Thursday, September 17, 2026

पहला और दूसरा संस्करण कब छपा?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बात जापान की है। जापान तक बौद्ध धर्म पहुंच चुका था। जापान में एक महाभिक्षु भोग्गालि पुत्तस अपने आश्रम में चिंतित बैठे हुए थे। उनके एक शिष्य ने अन्यमनस्क देखा, तो पूछ लिया, तात! आप उदास क्यों बैठे हुए हैं? महाभिक्षु ने कहा कि मैंने भारत में तथागत के कुछ उपदेश पालि भाषा में प्राप्त किए थे। शिष्य ने पूछा, क्या वे खो गए हैं? 

महाभिक्षु ने कहा कि नहीं, मैंने उसका जापानी भाषा में अनुवाद कर लिया है। अब उसके प्रकाशन की चिंता है। शिष्य ने कहा कि क्या, इसके लिए धनिकों के पास जाकर धन संग्रह किया जाए? महाभिक्षु ने कहा कि साधन भी साध्य की गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। क्यों न हम लोग मजदूरी करें। यह सुनकर सभी शिष्य चकित रह गए। बौद्ध ने मजदूरी करनी शुरू की, तो उद्देश्य जानकर लोगों ने धन देना भी शुरू कर दिया। 

काफी धन संग्रह हो गया, लेकिन संयोग से उन्हीं दिनों जापान के एक इलाके में दुर्भिक्ष पड़ा। महाभिक्षु ने संग्रहीत धन का उपयोग लोगों को वस्त्र और भोजन जुटाने में करना शुरू कर दिया। अगले वर्ष वर्षा हुई और दुर्भिक्ष खत्म हुआ। इस बार पहले से कम समय में धन संग्रह हो गया, लेकिन तभी महाभिक्षु को ज्ञात हुआ कि जापान में कई इलाकों में बाढ़ की वजह से फसलें नष्ट हो गई हैं। लोगों के पास खाने-पीने का अभाव है। 

महाभिक्षु ने इस बार भी लोगों के भोजन और वस्त्र के लिए संग्रहीत धन को बांटना शुरू कर दिया। अब उनके शिष्य थोड़ा निराश भी होने लगे थे। लेकिन इस बार पहले कहीं जल्दी धन संग्रह हुआ और उस पुस्तक का प्रकाशन संभव हुआ। पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर लिखा गया तीसरा संस्करण। लोगों ने पूछा पहले संस्करण कब छपे, तो शिष्यों ने कहा कि अकाल ग्रस्त और बाढ़ ग्रस्त लोगों की आंखों में पहला और दूसरा संस्करण पढ़ा जा सकता है। लोग उनकी बात से संतुष्य हो गए।

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