बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
आम्रपाली वैशाली की नगर वधू थी। रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति आम्रपाली के आगे पीछे वैभव डोलता रहता था। एक दिन सबने देखा कि साधारण वेश में आम्रपाली नंगे पांव महात्मा बुद्ध के आश्रम की ओर स्थिर कदमों में बढ़ती चली जा रही है। लोग आश्चर्य से भर उठे। आकंठ पाप कर्म में डूबी आम्रपाली बौद्ध संघ में क्या करने जा रही है, यह लोगों के बीच कौतूहल का विषय था। कुछ लोग उसके पीछे पीछे चल पड़े।वैशाली नगर में आम्रपाली का बौद्ध आश्रम की ओर जाना चर्चा का विषय बन गया। स्थिर कदमों से कई तरह की बातों को सोचती-विचारती आम्रपाली अंतत बौद्ध संघ तक पहुंच ही गई। भिक्षु संघ के प्रवेश द्वार पर आनंद किसी काम से निकल रहे थे। आम्रपाली ने जाकर उनसे विनती की, मैं महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए आई हूं। आनंद तत्काल उल्टे पैर लौट पड़े। उन्होंने भीतर जाकर महात्मा बुद्ध को संदेश दिया।
तब तक आम्रपाली भी पीछे-पीछे चलकर महात्मा बुद्ध तक पहुंच चुकी थी। करुणा निधान तथागत यह सुनकर खड़े हो गए। उन्होंने मधुर किंतु स्नेहमयी वाणी में कहा, आओ देवि! बुद्ध के स्वर से झरती करुणा में आम्रपाली का गात भी गया। वह फफक कर रो पड़ी। उसने रुदन करते हुए कहा, भगवन! मैं अपने पाप कर्म से ऊब चुकी हूं। क्या मेरा इस नरक से उद्धार होगा?
महात्मा बुद्ध ने करुणायुक्त स्वर में कहा, न...न! जिसे तुम पाप जीवन कह रही हो, वह समाज की बनाई हुई व्यवस्था है। देवि! जाग्रत जन ही समाज को नई व्यवस्था देते हैं। और सचमुच तथागत ने उसे नई व्यवस्था का मार्ग सुझा दिया। उस दिन के बाद अपना सब कुछ छोड़कर आम्रपाली भिक्षुणी बनकर इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई।
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