अशोक मिश्र
हरियाणा की सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट डेथ स्पॉट के रूप में बदल चुके हैं। राज्य में ब्लैक स्पॉट सड़क पर चलने वालों के लिए स्थायी जख्म बन चुके हैं जिस पर न तो सरकार ध्यान दे रही है, न ही केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण। राज्य में ब्लैक स्पॉट्स की संख्या और इनसे होने वाली मौतों का आंकड़ा राज्य की सड़क सुरक्षा की पोल खोलता है। राज्य में वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 474 ब्लैक स्पॉट्स चिन्हित किए गए थे।तकनीकी परिभाषा में ब्लैक स्पॉट वह स्थान है जिसे सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मानकों के अनुसार चिन्हित किया जाता है, जहां 500 मीटर के दायरे में पिछले तीन सालों में पांच सड़क दुर्घटनाएं जिनमें मृत्यु या गंभीर चोट हुई हो, या दस मौतें हुई हों। ब्लैक स्पॉट इंजीनियरिंग की विफलता के नक्शे हैं, कहीं तीखा मोड़ है, कहीं सर्विस रोड नहीं है, कहीं डिवाइडर का गलत कट है, कहीं रोशनी नहीं है, कहीं स्पीड ब्रेकर और साइनेज गायब हैं और कहीं हाईवे पर ही अवैध अतिक्रमण है।
सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट पर होने वाले हादसों के लिए केवल इंजीनियरिंग ही दोषी नहीं है। चालक भी बराबर के जिम्मेदार हैं। पुलिस डेटा बताता है कि सबसे ज्यादा शिकार पैदल यात्री और दोपहिया चालक होते हैं। ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में चलना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनना, हाईवे पर शराब के ठेकों के पास से निकलते हुए तेज रफ्तार, ये सब ब्लैक स्पॉट को डेथ ट्रैप में बदल देते हैं। एक ही ब्लैक स्पॉट पर जैसे दिल्ली-अंबाला हाईवे पर पानीपत में तीन साल में 41 हादसे और 26 मौतें हो चुकी हैं। यह मौतें साबित करती हैं कि सड़क का दोष स्थायी है पर चालक की गलती उसे घातक बना देती है।
अंतत: यही कहा जा सकता है कि हरियाणा में ब्लैक स्पॉट की समस्या सड़क की नहीं, सिस्टम की है। सरकार की योजना में ब्लैक स्पॉट सुधार को प्राथमिकता दी गई है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सभी चिह्नित स्थलों को मार्च 2026 तक सुधारने का निर्देश दिया था और मिशन मोड में काम करने पर जोर दिया था, लेकिन राज्य के कई ब्लैक स्पॉट आज भी लोगों की जान ले रहे हैं।
फरीदाबाद में ही वर्ष 2025 में चिन्हित ब्लैक स्पॉट पर हुए 56 हादसों में 30 लोगों की मौत हो चुकी है। ब्लैक स्पॉट दूर करने में लापरवाही कई कारणों से बरती जाती है। विभिन्न एजेंसियों जैसे एनएचएआई और राज्य विभागों के बीच समन्वय की कमी, बजट और संसाधनों की सीमितता, भूमि अधिग्रहण या निर्माण संबंधी बाधाएँ, तथा सुधार कार्यों की निगरानी में शिथिलता प्रमुख हैं। कभी-कभी स्थलों की पहचान के बाद स्थायी समाधान में वर्षों लग जाते हैं जबकि अल्पकालिक उपाय भी समय पर लागू नहीं होते। राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्राथमिकता की कमी भी इसमें योगदान देती है। हालांकि हाल के निदेर्शों और अभियानों से स्थिति में सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन निरंतर निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।
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