Friday, October 9, 2026

सच के आगे झूठ ज्यादा देर नहीं टिकता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के जीवन की राह कभी आसान नहीं रही। वह परस्पर विरोधी शक्तियों से आजीवन संघर्ष करते रहे। कुछ लोग समझते हैं कि बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्त होने के बाद हर जगह मान-सम्मान मिलता रहा। उनके अनुयायी हमेशा उनकी सुरक्षा में लगे रहे। जो भी उनके सामने आता था, वह उनका अनुयायी बन जाता था। ऐसा कुछ नहीं था। बुद्ध के बहुत सारे विरोधी थे और वह उनके खिलाफ कोई न कोई साजिश रचते रहते थे। 

एक बार महात्मा बुद्ध एक ऐसे राज्य से गुजर रहे थे जिसमें उनको नापंसद करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा थी। वह तथागत को परेशान करने, उन पर लांक्षन लगाने का कोई भी अवसर चूकते नहीं थे। जब उन्हें यह बता चला कि गौतम बुद्ध नगर में प्रवचन देने आए हैं। तब उन्होंने एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने एक महिला को तैयार किया और वह महिला पेट में कपड़े लपेटकर गर्भवती स्त्री की तरह उस जगह पहुंची, जहां धर्म सभा में महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। 

वह धर्मसभा में जाकर चिल्लाने लगी, देखो इस ढोंगी आदमी को। यह बहुत बड़ा महात्मा बना फिरता है। इसने मुझे गर्भवती कर दिया है और मुझे अपनाता भी नहीं है। अब यहां बैठा उपदेश कर रहा है। यह सुनकर सभा में खलबली मच गई। बुद्ध का शिष्य घबराया। उनसे बुद्ध से पूछा, भगवन! अब क्या होगा? बुद्ध मुस्कुराए और बोले, झूठ कभी नहीं टिकता है। चिंता मत करो। 

संयोग से जब वह महिला सभा के सामने गरज-गरज कर बुद्ध के चरित्र हनन का प्रयास कर रही थी, तभी उसकी करधनी ढीली होकर जमीन पर गिर पड़ी। उस महिला का राज खुल गया। वह शर्मसार हो गई। उसने धर्मसभा के सामने सच्चाई स्वीकार कर ली। लोग उसे मारने-पीटने के लिए उद्यत हो गए, तब बुद्ध ने लोगों को रोकते हुए कहा कि पतित लोग पहले ही मर जाते हैं। ऐसे में शारीरिक पीड़ा देने का कोई अर्थ नहीं है। वह स्त्री लज्जित होकर वहां से चली गई।

कांग्रेस और सपा में दरार की बात सच है या कोरी कल्पना?

अशोक मिश्र

पिछले तीन दिनों से इंडिया गठबंधन के सांसद सड़क पर हैं। आज भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसद और इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को कार्यकर्ता राजघाट पहुंच चुके हैं। पुलिस ने राजघाट के सभी द्वारों पर बैरिकेडिंग लगाकर अंदर जाने का रास्ता बंद कर दिया है। इंडिया गठबंधन के सांसदों का कहना है कि वह राजघाट जाकर बापू के सरकार को सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करेंगे। 

पिछले तीन दिनों से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन का प्रदर्शन दिल्ली में चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ियां हैं। इसके सहारे वोट चोरी हो रही है, इसलिए विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, एसआईआर रद्द करने और बैलेट पेपर पर चुनाव कराने की मांग कर रहा है। 

सात अक्टूबर को नई दिल्ली के जनपथ स्थित सागर रत्ना रेस्टोरेंट में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा आयोजित लंच के बाद करीब सौ सांसद जंतर-मंतर की ओर रवाना हुए। इसी लंच को लेकर विवाद खड़ा हुआ। बुधवार 6 अक्टूबर को सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से पहले खड़गे ने सभी विपक्षी पार्टियों के साथ मीटिंग बुलाई थी, लेकिन उसमें समाजवादी पार्टी का कोई सांसद शामिल नहीं हुआ। इसके बाद अटकलें लगीं कि इंडिया गठबंधन में दरार है। इस पर दो अलग-अलग दावे सामने आए। 

सपा सूत्रों ने दावा किया कि कांग्रेस ने उन्हें इस लंच के लिए आमंत्रित ही नहीं किया था। वहीं कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि लंच के लिए इंडिया गठबंधन के सभी दलों को आमंत्रित किया गया था। लंच का फैसला कल देर रात लिया गया और उसी समय जानकारी दी गई, इसलिए स्वाभाविक था कि कुछ दलों के प्रतिनिधि शामिल नहीं हो सके। कुछ दलों के प्रतिनिधि देर से सूचना के कारण शामिल नहीं हो सके। इसमें अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, शिवसेना उद्धव और एनसीपी शरद पवार गुट के लोग थे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन में कोई दरार नहीं है। इसी बीच उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर खींचतान की खबरें भी सामने आ रही हैं। 

कांग्रेस सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि वह कम से कम 150 सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा खेमे से 50 से 53 सीटें से लेकर 85-90 सीटें देने तक की अलग-अलग चर्चाएं चल रही हैं। एक अन्य रिपोर्ट में 53 से 55 सीटों का आॅफर बताया जा रहा है। अखिलेश यादव ने भी हाल में कहा था कि किसको कितनी सीट मिलेगी यह बड़ी बात नहीं, गठबंधन की जीत ज्यादा जरूरी है। भविष्य में राजनीतिक समीकरण क्या रूप अख्तियार करता है, इसके बारे में ठीक-ठीक कह पाना संभव नहीं है। लेकिन वर्तमान में जो हालत है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इंडिया गठबंधन में दरार की बात कोरी कल्पना है।

Thursday, October 8, 2026

Wealth Is Not Needed for Spiritual Well-being


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Buddhist literature abounds with stories concerning the Buddha and the Bodhisattvas. The Bodhisattva tales recount the stories of Gautama Buddha's past lives. Through their characters, these stories illustrate virtues such as purity, compassion, a sense of duty, and non-violence. Among these Buddhist tales is the story of a merchant named Shaur Puchchha. According to the story, Shaur Puchchha was an extremely wealthy merchant.

He was renowned for his generosity and was a devoted follower of Gautama Buddha. He harbored a deep desire to contribute to the Sangha (the monastic community). Once, Gautama Buddha was seated with his disciples, engaged in a discourse on the Dharma. Shaur Puchchha arrived and humbly stated, "I possess one hundred thousand gold coins. I wish to donate them to the Sangha so that arrangements for food, clothing, and other necessities can be made for the people." Upon hearing this, the Buddha silently rose and went to rest.

Shaur Puchchha sat there for a long time, pondering what mistake he might have made that caused the Buddha to leave without a word. By chance, he met the Buddha again some time later. Shaur Puchchha said to the Tathagata, "I have some gold ornaments that I wish to offer to the Sangha." Once again, the Buddha remained silent. A few days later, a grand religious assembly was organized in Vaishali, drawing thousands of people.

Everyone was occupied with some task or another. Shaur Puchchha arrived and, without asking anyone, set to work. The assembly concluded, and the people departed, yet Shaur Puchchha continued to work, completely absorbed in the task. At midnight, the Buddha approached him and asked, "My child, have you partaken of the *Prasad* (sanctified offering)?" Shaur Puchchha was overcome with emotion, his voice choking with feeling, and he prostrated himself fully before the Buddha. Buddha said that wealth is not required for spiritual well-being; all that is needed is devotion. Shaur Puchh had found the path to spiritual well-being.


आत्म कल्याण के लिए धन की जरूरत नहीं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध साहित्य में बुद्ध और बोधिसत्व से संबंधित तमाम कथाएं भरी पड़ी हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं बताई गई हैं। यह कथाएं जीवन में शुचिता, दया, कर्तव्यबोध और अहिंसा जैसे गुणों की पात्रों के माध्यम से व्याख्या करती हैं। इन्हीं बौद्ध साहित्य में शौर पुच्छ बनिक की एक कथा भी कही गई है। कथा के मुताबिक शौर पुच्छ एक बहुत ही धनवान व्यापारी था। 

वह अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। वह गौतम बुद्ध का एक अनन्य भक्त था। वह संघ के लिए बहुत कुछ करना चाहता था। एक बार की बात है। गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए धर्मचर्चा कर रहे थे। तभी वहां पर शौर पुच्छ वहां पर आया और उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएं हैं। मैं इन स्वर्ण मुद्राओं को संघ को देना चाहता हूं ताकि लोगों के लिए भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था किया जा सके। यह सुनकर बुद्ध चुपचाप वहां से उठे और विश्राम करने चले गए। 

वहां पर बैठा शौर पुच्छ काफी देर तक सोचता रहा कि उससे क्या गलती हुई जो बुद्ध बिना कुछ कहे सुने उठकर चले गए। एक दिन संयोग से उसकी मुलाकात फिर हुई। शौर पुच्छ ने तथागत से कहा कि मेरे पास कुछ स्वर्ण आभूषण हैं। यह मैं संघ को देना चाहता हूं। इस बार भी बुद्ध चुप रहे। कुछ दिनों बाद वैशाली में एक विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया। हजारों लोग जमा हुए थे। 

सभी लोग किसी ने किसी काम में लगे हुए थे। शौर पुच्छ वहां पहुंचा और बिना किसी से कुछ पूछे वह काम में लग गया। धर्मसभा खत्म हुई। लोग चले गए। शौर पुच्छ बेसुध काम करता रहा। आधी रात को बुद्ध उसके पास पहुंचे और कहा, वत्स! तुमने प्रसाद ग्रहण किया? शौर पुच्छ का गला रुंध गया। उसने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा कि आत्म कल्याण के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिए बस निष्ठा की जरूरत होती है। शौर पुच्छ को आत्मकल्याण का मार्ग मिल चुका था।

एसआईआर विवाद का टकराव से नहीं पारदर्शिता से निकलेगा समाधान


अशोक मिश्र

देश में इस समय चुनाव आयोग को लेकर बना माहौल चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष का प्रदर्शन और मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नारेबाजी, ये दोनों घटनाएं एक बड़े टकराव का हिस्सा हैं जिसका केंद्र है एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण। एसआईआर कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह मतदाता सूची को साफ करने की एक विशेष प्रक्रिया है जिसे तब अपनाया जाता है, जब मृत मतदाताओं के नाम, एक ही व्यक्ति के कई जगह नाम, पते बदलने और फर्जी नाम जुड़ने की शिकायतें बड़े पैमाने पर मिलती हैं। 

सामान्य पुनरीक्षण हर साल होता है, लेकिन एसआईआर गहन जांच के लिए कराया जाता है।  बिहार में 24 जून 2025 को इसके लिए आदेश जारी हुआ। बाद में दूसरे राज्यों में भी इसे लागू किया गया। विवाद की शुरुआत इसके बड़े पैमाने और गति को लेकर हुई। विपक्ष का कहना है कि बहुत कम समय में लाखों नामों का सत्यापन किया गया जिससे कई वास्तविक मतदाता भी सूची से बाहर हो गए। कुछ खबरों में यह भी आया कि आयोग के अंदर ही इस प्रक्रिया के तकनीकी बदलावों पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने असहमति दर्ज कराई थी। आयोग ने स्पष्ट किया कि संस्थागत फैसलों में अलग अलग राय आना सामान्य है। 

अंतिम आदेश सर्वसम्मति से जारी किया गया था। एसआईआर के साथ फॉर्म 6 का विवाद जुड़ गया जिसने आग में घी का काम किया। इस मामले में सबसे बड़ा पेच तब आया जब आयोग ने कहा कि इस अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है जबकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अदालत में स्पष्ट किया कि अदालत ने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी, उसने केवल स्वघोषणा के सिद्धांत को सही माना था। इसी पृष्ठभूमि में वोट चोरी का आरोप लगाया जा रहा है। विपक्ष खासकर कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा और एनडीए गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिए लक्षित तरीके से विरोधी मतदाताओं के नाम काटे गए और फर्जी मतदाता जोड़े गए। 

इस आरोप के पीछे तीन आधार बताए जा रहे हैं। पहला कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या में असामान्य वृद्धि या कमी के आंकड़े। दूसरा बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा बिना फील्ड वेरिफिकेशन के नाम हटाने की शिकायतें। तीसरा फॉर्म छह की अतिरिक्त शर्त को जानबूझकर कठिन बनाना। इस गतिरोध का समाधान टकराव से नहीं पारदर्शिता से निकलेगा। सबसे पहले एसआईआर के तहत हटाए गए और जोड़े गए नामों की बूथवार सूची सार्वजनिक कर सभी दलों को डिजिटल रूप में दी जानी चाहिए ताकि कोई भी दल घर बैठे जांच कर सके। 

चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उसकी गलती हो सकती है, उसकी आलोचना जरूरी है लेकिन उसे राजनीतिक विरोधी मानकर घेरने से अराजकता ही बढ़ेगी। भरोसा तभी लौटेगा जब प्रक्रिया अधिक खुली, जांच योग्य और सबकी भागीदारी वाली बनेगी।

Wednesday, October 7, 2026

The Purpose of Life is to Walk the Path of Knowledge

Bodhi Vriksha

Ashok Mishra

Sudatta was an immensely wealthy merchant of Shravasti (Savatthi). He was also known as Anathapindaka because he was always at the forefront of arranging food and education for the poor and orphaned children in and around Shravasti. He never hesitated to do good for others. It was for this reason that he was called Anathapindaka. He had purchased a forest belonging to Jeta—the son of King Prasenajit—at a high price and dedicated it to Mahatma Buddha. 

That forest is known as Jetavana. It still exists in Shravasti today. Once, Mahatma Buddha was delivering a sermon to his disciples in Jetavana. All the disciples were striving to internalize every single word spoken by the Tathagata. Just then, Mahatma Buddha saw Mahakashyapa, Maudgalyayana, Sariputra, Chunda, and Devadatta approaching. The Tathagata instructed his disciple Anathapindaka, "My child, rise! A group of Brahmins is approaching; arrange suitable seats befitting them." Anathapindaka was taken aback. 

He said, "Lord! Perhaps you do not recognize them. Only one among them is a Brahmin; the others belong to the Kshatriya, Vaishya, and 'Untouchable' castes." Hearing this, Buddha smiled and said, "My child, caste is not determined by birth but by qualities, temperament, and deeds. By their deeds, all of them are indeed Brahmins." 

As they drew closer, one of them praised Anathapindaka; Buddha remarked that the only shortcoming Anathapindaka had was that he had not yet grasped the true purpose of life. Had he understood that the purpose of life is to become altruistic rather than selfish, he would not have spoken in that manner. Walking the path of wisdom is more important than merely being wise. Hearing this, Anathapindaka felt humbled and grasped the essence of the Buddha's words; the true purpose of life is to walk the path of wisdom.


जीवन का उद्देश्य ज्ञान के मार्ग पर चलना है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रावस्ती (सावत्थी) के एक अत्यंत धनी व्यापारी थे सुदत्त। उन्हें  अनाथ पिंडक भी कहा जाता था क्योंकि वह श्रावस्ती के आसपास के गरीब और अनाथ बच्चों के भोजन और शिक्षा की व्यवस्था में सदैव आग रहते थे। वह लोगों की भलाई करने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। इसी वजह से उन्हें अनाथपिंडक भी कहा जाता था। उन्होंने प्रसेनजित के पुत्र जेत के वन को बड़ी कीमत देकर खरीदा था और उसे महात्मा बुद्ध को समर्पित कर दिया था।

 उस वन को जेतवन कहा जाता है। श्रावस्ती में यह वन आज भी मौजूद है। एक बार की बात है। जेतवन में महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ प्रवचन दे रहे थे। सभी शिष्य तथागत के एक-एक शब्द को आत्मसात करने का प्रयास कर रहे थे। उसी समय महात्मा बुद्ध को महाकश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुंद और देवदत्त आते हुए दिखाई दिए। 

तथागत ने अपने शिष्य अनाथ पिंडक को निर्देश देते हुए कहा कि वत्स! उठो, ब्राह्मण मंडली आ रही है, उसके बैठने के योग्य उचित आसन की व्यवस्था करो। अनाथ पिंडक शिष्य अचकचा गया। उसने कहा कि भगवन! आप शायद इन्हें पहचानते नहीं हैं। इनमें से एक ब्राह्मण है, बाकी क्षत्रिय, वैश्य और अस्पृश्य हैं। 

अनाथ पिंडक की बात सुनकर बुद्ध हंस पड़े और उन्होंने कहा, तात! जाति जन्म से नहीं, गुण, स्वभाव और कर्म से पहचानी जाती है। यह सभी लोग कर्म से ब्राह्मण ही हैं। पास आने पर एक ने अनाथ पिंडक की प्रशंसा की, तो बुद्ध ने कहा कि उसमें बस यही कमी है कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं जान सका। जीवन का उद्देश्य स्वार्थी नहीं परमार्थी बनना है, तो वह ऐसा नहीं कहता। ज्ञानी होने से ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान के मार्ग पर चलना होता है। यह सुनकर अनाथ पिंडक लजा गया और वह बुद्ध का कथन समझ गया।

महिलाओं के साथ होने वाले अपराध को रोकने की समाज की भी जिम्मेदारी

 

अशोक मिश्र

जब किसी महिला या बच्ची के साथ दुराचार या यौन शोषण होता है, तो शरीर पर लगने वाले घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, लेकिन उसके मन पर जो दंश लगता है, वह आजीवन उसे सालता रहता है। वह बलात्कार की पीड़ा से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाती है। बलात्कारी किसी महिला या बच्ची के शरीर को ही घायल नहीं करता है, बल्कि वह पीड़िता की आत्मा को भी छलनी कर देता है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से, पार्कों से, बसों से जो खबरें आई हैं, उन्होंने फिर एक बार सबके भीतर कुछ तोड़ दिया है। एक के बाद एक लड़कियों के साथ हुई हैवानियत की घटनाएं मर्माहत करती हैं। 

दिल्ली जैसी शहर, जो कभी सपनों का शहर कहलाता था, अब अपनी ही बेटियों के लिए सबसे असुरक्षित जगह बनता जा रहा है। तभी सुप्रीम कोर्ट की गुस्से और बेबसी दोनों से भरी टिप्पणी सामने आती है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से साफ कहा कि अब सिर्फ अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना काफी नहीं है, अपराध को होने से रोकना भी पुलिस का काम है। अदालत ने कहा कि जब तक असामाजिक तत्वों के मन में यह डर पैदा नहीं होगा कि अब कुछ किया तो मारे जाएंगे, तब तक जघन्य अपराधों पर रोक लगाना संभव नहीं है। 

यह शब्द कानून की किताब से ज्यादा एक पिता के आक्रोश जैसे लगते हैं। लेकिन क्या यही एकमात्र तरीका है। अगर फांसी के डर से ही बलात्कार रुक जाते तो शायद दुनिया में कहीं भी यह अपराध नहीं होता। कानून किताब में लिखा एक शब्द है, पर उसे जमीन पर उतारती है पुलिस व्यवस्था, और हमारी व्यवस्था अक्सर तब जागती है, जब सब कुछ लुट चुका होता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी पर चोट की है कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से जमीनी स्तर पर महिलाएं सुरक्षित नहीं होंगी। हमें गश्त बढ़ाने वाली, सर्विलांस बढ़ाने वाली, पहले से रोकने वाली पुलिस चाहिए। एक ऐसी पुलिस जो रात दस बजे सड़क पर अकेली चल रही लड़की को शक की नजर से नहीं, जिम्मेदारी की नजर से देखे। सबसे बड़ा सवाल इस समाज से है। किसी भी समाज में अपराधी अचानक पैदा नहीं होता। यह उसी घर में पनपता है जहां बेटे को सिखाया जाता है कि वह ज्यादा ताकतवर है। 

उसी स्कूल में पनपता है जहां लड़की की हंसी को गलत समझा जाता है। उसी मोहल्ले में पनपता है जहां हम चुप रहना सीख लेते हैं। जब तक हम अपने लड़कों को औरत की इज्जत करना नहीं सिखाएंगे, जब तक हम अपनी भाषा में, अपने मजाक में, अपनी सोच में औरत को वस्तु समझना बंद नहीं करेंगे, तब तक कोई भी कानून, कितना भी कड़ा क्यों न हो, इस जड़ को नहीं काट पाएगा। यह काम सिर्फ अदालत या थाने का नहीं है। यह काम हर घर का है। हमें ऐसी पीढ़ी बनानी होगी जो डर से नहीं, समझ से अपराध से दूर रहे।

Tuesday, October 6, 2026

Death is certain for everyone, Gautami!


bodhi tree

Ashok Mishra

Whoever is born, his death is certain. This is the law of the nature There is no exception to this rule. For millions and crores of years, living beings have been coming into existence and have been leaving this meaningless world after spending their lives. The same sequence will continue in future also. There is not the slightest possibility of any change in this. 

Although man has been trying to make himself immortal for centuries, it has not been possible yet. Once upon a time. The only son of a woman named Gautami died due to some reason. She loved her son very much. Although this is the quality of every mother, she loves her children the most. She became completely insane after her son's death. Gautami heard from someone that Mahatma Buddha had come to his city. 

He had heard that Mahatma Buddha was miraculous. If he wants, he can bring his son back alive. On hearing this, she immediately got up and reached the place where the Tathāgata was present. She went and fell at the feet of Buddha and started crying and requesting that her son be brought back to life. Buddha explained to him that it was not possible to bring his son back to life. 

Even then she did not agree. Then Buddha told Gautami that if she brought a pot of water from such a house, he would bless her and bring her son back to life. Gautami wandered throughout the day in the city and village, but she could not find a single pot of water because there was no house in which death had not occurred. She returned to Buddha in despair. 

Buddha explained that death is certain for everyone, only the timing is different. Gautami was disillusioned. The next day she performed the last rites of her son and remained engaged in public welfare throughout her life.

मृत्यु तो हर किसी की निश्चित है, गौतमी!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। इस नियम में कोई अपवाद नहीं है। लाखों-करोड़ों साल से जीव-जंतु पैदा होते आ रहे हैं, अपना जीवन बिताकर इस असार संसार से विदा लेते रहे हैं। भविष्य में भी ऐसा ही क्रम चलता रहेगा। इसमें किसी प्रकार के बदलाव की रंचमात्र संभावना नहीं है। 

हालांकि मनुष्य सदियों से अपने को अमर बनाने की कोशिश में लगा हुआ है, लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है। एक बार की बात है। गौतमी नाम की महिला का इकलौते बेटे की किसी कारणवश मृत्यु हो गई। वह अपने बेटे को बहुत प्यार करती थी। वैसे तो यह हर मां का गुण है, वह अपनी संतान को सबसे ज्यादा प्यार करती है। बेटे की मृत्यु पर वह एकदम विक्षिप्त सी हो गई। किसी से गौतमी ने सुना कि महात्मा बुद्ध उसके नगर में आए हुए हैं। उसने सुन रखा था कि महात्मा बुद्ध चमत्कारी हैं। वह अगर चाहें तो उसके बेटे को जिंदा कर सकते हैं। 

यह सुनते ही वह तत्काल उठी और उस जगह जा पहुंची जहां तथागत मौजूद थे। वह जाकर बुद्ध के चरणों में गिर पड़ी और रो-रोकर विनती करने लगी कि उसके बेटे को फिर से जिंदा कर दें। बुद्ध ने उसे समझाया कि उसके बेटे को अब जिंदा कर पाना संभव नहीं है। तब भी वह नहीं मानी। फिर बुद्ध ने गौतमी से कहा कि वह किसी ऐसे घर से एक लोटा जल ले आए तो वह उसे अभिमंत्रित करके उसके बेटे को जीवित कर देंगे। 

गौतमी नगर और गांव में दिन भर भटकी, लेकिन उसे एक लोटा पानी नहीं मिला क्योंकि कोई घर ऐसा नहीं था जिस घर में मौत न हुई हो। वह हताश निराश बुद्ध के पास लौट आई। बुद्ध ने समझाया कि मृत्यु सबकी निश्चित है, बस समय अलग-अलग है। गौतमी का मोह भंग हुआ। अगले दिन उसने अपने बेटे का अंतिम संस्कार किया और लोक कल्याण में आजीवन लगी रही।