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Wednesday, April 16, 2025

डॉ. जाकिर हुसैन ने नौकर के लिए बनाई चाय

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा गांधी के अनन्य सहयोगी डॉ. जाकिर हुसैन हमेशा विनम्रता को ही आचरण का आधार मानते थे। उनका जन्म 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद के एक अफरीदी पश्तून परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक पढ़ाई लिखाई उत्तर प्रदेश में हुई थी। बाद में वह उच्च शिक्षा के लिए बर्लिन गए थे और वहां से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। 

डॉ. जाकिर हुसैन जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। बाद में वह इसी विश्वविद्यालय में कुलपति भी बनाए गए। वह भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति भी रहे। उनकी विनम्रता के बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर है। उनके घर में एक नौकर था। काफी दिनों से वह जाकिर हुसैन के घर में काम करता आ रहा था, इसलिए वह थोड़ा आलसी भी हो गया था। 

वह सुबह देर तक सोता रहता था। घर के लोग सुबह जल्दी उठने को कहते थे, तो वह टालमटोल कर देता था। एक परिवार वालों ने इसकी शिकायत जाकिर हुसैन से की तो उन्होंने कहा कि उसे समझाओ। वह समझ जाएगा। लोगों ने उस नौकर को विभिन्न तरीके से समझाया, लेकिन उसकी समझ में नहीं आया। कुछ दिनों बाद लोगों ने उस नौकर की एक बार फिर शिकायत की और कहा कि अब आप ही उसे समझाएं। 

जाकिर हुसैन सहमत हो गए। अगले दिन सुबह पांच बजे एक गिलास में पानी लेकर उस नौकर के पास पहुंचे और उसे जगाते हुए बोले, उठिए जनाब, जागिए। मुंह हाथ धो लीजिए, तब तक मैं चाय बना लाता हूं। यह कहकर जाकिर हुसैन अंदर चले गए। थोड़ी देर बाद एक कप में चाय लेकर लौटे और नौकर से कहा, आप चाय पी लीजिए। यह सुनकर वह नौकर घबरा गया। अगले दिन वह नौकर सबसे पहले उठकर सारा काम किया। उसमें आए बदलाव से सब लोग चकित रह गए।


Tuesday, March 4, 2025

महात्मा गांधी और टैगोर में मतभेद

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम बहुत सारे लोगों ने अपनी आहुति दी थी। इस दौरान कुछ राजनीतिक संगठन भी बने जिन्होंने आजादी की लड़ाई की अगुआई की। कांग्रेस इसमें प्रमुख थी। इसके सर्वमान्य नेता थे मोहनदास करमचंद गांधी। गांधी जी अहिंसा के समर्थक थे। वहीं रवींद्रनाथ टैगोर भी अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों में जन जागृति कर रहे थे। लेकिन कहा जाता है कि महात्मा गांधी और रवींद्र नाथ टैगोर में वैचारिक मतभेद थे। कई मुद्दों पर टैगोर महात्मा गांधी से सहमत नहीं होते थे, तो वह खुलकर विरोध करते थे। वह गांधी जी के फैसलों को प्रभावित करने का प्रयास भी करते थे, लेकिन वह गांधी जी का अनादर नहीं करते थे। निजी और सार्वजनिक जीवन में वह गांधी की आलोचना करते हुए भी उनके मान सम्मान का पूरा ख्याल रखते थे। एक बार की बात है। गांधी जी शांति निकेतन आए, तो वहां पढ़ने वाली एक छात्रा ने गांधी जी से आटोग्राफ मांगा।

गांधी से उस छात्रा के अनुरोध को अस्वीकार नहीं कर सके। उन्होंने उसकी नोटबुक में लिखा कि जीवन में जब किसी व्यक्ति से कोई वायदा करो, तो उसे हर हालत में पूरा करने का प्रयास करो। अपने वायदे से मुकरना कतई उचित नहीं है। जब रवींद्र नाथ टैगोर को यह बात पता चली तो उन्होंने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि गांधी जी ने क्या लिखा है। उस नोट बुक पर गांधी जी की लिखी बात से टैगोर चकित रह गए।


उन्होंने उस छात्रा की नोटबुक में अपनी ओर से कविता की दो पंक्तियां लिखीं। आखिरी लाइन उन्होंने अंग्रेजी में लिखी कि जब तुम्हें पता  लगे कि तुमने गलत वायदा किया है, तो उसे तोड़ दो। वैसे कुछ लोगों का यह भी कहना है कि गांधी जी और टैगोर में कई बार अबोला हो जाता था। यह बात कितनी सही है, यह नहीं कहा जा सकता है। कई बार छोटी-छोटी बातों को लोग बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं।