Tuesday, October 16, 2012

‘करसी’ चली गई


-अशोक मिश्र
आप लोगों को एक मजेदार वाकया सुनाऊं। बात उन दिनों की है, जब नया-नया जवान हुआ था। कविताओं से समाज में क्रांति लाने का जज्बा मन में हिलोरें मार रहा था। उन्हीं दिनों नया-नया मार्क्सवादी भी हुआ था। कवि गोष्ठियों में जिन कविताओं में जरा-सा भी शृंगार रस या छायावादी काव्य की झलक मिलती, झट से फरमान जारी कर देता था, ‘अरे यार! यह कवि है या सामंतीवादी टट्टू।’ समंदर की लहरों की तरह ठाठें मारता जोश किसी से भी भिड़ने को तैयार रहता था। मैंने बहस और अंतहीन विवादों से अपना नाता इस तरह जोड़ रखा था, जैसे आंसू और विरह का आपसी रिश्ता होता है। लखनऊ में कोई भी साहित्यिक गोष्ठी हो, अपनी क्रांतिकारी कविताओं और विचारों के साथ मैं हाजिर। इस पुनीत कार्य को संपादित करने के लिए बीस-बाइस किमी तक साइकिल चलाता था। उन दिनों गजल लिखने का नया-नया शौक भी पाला था।

मेरे क्रांतिकारी विचारों और फरमानों का नतीजा यह हुआ कि कवि गोष्ठियों में जैसे ही मैं अपनी गजलें पढ़ता, कुछ मठाधीश टाइप के शायर तुरंत सुना देते, ‘बेटे! तुम्हारी गजलें ‘बहर’ से खारिज हैं, ‘काफिया’ भी दुरुस्त नहीं है, ‘रदीफ’ में सख्ता है।’ दूसरों को अपने फरमान से परेशान करने वाला मैं अब खुद परेशान रहने लगा, कि सारी रात उल्लुओं की तरह जागकर तुक और छंद भिड़ाने के बावजूद ये कमबख्त बहर, काफिया और रदीफ क्यों नहीं काबू आ रहे हैं। इसका जवाब सूझा कि मैं भी इन उर्दूदां लोगों की तरह उर्दू सीखूं और उर्दू अदब का कायदा भी। सो, मैं एक मौलवी जी के सान्निध्य में इस काम में युद्ध स्तर पर जुट गया। कुछ दिनों बाद हिज्जे मिला-मिलाकर उर्दू पढ़ लेने लगा। पारंगत होने के लिए ‘कौमी आवाज’ अखबार भी घर पर मंगाने लगा। एक दिन अखबार में एक शे’र पढ़ा, ‘करने चला सुधार तो करसी चली गई।’ मैं यहां ‘करसी’ शब्द का अर्थ नहीं समझ पाया, तो मैंने लखनऊ के एक मशहूर शायर ‘गाफ नून’ साहब से इसका अर्थ पूछा। उन्होंने समझाया, ‘यह एक क्रांतिकारी गजल है। आपने रामधारी सिंह दिनकर का महाकाव्य उर्वशी पढ़ा है न! उर्वशी का अर्थ ‘उर-वशी’ यानी दिल में बसने वाली भी है। इस शे’र में करसी शब्द भी ‘कर-सी’ यानी कर (टैक्स) की तरह के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ यह है कि जब शायर ने अपने आस-पास गरीबों को आर्थिक स्थिति सुधारने के गुर बताए, तो उनकी गरीबी और परेशानियां धीरे-धीरे ठीक वैसे ही खत्म हो गईं, जैसे जनता से धीरे-धीरे सरकार ‘कर’ (टैक्स) के रूप में पैसा खींच लेती है।’

चचा ‘गाफ नून’ के उत्तर से मुझे संतोष नहीं मिला, तो मैंने अपने अजीज मित्र शायर ‘बतकूचन बेढंगी’ से इस पंक्ति का अर्थ पूछा। वे यह शे’र सुनते ही उछल पड़े। उन्होंने शायर को दाद देते हुए कहा, ‘वाह...वाह! क्या उम्दा गजल कही है गजलगो ने। दरअसल, यह कबीरदास के रहस्यवादी और महादेवी वर्मा के छायावादी काव्य परंपरा का मिश्रित शे’र है। मियां! मेरा ख्याल है कि इस पंक्ति में आगे-पीछे कुछ शब्द गायब हैं। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं, पंक्ति कुछ इस प्रकार है, ‘निकाह करने चला सुधार, तो करसी चली गई।’ कहीं किसी गांव में ‘सुधार’ और ‘करसी’ नाम के आशिक-माशूका रहते थे। उनका इश्क जब गली-कूंचे में चर्चित होने लगा, तो माशूका के घरवालों ने ‘करसी’ पर तमाम तरह की बंदिशें लगानी शुरू कर दीं। एक दिन दोनों ने घर से भागकर निकाह करने का मनसूबा बनाया। दोनों नियत समय पर भागकर आशिक के एक दोस्त के घर पहुंचे। उसके बाद दूसरे दिन उनके दोस्त ने उन्हें काजी साहब के सामने निकाह के लिए पेश किया। निकाह हो पाता, इससे पहले घटनास्थल पर माशूका का चाचा आ धमका। डर के मारे माशूका करसी वहां से भाग गई।’
इतना कहकर ‘बतकूचन बेढंगी’ ने जिराफ की तरह गर्व से अपनी गर्दन उठाई, इधर-उधर देखा और चलते बने। मैं शायर ‘बतकूचन बेढंगी’ की व्याख्या से भी संतुष्ट नहीं था। काफी दिनों तक परेशान होकर इसका संभावित अर्थ खोजता रहा, मगजमारी करता रहा। ...लेकिन एक दिन, कुछ सोचते-सोचते मैं अचानक उछल पड़ा। इस पंक्ति का अर्थ मेरी समझ में आ गया था। दरअसल, यह मेरी कमअक्ली ही थी कि मैं उर्दू का बेसिक फंडा ही भूल गया था। उर्दू सिखाते समय मौलवी साहब ने बताया था कि उर्दू में लिखते समय कुछ मात्राएं लगाने का चलन नहीं है। जैसे उ, इ आदि की मात्राएं। यह बात समझ में आते ही शेर कुछ इस तरह बना, ‘करने चला सुधार, तो कुरसी चली गई।’

Sunday, October 14, 2012

‘मदरचेंज’ शॉपिंग मॉल


-अशोक मिश्र

नथईपुरवा गांव में रामभूल काका ने अपनी दस वर्षीय बेटी सुतंतरता (स्वतंत्रता) की पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा, ‘तू मेरी जान मत खा, अपनी अम्मा के पास जाकर मर।’ मैंने बुक्का फाड़कर रोती सुतंतरता को पलभर निहारा। उसकी आंख, नाक और मुंह से गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी बहकर ठुड्ढ़ी पर संगम जैसा कोलाज रच रही थी। मैंने रामभूल काका से उलाहने के स्वर में कहा,‘क्या काका! आप भी इस छोटी-सी बिटिया पर अपना क्रोध उतार रहे हैं। यह क्यों रो रही है?’

काका ने अंगोछे से अपना पसीना पोंछते हुए कहा, ‘क्या बताएं बेटा! श्यामता बाबू का बेटा गॉटर अभी थोड़ी देर पहले एक चमकीली पन्नी में लिए कुछ खा रहा था। अच्छा-सा उसका नाम है..खाते समय जो ‘कुर्र..कुर्र’ की आवाज करता है।’ मैंने कहा, ‘कुरकुरे...।’ काका रामभूल ने कहा, ‘हां बेटा! वही...अब ई अंगरेजी नाम तुमही लोग जानो। तो गॉटर को कुरकुरे खाते देख सुतंतरता ने जिद पकड़ ली कि मुझे भी कुरकुरे चाहिए। मैंने इस सुतंतरिया से कहा कि अपनी अम्मा से दो रुपये लेकर माता बदल पंसारी की दुकान से कंपट या टाफी ले लो, लेकिन इसे भवानी उठा ले जाए, यह अइलहवा मोड़ पर खुली ऊ चमक-दमक वाली दुकान से ‘कुर्रकुर्रे’ लेने की जिद सुबह से पकड़े हुए है।’ रामभूल काका की बात में गुस्सा, बेबसी और बेटी को पीटने का अपराधबोध एक साथ झलक रहा था। वे बोले, ‘बेटा! दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद कहीं जाकर सौ-सवा सौ रुपये मजदूरी मिलती है। अब अगर रोज-रोज सुतंतरता दस-बीस रुपये की यह आलतू-फालतू चीजें खरीदने की जिद करेगी, तो गुस्सा आएगा ही। गांव में यह अच्छी बला खोल दी है नासपीटों ने। जब से यह अंगरेजी दुकान खुली है, गांव के लड़के-लड़कियां बिगाड़ रही हैं।’

रामभूल काका की बात सुनते ही मुझे याद आया कि अइलहवा मोड़ पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अपना शॉपिंग मॉल अभी दो महीने पहले ही खोला है। छह महीने पहले जब मैं गांव आया था, तब यह शॉपिंग मॉल बन रहा था। उस समय शॉपिंग मॉल की बन रही इमारत को देखकर गांव के ही एक स्नातक बेरोजगार से मैंने पूछा था, ‘रंगनाथ भाई! यहां कोई सिनेमा हॉल बन रहा है क्या?’ गहरी सांस लेते हुए रंगनाथ ने कहा था, ‘नहीं भइया! यहां एक शॉपिंग मॉल खोला जाएगा।’ रंगनाथ की बात सुनकर मैं अवाक रह गया। रंगनाथ अपनी रौ में बोले जा रहा था, ‘भइया! आप तो जानते ही हैं, नथईपुरवा में पिछली चार पीढ़ियों से माता बदल पंसारी की दुकान चल रही है। गांव के लोग हल्दी, धनिया, गुड़, साबुन जैसी चीजों पीढ़ियों से माता बदल की दुकान से ही खरीदते आ रहे हैं। पैसा हुआ तो भी, नहीं हुआ तो भी। सुख हो, दुख हो, माता बदल पंसारी ने कभी उधार देने से किसी को मना नहीं किया। लोग सामान उधार लेते रहते हैं और जब अनाज पैदा होता है, तो चुकता कर देते हैं। लेकिन अब लगता है कि माता बदल पंसारी के बुरे दिन आ गए। सुना है, इस मॉल में सुई-धागे से लेकर हवाई जहाज, नमक-मिर्च से लेकर विदेशी कपड़े तक बिका करेंगे। सदियों से गांव में अपनी दुकान चला रहे माता बदल पंसारी की भट्ठी बुझाने और लोगों को लुभाने के लिए इस शॉपिंग मॉल का नाम जानते हो क्या रखा गया है...मदरचेंज शॉपिंग मॉल।’

रंगनाथ को उदास देखकर मैंन ढांढस बंधाते हुए कहा था, ‘रंगनाथ भाई! ये कंपनियां चाहे जो कुछ बेचें, लेकिन ये कंपनियां माता बदल पंसारी की तरह सौदा खरीदने गए बच्चों को ‘घातू’ (सौदा खरीदने गए बच्चों को दुकानदार की तरफ से दिया जाने वाला एक कंपट, भेली का एक टुकड़ा या एक बिस्कुट) तो नहीं देंगी न! तुम देखना, गांव के बच्चे घातू की लालच में इन कंपनियों की बड़ी-बड़ी दुकानों की ओर मुंह नहीं करेंगी। उन्हें घातू खाने की आदत जो पड़ गई है।’ लेकिन आज सुतंतरता को पिटने के बाद भी कुरकुरे खाने की जिद पर अड़ा देखकर मुझे लगा कि शायद मैं गलत सोच रहा था। मैंने रोती सुतंतरता को दस रुपये का नोट पकड़ाया और आगे बढ़ गया।

जुलाहे से लट्ठम लट्ठा


-अशोक मिश्र

लाला लक्ष्मी दयाल इंटर कालेज में दसवीं कक्षा की हिंदी विषय की अर्धवार्षिक परीक्षा में एक सवाल पूछा गया था, ‘सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम-लट्ठा’ मुहावरे का उदाहरण सहित अर्थ बताओ। इस स्कूल के एक होनहार छात्र ने मुहावरे का अर्थ बताते हुए उदाहरण दिया। भारत के किसी गांव में दो बुजुर्ग गप्प गोष्ठी जमाए बैठे थे। एक बुजुर्ग ने तंबाकू मलकर होठों के नीचे दबाने के बाद पिच्च से जमीन पर थूकते हुए कहा, ‘रामबचन! तुम यह समझो कि केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनने की देर है, बस। इधर वे प्रधानमंत्री बने कि हम लोगों के दुख-दलिद्दर समझो दूर हो गए। गांधी बाबा (महात्मा गांधी) तो सुराज (स्वराज्य) ही लाए थे, ये तो सुराज और क्रांति दोनों ला रहे हैं। एक दवा से काम न चले, तो दूसरी दवा हाजिर है।’

रामबचन ने सिर पर बंधी पकड़ी उतारकर सिर खुजाते हुए कहा, ‘भुलावन भाई! सुराज और क्रांति सब भ्रमजाल हैं। आजादी से पहले गांधी बाबा के सुराज का बड़ा हल्ला था। आजादी तो आई, लेकिन सुराज पता नहीं कैसे रास्ता भटककर अमीरों के घर पहुंच गया और उनके घर की पहरेदारी करने लगा। जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने कहा कि वे देश की गरीब जनता के लिए ‘समाजवाद’ ला रहे हैं। वे पता नहीं कैसा समाजवाद लाए कि गरीबों की दुर्गति हो गई। उनकी बेटी ने जब गद्दी संभाली, तो ‘गरीबी हटाओ’ नारे की ओट में वे गरीबों को ही हटाने लगीं। गरीब-गुरबा त्राहि-त्राहि कर उठे। गरीबों की दुर्दशा देखकर जेपी बाबू बिलबिला उठे। उन्होंने कहा कि अब गरीबी हटाओ से काम नहीं चलेगा, संपूर्ण क्रांति करनी होगी। लेकिन भाग्य फेर देखो, कुछ दिन आंदोलन चलाने के बाद उनकी संपूर्ण क्रांति साबुन के झाग की तरह न जाने कहां बिला गई। इसके बाद बड़े-बड़े दार्शनिक आए, विचारक आए, संत आए, महात्मा आए, निरहू आए, घुरहू आए, लेकिन सब बेकार। कभी नागनाथ प्रधानमंत्री बने, तो कभी सांपनाथ। सबने हमारे दुख-दलिद्दर को दूर करने की बीन बजाई,। हमारा दुख-दलिद्दर तो दूर नहीं हुआ, लेकिन उनकी सात पीढ़ियों का दुख-दलिद्दर जरूर दूर हो गया। सबने कहा कि गरीबी दूर करना हमारी पहली प्राथमिकता है, लेकिन पिछले साठ-पैंसठ साल से दो पीढ़ियां तो इसी भ्रमजाल में जीते-जीते बूढ़ी हो गईं। आज तक न सुराज आया, न संपूर्ण क्रांति हुई। हां, हम सबकी दुर्दशा जरूर हो गई। नोन, तेल, लकड़ी जुटाने में ही पूरी जिंदगी बिला गई।’

‘केजरीवाल अन्ना हजारे के चेले हैं, अन्ना हजारे अपने को गांधी बाबा का चेला कहते हैं। तुम देखना, राम बचन! गुरु गुड़ ही रहेगा, चेला शक्कर हो जाएगा। गांधी और अन्ना का यह चेला अपने गुरुओं से कहीं आगे जाएगा। हमने तो सुना है कि हिमालय पर्वत पर पिछले सौ साल से तपस्या कर रहा कोई योगी आया था, उसने केजरीवाल को कोई सिद्ध मंत्र दिया है जिसका जाप करते ही उसकी पार्टी के सारे उम्मीदवार दूध से धुल जाएंगे। उनके चरित्र पर कोई दाग नहीं रह जाएगा। भ्रष्टाचार की ओर तो वे आंख उठाकर नहीं देखेंगे। एक हफ्ता पहले जंतर-मंतर पर केजरीवाल को देखा नहीं, केंद्र सरकार पर कैसे गरज रहे थे। एकदम सुभाष बाबू की तरह।’ राम भुलावन ने जमीन पर पास रखी लाठी उठाकर पटकते हुए कहा,‘टीवी पर मैंने देखा था, जब वे बोल रहे थे, तो उनके सिर के चारों ओर एक आभा घूमती दिखाई दे रही थी। जैसे संतों-महात्माओं के होती थी पुराने जमाने में।’

‘भुलावन भाई! ये चेला ही तो सारी खुराफात की जड़ हैं। ऊंच-नीच करते खुद हैं और फोकट में बदनाम होते हैं उनके गुरु। तुमने देखा नहीं, गांधी के चेलों ने गांधी को किस तरह बेच दिया, मानो वे घर में फालतू पड़ी रद्दी हों। देखना एक दिन अन्ना के ये चेले अन्ना को भी बेच खाएंगे।’ रामबचन के इतना कहते ही राम भुलावन तमतमाकर उठ खड़े हो गए और लाठी हाथ में ले ली, ‘चोट्टे! तूने मेरे गांधी बाबा को रद्दी कहा। तू अपने आपको समझता क्या है? तेरी सारी मस्ती अभी झाड़ता हूं।’ इतना कहकर रामभुलावन ने रामबचन के सिर पर लाठी दे मारी। सिर से खून बहता देखकर राम बचन हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाए, तो उनके बेटे घर से निकल आए और फिर गांव में दोनों पक्षों में जमकर लाठियां चलीं। कई लोगों के हाथ-पांव टूटे, सिर फूटे और पुलिस ने दोनों तरफ के दस-दस, बारह-बारह लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

Tuesday, September 18, 2012

ये ‘पुंगी’ कैसे बजती है?

अशोक मिश्र

मेरा दस वर्षीय बेटा स्कूल से आया, तो मैंने लाड़ जताते हुए कहा, ‘आ गए लख्ते जिगर।’ बेटे ने रोज की तरह बस्ते को सोफे पर बड़ी बेमुरौव्वती से पटका और कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए पूछा, ‘पापा! ये पुंगी कैसे बजती है? और फिर यह पुंगी है क्या बला? मुझे आज शाम को मार्केट में चलकर एक पुंगी दिला दीजिए। मैं भी दिन भर बजाऊंगा।’ बेटे की बात सुनकर मैं चौंक गया, ‘क्या मतलब?’ बेटे ने मामले की पूंछ पकड़ाते हुए कहा, ‘वो एक गाना है न! एजेंट विनोद का। कहां चल दी, कहां चल दी, प्यार की पुंगी बजाके। यह गाना मैं रोज सुनता हूं, लेकिन आज तक यह नहीं जान पाया कि यह पुंगी आखिर भला बजती कैसे हैं?’


यह सवाल सुनकर मैंने गहरी सांस ली, ‘बेटा! मैं भी आज तक नहीं जान पाया कि यह पुंगी बजती कैसे हैं? यह तो निराकार ब्रह्म की तरह है, जिसकी बजती है, वही जानता है, लेकिन किसी दूसरे को बता नहीं पाता है कि उसकी पुंगी बजाई जा रही है।’ अब चौंकने की बारी बेटे की थी, ‘क्या मतलब? यह कौन सी बात हुई भला! जिसकी बजती है, वह किसी दूसरे को कैसे नहीं बता पाता?’ मैंने दार्शनिक अंदाज में कहा, ‘पुत्तर! पिछले पंद्रह साल से तेरी मम्मी रोज मेरी पुंगी बजाती हैं, लेकिन आज तक मैं किसी से नहीं बता पाया। ठीक वैसे ही जैसे अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले सात-आठ साल से पूरे देश की पुंगी बजा रहे हैं, लेकिन मजाल है कि कोई चूं चपड़ भी कर पाए। यूपीए सरकार नंबर दो की पुंगी ‘दीदी’ बजा रही हैं। दीदी की पुंगी बजाने पर ‘बहन जी’ और ‘नेता जी’ तुले हुए हैं। उत्तर प्रदेश में नेता जी के सुपुत्र की पुंगी बजाने को बहन जी तैयार बैठी हैं। बस, मौका मिलने की देर है।’ बेटे ने मासूमियत से कहा, ‘पापा! आपकी बात मेरी समझ में नहीं आई। मनमोहन सिंह, दीदी, बहन जी और नेताजी का समीकरण मेरी समझ में नहीं आया। जरा आप विस्तार से बताएं।’

‘बेटे! बात यह है कि पिछले सात-आठ साल से भ्रष्टाचार और घोटालों के माध्यम से केंद्र की सरकार आम जनता का कचूमर निकालने पर तुली हुई है, तुम्हारे शब्दों में जनता की पुंगी बजा रही है। केंद्र सरकार को समर्थन दे रही तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता दीदी गाहे-बगाहे समर्थन वापसी की धमकी देकर सरकार से अपने मनमुताबिक फैसले करवा लेती हैं। लेकिन दीदी की इस कूटनीति की हवा उत्तर प्रदेश की बहन जी और नेताजी बाहर से बिना शर्त समर्थन देकर निकाल देते हैं।’ मैंने बेटे को विस्तार से समझाने की कोशिश की, ‘इस बात को तुम दूसरे उदाहरण से समझो। 


अपने गुजराती रोल मॉडल नरेंद्र मोदी पिछले चार-पांच साल से राजनीतिक अखाडे में लंगोट कसे भाजपाइयों और संघियों को ललकार रहे हैं कि है कोई मेरे मुकाबले में तुम्हारे पास मुझसे अच्छा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार। लेकिन उनकी पार्टी के साथ गठबंधन किए बैठे नीतीश बाबू एक हद से ज्यादा बढ़ने पर उनकी पुंगी बजा देते हैं। वे कहते हैं कि संप्रग के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कोई सेकुलर होना चाहिए। लोग यह समझते हैं कि आज की राजनीति में सेकुलर मतलब नीतीश बाबू है। लेकिन नीतीश की पुंगी मराठी माणुस बाल ठाकरे यह कहकर बजा देते हैं कि सुषमा जी से बढ़िया प्रधानमंत्री का उम्मीदवार न अतीत में कोई हुआ है, न भविष्य में कोई होगा। फिल्म ‘पीएम : इन वेटिंग’ के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर आडवानी दादा अपनी पुंगी अलग ही बजा रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि राजनीति में हर कोई एक-दूसरे की पुंगी बजाने पर तुला हुआ है। बाकी वास्तव में पुंगी क्या बला है? अगर यह जानना हो, तो अपनी मम्मी से पूछो। शायद उन्हें मालूम हो।’


बेटे ने अपनी मम्मी को आवाज लगाई। घरैतिन ने किचन से निकलकर पूछा, ‘काहे को बाप-बेटे सिर पर आकाश उठाए हुए हो?’ नूर-ए-नजर ने मेरी कमअक्ली की बात दोहराते हुए वही सवाल दागा, तो घरैतिन ने तल्ख स्वर में कहा, ‘अक्लमंदों की जगह मंदअक्लों से ऐसी ज्ञान की बात पूछोगे, तो होगा क्या? दरअसल, पुंगी एक किस्म के कागज और चमकीली ‘पन्नी’ से बना बाजा है, जो मेले-ठेले में पांच-दस रुपये में बच्चे खरीदकर बजाते हैं। याद करो, पिछले महीने तुमने एक कागज का बाजा खरीदा था जिसमें फूंक मारने पर ‘पूं...ऊ..ऊ..ऊ..ऊ’ की आवाज निकलती थी जिसे तुमने तीन दिन और रात बजा-बजाकर भेजा फ्राई कर दिया था।’ बेटे ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘अच्छा...तो वो पुंगी है?’ इतना कहकर वह स्कूल की ड्रेस चेंज करने चला गया और मैं पुंगी की तरह मुंह बाए बैठा रहा।

Wednesday, September 5, 2012

बिल्लो रानी! कहो तो...

अशोक मिश्र                                                                                                                                                                                               मुसद्दी लाल आफिस जाने के लिए घर से निकले ही थे कि अपने दरवाजे पर खड़े प्रपंची राम दिख गए। उनके हाथ में एक मोटा-सा डंडा था जिसको वे लाठी की तरह कंधे पर रखे क्रोधित बैल की तरह नथुने से फुफकार छोड़ रहे थे। प्रपंची राम लपक कर मुसद्दी लाल के आगे आ खड़े हुए और बोले, ‘सुनो! तुम्हारा बेटा तो तुम्हारे हाथ से निकल गया। उसकी करतूत को देखकर तो मन करता है कि जड़ दूं तुम्हारे कान के नीचे एक कंटाप। तेरी हरकतों को देखकर ही मुझे लगता था कि एक दिन तेरा बेटा तुझसे चार जूता आगे निकलेगा। आज मेरी बेटी बिल्लो रानी को प्रेमपत्र देकर उसने साबित कर दिया कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात।’ प्रपंची राम की बात सुनकर मुसद्दी लाल को गुस्सा आ गया। उन्होंने तल्ख स्वर में कहा, ‘क्या बक रहे हैं आप? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। लाल बुझक्कड़ी छोड़िए और आपको जो कुछ कहना है, साफ-साफ कहिए। मुझे आफिस के लिए दे हो रही है।’
प्रपंची राम ने घूरते हुए कहा, ‘कहूंगा तो है ही। कहने के लिए ही तो तुम्हारा थोबड़ा सुबह-सुबह देख रहा हूं, वरना तू ‘सनी लियोन’, मलाइका अरोड़ा खान या मल्लिका शहरावत नहीं है कि तेरे दीदार को सुबह-सुबह अपने दरवाजे पर खड़ा रहूं। बात दरअसल यह है कि तम्हारे साहबजादे जनाब खुरपेंची राम अभी थोड़ी देर पहले मेरे घर के सामने से होकर स्कूल जा रहे थे। संयोग से उसी समय मेरी बेटी ‘बिल्लो रानी’ भी स्कूल जाने के लिए घर से निकली। मेरी बेटी को देखते ही आपके लख्तेजिगर ने अपने स्कूली बैग से प्रेमपत्र निकाला और मेरी बेटी को जबरदस्ती पकड़ा दिया। उसके बाद वह शायराना अंदाज में मेरी बेटी से बोला, डॉर्लिंग! मेरा प्रेमपत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना। इसके बाद वह नामाकूल ‘बिल्लो रानी! कहो तो अभी जान दे दूं’ गाता हुआ चला गया। मैं दरवाजे के पीछे खड़ा सब सुन रहा था। पहले तो सोचा कि तुम्हारे सुपुत्र को लगाऊं एक हाथ, ताकि तबीयत हरी हो जाए। लेकिन फिर अभी कुछ ही दिन पहले एक मुख्यमंत्री का दिया गया बयान याद आया कि यदि कोई अपराध करे, तो उसके बाप को पकड़ो और उसे पीटो। अगर कोई बेटा आवारा, बदचलन, चोर-डाकू निकलता है, तो इसके लिए उसका बाप दोषी है। इसलिए आप तुम्हारे बेटे की खता की सजा तुझे भोगनी पड़ेगी।’
प्रपंची राम की शिकायत सुनकर मुसद्दी लाल चौंक गए। मन गी मन कहने लगे, ‘हूंऊ...साहबजादे मेरा ही रिकॉर्ड तोड़ने चले हैं। आज से पच्चीस साल पहले मेरा और छबीली का टांका तो चौदह साल की उम्र में भिड़ा था। लेकिन मेरे ‘नूरेनजर’ खुरपेंची राम के तो अभी दूध के दांत भी टूटे नहीं हैं। बारह साल की उम्र में चले हैं इश्क फरमाने।’ मुसद्दी लाल ने प्रपंची राम से कहा, ‘अरे भाई! ठंड रखो...ठंड। पहले सच-सच यह बताओ कि जब मेरे बेटे ने आपकी बेटी बिल्लो रानी को प्रेम पत्र दिया, तो आपकी बेटी ने क्या कहा, उसके चेहरे का भाव कैसा था?’
प्रपंची राम ने सोचने वाली मुद्रा अख्तियार कर ली। बोले, ‘पत्र पाकर पहले तो मेरी बेटी शरमाई और फिर उसने झट से बैग में रख लिया और बोली, सुनो! तुम स्वीटी से बात मत किया करो। मुझे अच्छा नहीं लगता।’ अब गरजने की बारी मुसद्दी लाल की थी, ‘जब इश्क लड़ाने के अपराध में तुम्हारी बेटी भी बराबर की भागीदार है, तो सिर्फ मेरी या मेरे बेटे की पिटाई क्यों? तुम्हारी भी पिटाई होनी चाहिए। बोलो क्या कहते हो?’ मुसद्दी लाल ने समझाने वाले लहजे में कहा, ‘बरखुरदार! इन स्थितियों के लिए दोषी भी हम ही लोग हैं। हमारे पास इतनी फुरसत ही नहीं है कि हम यह देख सकें कि हमारे बेटे-बेटियां क्या कर रहे हैं? कहां जा रहे हैं? क्या पढ़-लिख रहे हैं? हमने उन्हें तमाम सुख-सुविधाएं देकर समझ लिया है कि हमारा कर्तव्य पूरा हो गया। हमने उनसे दोस्ती करने, उनके साथ बोलने-बतियाने, खेलने-कूदने की जरूरत ही नहीं समझी। हमने तो सिर्फ पैसा कमाने और उसे परिवार पर खर्च को ही अपना कर्तव्य मान लिया है। ऐसे में यह नई पीढ़ी क्या करेगी। वह ऐसे ही गुल-गपाड़े करेगी और हम उन पर अंकुश लगाएंगे, तो वे बगावत करेंगे। आप निश्चिंत रहें, अपने बेटे को समझाऊंगा। उसके साथ दोस्ती करके उसका विश्वास जीतूंगा और उसे कुछ बनने को प्रेरित करूंगा। आप भी अपनी बेटी के दोस्त बनकर उसे समझाएं। सही रास्ते पर लाएं।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल चलते बने।

आखिर कब होगा विहान?


अशोक मिश्र   

देश के अन्य राज्यों के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोण्डा, बलरामपुर, बस्ती, बहराइच, बाराबंकी आदि जिलों में एक जनजाति बसती है थारू। थारू जनजातियों की महिलाओं को न तो अपना अधिकार मांगना पड़ता है, न ही उन्हें इसके लिए किसी पंचायत, न्यायालय या पुलिस के पास जाने की जरूरत होती है। यह उनकी परंपरा में है। यदि पुरुष को मनचाही स्त्री को रखने की इजाजत है, तो स्त्री को भी यह अधिकार मिला हुआ है कि वह जब चाहे अपनी पसंद के पुरुष के साथ रह सकती है ( ठीक लिव इन रिलेशन की तरह), उसके साथ पहले पति को त्यागकर विवाह कर सकती है। हां, इसके लिए बस जातीय पंचायत में अपनी बात रखनी होगी। इस जनजाति में न तो नारी दलित है, उत्पीड़ित है, न शोषित है, और न ही शोषक की भूमिका में है। यहां न दहेज की समस्या है, न ही दैहिक या मानसिक शोषण की। स्त्री और पुरुष जनजातीय मर्यादाओं और परंपराओं में बंधे होने के बावजूद स्वतंत्र होते हैं। इनकी जनजातीय व्यवस्था में शोषण का कहीं कोई स्थान नहीं है। इसका यह मतलब नहीं है कि इनका शोषण, दोहन या उत्पीड़न नहीं होता है। इनका शोषण, दोहन और उत्पीड़न का माध्यम बनती हैं इनकी जातीय व्यवस्था से इतर की व्यवस्थाएं।
ऐसा क्यों है? इसका विश्लेषण करने पर एक बड़ा रोचक तथ्य सामने आता है। वह यह कि थारू और इनकी जैसी अन्य जनजातियां ज्यादातर आज भी घुमंतू ही हैं। इनके पास निजी संपत्ति के नाम पर तंबू, कनात, छेनी, हथौड़ी, कुल्हाड़ी, पेशागत अन्य औजार, बकरी, भैंस आदि ही होते हैं।
खेत या खलिहान जैसी व्यवस्था घुमंतूपन की वजह से इनके किसी काम की नहीं है। परिवार का मुखिया स्त्री या पुरुष दोनों में से कोई भी हो सकता है, लेकिन उस परिवार के सभी सदस्यों का उत्पादन के साधनों यानी निजी संपत्ति पर समान अधिकार होता है। यदि किसी वजह से इस जनजाति की स्त्री या पुरुष के बीच संबंध विच्छेद होते हैं, तो सभी चीजों का बराबर बंटवारा होता है। यही वजह है कि इन जनजातियों में स्त्रियां स्वतंत्र होती हैं। महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को सुधारने में इस आदिवासी मॉडल को अपनाया जा सकता है। यदि नहीं, तो महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक चेतना और उनकी बदतर स्थिति को सुधारने में महिला आरक्षण विधेयक को पास कर, उसे कानून बनाकर उनमें आत्म विकास की ज्योति जगाई जा सकती है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी का निहितार्थ समझते थे, तभी तो पहली लोकसभा के गठन के बाद सन 1952 में उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की अपील की थी। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था, ‘आज जब मैं संसद के दोनों सदनों के लगभग सात सौ सदस्यों के साथ मिल रहा था, तो मैंने पाया कि इन सदस्यों में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। मैं समझता हूं कि ऐसा ही विधानसभाओं और कौंसिलों में भी होगा। यह किसी का विरोध करने या किसी की तरफदारी करने का मामला नहीं है। यह मेरा विश्वास है कि हमारा वास्तविक और आधारभूत विकास तभी हो सकता है, जब सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की पूर्ण स्वतंत्रता महिलाओं को मिले।’ नेहरू की मंशा को न तो तब किसी ने समझने की जरूरत समझी और न ही आज उन्हें समझने का प्रयास किया जा रहा है। यदि राजनीतिक दलों ने आपसी भेदभाव भुलाकर महिलाओं की उन्नति की दिशा में प्रयास किया होता, तो शायद आज महिलाओं की यह दयनीय दशा नहीं हुई होती।
काफी जद्दोजहद के बाद 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम 1993 में पारित कर सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देकर उनकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। नतीजा सबके सामने है। आज देश में लगभग साढ़े सात लाख ग्राम पंचायतें हैं जिनमें से लगभग साढ़े चार लाख चुनी गई महिला सरपंच गांव और समाज के विकास में अहम भूमिका अदा कर रही हैं। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सरकार का यह कदम मील का पत्थर साबित हो रहा है।
अगर हम इन पंचायतों में चुनी गई महिलाओं की गणना करें, तो यह विश्व में संसद, विधानसभाओं और अन्य क्षेत्रों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या से बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद स्थिति संतोषजनक नहीं है। आजादी के पैंसठ सालों में देश ने कई मामलों में उल्लेखनीय प्रगति की। दूरसंचार, सैन्य, औद्योगिक विकास और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमारे देश की प्रगति ने अमेरिका, चीन, रूस जैसी महाशक्तियों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है, लेकिन महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के मामले में हमने कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं हासिल की है। राजनीतिक पार्टियां संसद से बाहर तो महिला आरक्षण विधेयक को पास करने की तरफदारी करते हुए नहीं अघाती हैं, लेकिन संसद सत्र के दौरान उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है। आम राय के नाम पर महिला आरक्षण बिल आज तक लटका हुआ है।
ऐसी स्थिति सिर्फ हमारे देश में ही हो, ऐसा भी नहीं है। संसद में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में रवांडा, स्वीडेन, क्यूबा, फिनलैंड, नेपाल, अफगानिस्तान और साउथ अफ्रीका जैसे पिछड़े और अविकसित देश दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका, रूस, चीन और भारत से कहीं आगे हैं। अविकसित   और पिछड़े देशों में शुमार साउथ अफ्रीका सन 2004 में निम्न सदन के लिए हुए चुनाव में 400 में से 132 महिलाएं और सर्वोच्च सदन के लिए हुए चुनाव में 54 में से 22 महिलाएं चुनी गई थीं। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में सन् 2006 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में 435 सीटों में से महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 73 थी, वहीं उच्च सदन में सौ सीटों के मुकाबले 16 महिलाएं ही पहुंची थी। सन 2009 में हुए आम चुनाव में भारतीय महिलाओं के लोकसभा में पहुंचने का आंकड़ा इन देशों के मुकाबले तो और भी कम रहा। 543 सीटों के लिए हुए चुनाव में सिर्फ 59 महिलाएं ही संसद में पहुंच सकीं, उस पर भी इस देश की नेताओं ने यह कहकर अपनी पीठ थपथपाई कि सन 1952 से लेकर आज तक इतनी महिलाएं लोकसभा में नहीं पहुंची थीं। यदि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण मिल जाता है, तो भी उनकी स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है। आज भी हमारे देश की महिलाओं की दशा कई पिछड़े और अविकसित कहे जाने वाले देशों के मुकाबले बदतर है।

कम भ्रष्ट बनाम ज्यादा भ्रष्ट


-अशोक मिश्र
नवगठित ‘मन्ना पार्टी’ के प्रदेश कार्यालय में भारी भीड़ थी। ‘मन्ना पार्टी’ का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर जब राम निहोर जी पहली बार पार्टी कार्यालय आए, तो पिछले कई महीने से राम निहोर जी की गणेश परिक्रमा कर रहे कुछ मुंहलगे कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक समारोह प्रदेश कार्यालय में आयोजित किया। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ‘अनशन प्रसाद’ भी बुलाए गए। राष्ट्रीय महासचिव अनशन प्रसाद, नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष राम निहोर जी सहित कई छुटभैये नेताओं के मंचासीन होते ही कार्यकर्ताओं ने जोश में नारे लगाना शुरू किया, ‘भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाएंगे, मन्ना जी को प्रधानमंत्री बनाएंगे!...भ्रष्टाचार का नाश हो! सदाचार की जय हो!’ कार्यक्रम का संचालन कर रहे ‘लंबित लोकपाल’ ने सदाचारी कार्यकर्ताओं को शांत रहने का इशारा करते हुए कहा, ‘साथियो! आप सबको मालूम है कि दूसरे गांधी के खिताब से नवाजे गए मन्ना जी भारत को भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रयास के तहत राम निहोर जी को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। आप सब यह जानते ही होंगे कि मन्ना पार्टी में आने से पहले राम निहोर जी ‘राष्ट्रीय हेराफेरी संस्थान’ के अध्यक्ष थे, लेकिन आदरणीय मन्ना जी के आह्वान पर ये अपना सर्वस्व त्यागकर पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता बने और अब प्रदेश अध्यक्ष। मैं राष्ट्रीय महासचिव अनशन प्रसाद जी से आग्रह करता हूं कि वे दो शब्द कहकर हमें दिशा-निर्देश दें, ताकि हम उनके बताए मार्ग पर चल सकें।’
सबसे पहले बुलाए जाने से खफा महासचिव अनशन प्रसाद ने माइक को मजबूती से पकड़कर लगभग गुर्राते हुए कहा, ‘साथियो! आप सबके बीच अपने को पाकर मैं धन्य महसूस कर रहा हूं। एक बात आप साथियों से कहने का मन हो रहा है। बात यह है कि मन्ना दादा ने अनशन खत्म करने की घोषणा भले ही की हो, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है। हमारा केंद्रीय नेतृत्व देश भर में घूम-घूमकर भ्रष्टाचार के खिलाफ वातावरण तैयार कर रहा है। चूंकि अभी पूरा देश भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो सका है, ऐसे में पार्टी की मजबूरी है कि वह कुछ मामलों में लचीला रुख अपनाए। अत: जरूरत पड़ी, तो सिर्फ बीस फीसदी भ्रष्ट या दागी नेताओं को संगठन और पंद्रह फीसदी से कम भ्रष्ट व्यक्ति को सरकार में शामिल किया जाएगा।’
-इतना कहकर अनशन प्रसाद ने कार्यकर्ताओं पर एक निगाह डाली, ‘साथियो! अगर हम साफ-सुथरे और बेदाग छवि वाले अपेक्षित उम्मीदवारों को चुनने में असफल रहे, तो देश-विदेश से लाखों-करोड़ों रुपये अनुदान लेकर गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) चलाने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। एक ही शहर में आयोजित दो कार्यक्रमों में भाग लेने के बाद दोनों संस्थाओं से आने-जाने का किराया लेकर डकार जाने वाले को चुनाव के दौरान पार्टी टिकट देने में सत्रह फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। लाखों रुपये आयकर बकाया रखने वालों को भी प्रमुखता दी जाएगी। ‘अब या तो मेरी लाश ही यहां से उठेगी या फिर सरकार मांगे मानेगी’ कहकर आमरण अनशन पर बैठने और बाद में सेहत की आड़ में अनशन से भाग लेने वालों को मन्ना पार्टी न केवल मंत्रिमंडल में शामिल करेगी, बल्कि उसे दूसरे राज्यों में होने वाले चुनावों के दौरान प्रचार भेजा जाएगा।’
महासचिव की बात सुनकर नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष राम निहोर जी मुस्कुराए और फिर एकाएक गंभीर हो गए। उधर, महासचिव अनशन प्रसाद अपनी रौ में बोलते जा रहे थे, ‘आप लोग तो पिछले पैंसठ साल की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह समझ ही गए होंगे कि इस देश में बेदाग और सदाचारी लोगों की बहुत कमी है। आजादी के एकाध दशक तक तो ईमानदार, सद्चरित्र और नैतिक आचरण को आत्मसात करने वाले मंत्री, सासंद, विधायक, नेता और अधिकारी बीस-पच्चीस फीसदी पाए जाते थे, लेकिन अब पूरी आबादी में एकाध प्रतिशत ही ऐसे लोग बचे होंगे। हमारी पार्टी ऐसे गुणी व्यक्तियों को विलुप्त प्राय मानती है और इनको संरक्षित करने के लिए चुनाव टिकट देने से लेकर पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण पद देने का प्रयास कर रही है। इस पर भी बात नहीं बनी, तो हमारी पार्टी कम भ्रष्ट लोगों को टिकट देकर उन्हें पहले संसद और विधानसभा में पहुंचाएगी और फिर हृदय परिवर्तन कर उन्हें सद्चरित्र, ईमानदार और नैतिक बनाने का प्रयास करेगी। लेकिन, एक बात आप लोगों के सामने स्पष्ट कर दूं, हमारी पार्टी की सरकार बनने पर दाल में नमक बराबर भ्रष्टाचार करने वालों को तो आम माफी दी जाएगी, लेकिन इससे ज्यादा भ्रष्ट लोगों को इस देश में रहने की कोई जगह नहीं मिलेगी।’ इतना कहकर महासचिव अनशन प्रसाद ने उपस्थित भीड़ को अभिवादन किया और अपनी जगह पर बैठ गए।

आइए, कहानी-कविता चुराएं


-अशोक मिश्र
उस्ताद गुनहगार मुझको बता रहे थे, ‘पाकेटमारी और चोरी दो अलग-अलग विधाएं हैं। पाकेटमारी कला का जन्म और विकास अंग्रेजों के भारत आगमन के बाद हुआ था। मेरे परदादा बताते थे कि शाहजहां के शासनकाल में जब पहला अंग्रेज भारत आया था, तो गोवा में मेरे लक्कड़दादा के लक्कड़दादा ने उनकी पाकेट मार दी थी। उसके पाकेट में इंग्लैंड के अलावा एक जहांगीरी सिक्का भी था। यह जहांगीरी सिक्का आज भी हमारे परिवार का मुखिया अपने उत्तराधिकारी को सौंप जाता है। लेकिन यह मुई चौरवृत्ति वैदिक युग से ही चली आ रही है। चौरकर्म का प्रमाण पहली या दूसरी शताब्दी में गुप्तकाल में रची गई शूद्रक की मृच्छकटिकम में भी मिलता है। इसमें एक चोर ब्राह्मण रात में अपनी जनेऊ से नाप-नापकर कलात्मक सेंध तैयार करता है और सुबह हो जाने की वजह से पकड़ा जाता है।’
‘लेकिन आप मुझे यह सब क्यों बता रहे हैं?’ आजिज आकर मैंने पूछा। आज सुबह सोकर उठा भी नहीं था कि उस्ताद गुनहगार लगभग नक्सलियों की तरह घर में आ घुसे। मैं उनको देखते ही समझ गया कि हो गया दिन का सत्यानाश। कहां सोचा था कि बारह बजे तक सोकर छुट्टी का जश्न मनाऊंगा। उस्ताद गुनहगार ने तंबाकू फांकते हुए कहा, ‘वही बताने तो मैं सुबह-सुबह आया हूं, वरना न तो तू कोई देव है और न ही तेरा घर कोई तीर्थस्थान। कल एक पार्क में ‘कपि गोष्ठी’(कवि गोष्ठी को गुनहगार यही कहते हैं) हो रही थी। मैंने सोचा, चलो एकाध अच्छी कविताएं सुनने को मिलेंगी। इसी आशा में वहां बिछी दरी पर जा बैठा। वहां एक ‘जवानी दिवानी’ टाइप की कवयित्री भी आई हुई थीं। माइक पकड़कर वह पहले तो अपने लटके-झटके दिखाती रहीं और फिर उन्होंने गोपालदास नीरज की एक गजल अपनी कहकर हम सब के सिर पर दे मारा। हद तो यह थी कि सारे बेवकूफ श्रोता उस जवानी दिवानी के हर लफ्ज पर ‘वाह...वाह’ कहते रहे।’
गुनहगार की बात सुनकर मैं गंभीर हो गया। मैंने कहा, ‘उस्ताद, साहित्यिक चोरियां तो इधर कुछ सालों से बहुत बढ़ गई हैं। मैं आपको एक किस्सा बताऊं! मेरे एक कवि मित्र हैं ढपोरशंख जी। उनका यह तखल्लुस इतना चर्चित हुआ कि लोग असली नाम भूल गए। वे पिछले दस सालों से इनकी गजल, उनके गीत, फलाने का मुक्तक, ढमकाने का छंद अपने घर में रखे साहित्यिक खरल में डालते हैं और उसे दस-बीस घंटे तक घोंटते रहते हैं। और फिर, उस खरल से नए-नए गीत, छंद, गजल और मुक्तक मनचाही मात्रा में निकाल लेते हैं। गली-मोहल्ले में होने वाली कवि गोष्ठियों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों में वे बड़ी हनक से अपनी कहकर गीत, गजल और छंद पढ़ते हैं। मजाल है कि इस साहित्यिक हेराफेरी पर कोई चूं-चपड़ कर सके।’
मेरी बात सुनकर गुनहगार सिर हिलाते रहे। फिर बोले, ‘हां मियां! साहित्यिक चोर तो कबीरदास, तुलसीदास और रहीमदास से लेकर निराला, पंत, महादेवी वर्मा तक और आज के तमाम प्रख्यात कवियों, कथाकारों और कहानीकारों की ‘वॉट’ लगाने पर तुले हुए हैं। इन रचनाओं के रीमिक्स तैयार किए जा रहे हैं। कोई माई का लाल विरोध करने वाला भी नहीं है। मैं तुम्हें क्या बताऊँ। मेरे एक परिचित लेखक हैं। कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं। पहली पुस्तक जब प्रकाशित हुई थी, तभी कुछ लोगों ने दबी जुबान से उन पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया था। बाद में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों को लेकर भी लोगों ने यही आरोप दोहराया, तब भी मुझे विश्वास नहीं हुआ। दो साल पहले जब मैं एक मासिक पत्रिका का संपादक बनाया गया, तो वे मुझे मिलने मेरे दफ्तर आए। बड़ी गर्मजोशी से मिले और जाते समय अपनी तीन रचनाएं मुझे थमा गए। मैंने उनसे तीनों रचनाएं एक-एक करके छाप दी। इन रचनाओं के छपने के चार-पांच महीने बाद एक दिन मेरे नाम नोटिस आई कि मेरे परिचित ने अपनी बताकर जो तीनों रचनाएं मेरी पत्रिका में छपवाई थीं, वे तीनों रचनाएं वास्तव में महात्मा गांधी, दक्षिण भारत के एक प्रख्यात दार्शनिक और मोहम्मद अली जिन्ना की थीं।’
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘उस्ताद! साहित्यिक चोरी की गंगोत्री में जब सभी डुबकी मार रहे हों, तो फिर हम लोग ही इतनी मगजमारी क्यों करें। आइए, हम लोग भी दूसरों की कहानी-कविता, लेख चुराकर राष्ट्रीय स्तर के कवि, कहानीकार और लेखक बन जाते हैं।’ ‘चुपकर नासपीटे! ऐसा करके बाप-दादाओं का नाम डुबोएगा क्या? खबरदार! जो ऐसा करने की सोची, खाल खींच लूंगा तेरी।’ इतना कहकर उस्ताद उठे और चलते बने।

कमाल के आदमी है बेनी बाबू


-अशोक मिश्र
‘बेनी बाबू कमाल के आदमी हैं। वे जो कुछ भी बोलते हैं, एकदम बिंदास। खांटी नेता जो ठहरे। और जो खांटी होता है, वह ऐसा ही होता है। चाहे वह नेता हो या मुझे जैसा पाकेटमार। खांटी हमेशा हानि-लाभ के समीकरण से ऊपर होता है। वैसे भी बाबा तुलसीदास कह गए हैं कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ। जब सब कुछ लोकतांत्रिक विधि यानी मतदाताओं के हाथ में है, तो काहे दूसरों की लल्लो-चप्पो की जाए। सीधे मतदाताओं को न पटाया जाए। जियो राजा बनारस! तुम्हारी इसी बेबाकी के मुरीद तो हम सब हैं।’ काफी दिनों बाद आज मेरे घर पधारे उस्ताद मुजरिम ‘बेनी प्रसंग’ छिड़ने पर बनारसी अंदाज में अपने सद्विचार प्रस्तुत कर रहे थे। उन्होंने प्याले में फूंकमार कर ‘सुर्र...’ की आवाज करते हुए चाय सुड़की और बोले, ‘क्या मजेदार बात कही है, अपने बेनी बाबू ने। वाकई इतना बड़ा जिगरा है किसी नेता में। सब गुड़ खाकर ‘गुलगुले’ से परहेज करते हैं। ढोंगी हैं सबके सब।’
उस्ताद मुजरिम धारा प्रवाह बोले जा रहे थे। उस्ताद की बात सुनकर मुझे ताव आ गया। मैंने मुजरिम की बात काटते हुए कहा, ‘उस्ताद! एक बात बताएं। जिसने जेठ की चिलचिलाती दुपहरिया में सूखते कंठ से खेतों में हल चलाने की पीड़ा ने झेली हो, सावन-भादो की अंधेरी रात में छत से टपकती पानी की बूंदों से बचाने के लिए अपनी कथरी-गुदरी को बचाने की कोशिश में रातभर जागा न हो या माघ-पूस की पाले वाली रात में भूखे पेट न सोया हो, वह गरीबों और किसानों की व्यथा का अंदाजा लगा सकता है। मैं तो इस बात से पूरा इत्तफाक रखता हूं कि जाके पैर न फटी बिंवाई, वह क्या जाने पीर पराई। आप इसे बेनी बाबू की बेबाकी कहते हैं। यह उनकी बेबाकी नहीं, सत्ता की ठसक है। वे मंत्री पद के नशे में चूर हैं। अगर बेनी बाबू किसी निजी कंपनी में दस-दस, बारह-बारह घंटे खटने के बाद पांच-दस हजार रुपये कमाते, तब उनसे पूछता कि महंगाई बढ़ने से उनका कितना फायदा हुआ है। बीवी की फटी धोती से झांकते अंगों को ढक न पाने की बेबसी, दवाइयों के अभाव में रात भर कराहती बूढ़ी मां की पीड़ा और बच्चे की फीस के तगादे के बीच वे बढ़ती महंगाई का जश्न कैसे मनाते, यह मैं भी देखता। बेनी बाबू मंत्री हैं, उनके पास अकूत पैसा है, उन्होंने अपनी सात पुश्तों की व्यवस्था कर ली। वे चाहें तो बिसलरी पानी से नहा सकते हैं, रोज मुर्ग मुसल्लम खा सकते हैं, उनके लिए महंगाई कोई मुद्दा नहीं है।’
मेरी बात सुनकर उस्ताद मुजरिम पहले तो मुस्काराए, ‘नहीं रे लल्लू! यह सत्ता की ठसक नहीं, सावन-भादों में बौराई छिछली नदी की तरह गरीबों के प्रति उमड़ता उनका प्रेम है। वे सच्ची बात बोलते हैं। बेनी बाबू जैसा सच बोलने वाले इस दुनिया में विरले ही होते हैं। अब देखो न! बेनी बाबू ने सच क्या बोला, विपक्षियों को तो छोड़िए, उनकी ही पार्टी के लोग उनका टेंटुआ दबाने को तैयार हैं। मीडिया वाले अलग छाती पीटकर स्यापा कर रहे हैं। हाय बेनी बाू ने यह क्या कह दिया, हाय बेनी बाबू ने ऐसा क्यों कह दिया। अरे भइया! बेनी बाबू को जो कहना था, कह दिया। आप क्यों हाय-तौबा मचाए हुए हो। सच्ची बात तो यह है कि छाती पीट-पीटकर स्यापा करने वाले इन मीडिया कर्मियों और नेताओं में सच कहने, लिखने और दिखाने की हिम्मत तो बची नहीं, सुबह से शाम तक ख्याली पुलाव पकाने वालों को सच्ची बात कैसे पच सकती है। खुदा न खास्ता, उनके बीच कोई सच्चा बंदा पहुंच जाता है, तो ये झू्ठे और चोट्टे नेता उसी का गला दबाने पर उतारू रहते हैं।’
मैंने कहा, ‘उस्ताद! आपसे यह उम्मीद नहीं थी। लोगों की पाकेट मारते-मारते कहीं आप अपनी आत्मा को तो नहीं मार बैठे?’ मेरी बात सुनकर मुजरिम ठहाका लगाकर हंसे और बोले, ‘नहीं रे! मेरी आत्मा मरी नहीं है। मैं तो यह देखना चाहता था कि तुम्हारी आत्मा जिंदा है या नहीं। वैसे तुम्हारी बात ठीक है। मैं उससे इत्तफाक रखा हूं।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम उठे और छड़ी से टेकते हुए खरामा-खरामा (धीरे-धीरे) अपने घर चले गए।

काश! गाजी मियां होते...



-अशोक मिश्र
एक थे गाजी मियां। उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में कहीं रहते थे। एकाध दशक पहले नहीं, दो चार सदी पहले पैदा हुए थे। अवध क्षेत्र में उनसे बड़ा लंतरानीबाज कोई पैदा नहीं हुआ है। न भूतो न भविष्यति। उनके बारे में एक से बढ़कर एक लंतरानियां और किस्से मशहूर हैं, कुछ श्लील भी, तो अश्लील भी। जो काम कोई नहीं कर सकता, उसे अपने गाजी मियां चुटकी बजाते ही कर डालते थे। अवध क्षेत्र के लाल बुझक्कड़, नजूमी या भविष्यवता आप जो कुछ भी समझें, वह सब कुछ थे गाजी मियां। किसी के बेटा होगा या बेटी? परदेश गया पिया लौटेगा या वहीं किसी के चंचल के नयनों का शिकार होकर रह जाएगा? इसकी पूरी जानकारी रखते थे गाजी मियां। अवध के नवाब साहब की नइकी बेगम किसी खानसामे के साथ गहना-गुरिया लेकर रफूचक्कर हो गई, तो उसको पकड़ मंगाने का जिम्मा गाजी मियां का। नवाब साहब की बकरी को उधर जुकाम हुआ नहीं कि गाजी मियां काढ़ा लेकर तैयार खड़े हैं। गाजी मियां तो सावन-भादों में होती मूसलाधार बारिश को तब तक के लिए रोक रखने में सक्षम थे, जब तक नवाब साहब शिकार से वापस नहीं आ जाते। सूरज-चांद, सितारों से लेकर आंधी, पानी, आग सब कुछ गाजी मियां के माध्यम से नवाब साहब के गुलाम थे। ऐसे थे अवध क्षेत्र की मशहूर शख्स गाजी मियां।
आप कल्पना कीजिए। अगर आज के युग में गाजी मियां पैदा हुए होते, तो क्या होता। अपने अन्ना दादा को न तो बार-बार अनशन पर बैठने की जरूत थी, न ही अन्ना टीम को राजनीतिक पार्टी बनाने की जहमत उठाने की। अन्ना दादा के संकेत करने भर की देर थी, गाजी मियां ऐसा मंत्र फूंकते कि सारे सांसदों का हृदय परिवर्तन हो जाता और वे एक सुर में लोकपाल विधेयक को पास करा देते। स्वामी रामदेव को बेकार में ‘कालाधन-कालाधन’ चिल्लाने की कतई जरूरत नहीं थी। गाजी मियां मात्र एक ‘पल्टासन’ से विदेशी बैंकों का खाता ही उलट-पलट देते। जो भारतीय आज अपना काला-सफेद धन लेकर विदेशी बैंकों की ओर भाग रहे हैं, गाजी मियां की एक घुड़की विदेशी बैंकों के अवसान ढीले कर देती। सारे विदेशी बैंक अपने यहां के ग्राहकों को अपना पैसा न केवल भारतीय बैंकों में जमा कराने को प्रोत्साहित करते, बल्कि अपने यहां जमा पैसा भी विदेशी बैंक हमारे यहां लाइन लगाकर जमा करते। लेकिन अफसोस है कि गाजी मियां को जब पैदा होना चाहिए था, तब वे पैदा नहीं हुए। जब उनकी कोई जरूरत नहीं थी, तो वे ‘पट्ट’ से धरती पर आ टपके। शायद विधाता से यहीं चूक हो गई।
पिछले पैंसठ सालों से हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हर साल गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर ऐलान करते आ रहे हैं कि हमारी पहली प्राथमिकता देश से गरीबी, बेकारी, भुखमरी और शोषण को दूर करना है। हम अपने देश की जनता को खुशहाल देखना चाहते हैं। लेकिन आज तक न गरीबी दूर हुई, न बेरोजगारी में कहीं कोई कमी आई, न भ्रष्टाचार दूर हुआ। गरीब का बच्चा आज भी भूखे पेट सोने को मजबूर है। काश! आज अगर अपने गाजी मियां होते, तो ये सारी समस्याएं होती ही नहीं। न कोई बेरोजगार होता, न शोषण, दोहन और उत्पीड़न। प्रधानमंत्री आते, लाल किले पर झंडा फहराते और मीठी-मीठी बातें करके चले जाते क्योंकि खट्टी/कड़वी बातें करने की जरूरत ही नहीं थी। देश में जितनी भी समस्याएं होतीं, उन्हें तो अपने गाजी मियां पहले ही साल्व कर चुके होते। लेकिन दोस्तो! अगर गाजी मियां आज होते, तो इतना तय है कि गली-कूंचे से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को कहीं मूंगफली बेचनी पड़ती या  चाट का ठेला लगाना पड़ता। इनकी राजनीतिक दुकान ही नहीं खुल पाई होती। जब देश में भ्रष्टाचार करने का मौका ही नहीं मिलता, तो भला ये नेता राजनीति में क्या भाड़ झोंकने आते। देश में रामराज्य होता, तो फिर नेताओं की जरूरत ही क्या थी? इनको तो कोई टके के भाव भी नहीं पूछता। और अगर नेता नहीं, तो शायद अपने देश में ये समस्याएं होती ही नहीं। अब आप इसे मेरी लंतरानी समझेंगे, तो समझते रहिए। मेरी बला से। एक लंतरानी आपको सुनानी थी, सो सुना दी। आप इस पर कान दें, न दें, आपकी मर्जी।