Showing posts with label युद्ध. Show all posts
Showing posts with label युद्ध. Show all posts

Wednesday, May 28, 2025

बेवजह सैनिकों का खून बहाने से क्या लाभ

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सिकंदर का जन्म 356 ईसा पूर्व मैसेडोनिया में हुआ था। पिता राजा फिलिप की हत्या के बाद सिकंदर ने मैसेडोनिया का शासन संभाला और उसे विस्तार देना शुरू किया। सिकंदर का वास्तविक नाम अलेक्जेंडर था। उसका सिर्फ 33 साल की उम्र में ही निधन हो गया था, लेकिन उस समय की ज्ञात दुनिया का लगभग एक तिहाई भाग जीत लिया था। सिकंदर ने सने अपने कार्यकाल में इरान, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया और भारत के कंधार पर हमला करके उसे जीत लिया था। 

कंधार में उसने राजा पोरस यानी पुरु को पराजित किया था। इसके बाद युद्ध से ऊबी हुई सेना के बगावती रुख अख्तियार करने पर वह वापस यूनान की ओर लौट गया। रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई। कहते हैं कि एक राज्य पर उसने आक्रमण किया, तो वहां के राजा ने अपनी सारी सेना को सिकंदर का सामना करने के लिए भेज दिया। 

कहीं कहीं पर इस राजा का नाम फिलिप बताया जाता है, लेकिन इतिहासकारों को मानना है कि उसके पिता फिलिप द्वितीय के अलावा उसके शासनकाल में कोई राजा फिलिप नहीं था जिससे उसका युद्ध हुआ हो। जब दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे के सामने आ गईं तो युद्ध शुरू होने की घोषणा होते ही राजा ने युद्ध खत्म होने की घोषणा कर दी। राजा बंदी बना लिया गया। 

सिकंदर ने कहा कि युद्ध शुरू होते ही क्यों बंद कर दिया। तब राजा ने कहा कि आपकी सेना के सामने हमारी सेना नहीं टिक सकती थी, तो बेवजह सैनिकों का खून बहाने का कोई मतलब नहीं था। आप यह जो नगर में लूटपाट करवा रहे हैं, वह आपकी ही प्रजा है। अब वह मेरी प्रजा तो रही नहीं क्योंकि मैं पराजित हूं। यह सुनकर सिकंदर उस राजा से बहुत प्रभावित हुआ और जीता हुआ राज्य लौटा दिया।

Saturday, May 10, 2025

सिवाय पीड़ा के युद्ध से हासिल कुछ नहीं होता

अशोक मिश्र

भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले तीन दिनों से जारी युद्ध को लेकर बहुत सारी बातें कही जा रही है। युद्ध कोई बच्चों का खेल नहीं है। युद्ध के दौरान खून बहता है, जानें जाती हैं, संपत्ति तबाह हो जाती है। और जब युद्ध खत्म होता है, तो उपलब्धि के नाम पर मिलते हैं, टूटे फूटे घर, तबाह कर दिए गए खेत, सैनिकों की विधवाओं की चीखें, अनाथ हुए बच्चों की कराहें, मारे गए नागरिकों के शोक संतप्त परिवार और विजेता होने के दंभ से हंसती खिलखिलाती सत्ता। सच कहा जाए, तो केवल विजयी होने के भाव के अलावा युद्ध से हासिल कुछ नहीं होता है।
प्राचीनकाल में जब युद्ध होते थे, तो उसके लिए राजा-महाराजा की कामुकता या राज्य विस्तार की लालसा जिम्मेदार होती थी। एक राजा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हजारों सैनिकों की बलि चढ़ा देता था। दोनों ओर के हजारों सैनिक मारे जाते थे। लेकिन आज युद्ध के न केवल मायने बदल गए हैं, बल्कि उसमें बाजार का हस्तक्षेप भी बढ़ गया है। यह बात सौ फीसदी सही है कि पाकिस्तान ने भारत के सिर पर युद्ध थोप दिया है।
पिछले कई सालों से युद्ध को टालते आ रहे भारत को मजबूर कर दिया गया है कि वह अपना हथियार उठाकर युद्ध के मैदान में आ खड़ा हो। इतने से भी अगर पाकिस्तान की बुद्धि के दरवाजे खुल जाएं, तो बेहतर है। वैसे जब भारत के सिर पर युद्ध थोप ही दिया गया है, तो उसे ठीक से निपटा देना चाहिए, ताकि भविष्य में वह अपने देश से घुसपैठिए या आतंकवादियों को भेजने की जुर्रत न कर सके। वैसे भी पिछले तीन दिनों में भारत ने जो सबक सिखाया है, पाकिस्तान को हमेशा याद रखना चाहिए। जरूरत पड़ी तो यह पाठ आगे भी दोहराया जाता रहेगा। सन 1971 की मार वह भूल गया है। यही वजह है कि वह पिछले कुछ वर्षों से नापाक हरकतें करता चला आ रहा है।
भारतीय सेना की वीरता और साहस का मुरीद हर भारतवासी है। दुनिया की किसी भी सेना का मुकाबला करने की हिम्मत और क्षमता हमारी सेना में है।भारतीय सेना बेजोड़ है। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता है कि युद्ध अच्छे होते हैं। युद्ध हमेशा बुरे थे और भविष्य में भी बुरे ही रहेेंगे। पहले और अब के युद्ध में अंतर सिर्फ इतना है कि सामंती युग में राजा की इच्छा से युद्ध होते थे, वर्तमान युग में बाजार देशों को मजबूर कर देता है कि वह एक दूसरे से युद्ध करें। इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे युद्ध की बात करें, तो जिन आतंकियों ने हमारे देश के 26 निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या की, उन आतंकियों को पाल-पोस कौन रहा है। स्वाभाविक है कि पाकिस्तान का ही नाम लिया जाएगा, जो बिल्कुल सच भी है। लेकिन पाकिस्तान को इन आतंकियों को पालने-पोसने के लिए धन कौन मुहैया करा रहा था।
कंगाल पाकिस्तान इन आतंकियों को हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराने के लिए धन कहां से पा रहा था? यह वही देश हैं जो आज पूरी दुनिया के चौधरी बने घूम रहे हैं।
कह रहे हैं कि हमें भारत-पाकिस्तान युद्ध से क्या लेना-देना है। यह दुनिया के धनी और अपने को चौधरी कहने वाले देशों की ही करामात है कि एक तरफ तो वह आतंकियों को पैदा करते हैं, उनको चोरी-छिपे धन मुहैया कराते हैं। फिर इन आतंकियों और इनसे प्रभावित होने वाले देशों को अपना हथियार बेचते हैं। अगर पूरी दुनिया में शांति स्थापित हो जाए, आतंकवाद खत्म हो जाए, तो चीन, अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों की फैक्ट्रियों में उत्पादित ड्रोन्स, मिसाइलों और किस्म-किस्म के लड़ाकू विमानों को कौन पूछेगा।

अपने यहां कबाड़ हो चुके हथियारों को महंगे दामों पर वह भारत, पाकिस्तान, नेपाल, अफ्रीकी देश और अविकसित देशों को बेचकर अपना रोकड़ा टेंट में रखकर दुनिया को शांति का उपदेश देते हैं। युद्ध इन हथियारों के व्यापारी देशों के लिए बड़े फायदेमंद साबित होते हैं। युद्ध के नाम पर इनका कारोबार चलता रहता है। अगर कहीं कोई देश युद्ध नहीं करना चाहता है, तो ये हथियारों के व्यापारी ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देते हैं जिससे मजबूर होकर उस देश को युद्ध में उतरना पड़ता है।

Friday, April 25, 2025

पहलगाम हमला: मानवता के खिलाफ युद्ध की घोषणा

अशोक मिश्र

पहलगाम में मंगलवार को जो कुछ भी हुआ, दरअसल वह एक तरह से मानवता के खिलाफ युद्ध की घोषणा थी। यह धर्म के नाम पर कायर लोगों के समूह द्वारा कुछ निर्दोष लोगों पर किया गया कायराना हमला था। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। कई दशकों से होता चला आ रहा है। इस हमले में इंसानियत की हत्या हुई है, भाईचारा घायल हुआ है। इसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम ही है। 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में जिस तरह आतंकियों ने खून की होली खेली और यह समझ लिया कि वह अपने मकसद में कामयाब हो गए, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है।
किसी की निर्दोष की हत्या करने से कोई भी पवित्र उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है। किसी बड़े और पवित्र उद्देश्य के लिए साधन की पवित्रता भी मायने रखती है। अगर लश्कर-ए-तोयबा का सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट अपने आपको इस्लामिक कायदे-कानून को मानने वाला कहतf है, तो यह सरासर झूठ है। इस्लाम या दुनिया का कोई भी धर्म किसी निर्दोष का खून बहाने की इजाजत नहीं देता। जिसका ईमान ही मुसल्लम नहीं, वह कैसा मुसलमान? पहलगाम में निर्दोषों की बेरहमी से हत्या करने वाले दरिंदे थे, हत्यारे थे, जुनूनी थे, लेकिन मुसलमान नहीं थे।
मुसलमान तो वह घोड़े वाला सैयद हुसैन शाह था जिसने अपनी जान तो दे दी, लेकिन कई लोगों की जान बचा गया। उसने हाथ जोड़ते हुए हमलावरों से कहा भी था कि इन्हें छोड़ दो। यह निर्दोष लोग हैं, भले ही इनका धर्म कोई भी हो। लेकिन हमलावर नहीं माने, तो उसने वही किया जो एक मुसलमान को करना चाहिए, ऐसी ही भिन्न परिस्थितियों में एक हिंदू को करना चाहिए, एक सिख, एक जैन, एक बौद्ध या एक ईसाई को करना चाहिए।
सैयद हुसैन शाह हमलावरों से भिड़ गया। उनकी रायफल छीनने की कोशिश में गोली चल गई और वह घायल हो गया। बाद में उसकी अस्पताल में मौत हो गई। यदि उसने यह हिम्मत न दिखाई होती, तो शायद मरने वालों की संख्या ज्यादा होती। सैयद हुसैन शाह की हिम्मत ने आतंकियों के हौसले को पस्त कर दिया। सच्चे हिंदू और मुसलमान तो वह लोग थे जो घायलों की मदद कर रहे थे, जरूरत पड़ने पर अपना खून दे रहे थे। घोड़े और खच्चर वाले वहां की हालत देखकर रो रहे थे और अपनी जान पर खेलकर यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहे थे।
सच कहा जाए, तो द रेजिस्टेंस फ्रंट के दरिदों ने हिंदुओं पर हमला नहीं किया है, उन्होंने जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ सालों से फल-फूल रही पर्यटन इंडस्ट्री पर हमला किया है। धारा-370 लागू होने के बाद जम्मू-कश्मीर में चारों ओर फैलती जा रही शांति और खुशहाली पर हमला किया है। पर्यटकों पर हमला करके उन्होंने जम्मू-कश्मीर की धीरे-धीरे मजबूत होते भाईचारे और अर्थव्यवस्था पर हमला किया है। इस हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में गए पर्यटक जल्दी से जल्दी अपने घर लौट जाना चाहते हैं।
हमलावरों ने उस विश्वास पर हमला किया है जिसने भारत और दूसरे देशों के पर्यटकों को श्रीनगर, पहलगाम जैसे पर्यटन स्थलों पर आने के लिए आकर्षित किया था। पर्यटकों के आने से जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों के चेहरे पर रौनक आने लगी थी। पर्यटन बढ़ने से कारोबार बढ़ने की उम्मीद पैदा होने लगी थी। लेकिन अफसोस, अब आगामी चार-पांच साल तक शायद ही देशी और विदेशी पर्यटक जम्मू-कश्मीर की ओर रुख करें। हमले के बाद जिस तरह पर्यटकों में भगदड़ मची हुई है, उससे यह बात साफ हो जाती है। इस एक हमले ने केंद्र और राज्य सरकार की चार-पांच साल की मेहनत पर पानी फेर दिया है। जो मानवीय क्षति हुई है, उसकी भरपाई तो संभव ही नहीं है, लेकिन जो आर्थिक नुकसान जम्मू-कश्मीर को आगे होने वाला है, उसकी भी भरपाई शायद ही संभव हो।