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Tuesday, April 29, 2025

हमारे देश की एकता को नहीं तोड़ सकती कोई शक्ति

अशोक मिश्र

मिनी स्वीटजरलैंड कहे जाने वाले कश्मीर के पहलगाम में 28 निर्दोष नागरिकों के मारे जाने का दुख पूरे देश को है। पहलगाम में क्रूर हत्याकांड को अंजाम देने के बाद आतंकियों और उनके आका ने सोचा  था कि इससे कश्मीर और देश का माहौल बदलेगा। हिंदू-मुसलमान के बीच वैमनस्य बढ़ेगा। फिर से पहले की तरह हाथों में पत्थर लेकर कश्मीर के युवा निकलेंगे। मस्जिदों से भारत विरोधी तकरीरें दी जाएंगी, युवाओं को आत्मरक्षा के नाम पर बचे खुचे कश्मीरी पंडितों और हिंदू पर्यटकों पर हमले किए जाएंगे? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

माहौल तो बदला, लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह आतंकी संगठनों और उनके आकाओं ने सोचा था। आतंकियों के इस कुकृत्य की जितनी निंदा कश्मीर के अलावा दूसरे राज्यों ने की, उससे भी बढ़चढ़कर कश्मीरियों ने की। मस्जिदों से पत्थर उठाने की नहीं, बल्कि शांति बनाए रखने और आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने की अपील की गई।

शायद कश्मीर के इतिहास में पहली बार कश्मीरी जनता पहलगाम की धरती पर मरने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए सड़कों पर उतरी, आतंकियों और पाकिस्तान की कड़े शब्दों में निंदा की। जिस तरह हमले के वक्त स्थानीय कश्मीरियों ने पर्यटकों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, उनको अपने घर में रखा, उनकी देखभाल की, ऐसा शायद पहले नहीं देखा गया था।  

घटना के चश्मदीद गवाहों के बयान सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। भाजयुमो की छत्तीसगढ़ इकाई के सदस्य अरविंद अग्रवाल की पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें उन्होंने अपने टूरिस्ट गाइड नजाकत अली से अपने परिवार की जान बचाने के लिए आभार व्यक्त किया है। उन्होंने नजाकत अली के लिए लिखा है कि आपने हमारी जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। हम नजाकत भाई का कभी भी पर्याप्त धन्यवाद नहीं कर पाएंगे। 

आतंकियों ने जब धर्म पूछकर निर्दोष लोगों की हत्या की थी, तो उन्होंने सोचा था कि हिंदुस्तान में इससे आग लग जाएगी। हिंदू-मुसलमान एक दूसरे पर टूट पड़ेंगे। पूरे देश में अराजकता का माहौल होगा। लेकिन देश के हिंदू-मुसलमानों ने आतंकियों और उनके आकाओं के मनसूबों पर पानी फेर दिया। उनमें वैमनस्य पैदा होने की जगह सांप्रदायिक सद्भाव पैदा हुआ। अगर हम सोशल मीडिया पर डाली जा रही कुछ विषैली पोस्टों को नजरअंदाज कर दें, तो पूरा देश पहलगाम हमले को लेकर एकमत है। सभी क्रूर हत्यारों को उनके किए की सजा देने की मांग कर रहे हैं। इस बार तो देश की सभी राजनीतिक पार्टियां भी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। 

पाकिस्तान और आतंकियों के खिलाफ की जाने वाली किसी भी कार्रवाई में वह केंद्र सरकार के साथ हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के नेता और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी की सर्वेसर्वा महबूबा मुफ्ती से लेकर एआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी तक पाकिस्तान को मजा चखाने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस, सपा, बसपा, टीएमसी सहित इंडिया गठबंधन की सभी पार्टियां अपने सारे मतभेद भुलाकर सरकार के साथ खड़ी हैं।

स्वस्थ लोकतंत्र की यही निशानी है। इस देश का आम नागरिक भी अपने सरकार के साथ खड़ा है और उसकी भी इच्छा यही है कि क्रूर हत्यारों को कठोर से कठोरतम दंड मिले और पाकिस्तान को उसके किए की सजा दी जाए।

देश के कुछ राज्यों में कुछ अराजक तत्वों ने कश्मीरी छात्र-छात्राओं और मुसलमानों को परेशान करने का प्रयास जरूर किया। किसी ने हॉस्टल खाली करने को कहा तो किसी मकान मालिक ने मकान। कुछ लोगों ने तो राज्य छोड़कर न जाने पर हमला करने की धमकी दी, लेकिन ऐसे मामलों में सतर्क राज्य सरकारों ने त्वरित कार्रवाई की और अराजक तत्वों पर अंकुश लगाकर माहौल को शांत करा दिया। 

इसका नतीजा यह हुआ कि दूसरे लोगों को माहौल खराब करने का मौका नहीं मिला। यह बदलाव बताता है कि भारत की आत्मा एकता में अनेकता वाली है। कोई कितना भी प्रयास कर ले, देश की आत्मा में गहरे तक बसे भाईचारे को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता है।

Sunday, April 27, 2025

आतंकी संगठनों की सबसे पहले रुकवानी होगी फंडिंग

अशोक मिश्र

पहलगाम हमले के बाद देश के जो हालात हैं, वह अपनी सरकार से कुछ ऐसा करने की मांग कर रहे हैं जिससे आतंकवाद की कमर टूट जाए। भारत सरकार ने जो पांच बड़े फैसले लिए हैं, उससे पाकिस्तान पर तत्काल बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। जहां तक सिंधु और उसकी दो सहायक नदियों झेलम और चिनाब के पानी को रोक देने का सवाल है, उसे रोकने के लिए फिलहाल काफी समय और पैसा चाहिए। इन तीनों नदियों के कुछ प्रतिशत पानी को रोक देने से बात बनने वाली नहीं है। वाघा-अटारी बार्डर बंद करने से भी पाकिस्तान बहुत ज्यादा फर्क पड़ने की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। जो देश अपनी खराब हालत के बावजूद आतंकियों को ट्रेनिंग देने, उन्हें भारत के खिलाफ आतंकी कार्रवाई करने के लिए उकसाता हो, उसके लिए वाघा बार्डर बंद हो या खुला, क्या मायने रखता है।

पहलगाम की घटना से प्रत्येक देशवासी दुखी और गुस्से में है। पाकिस्तान से युद्ध छेड़ना, काफी खर्चीला होगा। युद्ध से हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई सकारात्मक प्रभाव तो पड़ेगा नहीं। जब दो देशों में युद्ध होता है, तो दोनों ओर के सैनिकों की मौत होती है। अभी तो हम अपने देश के 26 नागरिकों की मौत को सहन नहीं कर पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में सैनिकों की शहादत कैसे बर्दाश्त की जा सकेगी। इसके लिए जरूरी है कि भारत पाकिस्तान और पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों पर ऐसा करारा प्रहार करे जिससे उसकी कमर ही टूट जाए। इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान के आतंकी संगठनों तक पहुंचने वाली फंडिंग की नदी को सुखा दिया जाए। 

आतंकी संगठनों को विभिन्न देशों से जकात के नाम पर मिलने वाली फंडिंग ही रोकने की कोशिश की जाए। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मित्रता जगजाहिर है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुस्लिम संगठनों को भारी मात्रा में अनुदान (जकात) देने के लिए प्रसिद्ध हैं। पाकिस्तान के कुछ संगठनों को भी उनसे जकात मिलती है।

यदि पीएम मोदी सऊदी अरब सहित मुस्लिम देशों से पाकिस्तान और पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों की करतूत का खुलासा करते हुए अपील करें कि वह ऐसे संगठनों को अनुदान देना बंद करें क्योंकि उनके द्वारा दिए गए अनुदान का उपयोग मानवता के खिलाफ किया जा रहा है। भारत सहित कुछ और देशों में निर्दोष जनता की हत्या करने में उनसे मिले पैसे का उपयोग किया जा रहा है। तो बात बन सकती है। पीएम मोदी का रसूख मुस्लिम देशों पर भी उतना ही है जितना प्रभाव अमेरिका, रूस, यूक्रेन आदि देशों पर है। 

संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जाएद अल नाहयान हों या बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर से लेकर सऊदी अरब तक के राष्ट्राध्यक्ष सबसे पीएम मोदी के मधुर संबंध हैं। यदि पीएम मोदी की अपील पर मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्ष थोड़ा सा भी तवज्जो दे दें, तो निश्चित रूप से पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं की कमर टूट जाएगी। बस, इसके लिए इन देशों से व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से आह्वान करना होगा। थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि मुस्लिम देश पीएम मोदी की बात पर ध्यान नहीं देते हैं, तो कम से कम यह मलाल तो नहीं रहेगा कि हमने प्रयास ही नहीं किया।

फंडिंग के साथ-साथ पाकिस्तानी आतंकवादियों तक हथियारों की पहुंच को रोकना होगा। पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के पास चीन निर्मित हथियार पाए जाते हैं या फिर अमेरिका निर्मित। इन दिनों चीन टैरिफ वॉर में उलझा हुआ है। उसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वार से बचने के लिए भारत की बहुत जरूरत है। वह टैरिफ वॉर शुरू होने के बाद भारत की ओर कई बार दोस्ती का हाथ बढ़ा चुका है। 

यदि चीन इस बारे में बात की जाए, तो इस बात की ज्यादा संभावना है कि वह पाकिस्तान को हथियार बेचना बंद कर दे। हालांकि पाकिस्तान से उसकी मित्रता काफी गहरी है। ठीक यही प्रक्रिया अमेरिका के साथ अपनाई जा सकती है। एक बार बात करने में कोई बुराई नहीं है। यत्ने कृते यदि न सिद्धयति, को अत्र दोष:।

Friday, April 25, 2025

पहलगाम हमला: मानवता के खिलाफ युद्ध की घोषणा

अशोक मिश्र

पहलगाम में मंगलवार को जो कुछ भी हुआ, दरअसल वह एक तरह से मानवता के खिलाफ युद्ध की घोषणा थी। यह धर्म के नाम पर कायर लोगों के समूह द्वारा कुछ निर्दोष लोगों पर किया गया कायराना हमला था। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। कई दशकों से होता चला आ रहा है। इस हमले में इंसानियत की हत्या हुई है, भाईचारा घायल हुआ है। इसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम ही है। 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में जिस तरह आतंकियों ने खून की होली खेली और यह समझ लिया कि वह अपने मकसद में कामयाब हो गए, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है।
किसी की निर्दोष की हत्या करने से कोई भी पवित्र उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है। किसी बड़े और पवित्र उद्देश्य के लिए साधन की पवित्रता भी मायने रखती है। अगर लश्कर-ए-तोयबा का सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट अपने आपको इस्लामिक कायदे-कानून को मानने वाला कहतf है, तो यह सरासर झूठ है। इस्लाम या दुनिया का कोई भी धर्म किसी निर्दोष का खून बहाने की इजाजत नहीं देता। जिसका ईमान ही मुसल्लम नहीं, वह कैसा मुसलमान? पहलगाम में निर्दोषों की बेरहमी से हत्या करने वाले दरिंदे थे, हत्यारे थे, जुनूनी थे, लेकिन मुसलमान नहीं थे।
मुसलमान तो वह घोड़े वाला सैयद हुसैन शाह था जिसने अपनी जान तो दे दी, लेकिन कई लोगों की जान बचा गया। उसने हाथ जोड़ते हुए हमलावरों से कहा भी था कि इन्हें छोड़ दो। यह निर्दोष लोग हैं, भले ही इनका धर्म कोई भी हो। लेकिन हमलावर नहीं माने, तो उसने वही किया जो एक मुसलमान को करना चाहिए, ऐसी ही भिन्न परिस्थितियों में एक हिंदू को करना चाहिए, एक सिख, एक जैन, एक बौद्ध या एक ईसाई को करना चाहिए।
सैयद हुसैन शाह हमलावरों से भिड़ गया। उनकी रायफल छीनने की कोशिश में गोली चल गई और वह घायल हो गया। बाद में उसकी अस्पताल में मौत हो गई। यदि उसने यह हिम्मत न दिखाई होती, तो शायद मरने वालों की संख्या ज्यादा होती। सैयद हुसैन शाह की हिम्मत ने आतंकियों के हौसले को पस्त कर दिया। सच्चे हिंदू और मुसलमान तो वह लोग थे जो घायलों की मदद कर रहे थे, जरूरत पड़ने पर अपना खून दे रहे थे। घोड़े और खच्चर वाले वहां की हालत देखकर रो रहे थे और अपनी जान पर खेलकर यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहे थे।
सच कहा जाए, तो द रेजिस्टेंस फ्रंट के दरिदों ने हिंदुओं पर हमला नहीं किया है, उन्होंने जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ सालों से फल-फूल रही पर्यटन इंडस्ट्री पर हमला किया है। धारा-370 लागू होने के बाद जम्मू-कश्मीर में चारों ओर फैलती जा रही शांति और खुशहाली पर हमला किया है। पर्यटकों पर हमला करके उन्होंने जम्मू-कश्मीर की धीरे-धीरे मजबूत होते भाईचारे और अर्थव्यवस्था पर हमला किया है। इस हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में गए पर्यटक जल्दी से जल्दी अपने घर लौट जाना चाहते हैं।
हमलावरों ने उस विश्वास पर हमला किया है जिसने भारत और दूसरे देशों के पर्यटकों को श्रीनगर, पहलगाम जैसे पर्यटन स्थलों पर आने के लिए आकर्षित किया था। पर्यटकों के आने से जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों के चेहरे पर रौनक आने लगी थी। पर्यटन बढ़ने से कारोबार बढ़ने की उम्मीद पैदा होने लगी थी। लेकिन अफसोस, अब आगामी चार-पांच साल तक शायद ही देशी और विदेशी पर्यटक जम्मू-कश्मीर की ओर रुख करें। हमले के बाद जिस तरह पर्यटकों में भगदड़ मची हुई है, उससे यह बात साफ हो जाती है। इस एक हमले ने केंद्र और राज्य सरकार की चार-पांच साल की मेहनत पर पानी फेर दिया है। जो मानवीय क्षति हुई है, उसकी भरपाई तो संभव ही नहीं है, लेकिन जो आर्थिक नुकसान जम्मू-कश्मीर को आगे होने वाला है, उसकी भी भरपाई शायद ही संभव हो।