बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
आदमी के सीखने की एक निश्चित सीमा है। दुनिया में जितना भी ज्ञान है, उसे एक आदमी पूरा हासिल नहीं कर सकता है। विद्वान से विद्वान आदमी सब कुछ नहीं सीख सकता है, लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सीखते जरूर रहना चाहिए। प्राचीन काल में एक दार्शनिक थे। काफी विद्वान थे, लेकिन वह विनम्र भी उतने ही थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते थे।बहुत सारे शिक्षण संस्थानों के अध्यापक और विद्यार्थी उनके पास ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे। लेकिन वह अपने पास आने वाले की शंकाओं और समस्याओं का हरसंभव तरीके से समाधान करने की कोशिश करते थे। उसके साथ ही साथ वह उनसे सवाल भी करते थे। उस व्यक्ति से हर तरह की जानकारी हासिल करने का प्रयास करते थे। यह देखकर एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि जो लोग आपसे सीखने आते हैं, आप उनसे भी सीखने की कोशिश करते हैं।
आप उनसे छोटी से छोटी बात पूछते हैं। आप सचमुच जानने की कोशिश करते हैं या सामने वाले के सामने न जानने का ढोंग करते हैं। यह सुनकर दार्शनिक पहले तो जोर-जोर से काफी देर तक हंसते रहे। फिर बोले, देखो, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में सब कुछ नहीं सीख सकता है। जितना वह सीखता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा उससे छूट जाता है।
दुनिया का समग्र ज्ञान एक व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता है। मैं भी सब कुछ नहीं जानता हूं। इसलिए जो मैं जानता हूं, वह उसे बताता हूं, जो मैं नहीं जानता हूं, वह उससे सीखने की कोशिश करता हूं। व्यक्ति को जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यह सुनकर मित्र चुप रह गया।

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