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Friday, April 18, 2025

चाय की बदौलत थामस लिप्टन ने कमाए अरबों रुपये

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

चाय पीने वालों ने लिप्टन टी का नाम जरूर सुना होगा। लिप्टन चाय के संस्थापक थॉमस लिप्टन का जन्म 10 मई 1848 को ब्रिटेन के ग्लासगो में हुआ था। थॉमस के तीन भाई और एक बहन थी जो बचपन में ही मर गए थे। इनके माता और पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इनके पिता पेंटर से लेकर छोटी-मोटी दुकान चलाने का काम करते थे। लेकिन थॉमस बचपन से ही बड़ा आदमी बनने का सपना देखते रहते थे। अपने पिता की आर्थिक मदद करने की खातिर तेरह साल की उम्र में ही थॉमस ने पढ़ाई छोड़ दी थी। 

उन्होंने कई तरह के काम किए। 1864 में उन्होंने एक स्टीमर पर केबिन बॉय के रूप में काम करना शुरू किया। उसी दौरान नाविकों से अमेरिका के बारे में सुना तो वह अपनी बचत से अमेरिका जाने का निश्चय किया। अमेरिका में पांच साल रहे और विभिन्न काम किए। 

हर जगह काम के दौरान उन्हें तर्जुबा हासिल हुआ। इस दौरान उन्होंने पूरे अमेरिका का भ्रमण किया। 1870 में वह अपने माता-पिता के पास ग्लासगो लौट आए। यहां उन्होंने एक प्रोवीजन स्टोर खोला और उसे अच्छी तरह से सजाया। ग्राहक आने लगे। लेकिन कुछ चीजों के दाम ज्यादा होने की वजह से गरीब परिवारों के लोग उनके यहां से खरीदारी नहीं कर पा रहे हैं। 

उन्होंने महसूस किया कि गरीब और मध्यम आयवर्ग के लोग चायपत्ती का पैकेट उठाते हैं और दाम पूछकर रख देते हैं। तब उन्होंने फैसला किया कि वह चाय के बागान में जाकर सीधे उत्पादक से चाय खरीदेंगे। उत्पादक से चाय खरीदकर उन्होंने छोटे-छोटे पैकेट बनाकर सस्ते दामों पर बेचना शुरू किया। उन्होंने अपने ब्रांड का नाम रखा लिप्टन टी। देखते ही देखते उनकी चाय मशहूर हो गई। उन्होंने चाय की बदौलत अरबों रुपये कमाए।


चित्र--साभार गूगल

Tuesday, March 25, 2025

करतार सिंह सराभा थे भगत सिंह के आदर्श

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

शहीद भगत सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब के बंगा गांव में 27 सितंबर 1907 में हुआ था। कुछ लोग भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर को हुआ मानते हैं। पश्चिमी पंजाब अब पाकिस्तान में है। उनके पिता सरदार किशन सिंह एक किसान थे। भगत सिंह गदर पार्टी के संस्थापक करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे। 

अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेजी हुकूमत ने बैसाखी के दिन हजारों निर्दोष लोगों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी थी, तब बारह वर्षीय भगत सिंह बहुत व्यथित हुए थे। हत्याकांड की खबर सुनकर भगत सिंह इतने बेचैन हुए कि अगले दिन वह स्कूल जाने की जगह लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां से पहली रेलगाड़ी से अमृतसर आए। 

अमृतसर में वह बारह मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे। कहते हैं कि उस समय उनके हाथ में एक बोतल थी जिसमें वह निर्दोष भारतीयों का खून भरकर ले जाना चाहते थे। लेकिन बालक भगत सिंह को यह नहीं मालूम था कि खून सूख चुका है। उन्होंने वहां की मिट्टी को बोतल में भरी और अपने साथ लेकर गए। इस घटना का उन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

वह क्रांतिकारी साहित्य पढ़ने की ओर प्रवृत्त हुए। चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने किसानों का साथ देने से इनकार करते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो उनका कांग्रेस और महात्मा गांधी से मोह भंग हो गया। उन्होंने देश के क्रांतिकारियों का मार्ग अपनाया। 

सन 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मौत ने उन्हें इतना उद्वेलित कर दिया कि उन्होंने एएसपी सांडर्स को मारकर लाला जी की मौत का बदला ले लिया। अंतत: 23 मार्च 1931 को भगत सिंह देश की खातिर शहीद हो गए।