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Sunday, May 18, 2025

कपड़ों से विद्वत्ता का पता नहीं चलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ग्यारहवीं शताब्दी में पैदा हुए राजा भोज परमार वंश के शासक थे। उनकी राजधारी धार नगरी थी। वह स्वयं विद्वान थे और विद्वानों का बहुत आदर करते थे। जब राजा भोज ने शासन संभाला था, तो उन्होंने अपने आसपास के राजाओं को पराजित करके राज्य का काफी विस्तार कर लिया था। 

लेकिन अंतत: उन्हें चंदेल सम्राट विद्याधर वर्मन से पराजित होना पड़ा और उनकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। कहते हैं कि एक बार राजा भोज ने अपनी राजधानी में एक समारोह आयोजित किया। इसमें उन्होंने अपने राज्य सहित अन्य राज्यों के विद्वानों को आमंत्रित किया। राजा भोज साल में एकाध बार ऐसे समारोह आयोजित किया करते थे। जब समारोह में विद्वानों का आना शुरू हुआ, तो राजा भोज ने सबका यथोचित आदर सत्कार किया। 

उन्होंने देखा कि एक विद्वान काफी बढ़िया वस्त्र पहनकर आया हुआ है, तो उन्होंने उस विद्वान को अपने सिंहासन के नजदीक बैठाया। समारोह सभी विद्वानों ने अपने विचार रखे। समारोह में साधारण कपड़ों में एक विद्वान ने अपने विचार रखना शुरू किया, तो सब लोग मंत्रमुग्ध होकर उसकी बात सुनने लगे। राजा काफी देर तक उसकी बात को सुनकर गुनते रहे। जब उस विद्वान ने अपनी बात समाप्त की तो राजदरबार तालियों से गूंज उठा। जब वह विद्वान जाने लगा, तो राजा भोज उसे द्वार तक छोड़ने आए। 

इस पर उनके एक दरबारी ने कहा कि जब अच्छे कपड़े पहने विद्वान आया था, तो आपने उसे अपने नजदीक बैठाया, लेकिन इसे आप द्वार तक छोड़ने आए, ऐसा क्यों? राजा ने कहा कि उसके अच्छे कपड़े देखकर उसके विद्वान होने का भ्रम हुआ था, लेकिन इस विद्वान ने जैसे ही पहला शब्द कहा, पता लग गया कि यह व्यक्ति सचमुच विद्वान है। कपड़ों से किसी की पहचान नहीं की जा सकती है।

Wednesday, April 30, 2025

राजा भोज ने सेवक की सजा माफ कर दी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गलती हर किसी से होती है। गलती होने पर क्षमा कर देना ही बड़प्पन है। परिवार के लोगों से भी कई बार कुछ गलतियां हो जाती हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें माफ न किया जाए। मित्र भी कई बार चाहे-अनचाहे गलती कर बैठते हैं, तो क्या उनसे दोस्ती तोड़ दी जाए। नहीं, उनको माफी देकर आगे बढ़ा जाए, यही उचित है। धारानगरी के राजा भोज और उनके सेवक के संबंध में एक बहुत ही रोचक कथा कही जाती है। 

आपको बता दें कि राजा भोज परमार वंश के शासक थे। उनकी राजधानी का नाम धारानगरी था। उनका राज्य उत्तर में चितौड़ से लेकर दक्षिण में उत्तरी कोंकण और पूर्व में विदिशा से लेकर पश्चिम में साबरमती नदी तक फैला हुआ था। राजा भोज ने अपने आसपास के राजाओं से अलग-अलग युद्ध में विजय प्राप्त की थी, लेकिन वह चंदेल सम्राट विद्याधर वर्मन से युद्ध में पराजित हो गए थे।  

वह चंदेल सम्राट के आधीन राजा होकर रह गए थे। एक बार की बात है। राजा भोज अपने राजमहल मेंभोजन कर रहे थे। भोजन एक सेवक परोस रहा था। इसी बीच खाना परोसते समय सेवक से थोड़ी सी सब्जी राजा भोज के कपड़ों पर गिर गई। राजा भोज को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने गुस्से में उस सेवक को मृत्यु दंड की सजा सुना दी। सेवक बहुत गिड़गिड़ाया। अपने अपराध की क्षमा मांगी, लेकिन राजा भोज नहीं माने। थोड़ी देर बाद उस सेवक ने सब्जी से भरा कटोरा उठाया और राजा भोज के सिर पर पलट दिया। 

राजा भोज ने कहा कि यह क्या किया तुमने? उस सेवक ने कहा कि जब कल दूसरे लोग सुनेंगे कि मामूली गलती पर राजा भोज ने सेवक को मृत्यु दंड दिया, तो आपकी बदनाम होगी। अब सब लोग यही कहेंगे कि सेवक बदमाश था, उसे उचित सजा मिली। यह सुनकर राजा भोज ने उसकी सजा माफ कर दी।

Friday, April 4, 2025

मेहनत कोई करे, आनंद दूसरा उठाए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ग्यारहवीं शताब्दी में परमार वंश के राजा हुए हैं भोज। धारा नगरी के राजा सिंधुल के पुत्र भोज थे। जब भोज पांच साल के थे, तब इनके पिता सिंधुल की मौत हो गई थी। भोज के चाचा मुंज पर राज्य और इनके पालन-पोषण का भार आ पड़ा। बाद में मुंज के मन में राज्य का लोभ आ गया और उसने बंगाल के वत्सराज को भोज की हत्या का दायित्व सौंपा। वत्सराज को भोज की हत्या करने का साहस नहीं हुआ। 

बाद में भोज के मारे जाने की बात सुनकर मुंज को बहुत अफसोस हुआ। तब वत्सराज ने सच्ची बात बताई। तब मुंज राजपाट भोज को सौंप कर पत्नी के साथ वन को चले गए। एक बार की बात है। राजा भोज अपने राज कवि पंडित धनराज के साथ कहीं जा रहे थे। काफी देर तक चलने से वह काफी थक गए थे, तो एक बरगद के पेड़ के नीचे रुक गए। 

थोड़ी देर बाद राजा भोज की निगाह ऊपर गई तो उन्होंने देखा कि मधुमक्खियों ने अपना छत्ता लगा रखा है। छत्ता शहद से पूरा भर गया था। वह गिरने ही वाला था। उस पर लगी मधुमक्खियां अपने पैर छत्ते पर रगड़ रही थीं। तब राजा भोज ने राजकवि धनपाल से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि इन मधुमक्खियों को इस बात का अफसोस हो रहा है कि उनके द्वारा बनाया गया छत्ता अभी गिर जाएगा। 

इतनी मेहनत से तैयार किए गए शहद का आनंद कोई दूसरा उठाएगा। इसी दुख में वह अपने पैर रगड़ रही हैं। इस संसार में अकसर देखने को मिलता है कि मेहनत कोई करता है, उस मेहनत के प्रतिफल का आनंद कोई दूसरा उठाता है। ऐसी स्थिति में मेहनत करने वाले के पास पछताने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता है। यह बात सुनकर राजा भोज सारी बात समझ गए। उन्होंने थोड़ी देर सुस्ताने के बाद अपनी राह ली।