Wednesday, December 31, 2025

राजेंद्र बाबू ने कर्ज लेकर किया भतीजी का विवाह

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दहेज आज भी गरीब और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। आजादी से पहले और आज भी दहेज की वजह से बहुत सारी लड़कियां अविवाहित रह जाती हैं। इस समस्या से मुक्ति के लिए अब कुछ संस्थाओं ने सामूहिक विवाह का आयोजन करना शुरू कर दिया है, ताकि गरीब परिवार की लड़कियों का भी विवाह कराया जा सके।

ऐसे वैवाहिक आयोजनों में कुछ अमीर लोग और संस्थाएं आर्थिक मदद करती हैं ताकि आयोजन संपन्न हो सके। कुछ लोग तो भारी भरकम रकम कर्ज लेकर भी अपनी कन्या क विवाह करते हैं। ऐसी ही पीड़ा देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी झेलना पड़ा था। 

बात तब की है, जब उनके पिता का निधन हो गया था। कुछ समय बाद उनकी मां भी चल बसीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिन्हें लोग बड़े प्यार से राजेंद्र बाबू भी कहते थे, दो भाई थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद की बेटी विवाह योग्य हो चुकी थी। उन दिनों आमतौर पर लोग अपनी बेटियों का विवाह 14-15 साल की आयु में कर दिया करते थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद को तीन महीने पहले ही अध्यापक की नौकरी मिली थी। 

जमींदारी थी, लेकिन उससे केवल इतनी आय होती थी कि रहने खाने की व्यवस्था हो जाए। नतीजा यह हुआ कि दोनों भाइयों को कर्ज लेकर बेटी की शादी करनी पड़ी। कर्ज लेकर भतीजी की शादी करने की पीड़ा राजेंद्र बाबू को आजीवन सालती रही। उन्होंने आगे चलकर दहेज प्रथा के खिलाफ सक्रिय अभियान चलाया।  उन्होंने युवकों से यह शपथ पत्र भरवाया कि वह दहेज लेकर विवाह नहीं करेंगे। यदि लेना भी पड़ा, तो 51 रुपये से अधिक दहेज नहीं लेंगे। दहेज का दानव आज भी न जाने कितनी महिलाओं की बलि ले रहा है।

पूरी दुनिया की संपदा से भी नहीं चुकाया जा सकता मां की ममता का मोल


अशोक मिश्र

दुनिया की सभी भाषाओं में मां के लिए जो भी शब्द प्रचलित हों, वह उस भाषा के सबसे पवित्र शब्द है। मां अपनी संतान को नौ महीने पेट में रखने के बाद जब जन्म देती है, तो वह जिस पीड़ा से गुजरती है, उसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता है। मां कैसी भी हो, अपने बच्चे को अटूट प्यार देती है। अगर कहीं बच्चे को चोट लग जाए, तो सबसे पहले मां को ही दर्द महसूस होता है। 

मां अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती है। समाज में कई ऐसी घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं कि मां अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए अपना तन तक बेच देती है। इसके बड़ा बलिदान कोई दूसरा नहीं हो सकता है। मां की ममता का एक उदाहरण फरीदाबाद में देखने को मिला। 

फरीदाबाद की संजय कालोनी निवासी रीना की बेटी को रविवार की दोपहर में पेट दर्द हुआ। वह अपनी बच्ची को बीके अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लेकर पहुंची। अस्पताल में मौजूद डॉक्टर ने उसकी जांच के बाद बताया कि बच्ची की यहां आने से पहले ही मौत हो चुकी है। डॉक्टर ने कागजी कार्रवाई करते हुए बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया। इसके बाद भी रीना को यही लग रहा था कि उसकी बच्ची जिंदा है। डॉक्टर से जांचने में कोई गलती हुई है। मां की ममता यह मानने को तैयार ही नहीं थी कि उसकी बेटी की मौत हो चुकी है। वह छटपटा रही थी कि क्या किया जाए? 

उसने अंत में फैसला लिया और मॉर्च्युरी से अपनी बेटी का शव उठाया और उसे लेकर निजी अस्पताल की ओर भाग खड़ी हुई। मॉर्च्युरी में मौजूद लोगों ने इसका विरोध भी किया। लेकिन रीना नहीं मानी। निजी अस्पताल में पहुंचने पर वहां के डॉक्टरों ने भी वही बात बताई जो बीके अस्पताल के डॉक्टर बता चुके थे। इधर बीके अस्पताल के कर्मचारियों ने पुलिस को सूचित कर दिया। पुलिस ने आकर सब कुछ संभाला। बच्चे के प्रति मां की इस ममता ने कई लोगों को द्रवित कर दिया। 

अफसोस की बात यह है कि यही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी मां और पिता के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके मां-बाप ने उनके लिए किया ही क्या है? देश में दिनोंदिन बढ़ रहे वृद्धाश्रम इस बात की गवाही देते हैं। बच्चे बड़े होकर नौकरी या रोजगार करने के लिए जब मां-बाप से दूर चले जाते हैं, तो वह धीरे-धीरे अपने माता-पिता के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। ऐसा सभी बच्चे नहीं करते हैं। ऐसा करने वाले मुश्किल से कुछ ही प्रतिशत होंगे। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि बूढ़े माता-पिता अपने घर से दूर जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन बच्चों की मजबूरी यह होती है कि उनको नौकरी ही दूसरे जिले या राज्य में मिलती है। ऐसी दशा में उनके लिए अपने माता-पिता को अकेला छोड़ना मजबूरी हो जाती है।

सचमुच, लालच बहुत बुरी बला है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि लोभ सबसे बुरी बला है। लोभ के वशीभूत होकर लोग अपना नुकसान करा बैठते हैं। कई बार लोभ इतना भारी पड़ता है कि लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। कुछ मामलों में तो यह भी देखा गया है कि लालच के चक्कर में लोग अपना कमाया हुआ धन भी गंवा बैठते हैं। इसके बावजूद लोग सबक नहीं लेते हैं। 

इस संदर्भ में एक रोचक कथा कही जाती है। यह घटना सत्य घटना नहीं, बल्कि केवल एक कथा ही है। किसी राज्य के राजा के दरबार में एक कर्मचारी था। वह किसी काम से एक जंगल की ओर से गुजर रहा था। जंगल के बीचो बीच पहुंचने पर उसे एक आवाज सुनाई दी। 

उसने ध्यान लगाकर बात सुनने की कोशिश की। उसे लगा कि कोई कह रहा है कि सात घड़ा धन लोगे? उसने इधर उधर देखा, लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं दिया। एक बार उसने साहस किया और बोला, हां, लूंगा सात घड़ा धन। तब उसे दोबारा आवाज सुनाई दी। उस आवाज ने कहा कि सात घड़ा धन तुम्हारे घर पहुंच चुका है। घर जाकर देख लेना। उसे संभालकर रखना।

 जिस काम के लिए वह आदमी जा रहा था, उसे जल्दी-जल्दी निपटाया और घर पहुंच गया। घर जाकर उसने देखा कि छह घड़ा तो भरा हुआ है। लेकिन सातवां घड़ा खाली है। उसने सोचा कि मैं इस घड़े को भर दूंगा। उसने अपने घर के सारे जेवर उस घड़े में डाल दिया। घड़ा नहीं भरा। उसने राजा से वेतन बढ़ाने को कहा। राजा ने वेतन दो गुना कर दिया। फिर भी वह गरीब ही बना रहा। एक दिन राजा ने उससे पूछ लिया कि क्या तुम्हें सात घड़ा धन तो नहीं मिल गया है? उसने कहा, हां महराज। राजा ने कहा कि उससे छुटकारा पा लेने में ही भलाई है। उस आदमी ने धन से छुटकारा पाया, लेकिन उसका अपना धन भी चला गया।

सबसे बड़ी जरूरत अरावली क्षेत्र को संरक्षित करने की है


अशोक मिश्र

संतोष की बात यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने 20 नवंबर के अपने ही फैसले पर रोक लगा दी है। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से गुजरात, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान में आंदोलन कर रहे पर्यावरण प्रेमी और जागरूक नागरिकों ने चैन की सांस ली है। अब उनकी निगाहें 21 जनवरी 2026 को होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई है। सुप्रीमकोर्ट भविष्य में अरावली को लेकर क्या फैसला देता है, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीमकोर्ट करोड़ों लोगों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने पुराने फैसले को पलट देगा और लोगों को स्थायी रूप से राहत प्रदान करेगा। 

इस मामले में पर्यावरणविदों का मानना है कि सवाल यह नहीं है कि कितनी ऊंचाई वाली पहाड़ियां अरावली क्षेत्र में मानी जाएंगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि संपूर्ण अरावली क्षेत्र को ही संरक्षित किया जाए। उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए। सौ मीटर वाली परिभाषा में यह आशंका थी कि सौ मीटर से नीचे की पहाड़ियों पर खनन के लिए सरकारें इजाजत दे देंगी। रियल एस्टेट, खनन और वन माफियाओं को अरावली को तहस नहस करने का लाइसेंस मिल जाएगा। 

लोगों का यह भी मानना था कि अरावली क्षेत्र में जिन राजनेताओं, उद्योगपतियों और रियल एस्टेट से जुड़े लोगों ने अपने रिसार्ट, मैरिज हाल और भव्य मकान बना रखे हैं, उनको वैधता मिल जाएगा। इसी साल कोर्ट के आदेश पर अरावली क्षेत्र में अवैध रूप से बनाए गए पक्के निर्माणों को ढहा दिया गया था। तब यह भी बात उठी थी कि कुछ रसूखदार लोगों के पक्के निर्माण को नहीं गिराया गया है।  इससे लोगों में काफी आक्रोश था। यही वजह है कि जब सुप्रीमकोर्ट ने सौ मीटर वाली परिभाषा दी, तो लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। अरावली पर्वत शृंखलाओं से जुड़े चारों राज्यों में लोगों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।

इन चारों राज्यों में रहने वाले करोड़ों लोगों का मानना है कि यदि अरावली पर्वतमाला सुरक्षित रहेगी, तभी लोगों को स्वच्छ वायु सांस लेने के लिए मिलेगी। अरावली है, तो हम हैं। लोगों का यह सोचना सही भी है। करोड़ों साल से अरावली पर्वत शृंखलाएं यहां के लोगों को प्राणवायु प्रदान करती रही हैं। राजस्थान से उठने वाले रेत के बवंडर को अपनी सीमा के बाहर ही रोककर अरावली ने चारों राज्यों को रेगिस्तान होने से बचा लिया है। अरावली क्षेत्र में उगने वाले पेड़-पौधों ने जलवायु परिवर्तन की गति को भी काफी हद तक धीमा कर रखा है। 

अरावली बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे लोगों की मांग है कि सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक एक्सपर्ट कमेटी गठित करे जो पूरे अरावली क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट पेश करे। इस रिपोर्ट के आधार पर ही अरावली के बारे में भविष्य में फैसले लिए जाएं।

Monday, December 29, 2025

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती का वास्तविक नाम मुंशीराम विज था। श्रद्धानन्द को प्रखर शिक्षाविद, स्वाधीनता संग्राम सेनानी और आर्य समाज के संन्यासी के रूप में माना जाता है। उनमें धार्मिक कट्टरता तो रंच मात्र भी नहीं थी। स्वामी जी का जन्म 22 फरवरी 1856 को जालंधर जिले में एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में यूनाइटेड प्रॉविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। 

युवावस्था में वह ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे, लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रवचन सुनने के बाद वह आर्य समाजी हो गए। एक बार की बात है। हकीम अजमल खां अपने साथियों के साथ स्वामी श्रद्धानन्द से मिलने गुरुकुल पहुंचे। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना ही स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती ने की थी। 

जब अजमल खा गुरुकुल पहुंचे, तो उस समय वहां हवन चल रहा था। आश्रम के लोगों ने अजमल खा और उनके साथियों से कहा कि आप लोग थोड़ा इंतजार करें। इस समय हवन चल रहा है। फुरसत पाते ही स्वामी जी आपसे मुलाकात करेंगे। अजमल खां एक जाने-माने यूनानी चिकित्सक थे और बाद में वह कांग्रेस के पांचवें मुस्लिम अध्यक्ष चुने गए थे। जब हवन खत्म हुआ, तो स्वामी जी ने लोगों से कहा कि खाने का समय है, चलिए पहले भोजन कर लीजिए, फिर बातें करते हैं। 

इस पर कुछ लोगों ने कहा कि हमारे नमाज का वक्त हो गया है। हम नमाज के बाद ही भोजन करेंगे। कोई जगह बता दीजिए, जहां नमाज पढ़ सकें। स्वामी जी उन्हें यज्ञशाला में ले गए और बोले, यहीं नमाज पढ़ लीजिए। लोगों ने कहा कि अरे, यह आपकी यज्ञशाला है। हिंदुओं को बुरा लगेगा। स्वामी ने कहा कि यह पूजा स्थल है। तो पूजा ही होगी। चाहे हिंदू यज्ञ करे या मुसलमान नमाज पढ़े।

नए साल में फिरौती, कांट्रैक्ट किलिंग पर रोक लगाएगी हरियाणा पुलिस

अशोक मिश्र

किसी भी देश या राज्य को अपराधविहीन बना पाना लगभग असंभव है। हां, संगठित अपराधों को पुलिस, खुफिया विभाग और जागरूक नागरिकों के सहयोग से रोका जा सकता है। कम किया जा सकता है। पिछले काफी दिनों से हरियाणा पुलिस अपराधियों, फरार अपराधियों और नशा तस्करों के खिलाफ बाकायदा मुहिम चला रही है। काफी हद तक पुलिस को सफलता भी मिली है। कई वर्षों से फरार चल रहे अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। 

राज्य में छोटे से लेकर बड़े अपराधियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने का भी प्रयास किया जा चुका है। अपनी सफलता से उत्साहित हरियाणा पुलिस नए साल में अपराधियों पर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है। इस संदर्भ में मधुबन पुलिस अकादमी में राज्य स्तरीय बैठक आयोजित की गई है। इस बैठक में प्रदेश  के सभी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भाग लेंगे और अपराध पर लगाम लगाने की योजनाओं पर विचार विमर्श करेंगे। इस बैठक में वर्ष 2025 में पुलिस की ओर से चलाई गई मुहिम की समीक्षा की जाएगी। 

पता लगाया जाएगा कि पुलिस के प्रयास में कहां कमी रह गई। उनके प्रयास कितने सफल रहे। कहां अभी और प्रयास करने की गुंजाइश है। इसके बाद नए साल में नए जोश और उमंग के साथ प्रदेश के अपराधियों को उनके किए की सजा दिलाने की योजना बनाई जाएगी। प्रदेश अपराध मुक्त हो सके, इसकी युक्ति खोजी जाएगी। संगठित अपराध को रोकने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। यह भी सच है कि असंगठित अपराध पर अंकुश लगा पाना लगभग असंभव होता है। 

यदि कोई व्यक्ति राह चलते किसी व्यक्ति से टकरा जाए और क्रोध में आकर वह टकराने वाले व्यक्ति की हत्या कर दे, ऐसे अपराध को रोक पाना असंभव सा है। हर गली, हर नुक्कड़, हर चौराहे और हर मकान या व्यक्ति के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती है। क्षणिक उत्तेजना में होने वाले अपराध को किसी भी देश या प्रदेश में होने से नहीं रोका जा सकता है। हां, ऐसे अपराध होने के बाद के बाद दोषी को जल्दी से जल्दी सजा दिलाने का प्रयास जरूर पुलिस को करना चाहिए। 

नए साल में पुलिस का प्रयास रहेगा कि फिरौती काल, कांट्रैक्ट किलिंग और आनर किलिंग जैसे अपराध पर लगाम लगाई जाए। जेलों या विदेश में बैठे अपराधी सोशल मीडिया के माध्यम से अपराध को अंजाम देते हैं। ऐसे अपराधियों और अपराधों पर अंकुश लगाना पुलिस की पहली प्राथमिकता हो सकती है। इसके लिए सबसे पहले पुलिस को अपना नेटवर्क चुस्त दुरुस्त करना होगा। खुफिया विभाग को भी अपना जनसंपर्कबढ़ाना होगा, ताकि समय पर होने वाले अपराध के बारे में पता लग जाए और अपराध को रोका जा सके। बैठक में संगठित अपराध, नशा तस्करी, साइबर क्राइम आदि रोकने पर भी चर्चा हो सकती है।

Sunday, December 28, 2025

राजा को बताया अहंकार दूर करने का उपाय


 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि अभिमान व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। अभिमानी व्यक्ति को अपने कामकाज से पूरी संतुष्टि भी नहीं मिलती है। यही वजह है कि अभिमानी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं रहता है। इस संदर्भ में एक रोचक कथा है। किसी राज्य का राजा पिछले काफी दिनों से अपने राजकाज से संतुष्ट नहीं हो पा रहा था। उसे हर काम अधूरा सा लगता था। 

पता नहीं क्यों, कुछ दिनों से  उसे अपने राज्य और धन पर अभिमान होने लगा था। वह अहंकारी होता जा रहा था। वैसे तो राजा बहुत ज्ञानवान था। वह अपने भीतर घर करने वाली इन बुरी भावनाओं को लेकर सचेत था, लेकिन अहंकार को वह अपने से दूर नहीं कर पा रहा था। यही बात उसे परेशान किए हुए थी। वह इस समस्या से छुटकारा पाना चाहता था। एक दिन उसने अपने गुरु से अपनी समस्या बताते हुए समाधान बताने को कहा। 

उसकी बात सुनकर उसके गुरुदेव कुछ देर तक मौन रहे। फिर बोले, राजन! तुम मेरी तीन बातों पर अमल करोगे, तो सुखी रहोगे। राजा ने कहा, बताइए गुरुदेव। मैं आपकी बात हर हालत में मानूंगा। गुरुदेव ने कहा कि पहली बात यह है कि तुम रात में मजबूत किले में रहना। दूसरी बात, स्वादिष्ट भोजना करना। और तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सदा मुलायम बिस्तर पर सोना। 

यह सुनकर राजा ने कहा कि ऐसे तो मैं और भी अहंकारी हो जाऊंगा।  गुरु ने कहा कि तुम मेरी बात समझ नहीं पाए। पहली बात का अर्थ है कि तुम सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। दूसरी बात, कभी भरपेट भोजन मत करना, जो मिल जाए, उसे खा लेना। तीसरी बात, जैसा भी बिस्तर मिल जाए, उसी पर सोना, वह तुम्हें मुलायम लगेगी। यह सुनकर राजा ने वैसा ही करने का संकल्प लिया और कुछ दिनों बाद उसकी समस्या भी दूर हो गई।

मौत के मुंह में ढकेले जा रहे बॉडी बनाने की चाह रखने वाले युवा

 

अशोक मिश्र

हमारे देश में सदियों से सेहत को लेकर बड़ी जागरूकता रही है। ‘तंदुरुस्ती हजार नियामत है’ जैसी कहावतें बताती हैं कि हमारे देश के लोग अपनी सेहत को लेकर काफी जागरूक रहे हैं। जीवन को सुखी और समृद्ध रखने के लिए व्यक्ति का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। यही वजह है कि लोग अपने को स्वस्थ रखने के लिए अखाड़ों में जाया करते थे। हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में अखाड़े आधुनिक जिम का प्राचीन रूप हुआ करते थे। अखाड़े गांवों से लेकर शहरों तक फैले हुए थे। इन अखाड़ों का स्थान अब गांव और शहरों में खुलने वाले जिम ने ले लिया है। फिटनेस और पतले होने के लिए लोगों ने जिम और विभिन्न क्लबों में जाना शुरू कर दिया है। बॉडी बनाना और फिगर मेनटेन रखना जैसे अब युवक-युवतियों की हॉबी बन चुकी है। 

इसका फायदा उठाकर जिम ट्रेनरों ने डॉक्टरों की मदद से जिम ज्वाइन करने वालों को नशे का आदी बना दिया है। तुरंत रिजल्ट की चाह ने युवाओं को नशे के दलदल में ढकेल दिया है। इसका फायदा उठाकर जिम संचालकों ने उन्हें नशा परोसना शुरू कर दिया है। हरियाणा में ऐसे जिम संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है जो युवाओं को स्टेरायड आदि की जगह नशे का इंजेक्शन लगाकर उनका जीवन बरबाद कर रहे हैं। एक सीमा से अधिक स्टेयराइड का इस्तेमाल करना भी नुकसानदायक है। 

स्टेरायड का उपयोग भी योग्य चिकित्सकों की देख-रेख में ही होना चाहिे। प्रदेश में नशे के कारोबारी जगह-जगह मिल सकते हैं। खासतौर पर उन जगहों पर जहां जिम आदि खुले हुए हैं। आपरेशन हॉटस्पाट मोमिनेशन के दौरान प्रदेश में बड़ी मात्रा में एंटी नारकोटिक्स डिपार्टमेंट ने नशीले पदार्थ बरामद किया है। कई नशा तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस और नारकोटिक्स डिपार्टमेंट को इस मामले में अच्छी सफलता मिली है, लेकिन राज्य से नशा तस्करों का पूरा नेटवर्क तोड़ दिया गया है, ऐसा भी नहीं है। 

प्रदेश में जिम क्लबों और उसके आसपास यदि गहनता से जांच की जाए, तो नशा तस्करों को पकड़ने में सफलता मिल सकती है। कहा तो यही जा रहा है कि जिम ट्रेनर, डॉक्टर और पार्टी प्रमोटर्स की मिलीभगत से युवाओं को सप्लीमेंट्स और दवाओं के नाम पर एमडी (मेफेड्रोन) जैसे नशीले पदार्थ दिए जा रहे हैं। बाडी बनाने की इच्छा से जो युवा इनका सेवन कर रहे हैं, कुछ समय बात उनकी किडनी, लिवर आदि बरबाद हो जाती है। ऐसे लोगों में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। 

स्वास्थ्य बनाने की प्रत्याशा में जिम जाने वाले युवाओं की जिंदगी कुछ लोग पैसे कमाने के चक्कर में बरबाद कर रहे हैं। राज्य में कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं कि इन जिन संचालकों के झांसे में आकर कई युवा अपनी पूरी जिंदगी बरबाद कर चुके हैं। उनका पूरा करियर बरबाद हो चुका है।

Saturday, December 27, 2025

चित्रकला के चक्कर में बहरे हो गए सर जोशुआ रेनाल्ड्स

 
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अट्ठारहवीं सदी के महान अंग्रेज चित्रकारों में से एक थे सर जोशुआ रेनाल्ड्स। रेनाल्ड्स का जन्म 16 जुलाई 1723 को डेवोन में हुआ था। वह किशोरावस्था में ही चित्रकला के प्रति आकर्षित हो गए थे। रेनाल्ड्स की प्रारंभिक शिक्षा डेवोन के एक स्कूल में हुई। उनके पिता एक शिक्षक और पादरी थे। उन्होंने प्राचीनकाल से लेकर अपने समकालीन साहित्यकारों का अच्छी तरह से अध्ययन किया, लेकिन उन्होंने चित्रकारी को ही जीवन में अपनाया। रोनाल्ड्स ने थामस हडसन के साथ चित्रकला का अध्ययन किया था। 

उन्होंने माइकल एंजेलो और टिटियन जैसे पुराने उस्तादों के चित्रों का अध्ययन करने के लिए 1749 में इटली की यात्रा की। इटली पहुंचने के बाद उन्होंने महान चित्रकारों की कलाकृतियों का बड़ी गहराई से अध्ययन शुरू किया। वह अध्ययन में इतना डूब गए कि उन्हें उन दिनों इटली में पड़ रही बर्फ ही ध्यान नहीं रहा। भयंकर बर्फबारी और शीतलहरी की वजह से उनके कान धीरे-धीरे सुन्न होने लगे। 

अंतत: परिणाम यह हुआ कि उन्हें सुनाई देना कम हो गया। दो साल बाद वह इटली से लौट आए। उनकी हालत देखकर उनके दोस्त ने कहा कि यदि तुम इटली नहीं जाते, तो आंशिक बहरे नहीं होते। यह सुनकर रेनाल्ड्स ने कहा कि यदि चित्रकला की बारीकियां सीखने के लिए मुझे सौ बार भी अपने कान कुर्बानी देनी पड़े तो मुझे स्वीकार है। 

सन 1768 में रायल अकदामी आफ आर्ट्स की स्थापना हुई तो उन्हें उसका अध्यक्ष बनाया गया और वह उस पद पर 1792 अपनी मृत्यु तक रहे। उन्होंने जीवन में दो हजार से अधिक कलाकृतियां बनाई। उन्होंने कला के क्षेत्र में एक शैली विकसित की जिसे काफी पसंद किया गया।

स्कूली बच्चों को संस्कारवान बनाने को शुरू हुई नई पहल

 

अशोक मिश्र

एक जनवरी से 15 जनवरी तक हरियाणा के सरकारी और वित्त पोषित स्कूलों में अवकाश रहेगा। दसवीं और बारहवीं स्कूल के बच्चों को हो सकता है कि प्रैक्टिकल के लिए स्कूल आना पड़ सकता है। अवकाश के दिनों में बच्चों को होमवर्क दिए जा रहे हैं। इस बार होमवर्क देने का तरीका पुराने पैटर्न से थोड़ा हटकर है। इस बार प्रयास किया जा रहा है कि पंद्रह दिन तक छुट्टी पर रहने वाले बच्चे अपने परिजनों के साथ आत्मीय संबंध बनाएं। उनके साथ रहकर न केवल सामाजिक ज्ञान प्राप्त करें, बल्कि वह अपने आसपास के पर्यावरण के प्रति भी जागरूक हों। यह जागरूकता उन्हें भविष्य में सामाजिक जीवन में प्रवेश करने पर काम आएगी। 

हमारे देश में सदियों से बच्चे किशोरावस्था तक अपने माता-पिता, दादी-दादा, नानी-नाना और ताया-ताई आदि के संरक्षण में पलते थे। वह अपने परिवार में एक दूसरे के साथ होने वाले व्यवहार, बातचीत और कार्यकलाप को बहुत नजदीक से देखते थे। इससे उन्हें पारिवारिक संरचना और सबसे व्यवहार करने का सलीका सीखने को मिलता था। किससे किस तरह की बातचीत करनी है, किसका आदर करना है, हम उम्र के साथ किस तरह से रहना है, यह सब कुछ सीखते थे। 

वह घर के काम में भी हाथ बंटाते थे। इससे उन्हें जिम्मेदारी का एहसास होता था। रात में सोते समय अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर वह कहानियां सुनते थे, पहेलियां हल करते थे। देश-समाज और गांव या शहर के बारे में जानकारियां हासिल करते थे। बहुत सारी जानकारियां उन्हें अपने परिजनों से ही प्राप्त हो जाती थीं। इस बार भी बच्चों को कुछ इसी तरह के काम दिए जा रहे हैं। वह घर में अपनी मां के कामों में हाथ बटाएंगे। कोई पकवान बनाना सीखेंगे। अपने बुजुर्गों से तेनालीराम, अकबर-बीरबल के किस्से, पंचतंत्र की कहानियां, जातक कथाएं आदि सुनेंगे। इन कथाओं से उन्होंने क्या सीखा, यह अपने होमवर्क की डायरी में दर्ज करना होगा। 

वह अपने घर के आसपास पौधरोपण करेंगे। उन पौधों की सुरक्षा और देखभाल भी उनके जिम्मे रहेगी। इससे वह पर्यावरण के प्रति सचेत होंगे। दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों से वह जोड़-घटाना, गुणा-भाग भी सिखाने का प्रयास किया जाएगा। इस बार बच्चों को कोई ऐसा होमवर्क नहीं दिया जा रहा है जिससे उन्हें रटने या कापी-किताबों के बोझ तले दबना पड़े। 

दरअसल, यह हरियाणा सरकार का नया प्रयोग है, ताकि हमारी भावी पीढ़ी संस्कारवान बने। उनमें संस्कारों का पोषण करने के लिए ही पंद्रह दिनों तक अपने परिजनों के निकट रहने का अवसर प्रदान किया जा रहा है। इस कार्य में उनके परिजनों का भी सहयोग लिया जाएगा। रोज तीस-चालीस मिनट तक बच्चों को रचनात्मक और व्यावहारिक ज्ञान दिलाने में माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों से मदद ली जाएगी।

Friday, December 26, 2025

जापान का एकीकरण करने वाले नोबुनागा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जापान के महान सेनापतियों में गिने जाते हैं ओडा नोबुनागा। इनका जन्म 23 जून 1534 को ओवारी प्रांत के नागोया में हुआ था। नोबुनागा को जापान का एकीकरण करने वाला महान शासक कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने समय के तमाम राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। कुछ लोग नोबुनागा को दूरदर्शी किंतु क्रूर मानते हैं। 

नोबुनागा ने अपने जीवन में कई लड़ाइयां लड़ी और पराजित होने वाले कबीलों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। एक बार की बात है। नोबुनागा अपने कुछ सैनिकों के साथ कहीं पड़ाव डाले हुए थे। वह जानता था कि युद्ध निकट है, लेकिन उसने अपनी सेना की एक टुकड़ी को दूसरी जगह भेज दिया था। तभी उसके सेना अधिकारी ने आकर उससे कहा कि विरोधी सेना आक्रमण के लिए तैयार है। 

तब उसने अपने सैनिकों को एक मंदिर के पास जमा किया और कहा कि मंदिर के सामने मैं तीन बार सिक्का उछालता हूं। यदि चित आया तो विजय निश्चित है। यह देवता का आदेश होगा। उसने तीन बार सिक्का उछाला और तीनों बार सिक्का चित ही आया। उसकी सेना उत्साह से भर उठी। उसे यह विश्वास हो गया कि देवता उससे प्रसन्न हैं और वह भी नोबुनागा की विजय चाहते हैं। 

कम होते हुए भी नोबुनागा की सेना ने बड़े उत्साह के साथ शत्रु पर हमला बोला और उन्हें पराजित कर दिया। विजयी सेना जब इकट्ठी हुई तो उसने उस सिक्के को दिखाते हुए कहा कि यह आपके मनोबल की जीत हुई है। सिक्का इस तरह ढाला गया था कि दोनों ओर चित वाला प्रतीक ही था। कहते हैं कि 21 जून 1582 को दुश्मन की सेना से घिर जाने के बाद ओडा नोबुनागा ने एक कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली।

उद्योग और उत्पादन में चीन को टक्कर देने की राह पर हरियाणा


अशोक मिश्र

राज्यों का विकास उसके औद्योगिक ढांचे और पूंजीनिवेश पर निर्भर होता है। राज्य में मौजूद इफ्रास्ट्रक्चर भी इसमें काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आवागमन के साधन भी राज्य के विकास की दशा और दिशा को समझने में काफी मायने रखते हैं। हरियाणा में अभी औद्योगिक विकास की काफी संभावनाएं हैं। औद्योगिक विकास पर ध्यान देकर न केवल प्रदेश की बेरोजगारी को दूर किया जा सकता है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय को भी बढ़ाया जा सकता है। 

चीनी मॉडल अपनाकर राज्य में औद्योगिक विकास की एक नई इबारत लिखी जा सकती है। अब इसके लिए फरीदाबाद की मेयर प्रवीण जोशी ने शहर में  औद्योगिकि गतिविधियों में तेजी लाने के लिए स्थायी औद्योगिक मेला परिसर स्थापित करने की योजना बनाई है। स्थायी औद्योगिक मेला परिसर का प्रस्ताव फिलहाल मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को भेजा जा चुका है। उम्मीद है कि जल्दी ही सीएम इस प्रस्ताव को मंजूरी भी प्रदान कर देंगे। सीएम की मंजूरी मिलते ही इस दिशा में काम शुरू कर दिया जाएगा। 

यह चीनी उद्योग मॉडल की ओर बढ़ाया गया छोटा सा कदम साबित होगा। वास्तव में चीन के कई शहरों में स्थायी औद्योगिक मेला परिसर स्थापित किए गए हैं जिनमें लगभग रोज चीनी उत्पादों को प्रस्तुत किया जाता है और उन्हें विदेश में निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। चीन में सन 1980 के बाद छोटे-छोटे पैमाने पर घरेलू उद्योग और बड़े पैमाने पर राज्य नियंत्रित कारखानों का बड़ी तेजी से विकास हुआ है। निजी कंपनियां भी उद्योग-धंधों के विकास में लगी रहती हैं। 

चीन के बारे में कहा तो यह भी जाता है कि चीन में हर घर में कोई न कोई छोटा-मोटा उद्योग धंधा चल रहा होता है। ज्यादातर लोग राज्य नियंत्रित कारखानों में कर्मी के तौर पर काम करते हैं। घरेलू उद्योगों के उत्पादों की प्रदर्शनियां लगती रहती हैं। छोटे उद्योगों के उत्पादों को या तो कम्युनिस्ट सरकार खरीद लेती है या फिर निजी कंपनियां। सरकार और कंपनियां इन उत्पादों को वैश्विक बाजार में उतार देती हैं। इसी तर्ज पर फरीदाबाद की मेयर प्रवीण जोशी ने अपने शहर को छोटे उद्योगों का हब बनाने का सपना देखा है। जोशी का प्रयास यह है कि फरीदाबाद में करीब 20 एकड़ जमीन पर स्थायी औद्योगिक मेला परिसर विकसित किया जाए जहां साल भर घरेलू और विदेशी उद्योगपतियों के लिए पक्के और आधुनिक स्टॉल उपलब्ध कराए जाएं जहां पर वे अपने उत्पादों का प्रदर्शन कर सकें। 

इस परिसर में पूरे साल भर व्यापारिक गतिविधियां चलती रहें। सीएम से प्रोजेक्ट मंजूर होने के बाद दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले ट्रेड फेयर की तरह फरीदाबाद का स्थायी औद्योगिक मेला परिसर का निर्माण किया जाएगा। मेला परिसर में सभी आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी।

Thursday, December 25, 2025

मंच पर पहुंचे, तो भाषण भूल गए महात्मा गांधी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा गांधी के विचारों से तब भी और आज भी बहुत सारे लोग सहमत नहीं होंगे। कुछ लोग आलोचना भी करते हैं। अपने समय में भी महात्मा गांधी को अपने कार्यों और विचारों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके लिए कई बार वह शर्मिंदा भी हुए, लेकिन उन्होंने साहस नहीं छोड़ा और न ही अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास किया। 

गांधी के विचारों से असहमत होते हुए भी यह बात स्वीकार करनी होगी कि वह सत्य बोलने में कभी पीछे नहीं रहे। अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में उन्होंने अपने जीवन की घटनाओं को उसी तरह दर्ज की है जैसी घटी होगी। मोहनदास करमचन्द गान्धी का जन्म गुजरात के एक तटीय नगर पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर सन 1869 को हुआ था। 

उनके पिता करम चंद गांधी एक छोटी सी रियासत काठियावाड़ के दीवान थे। मई 1883 में साढे 13 वर्ष की आयु पूर्ण करते ही उनका विवाह 14 वर्ष की कस्तूर बाई मकनजी से कर दिया गया। पत्नी का पहला नाम छोटा करके कस्तूरबा कर दिया गया और उसे लोग प्यार से बा कहते थे। बात उन दिनों की है, जब 1893-94 को वह दक्षिण अफ्रीका गए। दक्षिण अफ्रीका के नटाल प्रांत में जब उन्होंने भारतीयों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाना शुरू किया, तो लोगों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। 

एक बार उन्हें भाषण देने जाना पड़ा। उन्होंने भाषण लिखकर अच्छी तैयारी की, लेकिन जब मंच पर पहुंचे तो भाषण की पर्ची हाथ से छूट गई और वह सब कुछ भूल गए। वह कुछ नहीं बोले और हाथ जोड़कर सबसे क्षमा मांगी। इसके बाद उन्होंने अपनी कमजोरियों को दूर किया। एक दिन वह भी आया जब उनकी आवाज को पूरी दुनिया ने सुना।

विलायती बबूलों ने अरावली का बिगाड़ दिया ईको सिस्टम

अशोक मिश्र

दिल्ली और हरियाणा की जमीनों के रेगिस्तान बनने की आशंका बलवती होती जा रही है। अरावली की पर्वत शृंखलाओं को लेकर इन दिनों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में जो विरोध प्रदर्शन हो रहा है, वह अरावली क्षेत्र में संरक्षित क्षेत्र की नई परिभाषा को लेकर है। इन चारों राज्यों में वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकारों ने अरावली पहाड़ियों को लेकर जो लापरवाही बरती है, उसके भी दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। 

गुजरात से लेकर दिल्ली तक अरावली पर्वत शृंखलाओं को जिस तरह बरबाद होने दिया गया, उसी का परिणाम है कि अब राजस्थान से उठने वाले धूल के बवंडर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने लगे हैं। यदि राजस्थान से आने वाली धूल को रोका नहीं गया, तो दिल्ली और हरियाणा की हरी-भरी जमीनें रेगिस्तान में बदल जाएंगी। ऐसी आशंका पर्यावरणविद व्यक्त करने लगे हैं। पिछले कई दशकों में अरावली के वन क्षेत्र और पहाड़ियों को काफी नुकसान पहुंचाया गया है। 

हरियाणा में सन 1990 से लेकर 1999 तक शासन करने वाली सरकारों ने एक नादानीभरा फैसला लिया था। इन दस वर्षों में अरावली पहाड़ियों और उसके आसपास के क्षेत्र में हेलिकाप्टर से जगह-जगह विलायती बबूल के बीज गिराए गए थे। नतीजा यह हुआ कि अरावली क्षेत्र की अधिकतर जमीनों पर विलायती बबूल उग आए। यह विलायती बबूल राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकने में नाकामयाब रहे। इन विलायती बबूलों ने अपना कुनबा बढ़ाना जब शुरू किया, तो स्थानीय वनस्पतियां सिकुड़ने लगीं। 

पहले से रोपे गए या अपने आप उगी स्थानीय वनस्पतियां पहले एक सीमा के बाद धूल को आगे बढ़ने से रोक देती थीं। इसके हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ क्षेत्र रेगिस्तान बनने से बचे रहे। लोगों को भी काफी हद तक राहत मिलती रही। लेकिन विलायती बबूल ने सारे इकोसिस्टम को बिगाड़कर रख दिया। पर्यावरण को शुद्ध रखने में सक्षम स्थानीय वनस्पतियां अब तो नब्बे फीसदी कम हो गई हैं। सन 2000 से 2004 के बीच अरावली क्षेत्र में अवैध खनन भी बहुत हुए। खनन और वन माफियाओं ने पूरे अरावली क्षेत्र को बरबाद करके रख दिया। 

पहाड़ियों के अवैध खनन और पेड़ पौधों की अंधाधुंध कटाई का नतीजा यह हुआ कि जो नाले और तालाब साल भर पानी से लबालब रहते थे, अब वह बरसात के मौसम में ही भरे हुए दिखाई देते हैं। गर्मियों और सर्दियों में तालाबों और छोटे-मोटे नालों में पानी ही नहीं रहता है। इससे लोगों को पानी की आवश्यकताओं के लिए भूजल पर निर्भर होना पड़ रहा है। जमीनों के रिचार्ज न होने की वजह से लगातार जल स्तर काफी नीचे जा रहा है। उस पर पर्यावरण में भी काफी तेजी से बदलाव आता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का असर अब दिखाई देने लगा है।

Wednesday, December 24, 2025

मां! वह बूढ़ी महिला मुझे बेटा कह रही है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उन्नीसवीं सदी में बंगाल सहित देश के कई प्रांतों में विधवाओं की स्थिति काफी खराब थी। विधवा विवाह को भी समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता था। स्त्रियों को उन दिनों पढ़ाया भी बहुत कम जाता था। कुछ जागरूक लोग ही अपनी बहन-बेटियों को पढ़ाने-लिखाने में रुचि लेते थे। ऐसे ही युग में पैदा हुए थे ईश्वर चंद विद्यासागर। 

विद्यासागर का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले में 26 सितंबर 1820 को हुआ था। काफी गरीब घर में पैदा होने के बावजूद उनमें पढ़ने के प्रति बहुत अधिक रुचि थी। वह कुशाग्र बुद्धि के थे। इस बात को भांपकर उनके पिता ठाकुर दास बन्ध्योपाध्याय ने अपने नौ वर्ष के पुत्र को पैदल चलकर कोलकाता के संस्कृत विद्यालय में भर्ती करवाया। गरीबी और शारीरिक कमजोरी के बावजूद विद्यासागर ने जीवन की सभी परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 

विद्यासागर के बचपन की एक घटना है। एक दिन वह घर में बैठे हुए थे कि दरवाजे पर एक बहुत बूढ़ी महिला ने कांपती हुई आवाज में कहा, बेटा! कुछ खाने को दे दो। यह सुनकर विद्यासागर दौड़ते हुए  अपनी मां के पास पहुंचे और कहा, मां! दरवाजे पर एक बूढ़ी महिला खड़ी है और मुझे बेटा कह रही है। उसे कुछ खाने को दो न। उनकी मां ने कहा कि बेटा, घर में कुछ खाने-पीने को तो है नहीं। 

यह थोड़े से चावल हैं, उसे दे दो। विद्यासागर ने कहा कि मां इतने चावल से क्या होगा? मां तुम मुझे हाथ में पहना कंगन दे दो। मैं जब बड़ा हो जाऊंगा, तो इसके बड़ा कंगन बनवाकर दूंगा। मां ने हाथ से कंगन उतारकर दे दिए। उस महिला ने कंगन बेचकर अपने घर की व्यवस्था को सुधार लिया। जब विद्यासागर बड़े हुए तो एक दिन उन्होंने अपनी मां से कहा कि अपनी कलाई का नाप दे दो। मैं कंगन बनवा दंू। मां ने हंसते हुए कहा कि अब मैं बूढ़ी हो गई हूं। इस पैसे से स्कूल खुलवा दो।

अरावली पर्वतमाला बचाने को सड़कों पर उतरे लोग


अशोक मिश्र

राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में अरावली को लेकर आंदोलन तेज होता जा रहा है। राजस्थान के सीकर, अलवर और जोधपुर क्षेत्र में लोग अरावली पर्वत शृंखला को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। लोगों ने अरावली को राजस्थान को प्राणवायु देने वाला बताकर सुप्रीमकोर्ट के फैसले को बदलने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। राजस्थान के कुछ शहरों में अरावली को बचाने के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हल्का लाठी चार्ज भी किया। गुरुग्राम में सेव अरावली अभियान चलाया जा रहा है। 

लोग यहां भी धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। अरावली को बचाने की मुहिम में लगे लोगों ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के हालिया बयान का विरोध जताते हुए उसे भ्रामक बताया। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने इस मामले में फैले भ्रम को दूर का प्रयास करते हुए कहा था कि कुल 1.47 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में से 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षित है। केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र ही खनन योग्य है। वहीं पर्यावरणविदों का कहना है कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश में सौ मीटर पहाड़ को नीचे से मापने का उल्लेख ही नहीं है।

 इस मामले में सेव अरावली ट्रस्ट का तर्क है कि केंद्रीय मंत्री कह चुके हैंकि अरावली में मौजूद किले, मंदिर, रिजर्व वन क्षेत्र और संरक्षित क्षेत्र को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा। लेकिन बाकी हिस्सों का क्या होगा? इस बारे में मंत्री के बयान से कुछ भी साफ नहीं होता है। बाकी क्षेत्रों की रक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? इस बारे में केंद्रीय मंत्री कुछ साफ नहीं किया है। पर्यावरणविदों ने  सरकार से इस मामले में पूरी योजना सार्वजनिक करने की मांग की है। ताकि सच्चाई सामने आ सके। 

दरअसल, लोगों की अरावली पर्वत को लेकर चिंता बहुत जायज है। पिछले कई दशकों से सरकारी नीतियों की कमियों का फायदा उठाकर ही खनन और वन माफिया मालामाल होते रहे हैं और उत्तर भारत के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते रहे हैं। तब लोगों में पर्यावरण को लेकर इतनी जागरूकता भी नहीं थी।  पिछले पंद्रह साल में खनन माफिया ने आठ से दस किमी क्षेत्र में पूरी पहाड़ी को ही वीरान कर दिया। 2023 के दौरान राजस्थान में किए एक अध्ययन के मुताबिक 1975 से 2019 के बीच अरावली की करीब आठ फीसदी पहाड़ियां गायब हो गईं। 

अगर अवैध खनन और शहरीकरण ऐसे ही बढ़ता रहा तो 2059 तक यह नुकसान 22 फीसदी पर पहुंच जाएगा। अगर अरावली को लेकर अभी सरकारें, अदालतें और लोग जागरूक नहीं हुए तो खनन और वन माफिया इसे वीरान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इस मामले में किसी प्रकार की लापरवाही अरावली पर्वतमाला के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकती है। अरावली को नुकसान पहुंचने पर लाखों करोड़ों लोगों का पलायन निश्चित है।

Tuesday, December 23, 2025

शार्गिद ने जीवन भर उस्ताद का कहा माना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अलाउद्दीन खान का जन्म 1862 ईस्वी में बंगाल (अब बांग्लादेश) के ब्राह्मणबारिया जिले के शिवपुर में हुआ था। मैहर घराने की नींव रखने वाले विश्व प्रसिद्ध सरोदवादक उस्ताद अलाउद्दीन खान को बीसवीं सदी का सबसे महान संगीतकार माना जाता है। उन्होंने कई नए रागों की रचना की थी। एक साधारण मुस्लिम बंगाली परिवार में जन्म लेने वाले अलाउद्दीन खान पंडित रवि शंकर, निखिल बनर्जी, पन्नालाल घोष, वसंत राय, बहादुर राय आदि सफल संगीतकारों के गुरु भी रहे। 

अलाउद्दीन खान ने अपने जीवन में कई गुरुओं से संगीत की शिक्षा ली। उन्होंने कड़ी मेहनत के बाद मशहूर वीणावादक रामपुर के वजीर खाँ से भी संगीत के गुर सीखे। कहा जाता है कि जब अलाउद्दीन वजीर खां को अपना गुरु बनाने पहुंचे, तो पहले उन्होंने मना कर दिया। वह वजीर खां को कई दिनों तक मनाते रहे, लेकिन आखिर में वे वजीर खां की बग्घी के नीचे लेट गए और कहा कि आप मुझे अपना शार्गिद बना लीजिए। नहीं तो मुझ पर अपनी बग्घी चढ़ा दीजिए। 

वजीर खां मान गए। उन्होंने वीणा सिखाना शुरू किया। कठोर साधना की बदौलत अलाउद्दीन ने सरोद पर असाधारण पकड़ बना ली। एक दिन उस्ताद वजीर खां को लगा कि उनका शिष्य उनके वंशजों से आगे न निकल जाए। पंद्रह साल बाद जब वह विदा होने लगे, तोवजीर खां ने कहा कि अलाउद्दीन कभी सीधे हाथ से सरोद न बजाना। शार्गिद ने जीवन भर उस्ताद के वचन की लाज रखी। 

अलाउद्दीन सरोद ही नहीं, बहुत सारे वाद्य यंत्र बजाने में माहिर थे। भारत सरकार ने 1958 में अलाउद्दीन खां को पद्म भूषण सम्मान दिया। इसके अलावा और भी पुरस्कार से वह नवाजे गए।

सूरजकुंड मेले में दिखेगी भारतीय संस्कृति और शिल्पकला की झलक



अशोक मिश्र

मेला लगाने की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। सदियों से देश के हर गांव और शहर में कोस-दो कोस पर लगने वाले मेले भारतीय संस्कृति के आदान-प्रदान के स्रोत हुआ करते थे। ये मेले लोगों के आपस में मिलने और एक दूसरे का हालचाल जानने का जरिया भी हुआ करता था। गांव और शहर के लोग इन मेलों में अपने दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं की खरीदारी करते थे और मेले में आने वाले अपने रिश्तेदारों से इसी बहाने मुलाकात भी कर लिया करते थे। दूसरे रिश्तेदारों का हालचाल भी उन्हें मालूम हो जाता था। लेकिन जैसे-जैसे आवागमन के साधन बढ़े, नगरीय सभ्यता का प्रभाव गांवों तक पहुंचा, मेलों का आयोजन खत्म होने लगा। 

एक तरह से मेलों की प्रासंगिकता खत्म होने लगी। लेकिन हरियाणा में हस्तशिल्प, धार्मिक और सांस्कृतिक मेलों की परंपरा किसी न किसी रूप में अभी तक विद्यमान है। आगामी 31 जनवरी से 15 फरवरी तक फरीदाबाद के सूरज कुंड पर लगने वाले अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले की तैयारियां इन दिनों बड़े जोरशोर से हो रही हैं। सूरज कुंड मेले में विदेश और देश के विभिन्न राज्यों के कलाकार, संस्कृति कर्मी, शिल्पकार और नागरिक शामिल होंगे। हर बार मेले की एक थीम हुआ करती है। इस बार भी मेले में पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति प्रेम, स्वच्छता अभियान, राष्ट्र प्रेम, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, जल संरक्षण जैसे सरोकार पर आधारित रंगोली तथा चित्रकला प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। 

देशभक्ति और कला-संस्कृति से जुड़ी गायन और नृत्य प्रतियोगिताएं भी होंगी। जिला शिक्षा विभाग के सहयोग से मेला परिसर स्थित नाट्यशाला में विद्यार्थियों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं होंगी। इस दौरान होने वाली विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिदिन अलग-अलग स्कूलों के 300 से अधिक बच्चों को प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया जाएगा। हरियाणा पर्यटन निगम का उद्देश्य है कि बच्चों को प्रतिभा प्रदर्शन के साथ ही सामाजिक सरोकार से भी जोड़ा जाए। बच्चों की प्रस्तुति से मेले में आने वाले पर्यटकों तक भी सामाजिक सरोकार का संदेश जाएगा। मेले में भाग लेने के लिए देश-विदेश से कलाकारों और शिल्पकारों को आमंत्रित किया गया है। 

यह कलाकार और शिल्पकार अपनी अनूठी कला, संस्कृति और परंपराओं का सूरजकुंड मेले में आए लोगों के सामने प्रदर्शन करेंगे। यहां आने वाले शिल्पकार आदि और आम नागरिक एक दूसरे की कला, संस्कृति और परंपराओं से परिचित होंगे। यहां विभिन्न देशों की वेशभूषा, लोककला आदि प्रदर्शित की जाएगी। सचमुच, हर साल आयोजित होने वाला यह मेला सूरजकुंड की ऐतिहासिकता को भी प्रकट करती है। वैसे तो सूरजकुंड का इतिहास दसवीं शताब्दी से जुड़ा है। तोमर वंश के शासक  सूरजपाल ने इस कुंड का निर्माण करवाया था।

स्वेटर बुनती औरतें और उधड़ते जीवन के रहस्य

संजय मग्गू

जिंदगी भी किसी सधे हुए हाथों से बुने हुए स्वेटर जैसी होती है। एक भी फंदा गलत हुआ, पूरे जीवन की सलाइयां उधेड़नी पड़ती हैं। लेकिन आज जिस तरह स्वेटर हाथों से नहीं मशीनों से बुना जाता है, उसी तरह हमारी तेज भागती जिंदगी में हाथों की जगह मशीनों ने ले ली है। आज से तकरीबन दो-ढ़ाई दशक पहले जैसे ही हल्की ठंडक पड़ने लगती थी, लगभग सभी घरों में ऊन के गोले, सलाइयां बाहर निकल आती थी। कहीं कोई पुराना स्वेटर उधेड़कर गोले बना रहा है, तो कोई ऊन का रंग फीका पड़ जाने की वजह से उसी रंग का घोल तैयार कर रहा है, ताकि ऊन को रंगकर नया जैसा बनाया जा सके। 

दादी, नानी, चाची, बुआ, भाभी अपना घर का काम निबटाने के बाद घर के आंगन में, घर के दरवाजे पर या छत पर बैठी स्वेटर बुन रही होती थीं। कहां फंदा घटाना है, कहां फंदा बढ़ाना है, सब कुछ पहले से ही तय है जिंदगी की तरह। छत, आंगन या घर के दरवाजे पर बैठी महिलाएं एक लय में स्वेटर बुनती जाती थीं और फिर खोल बैठती थीं यादों का पिटारा। एक से बढ़कर एक किस्से। रोचक, चटपटे और कभी-कभी गमगीन कर देने वाले किस्से। यदि ननद-भावज हों, तो एक दूसरे से चुटकी भी लेती चलती हैं। हास-परिहास के साथ-साथ अंगुलियां चलती रहती हैं। अंगुलियों को जैसे पता है, उन्हें कितने फंदे के बाद का फंदा घटा देना है। कई बार तो मन के ऐसे-ऐसे राज खुलते थे स्वेटर की बुनाई के दौरान जिसको महिला ने अपने अंतरमन में बहुत गहरे दबाकर रखा था। स्वेटर बुनती महिलाएं कभी खिलखिलाती थीं, तो कभी उदास हो जाती थीं। 

पीड़ा भरी कहानियां या घटनाएं उनकी संवेदना को झकझोर देती थीं, आंखों में अश्रु की बूंदे आ जाती थीं। आत्मीयता की गांठ बांधकर बड़े से बड़ा रहस्य अपने अंदर दफन कर लेती थीं स्वेटर बुनने वाली महिलाएं। मजाल है कि यह राज किसी के सामने खुल जाए। वैसे तो स्वेटरों की डिजाइन सबका अपना-अपना होता था जीवन की तरह। लेकिन बुनने का तरीका सबका एक जैसा। स्वेटर में डाला गया हर एक फंदा प्रेम, आत्मीयता और स्नेह का फंदा होता था। एकदम मजबूत। स्वेटर तैयार होने पर जो खुशी मिलती थी, वह आज बाजार से स्वेटर खरीदकर लाने पर नहीं मिलती है। हाथ से बुने गए स्वेटर में जो अपनापन, प्रेम और समर्पण की गर्माहट होती थी, वह आज की मशीनों से बुने हुए स्वेटर में कहां नसीब हो सकती है। 

यह अपनापन, संबंधों की गर्माहट ट्रांसफर भी होती रहती थी। अगर स्वेटर साल-दो साल बाद छोटा पड़ गया, तो फेंक नहीं दिया जाता था। जिसको आ जाए, उसको दे दिया जाता था। यदि किसी काम का नहीं भी रह गया, तो उसे उधेड़कर किसी बच्चे का कनटोप, मफलर या दस्ताना बुन लिया जाता था। मितव्ययता तो जैसे इन महिलाओं को घुट्टी में पिला दी जाती थी। मशीन से बुना स्वेटर कटने, फटने या छोटा हो जाने के बाद किसी काम का नहीं। फेंकने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है।

Monday, December 22, 2025

रेगिस्तानी लोमड़ी के नाम से विख्यात थे रोमेल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जर्मनी के सेनापति जोहान्स इरविन यूजेन रोमेल को उनके विरोधी रेगिस्तानी लोमड़ी कहकर पुकारते थे। रोमेल का जन्म 15 नवंबर 1891 में हेइडेनहाइम में हुआ था। वह दूसरे विश्वयुद्ध के समय जर्मनी के सेनापति बनाए गए थे। वह अपने दुश्मनों में भी नफरतरहित बातचीत के लिए विख्यात थे। रोमेल 1910 में जर्मन सेना में शामिल हुए और प्रथम विश्वयुद्ध में वीरता के लिए आयरन क्रॉस प्राप्त किया; उन्होंने युद्ध की नई रणनीतियाँ सीखीं और एक कुशल प्रशिक्षक बने। 

कहा जाता है कि वह जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर के काफी नजदीकी थे। लेकिन उनके नाजीवादी विचारधारा और दुश्मनों की हत्या के विरोधी थे। उन्होंने कई युद्धों में जर्मनी की सेना को विजय दिलाई थी। दूसरे विश्वयुद्ध की बात है। वह उन दिनों जर्मनी की सेना लेकर अफ्रीका में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे। काफी दिनों से युद्ध चलने की वजह से उनके तोपखाने में गोला बारूद खत्म हो गया था। 

अंग्रेजी सेना जर्मन की सेना पर हमला करने के लिए आगे बढ़ती चली आ रही थी। तभी उनके पास सेनाधिकारी दौड़ता हुआ आया और सच्चाई बताई। यह भी बताया कि अंग्रेजी सेना नजदीक आती जा रही है। रोमेल ने कहा कि घबड़ाने से काम नहीं चलेगा। तोपों में बारूद की जगह धूल भरकर अंग्रेजों पर फेंको। वायुसेना से कहो कि अंग्रेजों की सेना के ऊपर उड़ान भरते रहें। 

तोपों से धूल उड़ने  लगी तो अंग्रेजों को लगा कि जर्मनी बहुत बड़ी फौज बढ़ती चली आ रही है। उनके हौसले टूट गए और वह युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। हिटलर की हत्या की साजिश में फंसने के बाद उन्होंने साइनाइड की गोली खाकर 14 अक्टूबर 1944 को आत्महत्या कर ली।

अरावली पर्वत शृंखलाओं को बचाने के लिए होना होगा एकजुट

 


अशोक मिश्र

देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला है अरावली। सुप्रीमकोर्ट के हालिया फैसले ने पर्यावरणविदों और आम जनता को चिंता में डाल दिया है। सुप्रीमकोर्ट ने कुछ समय पहले लिए गए फैसले में कहा है कि अरावली पर्वतमाला के सौ मीटर से कम ऊंचाई वाले हिस्से को वन के रूप में पारिभाषित नहीं किया जा सकता है। लोगों का मानना है कि कोर्ट के इस फैसले से वन और खनन माफिया को अरावली के वन क्षेत्र को बर्बाद करने का मौका मिल जाएगा।

अगर सौ मीटर वाले फैसले के आधार पर देखा जाए तो हरियाणा में अरावली की पहाड़ियां दो ही जगहों पर सौ मीटर से ज्यादा ऊंची हैं। पहली भिवानी जिले में तोसाम और दूसरी महेंद्रगढ़ जिले में मधेपुरा। इसका मतलब यही है कि हरियाणा का बाकी क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा। लोगों का मानना है कि अगर इस फैसले को वापस नहीं लिया गया, तो निकट भविष्य में पूरे प्रदेश की जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। सौ मीटर से ज्यादा ऊंचे इन दोनों जगहों की चोटियों को छोड़कर बाकी हिस्सा असंरक्षित हो जाएगा जिसका फायदा खनन और वन माफियाओं को होगा। 

यही वजह है कि गुरुग्राम में कल अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर मंडरा रहे संभावित खतरे को देखते हुए ‘अरावली बचाओ सिटिजन मूवमेंट’ के आह्वान पर डेढ़ सौ से अधिक लोगों ने कई घंटों तक प्रदर्शन किया। इन लोगों ने दूसरे लोगों को भी इस मूवमेंट से जुड़ने की अपील की ताकि राज्य सरकार और सुप्रीमकोर्ट तक इस बात को पहुंचाई जा सके। अरावली को बचाने के लिए प्रयासरत लोगों का कहना था कि यदि सुप्रीमकोर्ट ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो पूरे उत्तर भारत के लोगों को सांस लेने के लिए आक्सीजन प्रदान करने वाली अरावली पहाड़ियां बरबाद होकर रह जाएंगी। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। 

अरावली पर्वत शृंखलाएं वाटर रिचार्ज, बायो डायवर्सिटी और लाखों  लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन हैं। लोगों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि पूरे अरावली क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया जाए। वैसे भी पर्यावरणविद बहुत पहले से कहते आ रहे हैं कि यदि अरावली का संरक्षण नहीं किया गया, तो पूरे उत्तर भारत में गर्मी पड़ेगी। भूजल रिचार्ज नहीं हो पाएगा जिसकी वजह से लोगों का पलायन बढ़ेगा। 

जब पानी ही नहीं होगा, तो खेती से लेकर व्यावसायिक गतिविधियों पर बुरा प्रभाव पडेÞगा। ऐसी स्थिति में उनके पास पलायन के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचेगा। इससे उद्योगपतियों को तो फायदा होगा क्योंकि खनन होने से भवन निर्माण आदि की सामग्री आसानी से उपलब्ध होगी और वे उसे बेचकर अपना मुनाफा बढ़ा सकेंगे। लेकिन लोकहित में यही है कि अरावली पर्वत शृंखलाओं का संरक्षण किया जाए।

Sunday, December 21, 2025

मेहनत करो, बीमारी ठीक हो जाएगी

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। मेहनत नहीं करने से तमाम तरह के रोग पैदा हो जाते हैं। यही वजह है कि सदियों से हमारे देश में श्रम की महत्ता ग्रंथों में गाई गई है ताकि लोग श्रम करने से पीछे न रहें। इस बात को हमारे देश के ऋषि-मुनि बहुत पहले ही समझ गए थे। 

एक बार की बात है। किसी जगह पर एक व्यापारी रहता था। व्यापारी ने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी बहुत सुखी थी। उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी। वह सबके साथ मधुर व्यवहार करता था। लोग उसकी दयालु प्रवृत्ति की प्रशंसा भी करते थे। लेकिन कुछ साल बाद उसे एक समस्या होने लगी। उसे रात में नींद आनी बंद हो गई थी। 

नींद न आने की वजह से वह कुछ चिढ़चिढ़ा भी होता जा रहा था। यदि थोड़ी देर के लिए नींद आ भी जाती तो वह बुरे-बुरे सपने देखता था। उसने अपना इलाज भी बहुत कराया लेकिन फायदा नहीं हुआ। उन्हीं दिनों उसने सुना कि उसके शहर में एक संत आए हैं जिनके पास लोग समस्याएं लेकर जाते हैं और वह उसकी समस्याओं का हल बता देते हैं। एक दिन बड़ी हिम्मत करके व्यापारी भी संत के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई। 

संत ने छूटते ही कहा कि तुम जैसे अपंग के साथ ऐसा ही होता है। व्यापारी तिलमिलाकर बोला, मैं अपंग कैसे हूं? मेरे सारे अंग तो काम कर रहे हैं। संत ने कहा कि अपंग वह भी होता है, जो अपना काम खुद नहीं करता है। तुम तो मेहनत ही नहीं करते हो, तो नींद कैसे आएगी। जाओ, दिन में इतनी मेहनत जरूर करो कि तुम थककर चूर हो जाओ। व्यापारी ने ऐसा ही किया। अब वह थकने के बाद बिस्तर पहुंचता, तो उसे गहरी नींद आ जाती थी। ठीक होने पर व्यापारी संत के पास गया और उसको धन्यवाद दिया।

पाला पड़ने से पहले किसान करें फसलों को बचाने का उपाय


अशोक मिश्र

इन दिनों पूरे उत्तर भारत में कोहरा पड़ने लगा है। इस कोहरे के कारण जहां रात और सुबह सड़क हादसों की घटनाएं बढ़ गई हैं, वहीं कोहरे के चलते रबी की फसलों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है। आमतौर पर दिसंबर के आखिरी पखवाड़े से लेकर फरवरी के पहले पखवाड़े तक उत्तर भारत में जमकर पाला पड़ता है। रबी की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान कोहरे, स्मॉग और पाले से होता है। कोहरे और स्मॉग के मुकाबले में पाला ज्यादा नुकसानदायक होता है। इससे फसल के पौधों की पत्तियों और तनों पर ओस की बूंदें जमा हो जाती हैं। यह जमी हुई बूंदें पत्तियों और तनों की कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी वजह से पौधा मरने लगता है। पत्तियां पीली पड़कर झड़ जाती हैं। 

हरियाणा में भी पिछले चार-पांच दिनों से कोहरा छाने लगा है। इसकी वजह से सब्जियों, दलहनी और तिलहनी फसलों के पौधों को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है। आने वाले कुछ ही दिनों बाद प्रदेश में पाला गिरना भी शुरू हो सकता है। ऐसी अवस्था में यदि किसान पहले से ही पाले से फसलों की सुरक्षा के उपाय करें, तो होने वाले संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है। किसानों को चाहिए कि वह गंधक के तेजाब के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव फूल आने से पहले फसलों पर करें, तो लगभग एक पखवाड़े के लिए फसलों की सुरक्षा पाले से हो सकती है। 

इस छिड़काव के चलते पाले की बूंदें पत्तियों और तनों को नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं। जरूरत महसूस हो, तो किसान इसी प्रक्रिया को दो से तीन बार दोहरा सकते हैं। प्रदेश के किसान पाले और कोहरे को लेकर पहले से ही आशंकित हैं। पिछली फसल भी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के चलते काफी बरबाद हो गई थी। खेतों में पानी भर जाने की वजह से रबी फसलों की बुआई भी थोड़ी बहुत पिछड़ गई थी। ऐसी स्थिति में यदि पाला गिरता है, तो फसल को अधिक नुकसान होने की आशंका है। 

कुछ किसान यदि फूल आने से पहले पाले से फसलों को बचाने का उपाय नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें थायोयूरिया का छिड़काव तब करना चाहिए, जब आधी फसलों पर पुष्प आ गए हों। इससे नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी। इससे भी पहले किसानों को चाहिए, जब उन्हें पाला गिरने की आशंका हो, तो वह खेतों की हल्की सिंचाई कर दें। खेत में पानी या नमी होने पर फसलों पर पाले का असर बिल्कुल कम होगा। 

इससे फायदा यह होगा कि खेत का तापमान संतुलित रहेगा। इसके अलावा किसान बहुत मजबूरी में खेत के आसपास के कूड़ा-करकट को इकट्ठा करके जला सकते हैं। इससे धुंआ पैदा होगा और पत्तियों पर ओस की बूंदें जमा नहीं होंगी। हालांकि ऐसा करना कतई उचित नहीं होगा। धुंआ करने से प्रदूषण बढ़ेगा।

Saturday, December 20, 2025

पिता ने पुत्र को दिया यशस्वी होने का आशीर्वाद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विख्यात कवि और साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर को बंगाल में सांस्कृतिक नवजागरण का पुरोधा माना जाता है। वह बचपन से ही बैरिस्टर बनना चाहते थे। उनका नाम भी लंदन विश्वविद्यालय में लिखवाया गया था, लेकिन बाद में वह डिग्री लिए बिना ही भारत लौट आए थे। 

टैगोर के पिता काफी समृद्ध थे। टैगोर के भाई बहन सरकारी सेवा, साहित्य आदि क्षेत्रों में अपना नाम कमा रहे थे। उनकी मां का देहांत बचपन में ही हो गया था। रवींद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। उनका ज्यादातर समय घूमने-फिरने में ही लगा रहता था। देवेंद्रनाथ अपने बेटों की प्रतिभा के कायल थे। लेकिन उन्हें रवींद्रनाथ के प्रति कुछ ज्यादा ही स्नेह था। सन 1905 में उनके पिता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे, तो एक दिन शाम को उन्होंने अपने बेटे रवींद्रनाथ से कहा कि तुम कोई भक्ति गीत सुनाओ जिससे मन को शांति का अनुभव हो। 

पुत्र रवींद्रनाथ ने अपने पिता की आज्ञा मानी और एक कविता पेश की। उस कविता में आत्मा का मौन, ईश्वर की शांति और समर्पण जैसे तमाम भावनाएं व्यक्त की गई थीं। रवींद्रनाथ ने कई गीत सुनाए और इतने तन्मय होकर सुनाए कि उनके पिता की आंखों में आंसू आ गए। यह देखकर रवींद्रनाथ की भी आंखें नम हो गईं। वह जान गए कि पिता से उनके विछोह का समय नजदीक है। 

पिता ने अपने पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि आज तुमने इतना अच्छा गाया कि मन प्रफुल्लित हो गया। मैं तुमको ईनाम देना चाहता हूं। इतना कहकर उन्होंने रवींद्रनाथ को सौ रुपये का पुरस्कार दिया। उस समय सौ रुपये की बहुत बड़ी कीमत हुआ करती थी। पिता ने पुत्र को यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।

कानूनों का बेजा लाभ उठाने वाली महिलाओं को मिले कठोर सजा

अशोक मिश्र

दुष्कर्म किसी भी महिला के साथ किया गया सबसे जघन्य अपराध है। दुराचार का दंश उसे जीवन भर सालता रहता है। समाज भी उसी को दोषी मान बैठता है। हालांकि यह भी सही है कि समाज के बहुसंख्यक लोग पीड़िता को निर्दोष मानते हैं, लेकिन वह आरोपी के खिलाफ डटकर खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाते हैं। यदि ऐसा हो, तो कोई भी किसी भी महिला या बच्ची के साथ छेड़छाड़, दुराचार या उसको ब्लैकमेल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। हमारे देश में ऐसे मामलों में पीड़िता को न्याय दिलाने केलिए कई सख्त कानून बनाए गए हैं। न्यायपालिका भी पीड़िता से सहानुभूति रखते हुए भी सबूत और गवाहों के बयान की रोशनी में न्याय करती है। 

लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि महिलाएं सख्त कानून का बेजा फायदा उठाने की कोशिश करती हैं। वह दुराचार का आरोप लगाकर निर्दोष व्यक्ति को भी सलाखों के पीछे भिजवा देती हैं। कई साल मुकदमा चलने और आरोपी के जेल में रहने के बाद पता चलता है कि महिला ने झूठा आरोप लगाया था। आरोपी तो निर्दोष था। इस प्रक्रिया में निर्दोष व्यक्ति कुछ साल तक जेल की सजा भुगतता है और समाज में उसकी बदनामी होती है, वह अलग। 

ऐसे ही दो मामले फरीदाबाद में सामने आए हैं। फरीदाबाद के जवाहर कालोनी में रहने वाली एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए अपने दोस्त पर चालीस बार विभिन्न होटलों में ले जाकर दुराचार करने का आरोप लगाया। ढाई साल तक चले मुकदमे में आरोपी युवक को जेल में ही रहना पड़ा। अदालत में महिला अपने साथ हुए दुराचार को साबित नहीं कर पाई। अदालत ने भी 14 लोगों की गवाही सुनने के बाद पाया कि पूरा मामला बेबुनियाद और फर्जी है। यहां तक कि लड़की की मां ने कथित पीड़िता के खिलाफ बयान दिया। ऐसा ही एक दूसरा मामला भी सामने आया। 

एक महिला ने एक युवक पर नशीला पदार्थ खिलाकर कई बार दुष्कर्म करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। अदालत में जब मामला गया, तो महिला अपने बयान से मुकर गई। अदालत ने युवक को आरोपों से बरी कर दिया। इस तरह की घटनाएं साबित करती हैं कि कानून का फायदा उठाकर कुछ महिलाएं पुुरुषों को बेवजह जेल भिजवा देती हैं। नारियों की सुरक्षा और उनके सम्मान की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का फायदा उठाकर किसी निर्दोष को जेल भिजवाने वाली महिलाओं को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि कोई ऐसा करने का साहस न करे। 

जो वास्तव में पीड़िताएं हैं, उनको जल्दी से जल्दी न्याय मिले, इसके लिए जरूरी है कि अदालतों में इस तरह के झूठे मामले न पहुंचें। अदालत पर ऐसे झूठे मुकदमे एक बोझ की तरह हैं और वास्तविक पीड़िताओं को न्याय मिलने मे ंदेरी का कारण बनते हैं।

Friday, December 19, 2025

नाच लोक नाट्य कला के जनक भिखारी ठाकुर

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भिखारी ठाकुर को नाच लोक नाट्य कला का जनक माना जाता था। वह महिला पात्रों की भूमिकाएं पुरुषों से करवाते थे। 18 दिसंबर 1887 को बिहार के छपरा जिले के कुतुबपुर दियारा में जन्मे भिखारी ठाकुर के पूर्वज बाल काटने का पेशा करते थे। कहते हैं कि जब 1914 में अकाल पड़ा तो उन्हें मजबूरन अपना गांव छोड़कर पश्चिम बंगाल के खड़गपुर आना पड़ा। 

पहले से ही खड़गपुर में उनके चाचा और गांव के अन्य लोग रहते थे। थोड़ा घुमक्कड़ प्रवृत्ति का होने की वजह से वह कलकत्ता और पुरी भी गए। वहां उन्होंने सिनेमा, नौटंकी और रामलीला आदि देखने का अवसर मिला। नाट्यकला और काव्य रचना की प्रतिभा तो जैसे उनमें जन्मजात थी ही, बस एक अवसर की तलाश थी। नौटंकी और रामलीला आदि को देखने के बाद वह सोचने लगे कि यदि मैं इसमें अपना भाग्य आजमाऊं, तो शायद कुछ बात बन जाए। 

यही सोचकर वह अपने गांव लौट आए। गांव के लोगों ने जब यह सुना कि वह नौटंकी में काम करेंगे, तो  लोगों ने अपमानजनक शब्द कहे। भिखारी ठाकुर ने उनके अपमान जनक शब्दों को ही अपनी ताकत बना ली। वह गीत रचते, उन्हें लय में गुनगुनाते और जब मंच पर पहुंचते तो उसे एकदम जीवंत कर देते थे। उनके गीतों, नाटकों में दलित जातियों की व्यथा, स्त्री जाति के साथ होने वाले अन्याय का मुखर विरोध होता था। 

कहा जाता है कि गबरघीचोर की तुलना अक्सर बर्टोल्ट ब्रेख्त के नाटक द कॉकेशियन चॉक सर्कल से की जाती है। एक दिन वह भी आया जब भिखारी ठाकुर की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई। बिदेशिया, बेटी बेचवा, गबरघीचोर जैसी रचनाओं ने समाज को जागृत करने का काम किया।