बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
अगर किसी की संगति अच्छी या बुरी है, तो उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता है। यही वजह है कि हमारे महापुरुषों ने हमेशा सत्संगति में ही रहने की सलाह दी है। कहते हैं कि सत्संगति से बुरा आदमी भी अच्छा व्यवहार करने लगता है। कुसंगति के मामले में भी यही प्रतिक्रिया होती है। कुसंगति में अच्छे आदमी को भी बुरा बनने में तनिक भी देर नहीं लगती है।सत्संगति को लेकर अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ी एक रोचक कथा कही जाती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने आविष्कारों की वजह से दुनिया भर में मशहूर थे। उन्हें जगह-जगह व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था। उनके यहां एक ड्राइवर था। जब वह व्याख्यान देते थे, तो वह पीछे बैठकर उन्हें बड़े ध्यान से सुनता था। इसका नतीजा यह हुआ कि वह उनके विचारों से प्रभावित हो गया और विचार सुनते सुनते वह भी थोड़ा बहुत जानकार हो गया।
एक दिन जब वह व्याख्यान देकर लौट रहे थे, तो ड्राइवर ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि सर, मैं भी मंचों पर आपकी तरह व्याख्यान दे सकता हूं। आज आपने जो कुछ कहा है, मुझे पूरी तरह याद हो गया है। आइंस्टीन ने हंसते हुए कहा, अच्छा, सुनाओ जरा। उसने पूरा भाषण सुना दिया। तब आइंस्टीन को मजाक सूझा। उन्होंने कहा कि अगली बार मुझे जहां जाना है, वहां तुम बोलना। ऐसा ही हुआ।
आइंस्टीन ड्राइवर की वर्दी पहनकर पीछे बैठ गए। ड्राइवर का व्याख्यान सुनकर लोग तालियां बजाने लगे। इसी दौरान एक व्यक्ति ने कठिन बात पूछी। ड्राइवर ने हंसते हुए कहा कि इतने आसान सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे सकता है। आइंस्टीन खड़े हुए और जवाब दे दिया। आइंस्टीन ड्राइवर की बुद्धिमत्ता को देखकर चकित रह गए।

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