बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कोसल नरेश प्रसेनजित के राज्य का कोषाध्यक्ष सुदत्त की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें अनाथपिंडक भी बताया गया है। उनकी पुत्री उत्पलवर्णा अत्यंत रूपवती थी। जब उसने षोडस वर्ष की आयु पार की, तो ऐसा लगने लगा कि देवी रति भी उसके रूप-सौंदर्य को देखकर शर्मिंदा हो जाएं। राग तो गौरवर्णी उत्पलवर्णा के अंग प्रत्यंग से मानो फूट रहा हो।अधरों पर मानो गुलाब की पंखुड़ियां आ बैठी हों। नयन रतनारे थे और ग्रीवा अत्यंत सुंदर थी। कंठ से इतनी मधुर ध्वनि निकलती थी कि सुनने वाला मोहित हो उठता था। ऐसी रूपवती कन्या से कौन विवाह नहीं करना चाहेगा। आसपास के राज्यों के राजकुमार, नगरश्रेष्ठि और सामंत कुमारों के विवाह प्रस्ताव आने लगे। अपनी अनुपम सुंदरी पुत्री के लिए ढेर सारे विवाह प्रस्ताव आने से पिता काफी चिंतित थे।
वह इस ऊहापोह में थे कि अपनी पुत्री के विवाह के लिए किसका प्रस्ताव स्वीकार करें और किसको मना कर दें। इसी विषय पर वह सोच ही रहे थे कि उनकी पुत्री ने उनके कक्ष में प्रवेश किया। उसने अपने पिता से कहा कि पिता जी, आपने सुना ही होगा। गंगातीर वासी ने पहले विवाह किया। फिर एक दूसरी स्त्री रख ली। उससे एक कन्या पैदा हुई। बाद में उस कन्या को भी अंकशयिनी बनाया।
ऐसे अमर्यादित समाज में कोई भी विश्वसनीय नहीं है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं अविवाहित रहकर समाज को सुधारने का प्रयत्न करना चाहती हूं। पिता ने आशीर्वाद देते हुए अपनी पुत्री को संन्यास लेने की अनुमति दे दी। महात्मा बुद्ध के पास जाकर उत्पलवर्णा ने प्रव्रज्या ग्रहण की।
पिता तुल्य स्नेह दर्शाते हुए बुद्ध ने उसे ज्ञान से सिंचित किया। भिक्षुणी उत्पलवर्णा ने अपनी साधना से सिद्धावस्था प्राप्त की और समाज को धर्म के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। महात्मा बुद्ध का वह जीवन भर सहयोग करती रही।
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