Thursday, April 2, 2026

समय और धैर्य सबसे बड़े हीरा और मोती

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी को हमेशा समय की कद्र करनी चाहिए। दुनिया में सबसे कीमती समय होता है। यदि इसे गंवा दिया, तो आदमी के पास कुछ भी नहीं बचता है। इसी तरह धैर्य इनसान की सबसे बड़ी खूबी होती है। यदि मनुष्य धैर्यवान नहीं है, तो वह जीवन में कुछ भी हासिल नहीं कर सकता है। 

एक बार की बात है। एक साधु नदी के किनारे बैठकर चिल्लाता रहता था, जो चाहोगे, सो पाओगे। लोग उधर से गुजरते। साधु को चिल्लाते हुए सुनते और मुस्कुराकर निकल जाते थे। लोग उस साधु की बात पर विश्वास नहीं करते थे। उसे पागल मानते थे। लेकिन साधु नियम से नदी के किनार आता और यही रट लगाता, जो चाहोगे, सो पाओगे। एक दिन की बात है। एक युवक ने साधु की बात सुनी, तो उसके पास गया। 

उसने साधु को प्रणाम किया और उसके बगल में बैठ गया। थोड़ी देर बाद साधु ने उससे पूछा, बेटा! तुम भी किसी कामना के साथ यहां आए हो? युवक ने कहा कि मैंने आपकी बात सुनी थी। मैं भी जो चाहता हूं, वह पाना चाहता हूं। साधु ने कहा कि तुम क्या चाहते हो? युवक ने कहा कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, वह पूरा हो सकता है? साधु ने कहा कि हां बेटा! जो चाहते हो, वह तुम्हें हासिल हो सकता है।

उस युवक ने कहा कि मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूं, क्या यह संभव है? साधु ने उसकी एक हथेली पर अपना हाथ रखते हुए कहा कि मैं तुम्हें एक हीरा दे रहा हूं। इससे तुम हजारों हीरे बना सकते हैं। वह हीरा है समय। इसे कसकर पकड़े रहना। दूसरे हाथ पर अपनी हथेली रखते हुए साधु ने कहा कि इस हाथ में दुनिया सबसे बढ़िया मोती धैर्य दे रहा हूं। इन दोनों की बदौलत तुम दुनिया के सबसे बड़े व्यापारी बन सकते हो। साधु की बात सुनकर युवक ने उसे प्रणाम किया और अपना रास्ते चला गया।

हरियाणा में अवैध गर्भपात पर रोक लगाने से ही सुधरेगा लिंगानुपात

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार लिंगानुपात में सुधार लाने का हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन उसके इस प्रयास में प्रदेश में लिंग परीक्षण करने वाले अवैध रूप से खुले क्लीनिक और शहर से लेकर गांवों तक फैले इनके एजेंट, सरकार के मनसूबों पर पानी फेर रहे हैं। राज्य के लगभग सभी जिलों में अवैध तरीके से होने वाले गर्भपात सरकार की लिंगानुपात बढ़ाने की योजना को अंगूठा दिखा रहा हैं। 

पलवल जिले में ही एक महिला को अवैध रूप से गर्भपात कराते हुए एक महिला को गिरफ्तार किया गया है। अवैध रूप से गर्भपात होने की जानकारी समय पर जिला सिविल सर्जन को मिल गई, तो उन्होंने एक टीम बनाकर अवैध रूप से गर्भपात करने वाली महिला के खिलाफ कार्रवाई की। तलाशी के दौरान टीम ने चिन्हित नोट, गर्भपात से संबंधित दवाइयां, इंजेक्शन सिरींज तथा अन्य मामले से जुड़े यंत्र बरामद किए हैं। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि यह महिला कई साल से अवैध तरीके से गर्भपात करा रही थी और इसके पास चिकित्सा से संबंधित डिग्री या सर्टिफिकेट या वैध लाइसेंस तक नहीं मिला। 

छानबीन में पता चला कि आरोपी महिला दसवीं तक ही पढ़ी है। सरकार समय समय पर अवैध गर्भपात के संबंध में लोगों को जागरूक भी करती रहती है। इसके बावजूद एक अच्छी खासी संख्या में महिलाएं भ्रूण की जांच करवाकर अवैध रूप से संचालित गर्भपात केंद्रों पर जाकर कन्या भ्रूण से छुटकारा पा रही हैं। यही नहीं, हरियाणा के पड़ोसी राज्यों में भी महिलाएं गर्भपात करा रही हैं।

राज्य के लगभग हर जिले में इन अवैध गर्भपात केंद्रों के दलाल फैले हुए हैं। यह अपने इलाके में गर्भवती महिलाओं से संपर्क करके उन्हें कन्या भ्रूण की जांच कराने का लालच देते हैं। यदि जांच के बाद भ्रूण कन्या निकलती है, तो उसे जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। यही वजह है कि सरकार अपने सभी प्रयास के बावजूद सफल नहीं हो पा रही है। हालांकि यह भी सही है कि अवैध तरीके से होने वाली घटनाएं प्रदेश में बहुत कम हो गई हैं, लेकिन अभी इसके खिलाफ अभियान तेज करने की जरूरत है। हालांकि यह भी सही है कि हरियाणा में जन्म के समय लिंगानुपात में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। 

2025 में यह बढ़कर 923 हो गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है। 2024 में यह आंकड़ा 910 था, जो बताता है कि सरकारी सख्ती और जागरूकता अभियानों (जैसे पीएनडीटी एक्ट का कड़ाई से पालन) के कारण स्थिति में काफी सुधार आया है। जिला स्तर पर, पंचकूला 2025 में 971 के लिंगानुपात में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला जिला बनकर उभरा। यह 2024 के 915 से एक बड़ा सुधार था। अगर राज्य सरकार अवैध रूप से खुले क्लीनिकों पर सख्ती की जाए, तो लिंगानुपात सुधारने में दिक्कत नहीं आने वाली है।

Wednesday, April 1, 2026

सुकरात बोले, मैं तो सबसे बड़ा अज्ञानी हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने ज्ञान का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। विनम्रता और लोगों को अपने से उच्च मानना, सच्चे ज्ञानी की निशानी है। जो वास्तव में ज्ञानी होता है, उसे अपने ज्ञान का अभिमान कभी नहीं होता है। वह हमेशा लोगों की भलाई करता रहता है, लेकिन बदले में वह आभार व्यक्त कराना भी नहीं चाहता है। 

बात उस समय की है, जब यूनान में सुकरात के ज्ञान की दूर-दूर तक चर्चा थी। उन्हीं दिनों एक संत भी ऐसे थे जो ज्ञानी थे और सुकरात उनकी बहुत प्रशंसा करते थे। एक दिन एक व्यक्ति उस संत के पास पहुंचा और संत से कहा कि महात्मा जी, मैं अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता हूं। आप कोई ऐसी शिक्षा या ज्ञान दें जिससे मेरा जीवन बेहतर हो जाए। 

उस व्यक्ति बात सुनकर संत ने कहा कि भाई, मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं। मैं आपको ज्ञान कैसे दे सकता हूं। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका बहुत नाम सुना है। आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है और आप अपने को साधारण व्यक्ति बता रहे हैं। इस पर संत ने कहा कि यदि तुम सचमुच ज्ञान पाना चाहते हो, तो सुकरात के पास चले जाए। 

वह यूनान के सबसे ज्ञानी व्यक्ति हैं। वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुंचा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि वह जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र सीखना चाहता है। इस पर सुकरात ने कहा कि जिस संत ने तुम्हें मेरे पास भेजा  है। वह कम से कम साधारण मनुष्य तो हैं। मैं साधारण मनुष्य भी नहीं हूं। मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं। वह व्यक्ति फिर संत के पास पहुंचा, तो संत ने कहा कि जब सुकरात जैसा ज्ञानी अपने को अज्ञानी कह रहा है, तो यह उनके ज्ञानी होने का प्रमाण है। यह सुनकर उस व्यक्ति ने इसे ही जीवन को बेहतर बनाने का पहला पाठ मान लिया।

सोशल मीडिया छीन रहा बच्चों की मानसिक ताकत और सुकून

अशोक मिश्र

वैसे तो सोशल मीडिया का अगर सदुपयोग किया जाए, तो यह बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ सोशल मीडिया लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने का बहुत सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके दुरुपयोग के खतरे भी कम नहीं है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। यह एक तरह से लत साबित होता जा रहा है जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास बाधित होता जा रहा है। 

हरियाणा के जिला अस्पतालों में अब ऐसे बहुत सारे मामले सामने आने लगे हैं जिनसे पता चलता है कि बच्चे एक लंबा समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं जिसके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। राज्य के जिलों में जिला नागरिक अस्पतालों में आए बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से जांचने के बाद पता चलता है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने की वजह से उनका फोकस पढ़ाई से हट रहा है। 

वह जो कुछ स्कूल, कोचिंग या घर पर पढ़ रहे हैं, वह उन्हें याद नहीं हो रहा है। ज्यादातर बच्चे शारीरिक रूप से भले ही अपने क्लास में मौजूद हों, लेकिन दिमागी रूप से वह सोशल मीडिया पर ही होते हैं। यही वजह है कि उनके टीचर्स जो कुछ क्लास में पढ़ाते हैं, वह उनके भेजे में नहीं घुस रहा है। ऐसी अवस्था में उनकी याददाश्त भी प्रभावित हो रही है। 

बच्चे खुद भूलने की आदत से परेशान हैं, लेकिन वह सोशल मीडिया का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। अपने बच्चों की ऐसी स्थिति देखकर पैरेंटस भी काफी परेशान हो रहे हैं। बच्चों की ऐसी स्थिति के लिए कई सामाजिक और पारिवारिक कारण जिम्मेदार हैं। अगर माता-पिता दोनों कामकाजी हैं या घर का वातावरण अशांत है, तो मां-पिता अपने बच्चों को मोबाइल में उलझाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। घरों में रहने वाली महिलाएं भी अपने बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप या डेस्कटॉप देकर अपने लिए थोड़ी देर का सुकून खोजने में लग जाती हैं। 

इसी का नतीजा है कि बच्चे अब सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। बच्चे बाहर जाकर खेलने कूदने की जगह घर में ही रहकर सोशल मीडिया पर ही अपने लिए मनोरंजन तलाश रहे हैं। पहले बच्चे अपना ज्यादातर समय गली-मोहल्लों और पार्कों में खेलते-कूदते बिताते थे जिसकी वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से ज्यादा मजबूत रहते थे। वह स्कूल में भी अच्छा प्रदर्शन करते थे। 

लेकिन आज के हालात में जब स्कूल और घर में बच्चों को बेवजह डांटा-फटकारा जाता है, तो वह तनावग्रस्त हो जाते हैं। उस तनाव से मुक्ति पाने के लिए बच्चे सोशल मीडिया पर समय बिताना उचित समझते हैं। यदि अपने बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो सबसे पहले अभिभावकों, अध्यापकों को बच्चों से संवाद कायम करना होगा। उनकी समस्याओं को समझना होगा। उनकी दूसरे बच्चों से तुलना बंद करनी होगी, तभी वह सोशल मीडिया के जंजाल से मुक्त होंगे।

Tuesday, March 31, 2026

विसेंट वैन गॉग जिसे मरने के बाद सराहा गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने जीवन की अंतिम सांस लेने के समय ‘दुख हमेशा रहेगा’ कहने वाले डच चित्रकार विसेंट वैन गॉग को जीवन भर वह नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। मृत्यु के कई वर्षों बाद जब उनकी प्रतिभा को लोगों ने पहचाना और उन्हें अपने समय का महानतम चित्रकार माना। 

30 मार्च 1853 में नीदरलैंड्स में जन्मे वैन गॉग को बचपन से ही चित्रकला में रुचि थी। उनके परिवार के कई लोग कला से संबंधित व्यवसाय करते थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के काम किए। कई वह आर्ट डीलर बने जो उनके परिवार के दादा, चाचा आदि करते थे। 

निराशा के क्षणों में उन्होंने पादरी बनने का फैसला किया, लेकिन इस काम में भी वह विफल ही रहे। वैसे वैन गॉग का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा उनकी मां की देखरेख में हुई थी। लेकिन वह अपने परिवार से जीवन भर लगभग कटे से रहे। एकाकी जीवन जीने की वजह से वह अस्थिर दिमाग वाले हो गए थे। कुछ लोग तो उन्हें मनोरोगी समझते थे। 

जब वह 27 साल के हुए, तो उन्होंने मुकम्मल तौर पर तय किया कि अब उन्हें चित्रकार ही बनना है। उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया, लेकिन लोग उनके चित्रों के प्रति उदासीन ही रहते थे। वह अपने जीवन में केवल एक ही चित्र बेचने में सफल हो पाए थे। 

एक दशक से कुछ अधिक समय में, उन्होंने लगभग 2,100 कला कृतियाँ बनाईं, जिनमें लगभग 860 तैलचित्र थे, जिनमें से अधिकांश उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में बनाईं। एक बार उन्होंने अपने को गोली मार ली। गोली उनकी रीढ़ की हड्डी में फंस गई। अस्पताल में ही 29 जुलाई 1890 में 37 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

थोड़े से लालच के लिए रिश्तों की मर्यादा को भूल रहे लोग


अशोक मिश्र

रिश्तों को हर समाज में विशेष महत्व दिया जाता रहा है। माता-पिता, भाई-बहन, सास-बहू जैसे तमाम रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीवन को व्यवस्थित और संतुलित बनाते हैं। भारत में ही नहीं, कई देशों में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। आज भी बरकरार है, लेकिन संयुक्त परिवारों की संख्या में निस्संदेह भारी कमी  आई है। संयुक्त परिवारों की खूबी यह थी कि यदि परिवार का एक सदस्य आर्थिक रूप से कमजोर भी हो, तो परिवार के दूसरे लोग उसकी सहायता करते थे। 

एक साथ, एक ही घर में रहने और एक ही चूल्हे का भोजन करने की वजह से उनमें प्रेम बना रहता था। यदि कभी कोई ऊंच-नीच भी हो जाती थी तो परिवार का मुखिया समझा बुझाकर शांत कर देता था। बच्चे भी सब एक साथ खेलते-कूदते, खाते-पीते थे, अपने परिवार के बड़ों के साथ उठते-बैठते थे, तो उनमें प्रेम बना रहता था। वह रक्त संबंधों को समझते थे। भाई कितना भी बुरा हो, भाई होता था। लेकिन जैसे ही एक परिवार का चलन हुआ, रक्त संबंधों की महत्ता घटने लगी। 

अलग-अलग रहने की वजह से प्रेमभाव भी कम होते-होते लगभग खत्म हो गया। इसी वजह से अब समाज में छोटी-छोटी बातों पर भाई, बहन, देवर-भाभी, देवरानी-जिठानी जैसे रिश्तों में दरार आती जा रही है। थोड़े से फायदे के लिए लोग हत्या करने से भी हिचक नहीं रहे हैं। फरीदाबाद में ही बारह दिन पहले प्रापर्टी के पैसों की लालच में एक बहू ने अपनी सास की हत्या कर दी। 

रविवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने के बाद आरोपी बहू ने खुलासा किया कि सास अपनी प्रापर्टी बेचने से मिले पैसे को दूसरे बेटे को देना चाहती थी। यह बात उसकी बड़ी बहू को मंजूर नहीं था। एक दिन उसने अपनी सास का गला दबा दिया। जब उसने देखा कि गला दबाने से भी सास की मौत नहीं हुई है, तो वह पेट पर बैठकर तब तक छाती पर घूंसे बरसाती रही, जब तक कि सास की मौत नहीं हो गई। सास की मौत होने के बाद उसने सबसे कहा कि उसकी सास की मौत बीमारी के चलते हो गई, लेकिन उसकी देवरानी को शक हो गया और उसने पुलिस से शिकायत कर दी। 

पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया, तब जाकर हत्या की पुष्टि हुई। यह तो हमारे समाज की एक बानगी है। ऐसी घटनाएं रोज कहीं न कहीं हो रही है। कहीं बेटा पिता की हत्या कर रहा है, तो कहीं पिता अपने बेटे की। भाई भाई का हत्यारा है, तो भाई बहन का। लोग थोड़े से लालच के लिए  रिश्तों का कत्ल करने से हिचक नहीं रहे हैं। इन घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे समाज में रिश्तों की मर्यादा रह ही नहीं गई है। लेकिन इसी समाज में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो परिवार और अपने निकटतम परिजनों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

Monday, March 30, 2026

आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अगर आप अपने मन में ठान लें कि आप जीते हुए हैं, तो यकीन मानिए, हारी हुई बाजी भी आप हर हालत में जीत सकते हैं। बस मन में यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कोई हरा नहीं सकता है। परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, लोग खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन यदि मन में विश्वास है, तो विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है। 

कभी एक समय ऐसा था कि यूनान को अजेय समझा जाता था। उसकी फौजों ने कभी हार का सामना नहीं किया था। जिस देश पर यूनान हमला करता था, उस देश का शासक या तो अधीनता स्वीकार कर लेता था या फिर राज्य छोड़कर भाग जाता था। पूरा यूरोप यूनान की फौजों के आतंक से संत्रस्त था। रोम के सेनापति सीजर यूनानी फौजों का यह भय अपने देश के सैनिकों और प्रजा के मन से निकालता चाहता था। 

वह काफी दिनों से सोच रहा था कि यूनानी सैनिकों को कैसे मजा चखाया जाए। फिर उसने यूनानी फौजों की अपराजेयता को ही निशाना बनाने की बात सोची। सीजर ने अपने देश के हर शहर, हर गांव की दीवार पर यह वाक्य लिखवाया, यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं और यूनानी फौजों को उनकी करनी का मजा चखाएं। 

इस वाक्य का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ। रोम की जनता उत्साहित हो गई। घर-घर युद्ध की तैयारियां हुईं। एक दिन यूनान की फौजें रोम की फौज के सामने आ खड़ी हुई। जमकर लड़ाई लड़ी गई और अजेय समझा जाने वाला यूनान परास्त हो गया। सीजर ने एक इतिहास रच दिया।

हरियाणा की सड़कों पर पैदल चलना भी नहीं रहा सुरक्षित

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सड़क पर पैदल चलना भी सुरक्षित नहीं रहा। पता नहीं, कब तेज रफ्तार में बस, कार, ट्रैक्टर या ट्रक आए और कुचलता हुआ निकल जाए। गुरुग्राम में शुक्रवार की शाम को तेज रफ्तार थार ने पैदल घर लौट रहे नाना और उनके दो नातियों को उड़ा दिया। रफ्तार इतनी तेज थी कि तीनों लोग घटना स्थल से लगभग बीस मीटर दूर जा गिरे। हादसे के बाद थार चालक वाहन रोककर घायलों को अस्पताल पहुंचाने की जगह वहां से फरार हो गया। 

काफी देर तक जब साठ वर्षीय नाना सुभाष और उनके दस और आठ वर्षीय दोनों नाती जब घर नहीं पहुंचे, तब उनकी तलाश शुरू हुई। काफी देर बाद तीनों लोगों को खोज निकाला गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सड़क पर किनारे चल रहे इन तीनों को कहां मालूम था कि पीछे से तेज रफ्तार थार के रूप में उनकी मौत आ रही है। 

हरियाणा के युवाओं में तेज रफ्तार से कार चलाना काफी शान की बात समझी जाती है। उन्हें तेज वाहन चलाने में एक किस्म का रोमांच महसूस होता है, लेकिन तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले युवा यह भूल जाते हैं कि उनके ऐसा करने से उनकी जान तो खतरे में रहती ही है, सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जान को भी उतना ही खतरा बना रहता है। हरियाणा यातायात पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 57,901 लोगों की जान गई है। 

राज्य में पिछले 11 वर्षों में लगभग 1.15 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। 2017 में 11,258 सड़क दुर्घटनाओं में 5,120 लोगों की जान गई, जो 2014 के बाद सबसे अधिक है। हरियाणा में साल 2024 के दौरान 9806 सड़क हादसे हुए। इन हादसों में करीब 4689 लोगों की मौत हो गई, 7914 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा साल 2023 के मुकाबले काफी कम है। खास बात यह है कि पुलिस ने साल 2024 के सड़क हादसों में घायल होने वाले 5313 लोगों को फस्ट एड की सुविधा मुहैया करवाई, वहीं 7090 घायलों को तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया। साल 2023 में 10 हजार 168 सड़क हादसे हुए, जिनमें 5092 लोगों की मौत हुई है। साल 2022 में 11 हजार 130 सड़क हादसों में 5621 लोगों की मौत हुई थी। 

अधिकांश दुर्घटनाएं तेज गति, लापरवाही से गाड़ी चलाने और गलत दिशा में गाड़ी चलाने के कारण होती हैं। चालक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं या नशे में होते हैं, जो इन दुर्घटनाओं के कारणों में और इजाफा करता है। सड़क हादसों में लोगों की केवल मौत ही नहीं होती है, बहुत सारे लोग घायल भी होते हैं। कुछ लोग दिव्यांग हो जाते हैं। दिव्यांगता की वजह से पीड़ित व्यक्ति को जीवन भर तकलीफ उठानी पड़ती है। कुछ मामलों में जब परिवार में कमाने वाला व्यक्ति ही दिव्यांग हो जाए, तो पूरा परिवार बिखर जाता है।

युद्ध का इतना ही शौक है, तो अपने बेटे को भेजो लड़ने

संजय मग्गू

एसी कमरों में बैठकर 'युद्ध' का फैसला करना दुनिया का सबसे आसान काम है, क्योंकि वहां जान किसी और के बेटे की जाती है। यह एक कटु सत्य है। अभी हाल ही में इस कटु सत्य को उजागर किया है यूरोपीय संसद में स्पेन की आइरीन मोंटेरो ने। जब ट्रंप नाटो देशों से ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने की अपील कर रहे थे, उसी दौरान यूरोपीय संसद में स्पेन की नेता, वामपंथी विचारक और महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली आइरीन मोंटेरो गरज रही थीं और उन राष्ट्राध्यक्षों को ललकार रही थीं जो युद्ध की हिमायत कर रहे थे। उन्होंने सीधे डोनाल्ड ट्रंप को घेरे में लेते हुए यहां तक कहा कि अगर ट्रंप को जंग का इतना ही शौक है, तो वे खुद मैदान में उतरें और अपने बेटों को फ्रंट लाइन पर भेजें। 

यह एक कटु सत्य है। मोंटेरो का यह बयान उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो दूर बैठकर युद्ध की घोषणा करते हैं, सैनिकों को मरने के लिए युद्ध की आग में झोंक देते हैं। जैसे ही अपनी जान पर खतरा दिखता है, बंकरों में जाकर छिप जाते हैं। इन दिनों कई देशों के बीच युद्ध चल रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चलने वाले युद्ध में हजारों सैनिक अब तक मारे जा चुके हैं। 

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले एक महीने से चल रहे युद्ध में किसको अपनी जान गंवानी पड़ी है? ईरान में तो वहां के सुप्रीम लीडर सहित सैन्य अधिकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, लेकिन क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या फिर बेंजामिन नेतन्याहू के परिवार से किसी को युद्ध में अपनी जान गंवानी पड़ी। नहीं। यह दोनों देश हमलावर हैं, ईरान हमला झेलने वाला देश है। युद्ध ईरान ने नहीं शुरू किया था। इसलिए एक तरह से युद्ध उसकी ही भूमि पर लड़ा जा रहा है। 

ऐसी स्थिति में उसे नुकसान होना स्वाभाविक है। जब भी कहीं किन्हीं दो देशों के बीच युद्ध होता है, तो इन युद्धों में मरने वाले गरीब मां-बाप के बेटे यानी सैनिक ही होते हैं। दुनिया भर के युद्धों का इतिहास खंगाला जाए, तो यही सिस्टम देखने को मिलेगा। राजा-महाराजा अपने महल में रंगरलियां मना रहा होता था, उनकी फौज के सिपाही अपने राजा के प्रति वफादारी निभाने के लिए अपनी जान न्यौछावर कर रहा होता था। 

दूसरों के बच्चों को युद्ध की आग में झोंक देने वाले राजा-महाराजा अपने को वीर बताते थे, लेकिन वास्तव में वह कायर ही होते थे। जिस दिन दुनिया के हर राष्ट्राध्यक्ष की औलादें सीमा पर बंदूक थामकर खड़ी होंगी, उसी दिन दुनिया के सारे विवाद बातचीत की मेज पर सुलझ जाएंगे। अगर ट्रंप, नेतन्याहू, पुतिन और ब्लादिमीर जेलेंस्की के बेटे-बेटियां हाथों में बंदूक लेकर लड़ने गए होते, तो यह  युद्ध पहले ही दिन खत्म हो गया होता। 

सत्ता के नशे में चूर राष्ट्रहित का नारा देने वाले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, नेता के सामने अपने बेटे-बेटियों को युद्ध के समय बार्डर पर भेजने की बाध्यता हो, तो कितने देशों के सत्ताधीश युद्ध के पक्ष में खड़े होंगे? शायद एक भी नहीं। सब शांति दूत बन जाएंगे।

Sunday, March 29, 2026

इस सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे देगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी की संगति अच्छी या बुरी है, तो उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता है। यही वजह है कि हमारे महापुरुषों ने हमेशा सत्संगति में ही रहने की सलाह दी है। कहते हैं कि सत्संगति से बुरा आदमी भी अच्छा व्यवहार करने लगता है। कुसंगति के मामले में भी यही प्रतिक्रिया होती है। कुसंगति में अच्छे आदमी को भी बुरा बनने में तनिक भी देर नहीं लगती है। 

सत्संगति को लेकर अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ी एक रोचक कथा कही जाती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने आविष्कारों की वजह से दुनिया भर में मशहूर थे। उन्हें जगह-जगह व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था। उनके यहां एक ड्राइवर था। जब वह व्याख्यान देते थे, तो वह पीछे बैठकर उन्हें बड़े ध्यान से सुनता था। इसका नतीजा यह हुआ कि वह उनके विचारों से प्रभावित हो गया और विचार सुनते सुनते वह भी थोड़ा बहुत जानकार हो गया। 

एक दिन जब वह व्याख्यान देकर लौट रहे थे, तो ड्राइवर ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि सर, मैं भी मंचों पर आपकी तरह व्याख्यान दे सकता हूं। आज आपने जो कुछ कहा है, मुझे पूरी तरह याद हो गया है। आइंस्टीन ने हंसते हुए कहा, अच्छा, सुनाओ जरा। उसने पूरा भाषण सुना दिया। तब आइंस्टीन को मजाक सूझा। उन्होंने कहा कि अगली बार मुझे जहां जाना है, वहां तुम बोलना। ऐसा ही हुआ। 

आइंस्टीन ड्राइवर की वर्दी पहनकर पीछे बैठ गए। ड्राइवर का व्याख्यान सुनकर लोग तालियां बजाने लगे। इसी दौरान एक व्यक्ति ने कठिन बात पूछी। ड्राइवर ने हंसते हुए कहा कि इतने आसान सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे सकता है। आइंस्टीन खड़े हुए और जवाब दे दिया। आइंस्टीन ड्राइवर की बुद्धिमत्ता को देखकर चकित रह गए।

एलपीजी की किल्लत और दूसरे राज्य के मजदूरों में मची भगदड़

अशोक मिश्र

पश्चिमी एशिया में पिछली 28 फरवरी से चल रहे युद्ध का प्रभाव अब विश्व स्तर पर दिखाई देने लगा है। इससे हरियाणा अछूता कैसे रह सकता है। हरियाणा में भी एलपीजी और डीजल-पेट्रोल का संकट गहराने लगा है। लोगों में एलपीजी, डीजल पेट्रोल को लेकर दहशत फैलती जा रही है। इसमें अफवाह फैलाने वाले लोगों का बहुत बड़ा हाथ है। प्रदेश सरकार बार-बार एलपीजी, डीजल-पेट्रोल भरपूर होने की बात कह रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। 

हां, यह बात सही है कि युद्ध से पहले जहां लोग जरूरत पड़ने पर एलपीजी बुकिंग कराते थे, वहीं अब लगभग हर आदमी गैस सिलेंडर भरवा कर रख लेना चाहता है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी न हो। ऐसी स्थिति में उन लोगों को ज्यादा दिक्कत होने लगी है जिसके पास वैध एलपीजी कनेक्शन नहीं है। ऐसे लोगों में ज्यादातर वह लोग शामिल हैं, जो दूसरे राज्यों से हरियाणा में नौकरी या मजदूरी करने आए हैं। अपना घर-बार छोड़कर हरियाणा में रोजगार की तलाश में आए लोग स्थायी नहीं रहते हैं। 

यह कुछ दिनों तक काम करते हैं, फिर अपने घर लौट जाते हैं। कुछ महीनों बाद यह फिर काम की तलाश में लौटते हैं। ऐसे लोगों का कोई स्थायी पता नहीं होता है। ऐसे लोग वैध एलपीजी कनेक्शन लेने की जगह छोटे गैस सिलेंडर से अपना काम चलाते हैं। गैस और तेल संकट की वजह से पिछले लगभग एक महीने से छोटा वाला सिलेंडर भरा नहीं जा रहा है। जब वैध वालों को ही गैस नहीं मिल पा रही है, ऐसे में छोटे गैस सिलेंडर वालों को जरूर परेशानी हो रही है। 

कालाबाजारी करने वालों ने भी आपदा में अवसर तलाश लिया है। वह महंगे दाम पर गैस बेच रहे हैं। राज्य में कुछ जगहों पर पांच सौ रुपये प्रति किलो गैस बिकने की खबरें अखबारों में छप रही हैं। ऐसी स्थिति में रोजाना कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों, दूसरे राज्यों से आने वाले कामगारों के लिए परेशानी खड़ी हो गई है। पहली बात तो इन्हें रोज काम भी नहीं मिल पाता है। युद्ध के चलते काम-धंधा भी मंदा चल रहा है। ऐसी स्थिति में तीन-चार सौ रुपये किलो गैस खरीद पाना दिहाड़ी मजदूरों और निजी संस्थानों में काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों के लिए मुश्किल हो रहा है। 

ऐसी स्थिति में अपने घर लौट जाने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बच रहा है। हालात इतने विकट हैं कि डीजल-पेट्रोल और एलपीजी की वजह से लाकडाउन जैसे हालात पैदा हो गए हैं। उद्योग-धंधे बंद होते जा रहे हैं। इन उद्योगों में काम कर रहे लोग बेरोजगार होने लगे हैं। ऐसी हालत में इनके पास अपने घर लौट जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है। यही वजह है कि दूसरे राज्यों से आए मजदूरों में भगदड़ मची हुई है। गैस महंगी होने से खाना भी महंगा होता जा रहा है। ऐसी हालत में उन्हें घर लौटने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है।

Saturday, March 28, 2026

कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी के सीखने की एक निश्चित सीमा है। दुनिया में जितना भी ज्ञान है, उसे एक आदमी पूरा हासिल नहीं कर सकता है। विद्वान से विद्वान आदमी सब कुछ नहीं सीख सकता है, लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सीखते जरूर रहना चाहिए। प्राचीन काल में एक दार्शनिक थे। काफी विद्वान थे, लेकिन वह विनम्र भी उतने ही थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते थे। 

बहुत सारे शिक्षण संस्थानों के अध्यापक और विद्यार्थी उनके पास ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे। लेकिन वह अपने पास आने वाले की शंकाओं और समस्याओं का हरसंभव तरीके से समाधान करने की कोशिश करते थे। उसके साथ ही साथ वह उनसे सवाल भी करते थे। उस व्यक्ति से हर तरह की जानकारी हासिल करने का प्रयास करते थे। यह देखकर एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि जो लोग आपसे सीखने आते हैं, आप उनसे भी सीखने की कोशिश करते हैं। 

आप उनसे छोटी से छोटी बात पूछते हैं। आप सचमुच जानने की कोशिश करते हैं या सामने वाले के सामने न जानने का ढोंग करते हैं। यह सुनकर दार्शनिक पहले तो जोर-जोर से काफी देर तक हंसते रहे। फिर बोले, देखो, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में सब कुछ नहीं सीख सकता है। जितना वह सीखता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा उससे छूट जाता है। 

दुनिया का समग्र ज्ञान एक व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता है। मैं भी सब कुछ नहीं जानता हूं। इसलिए जो मैं जानता हूं, वह उसे बताता हूं, जो मैं नहीं जानता हूं, वह उससे सीखने की कोशिश करता हूं। व्यक्ति को जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यह सुनकर मित्र चुप रह गया।

नवरात्र में कंजकों को पूजने के साथ उन्हें पैदा भी होने दीजिए


अशोक मिश्र

कल अष्टमी और आज नवमी को देश भर में कन्यापूजन किया गया। जिन कंजकों को साल भर में कोई महत्व नहीं दिया जाता है, उन्हें चैत्र और शारदीय नवरात्र की अष्टमी और नवमी को बडेÞ आदर सम्मान के साथ घर बुलाया जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है, उनके पांव धोए जाते हैं और चलते समय अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दक्षिणा भी दिया जाता है। साल में दो बार नवरात्र का व्रत रखने वाले लोग नौ दिनों तक मातृशक्ति की पूजा करते हैं। उनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं। 

शतायु होने के साथ-साथ धन-धान्य का वरदान मांगते हैं, लेकिन जैसे ही नवरात्र के नौ दिन बीतते हैं, कन्याओं की अवहेलना शुरू हो जाती है। कुछ लोग तो नवरात्र बीतते ही अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर अस्पताल की ओर चल देते हैं ताकि चोरी-छिपे लिंग परीक्षण कराया जा सके। यदि गर्भस्थ शिशु कन्या है, तो भ्रूण हत्या कराया जाए। वैसे तो लड़कियों की बेकदरी के कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। 

समाज को उन प्रथाओं और मान्यताओं को बदलने की कोशिश करनी चाहिए जिनकी वजह से लोग अपने घर में बेटी को जन्म देना नहीं चाहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों के विवाह के समय होती है। देश के सत्तर फीसदी लोग जीवन भर पेट काटकर बेटी के विवाह के लिए रुपये जोड़ते हैं, ताकि वह अपनी बेटी का अच्छे से विवाह कर सकें। छोटी मोटी नौकरी करने वाले लड़के के मां-बाप दहेज के नाम पर इतना मुंह फाड़ते हैं कि लड़की का बाप दहल जाता है। 

जिसके पास जितना अधिक पैसा है, उसको उसी हिसाब से कमाऊ दामाद मिलता है। यही वजह है कि लोग दहेज न दे पाने की वजह से लड़कियों को जन्म नहीं देना चाहते हैं। वैसे तो सरकार ने दहेज लेना और देना अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन समाज में अपनी नाक बचाने के नाम पर इसे सामान्य व्यवहार मानकर देना पड़ रहा है। जब तक पूरे समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा, तब तक बात बनने वाली नहीं है। लोग अपनी बेटियों को गर्भ में ही मारते रहेंगे। 

इस मामले में हरियाणा बहुत पीछे नहीं है। सरकार की तमाम नीतियों और सख्ती के बावजूद साल 2025 में एक हजार लड़कों के पीछे 923 लड़कियों का ही जन्म हरियाणा में हुआ है। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 910 था। यही नहीं, साल 2014 में लड़कियों का लिंगानुपात 871 था। प्रदेश सरकार ने हर तरह का उपाय आजमा लिया है, इसके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुक रही है। 

प्रदेश में जगह-जगह खुले अवैध क्लीनिकों में यह काम जारी है। जानकारी मिलने पर सरकार कार्रवाई करती है, संबंधित लोगों को पड़ककर जेल में डालती है, लेकिन आरोपी जमानत करवाकर अपने काम में फिर जुट जाते हैं। जब तक समाज कंजक पूजन के साथ-साथ कंजकों को जन्म देना नहीं सीखेगा, तब तक लिंगानुपात सुधरने वाला नहीं है।

Friday, March 27, 2026

काश! कि मूर्तिकार ने एक बार और प्रयास किया होता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी को प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए। कई बार ऐसा भी होता है कि सौ-दो सौ बार प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती है, लेकिन यदि मन में दृढ़ता हो, तो सौ-दो सौ बार प्रयास करने वाले को भी अगली बार के प्रयास में सफलता मिल जाती है। 

एक बार की बात है। एक राजा के दरबार में एक विदेशी नागरिक आया। राजा ने उसका बड़ा  आदर सम्मान किया। विदेशी नागरिक कुछ दिन राजा के राज्य में रहा भी, लेकिन चलते समय उसने राजा को एक बड़ा सा सुंदर पत्थर भेंट किया। राजा उस पत्थर को देखकर बहुत खुश हुआ। विदेशी नागरिक के जाने के बाद राजा ने सोचा कि इस पत्थर से भगवान की एक सुंदर सी मूर्ति बनवाई जाए। 

उसने अपने एक मंत्री को मूर्ति बनाने का काम सौंप दिया। उस पत्थर को लेकर मंत्री राज्य के एक सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकार के पास गया और उससे सात दिन में मूर्ति बनाने को कहा। उस मूर्तिकार ने सहर्ष अनुमति दे दी। मंत्री ने मूर्ति बनाने के बदले पचास स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया। उस मूर्तिकार ने पत्थर को तोड़ने के लिए हथौड़ा मारा। पत्थर नहीं टूटा। पचास बार हथौड़े का प्रहार करने का बाद भी जब पत्थर नहीं टूटा, तो मूर्तिकार थक गया। 

उसने मंत्री से कहा कि इस पत्थर से मूर्ति नहीं बन सकती है, आप इसे ले जाएं। मंत्री उस पत्थर को लेकर दूसरे मूर्तिकार के पास गया। उसने मंत्री के सामने ही हथौड़े का प्रहार किया और पत्थर टूट गया। उसने मूर्ति बनानी शुरू कर दी। ऐसा होने पर मंत्री सोचने लगा कि पहले वाला मूर्तिकार यदि एक बार और प्रयास करता तो वह अपने काम में सफल हो जाता और 50 स्वर्ण मुद्राओं का अधिकारी होता। लेकिन जल्दबादी में उसने यह मौका गंवा दिया।

घाटा सहने के बावजूद बिजली की दरों में बढ़ोतरी न करने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

मार्च का महीना बीतने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। अभी से ही गर्मी अपना प्रभाव दिखाने लगी है। अप्रैल से जून-जुलाई तक प्रचंड गर्मी पड़ने के आसार हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि हरियाणा में बिजली की खपत बढ़ेगी। खपत बढ़ने से उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम पर बिजली खपत में संतुलन बनाए रखने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी। 

सामान्य दिनों की अपेक्षा गर्मी के दिनों में बिजली की खपत पढ़ जाती है, यह सर्वमान्य नियम है क्योंकि गर्मी के दिनों में पंखा और एसी यानी वातानुकूलन यंत्र लगभग हर घर में चलाया जाता है। एसी और पंखों को चलाने से बिजली खपत की दर आसमान छूने लगती है। ऐसी स्थिति में कई बार स्थानीय बिजली विभाग प्रशासन को  कई प्रकार की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। एक आंकड़े के  अनुसार प्रदेश के 83.79 लाख उपभोक्ता हैं। इन उपभोक्ताओं को गर्मी के दिनों में अबाधित बिजली सप्लाई कर पाना, एक बड़ी चुनौती होती है। उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम गर्मियों में किसी तरह हालात को बेहतर बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। 

इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हरियाणा सरकार ने इस बार बिजली की दरों में बढ़ोतरी नहीं करने का फैसला लिया है जो प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है। हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग ने यह निर्णय उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से दायर वार्षिक राजस्व आवश्यकता याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद लिया है। इससे दोनों डिस्कॉम्स को लगभग 4,484.71 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का अनुमान है। 

इतना बड़ा घाटा सहने के बावजूद बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी न करना, प्रदेश सरकार की सराहनीय पहल ही कही जाएगी। इससे पहले हरियाणा में बिजली की दरें अप्रैल 2025 में बढ़ाई गई थीं। इतना ही नहीं, आयोग ने बिजली क्षेत्र में सुधार के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं। हरियाणा पावर परचेज सेंटर के पुनर्गठन पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि बिजली खरीद प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और किफायती बन सके। साथ ही, डिमांड साइड मैनेजमेंट उपायों के माध्यम से मांग में उतार-चढ़ाव को संतुलित करने पर भी जोर दिया गया है। 

वर्तमान में अधिकतम और न्यूनतम मांग के बीच लगभग तीन हजार से पांच हजार मेगावाट का अंतर है। आयोग ने कृषि क्षेत्र के लिए 7,870.32 करोड़ रुपये की राज्य सरकार सब्सिडी का प्रावधान रखा है। इसके तहत किसानों को 7.48 रुपये प्रति यूनिट की वास्तविक लागत के मुकाबले केवल 0.10 रुपये प्रति यूनिट का भुगतान करना होगा, जिससे कृषि उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी।

Thursday, March 26, 2026

हमेशा लोगों के साथ प्रेमभाव से रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंजाब के गुजरांवाला जिले में पैदा हुए स्वामी रामतीर्थ ने अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बिताया था। इनका बचपन का नाम तीर्थराम था, लेकिन संन्यास ग्रहण करने के बाद रामतीर्थ कर दिया गया था। हालांकि इनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था, लेकिन जब संन्यास ग्रहण किया, तो परिवार का त्याग कर दिया। संन्यासी बनने से पहले वह एक स्नातक कालेज में शिक्षक थे। 

1891 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में सर्वोच्च अंक हासिल किया था। एक दिन जब वह अपने क्लास में बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि कुछ छात्र आपस में लड़ रहे हैं। उन छात्रों का आपस में लड़ना, उन्हें पसंद नहीं आया। वह सोचने लगे कि उनके छात्र आपस में वैरभाव रखते हैं। जबकि वह चाहते थे कि लोग आपस में प्रेमभाव से रहें, एक दूसरे की मदद करें। 

पहले तो उन्होंने सोचा कि इन छात्रों को समझाया जाए, लेकिन उस दिन उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन जब वह क्लास में पहुंचे, तो उन्होंने ब्लैक बोर्ड पर एक लाइन खींच दी। उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि इसे छोटा करके दिखाओ। एक छात्र ने डस्टर लिया और उस लाइन को थोड़ा मिटाने लगा। इस पर रामतीर्थ ने रोकते हुए कहा कि इसे छोटा नहीं करना है। 

तब कई छात्रों ने कहा कि यदि इसे मिटाया नहीं गया, तो इसे छोटा करना संभव नहीं है। तब स्वामी रामतीर्थ ने उस लाइन के नीचे एक लंबी रेखा खींच दी और बोले, हो गई न छोटी। तब उन्होंने समझाया कि किसी की उपलब्धि पर ईर्ष्या करने से बेहतर है, उससे भी बढ़कर काम किया जाए। अपने काम से किसी उपलब्धि की रेखा को छोटी कर दो। बिना लड़े आगे बढ़ने का यही तरीका है। छात्रों की समझ में अब बात आ गई थी।  उन्होंने भविष्य में आपस में न लड़ने का संकल्प लिया।

जब तक लालच या भय रहेगा साइबर क्राइम नहीं रुकेगा


अशोक मिश्र

साइबर ठगी के मामले हरियाणा में बढ़ते जा रहे हैं। साइबर ठगों की कार्यप्रणाली को देखते हुए लोग अब अनजान नंबर से आने वाले फोन को उठाना बंद करने लगे हैं। इसके चलते कई बार वाजिब नंबर से आने वाले फोन भी अटेंड नहीं हो पाते हैं। लोग यही सोचकर फोन कॉल को टाल देते हैं, क्या पता ठगों का ही फोन हो और ऐसे में जरूरी कॉल भी अटेंड होने से रह जाती है। इन तमाम सावधानियों के बाद भी बहुत सारे लोग हैं जो इन साइबर ठगों के चंगुल में फंस ही जाते हैं। 

हरियाणा का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां से रोज एकाध खबर साइबर ठगी की न आती हो। फरीदाबाद में ही साइबर ठगों ने क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने के नाम पर साठ हजार रुपये से अधिक ठग लिए। साइबर ठगों ने अपने शिकार को क्रेडिट कार्ड बढ़ाने का आश्वासन दिया और लिंक भेजकर उसमें डिटेल भरने को कहा। जैसे ही पीड़ित व्यक्ति ने उस लिंक को खोला, उसके खाते से पैसे कट गए। 

बल्लभगढ़ में ही एक फर्नीचर व्यापारी से दुबई टूर की व्यवस्था के नाम पर करीब साढ़े छह लाख रुपये ठग लिए गए। व्यापारी को अपने परिवार के साथ दुबई टूर पर जाना था। दुबई जाने के लिए व्यापारी वेबसाइट पर टूर पैकेज तलाश रहा था, उसी पर उसे एक नंबर मिला। उस पर बातचीत करने पर उस व्यक्ति ने एक टूर पैकेज भेजा। व्यापारी ने छह लाख चौबीस हजार रुपये भी अलग-अलग किस्तों में जमा कर दिया। 

नियत समय पर जब व्यापारी अपने परिवार के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचा तो पता चला कि साथ जा रही एक लड़की का वीजा फर्जी है। टूर पैकेज के नाम पर बेबसाइट से बात करने वाले व्यक्ति ने दो दिन बाद वीजा बनवाकर देने और दो दिन बाद की फ्लाइट से सीटें बुक करने का आश्वासन दिया। इसके बाद आरोपियों के फोन बंद आ रहे है। फर्नीचर व्यापारी ने इसकी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी है। 

स्वाभाविक है कि पुलिस अब अपना काम करेगी। हरियाणा पुलिस ही नहीं, देश भर की सरकारें, वहां के पुलिस अधिकारी, सुप्रीमकोर्ट और यहां तक कि पीएम नरेंद्र मोदी लोगों को साइबर अरेस्ट, डिजिटल ठगी और अन्य साइबर क्राइम के बार में देशवासियों को सचेत कर चुके हैं। आज भी कर रहे हैं और शायद भविष्य में भी लोगों को सचेत करते रहेंगे, इसके बावजूद ऐसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। ऐसी स्थिति में एक ही बात समझ में आती है कि इन घटनाओं के पीछे भय या लालच काम करता है। 

जब पुलिस बार-बार यह दोहरा रही है कि वह किसी भी मामले में न तो टेलीफोन, मोबाइल फोन या वीडियो कॉल करके किसी बारे में चर्चा नहीं करती है, तो फिर पता नहीं क्यों लोग साइबर अरेस्ट हो जाते हैं। अपने पैसे को दो गुना करने या जिस व्यक्ति से कभी मिले नहीं हैं, उस पर कैसे विश्वास करके लाखों रुपये ट्रांसफर कर देते हैं।

Wednesday, March 25, 2026

गुरु का स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में माता-पिता के बाद गुरु को ऊंचा स्थान दिया गया है। गुरु कैसा भी हो, वह हमेशा सम्मानीय होता है। इस संदर्भ में एक पुरानी कथा प्रचलित है। एक राजा था। उसे ज्ञान प्राप्त करने की बड़ी लालसा थी। उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वह किसी योग्य गुरु की तलाश करें। काफी खोज के बाद मंत्री एक योग्य व्यक्ति को खोजने में सफल हो गया। राजा ने उस गुरु से शिक्षा हासिल करनी शुरू की। गुरु जी बहुत योग्य थे। इस तरह काफी समय बीत गया, लेकिन गुरु के योग्य होने के बावजूद राजा को कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 

वह इस वजह से चिंतित रहने लगे। एक दिन उन्होंने इस बात की चर्चा अपनी महारानी से की। राजा ने कहा कि तुम बताओ, मैं इसका कारण किससे पूछूं। महारानी ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि आप इस समस्या का हल अपने गुरु जी से ही पूछिए। वह एक योग्य गुरु हैं। 

उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने कई लोगों को योग्य बनाया है। कुछ दिन विचार करने के बाद एक दिन राजा ने अपने गुरु के सामने समस्या रख दी। उन्होंने कहा कि गुरु जी, मुझे इतने महीने हो गए, आप मुझे रोज अच्छी अच्छी बातें सिखाते हैं, लेकिन मैं सीख नहीं पाता हूं। इसका कारण क्या है? गुरु जी ने राजा को गौर से देखा और बोले, इसका कारण आपका राजा होना है। 

आप मेरे शिष्य हैं और मैं आपका गुरु हूं। इस नाते मुझे आपको ज्ञान देते समय ऊंचे स्थान पर बैठना चाहिए और आपको नीचे। लेकिन राजा होने की वजह से आप ऊंचे स्थान पर बैठते हैं और मैं नीचे बैठता हूं। गुरु हर हालत में सम्मानीय होता है। उसका स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए। 

यह बात सुनकर राजा सारी बातें समझ गया और उसने गुरु को आगे से ऊंचा स्थान देना शुरू किया। कुछ साल के बाद वह विद्वान हो गया।

सामूहिक प्रयास से ही हरियाणा हो सकता है तपेदिक मुक्त राज्य


अशोक मिश्र

आज विश्व तपेदिक दिवस पर पूरे देश में टीबी उन्मूलन को लेकर अभियान चलाए गए। लोगों को जागरूक किया गया। उन्हें यह समझाने का प्रयास किया गया कि तपेदिक एक गंभीर रोग है, इससे पीड़ित होने पर इलाज ही इसका बचाव है। यदि समय पर रोग का पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है और मरीज का जीवन बचाया जा सकता है। हरियाणा में भी आज लगभग सभी जिलों में लोगों को जागरूक करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएं और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

इसके बावजूद अभी तक हरियाणा को तपेदिक मुक्त नहीं किया जा सका है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। राज्य के सभी जिलों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। औद्योगिक नगरी के नाम से जाने जाने वाले जिलों में दूसरे राज्यों से कामगारों का आना और उनका अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहना, तपेदिक रोग का सबसे बड़ा कारण कारण है। 

राज्य के लगभग हर जिले में शहरी क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है, इसके साथ झुग्गी-झोपड़ियों का भी विस्तार होता जा रहा है। दूसरे राज्यों से आए ज्यादातर मजदूर इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों में शरण लेते हैं। स्वास्थ्य एजेंसियां जब तपेदिक रोगियों का पता लगाने के लिए अभियान चलाती हैं, तो पता लगता है कि इनमें से कई मजदूर टीबी के मरीज निकल आते हैं। 

ज्यादातर मामलों में होता यह है कि यह मजदूर एक जगह टिकते नहीं हैं। टीबी का कोर्स भी पूरा नहीं करते हैं। जबकि टीबी का इलाज लंबा चलता है और एक दिन भी दवा लेने में नागा नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं जिससे बाद में जब परेशानी बढ़ जाती है, तो यह लोग फिर अस्पताल की ओर रुख करते हैं, तब दवा लेने की मियाद काफी बढ़ जाती है। इन सब परेशानियों के बावजूद राज्य सरकार अपने पूरे दमखम के साथ तपेदिक उन्मूलन के अभियान में लगी हुई है। 

मार्च महीने में ही राज्य सरकार ने एक आंकड़ा जारी किया था जिसके मुताबिक हरियाणा की 2157 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित कर दिया गया है। इनमें से 211 पंचायतों को स्वर्ण, 646 पंचायतों को रजत तथा 1300 पंचायतों को कांस्य श्रेणी में प्रमाणपत्र मिला है। राज्य में कुल 6237 पंचायतें हैं। इस तरह लगभग 35 प्रतिशत पंचायतें टीबी मुक्त हो गई हैं। अंबाला टीबी मुक्त 191 पंचायतों के साथ अभियान में सबसे आगे है। 

पिछले तीन वर्षों में टीबी-मुक्त पंचायतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस कार्यक्रम के जमीनी स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन को दर्शाती  है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 88,689 टीबी के मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 74,483 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया गया। ऐसी स्थिति में लोगों को भी चाहिए कि वह लगातार खांसी आने पर अपनी जांच कराएं और हरियाणा को तपेदिक मुक्त बनाने में सहयोग करें।


Tuesday, March 24, 2026

भगत सिंह बोले, तुम्हारा स्थान मेरी मां से ऊंचा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में छुआछूत जैसी कुरीति सदियों से चली आ रही थी। इसके खिलाफ हमारे देश के महापुरुषों ने बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी, तब जाकर समाज में धीरे-धीरे बदलाव आया और आज हम कह सकते हैं कि देश से अस्पृश्यता जैसी भावना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया है। बात उस समय की है, जब एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह जेल में बंद थे। 

ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी थी। लाहौर जेल में बंद किए गए भगत सिंह का सभी कैदी बड़ा सम्मान करते थे। उनमें एक बोधा नाम का सफाई कर्मी भी था। भगत सिंह बोधा को बेबे कहकर पुकारा करते थे। पंजाब में मां को बड़े सम्मान और प्यार के साथ बेबे कहकर संबोधित किया जाता है। 

इस पर बोधा विनीत स्वर में प्रतिरोध करते हुए भगत सिंह से कहा करता था कि वह निम्न कुल में पैदा हुआ है। आप उच्च कुल में पैदा हुए हैं। आपका इस तरह मुझे बेबे कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। इस पर हंसते हुए भगत सिंह कहा करते थे कि बचपन में मां ने मेरा मल-मूत्र साफ किया था। 

आप हमारे बड़े होने के बाद भी वही काम करते हो। इस नाते तो आपका सम्मान मां से भी बढ़कर होना चाहिए था। भगत सिंह वैसे भी उस विचारधारा को मानते थे जिसमें इंसान का इंसान के प्रति कोई भेदभाव न हो। अपनी फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह ने जेल प्रशासन से कहा कि उन्हें बोधा के हाथ की बनी रोटी खानी है। यह सुनकर बोधा फूट-फूटकर रो पड़ा। भगत सिंह ने अपनी शहादत देते हुए भी अपने आदर्श का जीवंत उदाहरण पेश करते हुए बड़े प्रेम से बोधा के हाथ की बनी रोटी खाई  और शहीद हो गए।

हरियाणा में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुईं पंचायतें


अशोक मिश्र

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अब लोग जागरूक होने लगे हैं। धार्मिक, सामाजिक क्षेत्र में जितनी भी कुरीतियां हैं, लोग अब उसके खिलाफ स्वर बुलंद करने लगे हैं। शादी-विवाह सहित सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों में लोगों ने देश और समाज को नुकसान पहुंचाने वाली रीतियों, परपंराओं से निजात पानी शुरू कर दी है। इसके लिए अब पंचायतें भी सामने आने लगी हैं। 

प्रदेश में सामाजिक बदलाव की बहने वाली बयार के पीछे जागरूक स्त्री और पुरुष दोनों हैं। फतेहाबाद जिले की बड़ोपल पंचायत ने प्रस्ताव पास किया है कि अब वह बाल विवाह नहीं होने देंगे। जो भी बाल विवाह कराता हुआ पाया जाएगा, उसके यहां होने वाले विवाह में बान पर नहीं बैठेंगे और हल्दी की रस्म नहीं निभाई जाएगी। पंचायत ने भी यह तय किया कि यदि किसी ने पंचायत के फैसले के खिलाफ जाकर बाल विवाह कराने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, पंचायत में बारात नहीं आने दिया जाएगा और यदि किसी ने गुपचुप बाल विवाह करने की सोची, तो उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की जाएगी। 

जरूरत पड़ने पर दूसरे गांवों की पंचायतों का भी सहयोग लिया जाएगा। कभी हमारे देश और प्रदेश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा थी। इसे सामाजिक मान्यता भी हासिल की थी, लेकिन जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ, जागरूर हुआ, लोगों को बाल विवाह से होने वाली परेशानियां और नुकसान की बात समझ में आने लगी। प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी ने बाल विवाह से अपना मुंह मोड़ लिया, लेकिन कुछ लोग अभी बाल विवाह को उचित मानकर अपने बेटा-बेटी का बाल विवाह कराते हैं। 

प्रदेश के मामले में अच्छी बात यह है कि पंचायतों ने अब शादी-विवाह में होने वाले बेतुके खर्चों पर भी रोक लगानी शुरू कर दी है। फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में पिछले दिनों आयोजित पंचायत में फैसला लिया गया है कि शादी-विवाह या अन्य दूसरे मांगलिक कार्यों के समय बजाए जाने वाली डीजे का बहिष्कार किया जाएगा। पूरे जिले के गांवों, कालोनियों और सेक्टरों से आए प्रतिनिधियों ने पूरे दस सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प लिया। लोगों को मानना था कि शादी-विवाह के समय कई परंपराएं पुराने समय के हिसाब से शुरू हुई थीं। अब इन परंपराओं का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

कुछ परंपराएं ऐसी हैं जिनकी वजह से वर और वधू पक्ष के खर्चे अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं और जिनका कोई औचित्य भी नहीं है। शादी-विवाह में बहुत तेज आवाज में बजने वाले डीजे की वजह से कई बार पड़ोसियों से मारपीट जैसी घटनाएं हो जाती हैं। बहुत ज्यादा शोर मचाने वाले डीजे जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं खर्चा भी बहुत ज्यादा आता है। यही नहीं, फैसला यह भी किया गया कि शादी, लगन-सगाई और अन्य रस्मों में खर्च लेने की प्रथा को बंद किया जाएगा।

Monday, March 23, 2026

प्रशंसा प्रगति का मार्ग रोक देती है, पुत्र!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान और प्रशंसा दो ऐसे शब्द हैं जो व्यक्ति की प्रगति को बाधित कर देते हैं। बहुत अधिक प्रशंसा होने से व्यक्ति में अभिमान आ जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि महापुरुषों ने हर व्यक्ति को प्रशंसा से दूर रहने की बात कही है। इस संदर्भ में एक मूर्तिकार की बड़ी रोचक कथा है। 

किसी नगर में एक मूर्तिकार रहता था। वह अपने समय में बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था। लोग जब उसकी प्रशंसा करते तो वह विनम्रता से सिर झुकाकर रह जाता था। कुछ दिनों बाद उसके बेटे ने भी मूर्तियं बनाना सीखना शुरू कर दिया। पिता अपने पुत्र की मूर्तियों में हमेशा कोई न कोई कमी निकाल देता और उसे दूसरी मूर्ति बनाने को कहता था। इस तरह कई साल बीत गए। 

अब उसका पुत्र भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगा था। लेकिन मूर्तिकार पिता अपने पुत्र के कार्यों से संतुष्ट नहीं होता था। वह अपने हिसाब से कुछ न कुछ कमियां निकाल ही देता था। धीरे-धीरे पुत्र के मन में क्रोध की भावना पैदा होने लगी। उसे लगने लगा कि पिता में ही कोई खोट है, जो उनकी इतनी अच्छी मूर्तियों से भी संतुष्ट नहीं हैं। एक दिन उसने अपनी एक मूर्ति को अपने मित्र के हाथ से पिता के पास भिजवाया। वह अपने घर में एक जगह पर छिप गया। 

पिता ने उस मूर्ति को देखा, तो बरबस मुंह से निकल गया कि जिसने यह मूर्ति बनाई है, वह महान मूर्तिकार है। तभी बेटा बाहर आया और बोला, यह मूर्ति मैंने बनाई है, लेकिन कभी आपने मेरी प्रशंसा नहीं की। थोड़ी देर पहले इस मूर्ति को बनाने वाले को महान मूर्तिकार कह रहे थे। तब पिता ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी प्रशंसा कर देता, तो तुममें और अच्छा करने की ललक नहीं पैदा होती। तुम्हें अपनी कला पर अभिमान हो जाता और तुम्हारी प्रगति रुक जाती। यह सुनकर पुत्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पिता से क्षमा मांगी।

आगामी ओलिंपिक खेल में 36 पदक जीतने का सरकार ने तय किया लक्ष्य

अशोक मिश्र

पूरे देश में हरियाणा को खिलाड़ियों वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता है। यहां की प्रदेश सरकारों ने समय-समय पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाईं, उन्हें प्रोत्साहित किया और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में पदक जीतने पर उन्हें सम्मानित भी किया, नकद ईनाम भी दिए। सरकारी नौकरियां प्रदान कीं। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 709 करोड़ रुपये करीब 17 हजार खिलाड़ियों को पुरस्कार देने पर खर्च किए हैं। पिछले साल से अब तक 662 खिलाड़ियों को 109 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जा चुकी है। इसका नतीजा यह रहा कि यहां के युवाओं ने भी सरकार को निराश नहीं किया। 

हरियाणा के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने प्रदेश और देश का नाम विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में रोशन किया है जिनमें भाला फेंक में पानीपत के नीरज चोपड़ा, कुश्ती में सोनीपत के योगेश्वर दत्त और रवि कुमार दहिया, झज्जर के बजरंग पुनिया, रोहतक की साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, संग्राम सिंह आदि प्रमुख हैं। प्रदेश में ऐसे खिलाड़ियों की भरमार है जिन्होंने समय-समय पर देश और प्रदेश का नाम गर्व से ऊंचा किया है। 

अब सैनी सरकार ने गुजरात के अहमदाबाद में वर्ष 2036 में ओलंपिक खेलों में हरियाणा के खिलाड़ियों के कुल मिलाकर 36 पदक जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार ने इसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है। मिशन ओलिंपिक 2036 में 36 पदक लाने के लक्ष्य लेकर सरकार ने प्रदेश में 21 नए स्टेडियम बनाने का फैसला किया है। इसके लिए हरियाणा में खेलों का बुनियादी ढांचा बेहतर किया जाएगा। प्रतिभावान खिलाड़ी तैयार करने के लिए जल्द ही वैज्ञानिक तरीके से प्रतिभा खोज अभियान शुरू की जाएगी। 

स्कूल-कालेजों और खेल नर्सरियों में जुझारू खिलाड़ी तलाशे जाएंगे और उन्हें पदक जीतने लायक बनाया जाएगा। 10 से 12 साल के प्रतिभाशाली बच्चों को ओलिंपिक स्तर की प्रतियोगिता के लायक बनाने के लिए राज्य खेल विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण दिया जाएगा। सैनी सरकार का 11 जिलों में नए खेल स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव है। कैथल, झज्जर, चरखी दादरी, गुरुग्राम, कुरुक्षेत्र, जींद, रोहतक, फरीदाबाद, यमुनानगर, सोनीपत, फतेहाबाद और पलवल जिले में कुल 21 नए खेल स्टेडियम बनाने जाएंगे। 

इनमें खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। दिव्यांग खिलाड़ियों को समर्पित पैरा खेल स्टेडियम बनाने की दिशा में सरकार ने काम शुरू कर दिया है। राजीव गांधी खेल परिसर दौलताबाद को भी सरकार अपग्रेड करेगी। सरकार ने तो पूरे राज्य में डेढ़ हजार खेल नर्सरियां खोल रखी हैं। इन नर्सरियों में 37 हजार से अधिक खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। इतनी तैयारी के बाद पूरी तरह विश्वास है कि हमारे प्रदेश के खिलाड़ी 36 से कहीं ज्यादा पदक जीतकर लाएंगे और प्रदेश का नाम रोशन करेंगे।

Sunday, March 22, 2026

प्रायश्चित रूपी पानी पापों को बहा देता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुरा कर्म करने वाले को यदि अपराध बोध से मुक्ति पानी है, तो उसे अपने बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना होता है। प्रायश्चित ही उसके मन निर्मल बना सकती है। जिस व्यक्ति के लिए उसका कर्म नुकसानदायक साबित हुआ है, उससे क्षमा मांगने से पाप का प्रायश्चित हो जाता है। 

बुरे कामों के लिए किसी से क्षमा मांगना और अपने पापों का प्रायश्चित करना वही व्यक्ति कर सकता है जिसे अपने पापों का ज्ञान हो गया हो। एक बार की बात है। एक संत किसी जगह प्रवचन कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी हुई थी। 

संत की मधुर वाणी में ज्ञान का अजस्र प्रवाह हो रहा था। वह कह रहे थे कि यदि किसी व्यक्ति से अनजाने में कोई गलती हो जाए, पाप हो जाए, तो उसे आभास नहीं होता है। ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति को जाने-अनजाने हुए पाप या बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। इतना ही नहीं, भविष्य में कोई बुरा कर्म या पाप न हो जाए, इसके लिए संकल्प लेना चाहिए। 

वहां मौजूद लोग मौन होकर संत का प्रवचन सुन रहे थे।  प्रवचन खत्म हुआ तो सारे लोग चले गए, लेकिन एक व्यक्ति वहां मौजूद रहा। जब सब चले गए तो उसने संत से कहा कि महाराज! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। प्रायश्चित करने से पापों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। 

संत ने कहा कि आप कल आइएगा, मैं समझाऊंगा। दूसरे दिन उस व्यक्ति को लेकर संत नदी किनारे पहुंचे। वहां एक गड्ढे में पानी सड़ गया था, कीड़े पड़ गए थे। संत ने पूछा कि यह पानी क्यों सड़ गया? उस व्यक्ति ने कहा कि प्रवाह न होने से पानी सड़ गया। संत ने कहा कि ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप होते हैं जिन्हें प्रायश्चित का पानी सड़े हुए पानी को बहा देता है।

देसी प्रजाति के पेड़ पौधों के लिए खतरा है विलायती कीकर

अशोक मिश्र

अरावली का प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन खतरे में है। इसका कारण अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में उगने वाली विलायती कीकर को माना जा रहा है। विलायती कीकर ने पूरे अरावली क्षेत्र में देसी प्रजाति के पौधों खेजड़ी, करीर और ढाक जैसे पौधों को पनपने और विकसित होने से रोक दिया है। देसी प्रजाति के पौधे धीरे-धीरे अरावली क्षेत्र से गायब होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव वन्यजीवों पर भी दिखाई देने लगा है।

जो वन्यजीव देसी प्रजाति के पेड़-पौधों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से कई बार वह भोजन की खोज में अपने निवास क्षेत्र से निकलकर मानव बस्तियों में पहुंच जा रहे हैं। अरावली क्षेत्र में विलायती कीकर के लगातार फैलने का कारण पूर्व सरकारों का गलत फैसला था। हरियाणा में सन 1990 से लेकर 1999 तक इन दस वर्षों में अरावली पहाड़ियों और उसके आसपास के क्षेत्र में हेलिकाप्टर से जगह-जगह विलायती कीकर यानी बबूल के बीज गिराए गए थे। 

नतीजा यह हुआ कि अरावली क्षेत्र की अधिकतर जमीनों पर विलायती कीकर उग आए। इन विलायती बबूलों ने अपना कुनबा बढ़ाना जब शुरू किया, तो स्थानीय वनस्पतियां सिकुड़ने लगीं। यह विलायती कीकर राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकने में नाकामयाब रहे। पहले से रोपे गए या अपने आप उगी स्थानीय वनस्पतियां पहले एक सीमा के बाद धूल को आगे बढ़ने से रोक देती थीं। इससेहरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ क्षेत्र रेगिस्तान बनने से बचे रहे। अब राजस्थान से उठने वाले धूल के बवंडर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने लगे हैं। यदि राजस्थान से आने वाली धूल को रोका नहीं गया, तो दिल्ली और हरियाणा की हरी-भरी जमीनें रेगिस्तान में बदल जाएंगी। 

ऐसी आशंका पर्यावरणविद व्यक्त करने लगे हैं। लेकिन विलायती बबूल ने सारे इकोसिस्टम को बिगाड़कर रख दिया। पर्यावरण को शुद्ध रखने में सक्षम स्थानीय वनस्पतियां अब तो नब्बे फीसदी कम हो गई हैं। सन 2000 से 2004 के बीच अरावली क्षेत्र में अवैध खनन भी बहुत हुए। खनन और वन माफियाओं ने पूरे अरावली क्षेत्र को बरबाद करके रख दिया। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र का दायरा बढ़ा है। 

वन विभाग का सर्वे बताता है कि वर्ष 2025 में वन क्षेत्र 6948.44 हेक्टेयर से बढ़कर 7530.23 हेक्टेयर हो गया है। इस विस्तार का श्रेय बड़े पैमाने पर अरावली क्षेत्र में किए गए पौधरोपण को जाता है। लेकिन इस पौधरोपण का फायदा तब मिलेगा, जब पूरे अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर की बढ़त को रोक दिया जाए। विलायती कीकर की बढ़त को लेकर जिला वन अधिकारी भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर को नियंत्रित करना हमारी प्राथमिकता है।

सोने की मुहर ले लो, बस आटा मत छीनना

प्रतीकात्मक चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संकट काल में सबसे बड़ा साथी व्यक्ति का धैर्य होता है। यदि धैर्यपूर्वक संकट का मुकाबला किया जाए, तो संकट से छुटकारा अवश्य मिलता है। यही वजह है कि महापुरुष और विद्वान लोग संकट के समय में घबराते नहीं हैं। वह बड़े धैर्य और साहस के साथ संकट का सामना करते हैं और अंतत: अपना मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक बार की बात है। एक गांव में भिक्षुक रहता था। 

वह दिन भर गांव-गांव घूमकर भिक्षा मांगता था। जो कुछ मिल जाता था, उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन वह भिक्षा मांगने के लिए पास के शहर में चला गया। संयोग से वह एक समृद्ध व्यापारी के घर पर भिक्षा मांगने पहुंच गया। उस समय व्यापारी बहुत खुश था क्योंकि कई साल बाद उसके यहां बेटा पैदा हुआ था। दरवाजे पर उसे भिक्षुक दिखाई पड़ा, तो उसने बड़े आदर के साथ भिक्षुक को अंदर बुलाया और उसे एक सोने की मुहर दान दी। 

भिक्षुक ने व्यापारी से प्रसन्नता का कारण पूछा, तो उसने कहा कि कई वर्ष के बाद उसके यहां संतान जन्मी है। मैं अत्यंत खुश हूं। भिक्षुक ने उस बच्चे को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। उसने दूसरे घरों में भी भिक्षा मांगी। कहीं आटा मिला, तो कहीं चावल। 

कहीं दूसरी वस्तु। जब वह भिक्षा मांगकर वापस लौट रहा था तो रास्ते में जंगल पड़ा। उसने मुहर आटे की थैली में छिपा ली। संयोग से उसी समय डाकुओं ने उसे घेर लिया और कहा कि जो कुछ भी है, वह दे दो। भिक्षुक ने सोने की मुहर देते हुए कहा कि बस, मेरा यह आटा मत छीनना। डाकुओं ने पूछा क्यों? तब भिक्षुक ने कहा कि यह आटा चमत्कारी है। रोज एक सोने की मुहर पैदा करता है। डाकुओं ने मुहर फेंक दी और आटा छीन लिया। और वहां से चले गए। अपने धैर्य और चतुराई से भिक्षुक ने सोने की मुहर बचा ली।