Sunday, February 15, 2026

...और बच्चा हमेशा के लिए सो गया

प्रतीकात्मक एआई चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। कहीं पेड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, तो कहीं वनों को उजाड़कर बस्तियां बसाई जा रही हैं। इससे हमारा पर्यावरण संकट में पड़ता जा रहा है। जिस मौसम में गर्मी पड़नी चाहिए, उस मौसम में चक्रवात आ रहे हैं, तेज हवाओं के साथ बरसात हो रही है। 

पृथ्वी का तापमान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से मौसम चक्र में भारी बदलाव आता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारी संख्या में लोगों को विस्थापित होने पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के शुरुआती दौर यह कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में कई वर्षों से बरसात नहीं हुई। उस राज्य के लोगों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादातर पेड़ों को काट डाला था। 

इसका नतीजा यह हुआ कि एक साल बादल आते और बिना बरसे निकल जाते। जैसे प्रकृति भी मानवों के कुकृत्य से नाराज थी। लोगों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। लोग भूख और प्यास से मर रहे थे। एक बच्चा भी कई दिनों से भूखा था। अनाज पैदा न होने की वजह से काफी संख्या में लोगों को अपनी जान देनी पड़ी थी। बच्चा भी काफी दुर्बल हो गया था। उसके पास थोड़ा सा पानी बचा था। 

तभी उस बच्चे के सामने एक चिड़िया भूख-प्यास से बेहाल होकर गिर पड़ी। वह भी शायद कई दिनों से भूखी प्यासी थी। उस बच्चे ने चिड़िया को देखा और फिर अपने पास बचे हुए पानी को देखा। उसने एक-एक बूंद पानी चिड़िया के चोंच में डालनी शुरू की। थोड़ी देर में कुछ पानी चिड़िया के पेट में गया और कुछ पानी जमीन पर। थोड़ी देर बाद चिड़िया ने अपने पंख फड़फड़ाए और उड़ गई। उसके बाद बच्चा जमीन पर गिरा और हमेशा के लिए सो गया। कहते हैं कि इसके बाद उस राज्य में भारी बारिश हुई।

जंगल सफारी तो चाहिए, लेकिन अरावली क्षेत्र की कीमत पर नहीं


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों में प्रस्तावित जंगल सफारी पर रोक लगा दी गई है। सुप्रीमकोर्ट ने हाल ही में अरावली की ऊंचाई को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। इसके बाद जब वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने इसका विरोध किया और मामले को लेकर दोबारा सुप्रीमकोर्ट में गए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले पर न केवल रोक लगा दी, बल्कि अब जंगल सफारी के निर्माण पर भी रोक लगा दी है। 

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान  अरावली की पहाड़ियों में किसी भी तरह के गैर वानिकी कार्य पर रोक लगाते हुए कहा है कि अगली सुनवाई तक अरावली क्षेत्र में कोई भी अंतिम निर्णय नहीं लिया जाए या विस्तृत कार्य योजना जमा की जाए। वैसे सरकार जंगल सफारी विकसित करने के लिए प्रारंभिक सर्वे और कॉन्सेप्ट प्लान तैयार करा रही थी। भूमि की पहचान के साथ-साथ मास्टर प्लान का प्रारूप तैयार कर लिया था। सरकार अब सुप्रीमकोर्ट के निर्देश के बाद सभी पहलुओं पर दोबारा विचार करेगी, समीक्षा करेगी। 

यह भी संभव है कि सरकार जरूरत पड़ने पर परियोजना के स्वरूप में थोड़ा बहुत बदलाव लाए। सरकार का कहना है कि जंगल सफारी के निर्माण के बाद पर्यावरण संरक्षण होता। सफारी की वजह से अरावली क्षेत्र में हो रहा पेड़ों का अवैध कटान ही नहीं रुकता, बल्कि खनन पर भी रोक लगती। वन और खनन माफिया लोगों की मौजूदगी की वजह से अपना काम नहीं कर पाते। उनकी गतिविधियों पर लगाम लग जाती। इतना ही नहीं, नूंह और गुरुग्राम के दस हजार एकड़ क्षेत्र में जंगल सफारी विकसित होने से प्रदेश में पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा। इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार बढ़ेगा, राज्य के लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। 

दुनिया के सबसे बड़े जंगल सफारी के चलते प्रदेश राष्ट्रीय और  अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन नक्शे पर अपनी जगह और पहचान बनाने में सफल होगा। सरकार का यह तर्क कहीं से भी गलत नहीं है, लेकिन जंगल सफारी बनने से नुकसान भी कम नहीं होता। अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीवों को लोगों के आने से जो परेशानी होती, वह भी ध्यान रखना होगा। वन्यजीवों को प्राकृतिक वातावरण नहीं मिल पाता, इससे वह मानव बस्तियों की ओर भी रुख कर सकते थे। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अरावली की पहाड़ियां हजारों साल से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए फेफड़े का काम करती रही है। अरावली की पहाड़ियों की वजह से ही लोगों को स्वस्थ हवा मिलती रही है। प्रदूषण पर काफी हद तक रोक लगती रही है, लेकिन मोटर गाड़ियों, कल-कारखानों के साथ-साथ पराली जलाने जैसी घटनाओं ने प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक बढ़ा दिया है। अरावली की पहाड़ियों पर होने वाले पेड़ों की अवैध कटान से भी बुरा प्रभाव पड़ा है। प्रदूषण की समस्या गहराई है।

Saturday, February 14, 2026

मेरे गुरु दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी हरिदास वृंदावन में रहते थे। वह कवि, संगीतकार और उच्चकोटि के कृष्ण उपासक थे। उनको सखी संप्रदाय का उपासक माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वह ललिता सखी के अवतार थे। स्वामी हरिदास के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती है। बस, इतना पता चलता है कि इनका जन्म 1478 में हुआ था। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। 

तानसेन अकबर के दरबार में थे। अकबर को तानसेन का गायन बहुत प्रिय था, लेकिन उसने तानसेन के गुरु हरिदास के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। अकबर जानता था कि गुरु हरिदास उसके सामने कभी नहीं गाएंगे। वह आगरा भी उसके बुलाने पर नहीं आएंगे। एक बार किसी संदर्भ में गुरु हरिदास की चर्चा चल रही थी, तो अकबर ने तानसेन के सामने हरिदास का गायन सुनने की इच्छा जाहिर की। 

तानसेन अपने गुरु के स्वभाव से भी परिचित थे। वह सोचने लगे कि अकबर की इच्छा कैसे पूरी की जाए। उन्होंने अकबर से कहा कि आपकी इच्छा जरूर पूरी हो सकती है, लेकिन आपको एक साधारण व्यक्ति की तरह वेष बदलकर मेरे साथ चलना होगा। एक दिन दोनों लोग वृंदावन पहुंचे। अकबर गुरु जी की कुटिया से बाहर खड़े हो गए। तानसेन अंदर गए और गुरु के समक्ष बैठकर गाने लगे। 

उन्होंने एक पद जानबूझकर गलत गाया, तो हरिदास ने वाद्य यंत्र उठाकर खुद गाना शुरू किया। हरिदास का गायन सुनकर अकबर चकित रह गया। लौटते समय अकबर ने तानसेन से कहा कि गुरु जी के गायन में जो बात है, वह तुम्हारे गायन में नहीं है। तानसेन ने कहा कि मैं एक सम्राट के लिए गाता हूं। मेरे गुरु जी पूरी दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं। यह बात सुनकर अकबर ने अपनी सहमति से सिर हिला दिया।

आधुनिक तकनीक और फैलते बाजार ने खत्म कर दी मेलों की उपयोगिता


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहे सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के समापन में बस दो दिन ही बचे हैं। पिछले एक पखवाड़े से चल रहा यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा हस्तशिल्प मेला माना जाता है। इस मेले में दुनिया भर से कला प्रेमी आते हैं। यह मेला भारत ही नहीं, दुनिया भर की संस्कृतियों का संगम जैसा प्रतीत होता है। दुनिया भर के लोग जब किसी जगह पहुंचते हैं, तो वह अपनी सभ्यता और संस्कृति की छाप तो छोड़ते ही हैं, जिस जगह गए हुए होते हैं, उस स्थान की भी सभ्यता और संस्कृति से परिचित होते हैं। 

यही मेले का उद्देश्य भी होता है। सूरजकुंड मेले का भी उद्देश्य यही है। पिछले 39 साल से हर साल सूरजकुंड में लगने वाले मेले की ख्याति का कारण भी यही है। युवा पीढ़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से परिचित हो रहे हैं। सच कहा जाए, तो हमारे देश में मेले की अवधारणा सदियों पुरानी है। प्राचीनकाल में भारतीय क्षेत्र में जितनी भी सभ्यताएं थीं, उनमें मेले प्रमुख स्थान रखते थे।

 कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी मेले लगाए जाते थे। इन मेलों में जहां लोग आमोद-प्रमोद के लिए आते थे, वहीं वह अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुएं भी खरीदते थे। मेले ठेले दैनिक जरूरतों की पूर्ति का माध्यम होने के साथ-साथ सूचनाओं के भी केंद्र हुआ करते थे। इन मेलों में आने वाले लोग अपने रिश्तेदारों से भी मिल लिया करते थे। जो लोग व्यस्तता के चलते अपने परिजनों से नहीं मिल पाते थे, वह मेले में जरूर जाते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि उनके परिजन और रिश्तेदार मेले में जरूर आएंगे। उन दिनों वैवाहिक रिश्ते भी बहुत ज्यादा दूर नहीं किए जाते थे ताकि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की मदद के लिए जल्दी से जल्दी पहुंचा जा सके। चार-पांच किलोमीटर के ही दायरे में बहन, बेटियों की शादियां की जाती थीं। इसका कारण यह था कि उन दिनों आवागमन के साधन सर्वसुलभ नहीं थे। 

इस वजह से दूरदराज के इलाके में शादियां नहीं की जाती थीं। ऐसी स्थिति यह मेले एक तरह से एक दूसरे से मिलने के साधन हुआ करते थे। दक्षिण से लेकर उत्तर तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अगर प्राचीन इतिहास खंगाला जाए, तो मेलों की गाथाएं जरूर मिलेंगी। लेकिन आज जब हम तकनीकी मामलों में बहुत आगे बढ़ चुके हैं, तो मेलों की महत्ता लगातार घटती जा रही है। 

अब साप्ताहिक मेलों का भी आयोजन लगभग बंद हो चुका है। दैनिक जरूरतों की पूर्ति करने वाले मेलों की उपयोगिता खत्म सी होने लगी है क्योंकि मेलों का स्थान अब बड़े-बड़े बाजारों और आनलाइन कंपनियों ने ले लिया है। अब तो बाजार भी जाने की जरूरत नहीं रह गई है। मोबाइल के एक क्लिक पर जरूरत की सारी वस्तुएं हाजिर हो जाती हैं। मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि अब मेलों के माध्यम से मिलने वाला मनोरंजन फीका लगने लगा है।

Friday, February 13, 2026

राजा का कर्तव्य विषय भोग नहीं, प्रजा पालन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। बचपन में एक दिन पिता ने मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत रखने को कहा। रात में पूजा करते समय देखा कि शंकर भगवान की मूर्ति पर चूहा चढ़ा हुआ है। उन्हें तब बोध हो गया कि यह वह शंकर नहीं हैं जिसके बारे में उन्हें बताया गया था। 

इसके बाद उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। इसके बाद दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। दयानंद सरस्वती की मृत्यु के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मौत की साजिश रचने में अंग्रेजों का हाथ था। 

बात 1883 की है। राजस्थान के जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के निमंत्रण पर महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर गए थे। वह रोज प्रवचन करते थे। कभी-कभी महाराजा जसवंत सिंह भी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महाराज के विशेष आग्रह पर वह कई बार राज महल भी गए। वहां उन्होंने देखा कि नन्हीं नाम की वेश्या का महाराज पर विशेष प्रभाव था। 

महाराज राजकाज करने की जगह पर ज्यादातर विषय भोग में लिप्त रहते थे। यह बात दयानंद को अटपटी लगी। एक दिन जब वह प्रवचन कर रहे थे, तो उन्होंने महाराज को संबोधित करते हुए कहा कि राजा का कर्तव्य प्रजा का पालन करना है, विषय भोग में लिप्त रहना नहीं। इससे महाराज ने नन्हीं से संबंध तोड़ लिए। कहते हैं कि अंग्रेजों की शह पर नन्हीं ने रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच मिलकर स्वामी जी पिला दिया। इसके बाद अस्पताल में भी धीमा जहर देने की बात कही जाती है। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में ही दयानंद का देहांत हो गया।

हरियाणा में प्रदूषित जल लोगों के लिए साबित हो रहा जानलेवा


अशोक मिश्र

पलवल के छांयसा गांव में पिछले एक पखवाड़े में 14 लोगों की अस्वाभाविक रूप से मौत हो चुकी है। प्रदूषित पानी की वजह से लोगों के मरने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने कुछ लोगों की मौत का कारण हेपेटाइटिस बी बताया है। हरियाणा में प्रदूषित पानी की वजह से लोगों की हो रही मौत काफी चिंताजनक है। 

हरियाणा के अधिकतर जिलों के कुछ इलाकों में लोगों को प्रदूषित जल का उपयोग दैनिक जीवन में करना पड़ रहा है। इसकी वजह से केवल इंसान ही नहीं, पालतू पशुओं की भी मौत हो रही है। नूंह के तावडू उपमंडल के अंतर्गत गोयला गांव के नजदीक कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे और रेलवे लाइन के बीच जहरीले केमिकल युक्त पानी पीने से नौ फरवरी को तीन गायों की मौत हो गई थी, वहीं 40 से अधिक गायों की हालत गंभीर बनी हुई थी। 

फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, हिसार के हांसी और उसके आसपास के क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से बीमारियां फैलने के कारण 50 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं।  फरीदाबाद के झाड़सेतली और मांगर गाँव में औद्योगिक प्रदूषण के कारण भूजल जहरीला हो चुका है। इस क्षेत्र में कैंसर, किडनी और लीवर की बीमारियों के कारण अब तक 30 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। 

हरियाणा में प्रदूषित जल की वजह से इंसान और पशुओं को अपनी जान गंवानी पड़ रही हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब किसी न किसी जिले में प्रदूषित जल की वजह से बीमार पड़ने या मौत होने की खबर न आती हो। राज्य में प्रदूषित पानी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है। इस समस्या का समाधान जितनी जल्दी खोज लिया जाए, उतना ही अच्छा है। प्रदूषित जल के कारण हर साल पूरे राज्य में काफी मौतें हो रही हैं, जो काफी चिंताजनक है। इसका कारण औद्योगिक कारखानों से निकला अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी और कृषि रसायनों हैं। इनके कारण ही राज्य के अधिकतर जिलों में भूजल पीने योग्य नहीं रहा है। 

दक्षिणी और पश्चिमी हरियाणा के जिले खासतौर पर प्रदूषित जल संकट के शिकार हैं। हरियाणा के कई जिलों भिवानी, फतेहाबाद, करनाल, जिंद, सोनीपत के भूजल में यूरेनियम, नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। डाइंग और प्लेटिंग इकाइयों का केमिकल युक्त पानी सीधे भूमिगत जल में मिल रहा है। इसे रोकने का प्रयास उद्योगों के मालिक नहीं कर रहे हैं। सरकारी मशीनरी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। जब किसी जिले में कोई हादसा होता है, तो सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। कुछ दिनों तक सावधानी बरती जाती है। मरीजों को दवाइयां दी जाती हैं, लोगों में क्लोरिन के टेबलेट्स बांटे जाते हैं। उसके बाद वही पुराना रवैया अख्तियार कर लिया जाता है।

Thursday, February 12, 2026

अपनी शादी में चर्च नहीं पहुंचे लुई पाश्चर


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

फ्रांस के महान सूक्ष्म जीवविज्ञानी, रैबीज टीके के आविष्कारक लुई पाश्चर बहुत मेहनती थे। 27 दिसंबर 1822 को फ्रांस में जन्मे लुई पाश्चर के पिता चमड़ा व्यापारी थे। चमड़ा व्यापार में उन्हें कमाई बहुत कम होती थी जिससे उनका परिवार आर्थिक संकट से ही घिरा रहता था। 

पाश्चर ने 1831 में स्कूली शिक्षा हासिल की। शुरुआती दौर में वह एक औसत छात्र थे। लिखने-पढ़ने में उनका मन नहीं लगता था। उन्हें मछलियां पकड़ना और पेटिंग करना बहुत पसंद था। एक बार उन्होंने अपने माता-पिता की  पेंटिंग भी बनाई थी। बाद में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। पाश्चर ने 1848 में स्ट्रासबर्ग में अध्यापन शुरू किया और बाद में वह रसायन विज्ञान विभाग के हेड बने। 

वह स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय के एक अधिकारी की बेटी को वह पसंद करते थे। लड़की और उसके मां-बाप भी शादी करने के लिए तैयार थे। उस समय कुत्ते के काटने का इलाज रैबीज टीके की खोज के कारण काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। शादी की तारीख तय हो गई। आखिरकार वह तारीख भी आ गई जिस दिन उनकी शादी होनी थी। लुई पाश्चर और लड़की के सभी रिश्तेदार नियत समय पर चर्च पहुंच गए, लेकिन दूल्हा ही गायब था। 

लोगों में अब कानाफूसी शुरू हो गई। काफी समय बाद एक मित्र उन्हें खोजते हुए प्रयोगशाला पहुंचा, तो देखा कि वह एक प्रयोग में बिजी हैं। मित्र ने कहा कि आज तुम्हारी शादी है और तुम यहां हो। प्रयोग तो बाद में भी किया जा सकता है। पाश्चर ने कहा कि कई साल की मेहनत सफल होने वाली है। शादी तो कल भी हो सकती है। प्रयोग पूरा करने के बाद वह चर्च पहुंचे और धूमधाम से उनकी शादी हुई।

अरावली क्षेत्र में तालाब बनाकर जलसंरक्षण की महत्वपूर्ण योजना


अशोक मिश्र

उत्तर भारत में दिन और रात का तापमान बढ़ने लगा है। हाड़ कंपाती सर्दी से छुटकारा मिल चुका है। आने वाले दिनों में सर्दी बिलकुल खत्म हो जाएगी। तब शुरू होगी पानी की समस्या। हरियाणा के लगभग सभी जिलों में गर्मी के मौसम में पेयजल की समस्या तो होती ही है, नदियों, तालाबों और नालों का जलस्तर काफी कम हो जाने या सूख जाने की वजह से जानवरों को भी पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में जानवर पानी की तलाश में अपने रिहायशी क्षेत्र से निकल कर मानवीय आबादी की ओर चले जाते हैं। 

शहर और गांवों में जानवरों के आ जाने की वजह से कई बार मानव और पशु दोनों को नुकसान पहुंचता है। इस समस्या से निपटने के लिए हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में नए तालाबों के निर्माण और पुराने तालाबों की मरम्मत करके उन्हें उपयोगी बनाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत फरीदाबाद में चार बड़े तालाब बनाने के साथ-साथ फरीदाबाद-गुरुग्राम को जाने वाली सड़क के आसपास पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इससे फायदा यह होगा कि इन तालाबों के आसपास रहने वाले वन्य जीवों को पानी पीने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। 

उन्हें अपने आसपास ही पीने का पानी उपलब्ध हो जाएगा जिससे उनके शहरों या गांवों में आने की आशंका भी कम हो जाएगी। वैसे भी राज्य सरकार अरावली ग्रीन वॉल योजना के जरिये पूरे अरावली क्षेत्र में नए नए तालाब बनाने और पुराने तालाबों की मरम्मत करने पर जोर दे रही है। इस योजना के तहत किसानों और अन्य लोगों को भी तालाब निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इस परियोजना के पहले चरण में गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, चरखी दादरी और भिवानी में 66 जल निकायों को विकसित और पुनर्जीवित करने की योजना है। 

वैसे तालाबों के निर्माण से फायदा यह होगा कि जहां वन्य जीवों को पीने के लिए पानी मिलेगा, वहीं इन तालाबों के जरिये भूगर्भ जल स्तर में भी सुधार आएगा। तालाब और झीलों के जरिये धरती पानी सोखती रहेगी जिससे आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों और वनस्पतियों को भी फलने-फूलने के लिए आवश्यक जल उपलब्ध हो सकेगा। अरावली क्षेत्र के आसपास बसे लोगों को सरकार की इस योजना से काफी उम्मीदें हैं। यदि इस परियोजना पर ईमानदारी से काम हुआ, तो अरावली क्षेत्र में बसी मानव आबादी को भी जल संकट से मुक्ति मिलने की पूरी उम्मीद है। 

लोगों का तो यहां तक कहना है कि यदि जगह-जगह पर ऐसे तालाब बनाए जाएं, तो पूरे अरावली क्षेत्र को फिर से हराभरा किया जा सकता है। ऐसा होने पर जल संरक्षण का ध्येय तो पूरा होगा ही, पर्यावरण प्रदूषण से भी काफी हद तक निजात मिल जाएगी। लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ भी मिलेगी।

Wednesday, February 11, 2026

आसानी से हासिल नहीं होती उच्चता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उच्चता या श्रेष्ठता बहुत आसानी से हासिल नहीं होती है। इसके लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। समय के साथ-साथ लगन भी बहुत जरूरी होती है। यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा है, तो इसका यही मतलब है कि उसने पूरा सफर तय किया है। बिना सफर तय किए कोई उस स्थान तक नहीं पहुंच सकता है।  इस संदर्भ में एक शिष्य की कथा है। किसी राज्य में एक गुरुकुल संचालित किया जा रहा था। 

गुरु का एक शिष्य नवदीक्षित हुआ था। अपने गुरु की ख्याति देखकर उसके मन भी आया कि मैं भी क्यों न एक गुरुकुल खोल लूं। मैं भी लोगों को दीक्षित करूं। लोग मुझे भी सम्मान देंगे। एक दिन उसने अपने गुरु के सामने अपने मन की बात को रखते हुए कहा कि गुरुदेव! गुरुदेव, मेरा भी मन करता है कि आपकी ही तरह मेरे भी कई शिष्य हों और सभी मुझे भी आप जैसा ही मान-सम्मान दें। 

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरु मंद मंद मुस्कुराने लगे। वह समझ गए कि शिष्य के मन में ख्याति की लालसा पैदा हो गई है। गुरु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा- कई वर्षों की लंबी साधना के पश्चात अपनी योग्यता और विद्वता के बलबूते पर तुम्हें भी एक दिन यह सब प्राप्त हो सकता है। शिष्य ने कहा- इतने वर्षों बाद क्यों? मैं अभी ही अपने शिष्यों को दीक्षा क्यों नहीं दे सकता? गुरु ने अपने शिष्य को तख्त से उतरकर नीचे खड़ा होने को कहा। फिर स्वयं तख्त पर खड़े होकर कहा- जरा मुझे ऊपर वाले तख्त पर पहुंचा दो। 

शिष्य विचार में पड़ गया। फिर बोला- गुरुदेव! भला मैं खुद नीचे खड़ा हूं, फिर आपको ऊपर कैसे पहुंचा सकता हूं? इसके लिए तो पहले खुद मुझे ही ऊपर आना होगा। गुरु ने मुस्कुराकर कहा- ठीक इसी प्रकार यदि तुम किसी को अपना शिष्य बनाकर ऊपर उठाना चाहते हो, तो तुम्हारा उच्च स्तर पर होना भी आवश्यक है। शिष्य गुरु का आशय समझ गया। वह उनके चरणों में गिर गया। 

नीमका जेल में बंदी की हत्या ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल


अशोक मिश्र

तबलीगी जमात से जुड़े आतंकी अब्दुल रहमान की फरीदाबाद के नीमका जेल में हत्या हो गई। इस जेल को प्रदेश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक माना जाता है। सुरक्षित कही जाने वाली इस जेल में जम्मू-कश्मीर के 50 से ज्यादा हार्डकोर बंदियों को रखा गया है। यह ऐसे बंदी हैं जिन पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से लेकर देश के खिलाफ साजिश रचने तक के आरोप हैं। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी अपराधी की हत्या हो जाना जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। 

आतंकी अब्दुल रहमान को स्पेशल सेल में रखा गया था जिसमें  हत्या का आरोपी अरुण चौधरी भी बंद था। इन दोनों के अलावा एक और बंदी सोहेब रियाज भी था। कहा जा रहा है कि हत्या के आरोप में बंद अरुण चौधरी ने रहमान की हत्या के लिए पहले एक पत्थर को खोजा, फिर उसे नुकीला बनाया और फिर उस नुकीले पत्थर को सर पर मारकर हत्या कर दी। संदिग्ध आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या के आरोपी पर पहले से ही हत्या का मुकदमा चल रहा था। 

उसे अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर की कठुआ जेल से फरीदाबाद की नीमका जेल में ट्रांसफर किया गया था। मारे गए संदिग्ध आतंकी रहमान के मामले में अभी तक एक भी गवाही नहीं हुई है, ऐसा कहा जा रहा है। रहमान को गुजरात एसटीएस और हरियाणा एसटीएस के संयुक्त प्रयास से 2 मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया था। रहमान पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के साथ-साथ अयोध्या में बने राम मंदिर को उड़ाने की साजिश रचने का भी आरोप था। 

जांच में पता चला था कि अब्दुल लगभग डेढ़ साल तक सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो अपलोड करता था। जब सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर दिया गया, तो उसने इंस्टाग्राम पर भड़काऊ वीडियो डालना शुरू कर दिया था। इसके बाद इसकी गतिविधियों पर पुलिस की नजर पड़ी और गुजरात एसटीएस के साथ हरियाणा एसटीएस ने संयुक्त टीम बनाकर इसे गिरफ्तार कर लिया था। नीमका जेल में इससे पहले भी कई तरह की अनियमितताएं पाई गई थीं। नीमका जेल में 19 जून 2013 में पांच-पांच हजार रुपये लेकर बाहर से दो मोबाइल और चार्जर मंगाने का आरोप जेल वार्डन पर लगा था। 

इसके कुछ ही दिन बाद दो बंदियों के पास से दो मोबाइल फोन, चार्जर, सिम और बैटरी बरामद हुई थी। दिसंबर 2019 में भी इसी तरह की घटना नीमका जेल में हुई थी। क्राइम ब्रांच पुलिस ने कई घंटे की खोजबीन के बाद पांच मोबाइल फोन और तीन सिम कार्ड बरामद किए थे। इसी जेल में जून 2011 में दो कुख्यात अपराधी आपस में लड़ बैठे थे। इस घटना के विरोध में एक बंदी के परिवार वालों ने जेल के बाहर प्रदर्शन भी किया था। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी बंदी की हत्या हो जाना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल देती है।

Tuesday, February 10, 2026

साधु ने कहा, मैं तो प्रेम करना जानता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सम्राट अशोक का सगा भाई तो तिष्य था, लेकिन सौतेले भाइयों को मिलाकर सौ भाई बताए जाते हैं। सम्राट बिंदुसार का सबसे बड़ा भाई सुसीम था। बिंदुसार युवराज सुसीम को ही उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। लेकिन अशोक खुद सम्राट बनना चाहता था। सुसीम तक्षसिला का राज्यपाल था। वह खुद अशोक से घृणा करता था। लेकिन सत्ता संघर्ष में उसने सुसीम की हत्या कर दी थी। 

जब सुसीम की हत्या हुई थी, तब उसकी पत्नी गर्भवती थी। कहा तो यह जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी। इसीलिए उसे चंड अशोक कहा जाने लगा था। कलिंग युद्ध के बाद हुए रक्तपात को देखकर अशोक का मन व्यथित हो उठा। वह बेचैनी में इधर उधर भटकने लगा। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। एक दिन वह बाग में बैठा हुआ था। 

उसने देखा कि एक युवा साधु के चेहरे पर असीम शांति है। उसका चेहरा चमक रहा था। अशोक उसके पास गया, तो साधु से परिचय पूछा। उस युवा साधु ने कहा कि मैं निग्रोध कुमार हूं। सुसीम का पुत्र। जब आपने मेरे पिता की हत्या की थी, तब मैं अपनी मां के गर्भ में था। उसके बाद मेरी मां को काफी भटकना पड़ा। मेरी मां को एक बौद्ध भिक्षु ने शरण दी। मेरा जन्म वहीं हुआ। अशोक ने कहा कि तब तो तुम मुझ से घृणा करते होगे। 

उस साधु ने कहा कि घृणा क्या होती है, यह मैं नहीं जानता हूं। मैं तो प्रेम करना जानता हूं। मैं समस्त प्राणियों को प्रेम करता हूं। अशोक ने कहा कि मुझे माफ कर दो। मेरे मन को शांति नहीं मिल रही है। साधु ने कहा कि तुम बुद्ध की शरण में जाओ। वहीं शांति संभव है। इसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उसने लोककल्याण के लिए बहुत सारे काम किए। तब उसे प्रियदर्शी अशोक के नाम से जाना गया।

सूरजकुंड हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहा अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर हस्तशिल्प मेले में शनिवार को झूला टूटने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। शनिवार को हुए हादसे में इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मौत हो गई और 13 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद मार्च में ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि प्रारंभिक जांच में झूले में गड़बड़ी पाई गई है। 

सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों की एक नौ सदस्यीय कमेटी बनाई गई थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि कमेटी ने मेले में लगने वाले झूलों की जांच ही नहीं की। जिस मेले में देश-विदेश से सैलानियों के लिए सुरक्षित बताया जा रहा था, उसी मेले में हुआ यह हादसा सारी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। कहा जा रहा है कि मेले में लगने वाले झूलों और अन्य मशीनों की रोज चेकिंग होनी थी। लेकिन इस मामले में काफी लापरवाही बरती गई। नियम बताते हैं कि किसी भी जगह पर जब कोई भारी झूला लगाया जाता है, तो उस जगह की मिट्टी की जांच की जाती है। 

यह पता लगाया जाता है कि झूले की नींव कितनी टिकाऊ होगी। मेला शुरू होने से पहले मिट्टी की जांच हुई थी या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। कहा तो यही जा रहा है कि हरियाणा टूरिज्म ने मानकों पर ध्यान ही नहीं दिया। जिस जगह पर झूला लगाया गया था, उस जगह की मिट्टी भुरभुरी बताई जा रही है। ऐसी जमीन पर मजबूती के साथ झूला लगा पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि सरकार ने हादसे की जांच के लिए कमेटी बना दी है। यह कमेटी जल्दी ही अपनी रिपोर्ट पेश कर देगी। 

हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, ऐसी आशा है। दरअसल, जितने बड़े पैमाने पर सूरजकुंड मेला आयोजित किया जा रहा है, उसके लिए बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। सूरजकुंड मेले में प्रति दिन हजारों लोग आते हैं। लोग मेले में खरीदारी करने आते हैं। इसी बहाने वह अपना मन बहलाव करते हैं। झूले और अन्य आयोजनों के जरिये मनोरंजन करना उनका मुख्य उद्देश्य होता है। मेले में आयोजित होने वाले विभिन्न तरह के कार्यक्रमों को देखकर वह प्रसन्न होते हैं। 

मेले में आने वाले लोग दूसरे प्रांतों के लोगों से मिलकर उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। वहीं दूसरे प्रदेश के लोग भी हरियाणा की कला, संस्कृति और खानपान से परिचित होते हैं। सूरजकुंड मेले को देखकर ऐसा लगने लगता है कि  एक छोटा भारत यहां बसा दिया गया हो। ऐसी स्थिति में विभिन्न संस्कृतियों के मेल-मिलाप से देशभक्ति की भावना प्रबल होती है। ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर यदि कोई हादसा हो जाए, तो लोगों में भय का संचार होता है और वह मेले में आने से परहेज करने लगते हैं।

Monday, February 9, 2026

संकट में भी साथ नहीं छोड़ता सच्चा मित्र


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संस्कृत साहित्य में कहा गया है कि सच्चा दोस्त संकट के समय में अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता है। सच्चा मित्र सभी तरह के पाप कर्म से दूर रखता है, लेकिन हितकारी कामों को करने के लिए उत्साहित करता है। ऐसे ही एक सच्चे दोस्त की एक कथा है। किसी राज्य के राजा ने घोषणा की कि राज कुमार को देश निकाला दिया जाता है। जो भी व्यक्ति राज कुमार का पक्ष लेगा या फिर उसकी सहायता करता हुआ पाया जाएगा, उसको कठोर दंड दिया जाएगा।

 यह घोषणा सुनकर राजकुमार चकित रह गया। उसको दुख भी हुआ कि उसने कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है जिसकी वजह से उसके पिता ने उसे ऐसा कठोर दंड दिया है। राजकुमार के तीन परम प्रिय मित्र थे। वह ऐसे कठिन समय में सहायता मांगने एक मित्र के पास पहुंचा। मित्र ने उसे देखते ही दरवाजा बंद कर लिया और कहा कि मैं कोई सहायता नहीं कर सकता। 

दूसरे मित्र ने कहा कि कहीं भी जाने के लिए मेरा घोड़ा ले जाओ। इससे ज्यादा मदद नहीं कर सकता हूं। जब राजकुमार अपने तीसरे मित्र के पास पहुंचा, तो उसके मित्र ने राजकुमार का स्वागत करते हुए कहा कि मैं हर हालत में तुम्हारे साथ हूं। लेकिन एक बार चलकर राजा से पूछ लिया जाए कि उन्होंने ऐसा आदेश दिया क्यों? दोनों राजा के पास पहुंचे। 

उन्हें देखते ही राजा ने राजकुमार के मित्र कहा कि तुम्हें मालूम है कि क्या सजा मिलेगी? मित्र ने कहा कि आप जो भी सजा देंगे, मंजूर है, लेकिन यह तो बताएं राजकुमार का अपराध क्या है? राजा ने कहा कि मैं अब राजकुमार को गद्दी सौंपने की सोच रहा था। जिसके साथ एक सच्चा मित्र होता है, वह जीवन में सफल होता है। राजकुमार के राजा बनने पर तुम मंत्री बनोगे।

खिलाड़ियों की डाइट ही नहीं होगी पौष्टिक, तो कैसे करेंगे मुकाबला


अशोक मिश्र

खेल और युद्ध के बीच बहुत ही गहरा संबंध हैं। पहले खेल शुरू हुए या युद्ध, यह कह पाना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन यह सही है कि प्राचीन काल में खेल भी युद्ध का ही एक प्रारूप हुआ करते थे। दोनों में अंतर केवल इतना है कि खेल एक निश्चित नियम और सौहार्दपूर्ण भावना से जुड़े होते हैं, लेकिन युद्ध का वैसे तो कोई नियम नहीं होता है और यह मानवघाती भी होता है। खिलाड़ी का एक ही लक्ष्य होता है प्रतिद्वंद्वी को हर हालत में पराजित करना, लेकिन युद्ध में प्रतिद्वंद्वी को मौत के घाट उतारना एकमात्र लक्ष्य होता है। ऐसी स्थिति में खिलाड़ियों को विशेष खानपान की जरूरत होती है। 

अपने प्रतिस्पर्धी को हराने में वह तभी सक्षम होंगे, जब वह हष्टपुष्ट और शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम होंगे। हरियाणा सरकार ने करीब एक साल पहले खिलाड़ियों की डाइट मनी में पांच सौ रुपये की बढ़ोतरी का ऐलान किया था, लेकिन हकीकत में यह बढ़ोतरी आज तक नहीं हुई है। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश की डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में साढ़े सैंतीस हजार खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं। 

ऐसी स्थिति में इन खिलाड़ियों को अपनी खुराक को संतुलित रखने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यह बात सही है कि हरियाणा ने देशी और विदेशी खेल प्रतिस्पर्धाओं में देश में सबसे ज्यादा पदक जीते हैं। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। सबसे ज्यादा पदक जीते हैं, लेकिन यदि इन खिलाड़ियों को अच्छी डाइट नहीं मिलेगी, तो यह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे करेंगे। इतना ही नहीं, इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षकों (कोचों) के वेतनमान में वृद्धि का ऐलान सरकार ने किया था। इन कोचों के वेतनमान में अभी तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। 

प्रदेश में संचालित डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में से एक हजार नर्सरियों का संचालन निजी तौर पर होता है। इन एक हजार खेल नर्सरियों का संचालन निजी संस्थाएं और पंचायतों द्वारा होता है। यदि सरकार इन प्रशिक्षकों का वेतनमान समय पर बढ़ा दिया गया होता, तो शायद यह कोच अपने खिलाड़ियों को बड़े उत्साह के साथ प्रशिक्षण देते। राज्य सरकार ने कनिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन बीस हजार से पच्चीस हजार और वरिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन 25 हजार से तीस हजार करने का वायदा किया था, लेकिन अभी तक वायदा पूरा न होने की वजह से प्रशिक्षकों में भारी असंतोष है। 

सरकारी अधिकारियों की कामकाज में लापरवाही का आलम यह है कि पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की घोषणा प्रदेश सरकार ने 2024-25 में की थी, यह खेल नर्सरियां आजतक नहीं खोली जा सकी हैं। पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की फाइल खेल विभाग, वित्त विभाग और सीएमओ के बीच घूम रही है।

Sunday, February 8, 2026

मां की मेहनत से वैज्ञानिक बने थामस अल्वा एडिसन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मां के लिए दुनिया की विभिन्न भाषाओं में जितने भी शब्द प्रचलित हैं, वह उस भाषा का सबसे पवित्र शब्द होता है। मां से महान दूसरा कोई नहीं हो सकता है। मां अपने बच्चे के लिए दुनिया से लड़ सकती है। यही वजह है कि पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती है। ऐसी मां थीं थामस अल्वा एडिसन की मां। 

उन्होंने अपनी सूझबूझ और बेटे के प्रति प्रेम के चलते सदी को महान वैज्ञानिक प्रदान किया। अमेरिका में 11 फरवरी 1847 में पैदा हुए थामस अल्वा एडिसन प्रारंभिक जीवन में मंद बुद्धि के थे। बात तब की है, जब थामस प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक ने एडिसन को एक पत्र देते हुए कहा कि इसे अपनी मां को दे देना। उनकी मां नैन्सी मैथ्यूज इलियट ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। 

अपनी मां को रोता देखकर एडिसन ने पूछा कि मां, इसमें क्या लिखा है? उनकी मां ने फीकी मुस्कान के साथ कहा कि इसमें लिखा है कि आपका बच्चा कुछ ज्यादा ही होशियार है। हमारा स्कूल उसके स्तर का नहीं है, इसलिए हम उसे नहीं पढ़ा सकते हैं। इसके बाद एडिसन को पढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी मां ने संभाली। शुरुआत में उन्हें बहुत परेशानी हुई, लेकिन अंतत: वह अपने उद्देश्य में सफल हो गईं। 

उनके बेटे ने इलेक्ट्रिक बल्ब जैसे कई महान आविष्कार किए। वह एक अमीर व्यवसायी बन गए। इसी बीच उनकी मां की मौत हो गई। एक दिन जब वह अपने घर में पुरानी चीजों को देख रहे थे, तो उनके हाथ पुराना पत्र लगा। उन्होंने खोलकर पढ़ा। उसमें लिखा था कि आपका बेटा बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर है, उसे स्कूल न भेजें। यह पढ़कर एडिसन काफी देर तक रोते रहे।

मोबाइल फोन का अधिक उपयोग बच्चों का विकास कर रहा बाधित

अशोक मिश्र

कोई भी आविष्कार मानव समाज के लिए बुरा नहीं होता है, सिवाय परमाणु बम के आविष्कार के। अभी तक तोप, तलवार, बम, पिस्तौल जैसे अस्त्र-शस्त्र को ही मानव समाज के लिए घातक माना गया है। यह भले ही देश की सुरक्षा में अब उपयोग किए जाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि मानव की हत्या में ही काम आता हैं। अगर इन सब हथियारों की खोज नहीं हुई होती, तो शायद मानव समाज में अपेक्षाकृत ज्यादा शांति होती। इन सबके अलावा जितने भी आविष्कार हुए हैं, वह सब किसी न किसी रूप में मानव समाज के विकास में योगदान ही करते रहे हैं। लेकिन मानव समाज के लिए लाभदायक माने जाने वाली तकनीक का यदि दुरुपयोग करने पर कोई व्यक्ति उतारू हो जाए, तो समाज को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अब मोबाइल फोन को ही लें। 

फोन का आविष्कार दूरदराज में बैठे लोगों से संवाद के लिए हुआ था। बात में इसमें सुविधाएं बढ़ती गई और इंटरनेट ने सूचनाओं का एक विशाल संसार खोल दिया। इसका उपयोग ज्ञान के लिए किया जाने लगा। यदि मोबाइल फोन का सही से इस्तेमाल किया जाए, तो यह छात्र-छात्राओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। यह बच्चों को भरपूर जानकारियां उपलब्ध करा सकता है। इसका उपयोग करके बच्चे अपने सिलेबस से इतर जानकारियां हासिल करके अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। कोरोना काल में तो बच्चों ने मोबाइल के सहारे ही अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। 

आनलाइन क्लासेस की वजह से ही उनका पाठ्यक्रम पूरा हो पाया था और बच्चे घर में रहकर सुरक्षित भी रहे। लेकिन जब इसका दुरुपयोग होने लगा, तो अभिभावकों को चिंता हुई। बच्चे पढ़ाई या मनोरंजन के नाम पर डिजिटल नशे का शिकार होने लगे। डिटिजल नशा उनके सिर पर इस कदर चढ़ा कि यदि मां-पिता ने उन्हें मोबाइल से दूर रखने का प्रयास किया, तो उन्होंने आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने से भी परहेज नहीं किया। गाजियाबाद की तीन बहनों की आत्महत्या एक गंभीर सवाल खड़े करती है। देश में बहुत सारे बच्चे हैं जो डिजिटल नशे के चलते अपना जीवन बरबाद कर रहे हैं। ज्यादा समय तक आन स्क्रीन रहने से बच्चों का शारीरिक-मानसिक विकास रुक जाता है। 

वह कई तरह की बीमारियों के शिकार होने लगते हैं। वह मोबाइल को ही अपना सच्चा साथी समझकर बाहरी दुनिया से कटने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वह समाज और परिवार के साथ अपना सामांजस्य नहीं बिठा पाते हैं। ऐसी हालत में वह मेमोरी लॉस, चिड़चिड़ापन, विद्रोही, एकाग्रता की कमी और मोटापे का शिकार हो जाते हैं। मनोचिकित्सकों का यह भी मानना है कि कई बार बच्चे मानसिक तनाव को दूर करने के लिए मोबाइल का सहारा लेते हैं, लेकिन बाद में इसके गुलाम होकर रह जाते हैं।

Saturday, February 7, 2026

बिभा चौधरी जिसके नाम पर रखा गया तारे का नाम



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कलकत्ता के जमींदार परिवार में 1913 को जन्मी बिभा चौधरी ने अपना पूरा जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया था। बिभा के पिता बाकूं बिहारी चौधरी और मां उर्मिला ने ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण कर ली थी जिसकी वजह से हिंदू समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। उनके पिता एक चिकित्सक थे। उनके माता-पिता यह मानते थे कि लड़कियों को भी पढ़ने-लिखने का पूरा अधिकार है। 

बिभा की बचपन से ही विज्ञान में काफी रुचि थी। सन 1936 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में एमएससी करने वाली वह अकेली छात्रा थीं। पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद वह उसी भौतिकी विभाग में प्रोफेसर देवेन्द्र मोहन बसु की देखरेख में शोध करने के लिए जुड़ गईं। सन 1938 से 1942 तक दार्जिलिंग की ऊंची पहाड़ियों पर कास्मिक किरणों पर अध्ययन किया। उन्होंने मेसॉन नामक कण की पहचान की।

इससे जुड़े तीन शोधपत्र नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुए।इसके बात तो बिभा चौधरी का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गया। इसके बाद कई अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलनों में भाग लेने का मौका मिला। वह भारत की प्रमुख महिला वैज्ञानिक के रूप में पहचानी जाने लगी थीं। उन्होंने वर्ष 1955 में इटली में पीसा में आयोजित मूल अणुओं पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी भाग लिया। 

विज्ञान के क्षेत्र में बिभा चौधरी ने बहुत अधिक योगदान दिया। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 2019 में पृथ्वी से 340 प्रकाश वर्ष दूर एक तारे का नाम बिभा रखा है। यह किसी वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़े सम्मान की बात है। आजीवन शोध कार्य में ही लगी रहने वाली बिभा चौधरी ने विवाह नहीं किया। 2 जून 1991 में कोलकाता में ही इस महान महिला वैज्ञानिक ने 77 साल की आयु में दुनिया छोड़ दी। 

प्रतिभाओं को निखारने के लिए खेल नर्सरियों की संख्या बढ़ाएगी सरकार


अशोक मिश्र

हरियाणा की सैनी सरकार पिछले साल 28 जनवरी से 14 फरवरी तक उत्तराखंड में आयोजित हुए 38वें राष्ट्रीय खेलों के पदक विजेताओं को सम्मानित करने जा रही है। पिछले साल हुए राष्ट्रीय खेल में हरियाणा के खिलाड़ियों ने 48 स्वर्ण, 47 रजत और 58 कांस्य पदक जीते थे। खेल चाहे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हो या राष्ट्रीय स्तर का, हरियाणा के खिलाड़ी पदक जीतने में सबसे आगे रहते हैं। हरियाणा के खिलाड़ियों का जोश और जुनून खेल प्रतिस्पर्धाओं में देखते ही बनता है। 

वैसे भी अन्य राज्यों की अपेक्षा हरियाणा अपने खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने, उनके लिए सुविधाएं मुहैया कराने और उन्हें पुरस्कार देने के मामले में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला राज्य है। सरकार ने तो पूरे राज्य में डेढ़ हजार खेल नर्सरियां खोल रखी हैं। इन नर्सरियों में 37 हजार से अधिक खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की अनुमति खेल विभाग ने मांगी है। सैनी सरकार बहुत जल्दी राज्य में खेल नर्सरियों की संख्या तीन हजार से अधिक करने जा रही है। 

इन नर्सरियों में बच्चों को छोटी उम्र से ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है।  यही वजह है कि सभी तरह की प्रतिस्पर्धाओं में हरियाणा के खिलाड़ी आगे रहते हैं। हरियाणा के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने प्रदेश और देश का नाम विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में रोशन किया है जिनमें भाला फेंक में पानीपत के नीरज चोपड़ा, कुश्ती में सोनीपत के योगेश्वर दत्त और रवि कुमार दहिया, झज्जर के बजरंग पुनिया, रोहतक की साक्षी मलिक,  विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, संग्राम सिंह आदि प्रमुख हैं। 

मुक्केबाजी में विजेंद्र सिंह, विकास कृष्ण यादव, मनोज कुमार, अमित पंघाल, अखिल कुमार, स्वीटी बूरा, नीतू घनघस का नाम उल्लेखनीय है। हाकी में कुरुक्षेत्र की रानी रामपाल, सिरसा की सविता पूनिया, नवजोत कौर, नवनीत कौर, मोनिका मलिक, नेहा गोयल का नाम गर्व के साथ लिया जाता है। निशानेबाजी में झज्जर की मनु भाकर, यशस्विनी देसवाल, अमन, सर्वजोत सिंह और पैरालिंपिक सुमित अंतिल, मनीष नरवाल, अमित सरोहा, प्रणव सुरमा, नितेश कुमार प्रमुख हैं। पर्वतारोहण में संतोष यादव, ममता सौदा, अनीता कुंडू आदि ने प्रदेश को गौरव दिलाया है। 

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 709 करोड़ रुपये करीब 17 हजार खिलाड़ियों को पुरस्कार देने पर खर्च किए हैं। पिछले साल से अब तक 662 खिलाड़ियों को 109 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जा चुकी है। हरियाणा की खेल नीतियां खिलाड़ियों को बहुत भा रही हैं। सरकार हर स्तर का पुरस्कार जीतने वाले खिलाड़ी को प्रोत्साहित जरूर करती है। यही कारण है कि दूसरे राज्यों ने भी हरियाणा की खेल नीतियों का अनुसरण करना शुरू कर दिया है, ताकि उनके यहां भी खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिले। 

Friday, February 6, 2026

परमाणु के बारे में पता लगाने वाले महर्षि कणाद


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि कणाद का जन्म कब हुआ था, इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी से दूसरे शताब्दी के बीच पैदा हुए होंगे। कुछ लोगों ने ईसा से तीन सौ साल पहले उनका जन्म माना है। कहते हैं कि जब किसान खेत से फसल काट लेते थे, तो खेत में फसल के दाने बिखर जाते थे, उन्हीं दोनों को इकट्ठा करके वह अपना काम चलाते थे। 

फसल के इन दानों को कन यानी कण कहा जाता था, इससे ही उनका नाम कणाद पड़ा। प्राचीन भारतीय प्रकृति वैज्ञानिकों और दार्शनिकों में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि वह भारतीय जगत में भौतिकी के जन्मदाता भी कहे जा सकते हैं। उन्होंने ही द्रव्य में परमाणु को मूल आधार मानते हुए परमाणु को अविभाज्य बताया था। 

कहा जाता है कि तत्कालीन राजा को जब यह जानकारी मिली कि कणाद खेतों से कन बीनकर अपना गुजारा करते हैं, तो उन्होंने बहुत सा धन देकर अपने मंत्री को कणाद के पास भेजा। कणाद ने धन लेने से मना करते हुए मंत्री से कहा कि इस धन को उन लोगों में बांट दो जिन्हें इसकी बहुत जरूरत है। इस प्रकार राजा ने तीन बार अपने मंत्री को भेजा, लेकिन कणाद ने धन नहीं लिया। 

आखिर में राजा खुद कणाद के पास पहुंचा, कणाद ने इस बार भी धन लेने से मना करते हुए कहा कि मैं इस धन को लेकर क्या करूंगा। मैं पहले से ही अमीर हूं। आपकी संपदा तो एक दिन नष्ट हो जाएगी, लेकिन मेरे पास जो संपदा है, वह कभी नष्ट नहीं होगी। कणाद की यह बात सुनकर राजा समझ गया कि कणाद के लिए भौतिक संपदा कोई मायने नहीं रखती है। वह उन्हें प्रणाम करके राजमहल लौट गया।

ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों के लिए साबित हो रही जानलेवा

अशोक मिश्र

आन लाइन गेमिंग की लत बच्चों के लिए जानलेवा साबित होने लगी है। जरूरत से ज्यादा मोबाइल पर समय बिताने वाले बच्चों का मानसिक विकास तो रुक ही रहा है, वह उग्र भी होते जा रहे हैं। कई देशों ने तो बच्चों को कम से कम आॅन स्क्रीन रखने के लिए अपने यहां कठोर नियम बनाए हैं। आस्ट्रेलिया जैसे देशों ने तो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को  सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है।

भारत में भी बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए नियम बनाने पर विचार किया जा रहा है। बच्चों के ज्यादा मोबाइल या कंप्यूटर पर समय बिताने की वजह से वह अवसाद के शिकार हो रहे हैं। गाजियाबाद के साहिबाबाद इलाके में रहने वाली तीन नाबालिग लड़कियों निशिका, पाखी और प्राची ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। वह कोरियन गेम्स के पीछे दीवानी थीं। इन तीनों बहनों की दीवानगी इस हद तक थी कि वह हर समय कोरियन गेम्स खेलती रहती थीं। इन्होंने तो गूगल के सहारे कोरियन भाषा भी सीख ली थी और आपस में कोरियन भाषा में बातचीत भी करती थीं। 

तीन साल पहले फेल हो जाने की वजह से इनकी पढ़ाई छूट गई थी। पंद्रह दिन पहले इनके पिता ने इनका मोबाइल छीन लिया था जिससी वजह से यह तीनों बहनें परेशान थी और अंतत: मंगलवार की देर रात दो बजे तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उन अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है जिनके बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय आन स्क्रीन बिताते हैं। वैसे कुछ लोगों की आदत होती है, बच्चों को बिजी रखने के लिए वह अपना मोबाइल पकड़ा देते हैं।

 वह यह भी जांचने की जहमत नहीं उठाते हैं कि उनके बच्चों ने मोबाइल या कंप्यूटर पर क्या देखा, क्या पढ़ा? गेमिंग की लत ते चलते बच्चों के आत्महत्या कर लेने की बहुत सारी घटनाएं देश और विदेश में हो चुकी हैं। पिछले एक दशक से टॉरगेट देने वाले गेम्स बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। ब्ल्यू वेल चैलेंज, द पास आउट चैलेंज, द सॉल्ट ऐंड आइस चैलेंज, द फायर चैलेंज और द कटिंग चैलेंज जैसे गेम्स बच्चों को टारगेट देकर आत्महत्या करने को प्रेरित करते हैं। वैसे तो ब्ल्यू वेल चैलेंज की शुुरुआत पिछले दो महीने से ही हुई है, लेकिन अब तक इस चैलेंज की वजह से 130 जानें जा चुकी हैं।

द पास आउट चैलेंज को चोकिंग गेम भी कहा जाता है। इसमें बच्चों को अपना गला दबाना होता है। हर साल अमेरिका में 250 से 1000 तक जानें चली जाती हैं। द साल्ट एंड आइस चैलेंज भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। द फायर चैलेंज में युवाओं को अपने शरीर पर आग लगाना होता है। द कटिंग चैलेंज गेम में भाग लेने वाले को अपने शरीर पर घाव करना होता है। जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ता है, खेल अधिक से अधिक खतरनाक होता जाता है।

Thursday, February 5, 2026

जल्दी पीछा नहीं छोड़ती है बुराई

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि बुरी आदतें बहुत आसानी से ग्रहण की जा सकती है, लेकिन अच्छी आदतों को ग्रहण करने में समय भी लगता है और परेशानी भी होती है। अच्छी आदतें बड़ी जल्दी छूट जाती हैं, लेकिन बुरी आदतों से छुटकारा बहुत मुश्किल से मिलता है। यही जीवन का कड़वा सच है। 

एक बार की बात है। एक धनी व्यापारी का पुत्र बुरी संगत में रहकर बिगड़ गया था। उसके पिता ने बड़ी ईमानदारी और मेहनत से काफी पैसा कमाया था। उसने जीवन भर लोगों की सहायता भी की थी। अपने बिगड़े हुए पुत्र को सुधारने की बहुत ज्यादा कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। अपने बेटे को लेकर वह काफी चिंतित रहने लगा। 

एक दिन उसने सुना कि नगर में एक महात्मा आए हैं जो लोगों की समस्याओं का समाधान करते हैं। व्यापारी एक दिन जाकर महात्मा से मिला। उनसे अपनी समस्या बताई। महात्मा ने कहा कि कल अपने पुत्र को अमुक बाग में भेज दो। उसे समझाने का प्रयास करूंगा। अगले दिन व्यापारी ने अपने पुत्र को बताए गए बाग में भेज दिया। महात्मा से जाकर व्यापारी पुत्र मिला। दोनों बाग में टहलने लगे। महात्मा ने एक छोटे पौधे की ओर इशारा करते हुए कहा कि इसे उखाड़ दो। व्यापारी पुत्र ने उस पौधे को बड़ी आसानी से एक झटके में उखाड़ दिया। थोड़ी दूर जाने पर महात्मा ने थोड़ा बड़े पौधे को उखाड़ने को कहा। उसे भी उसने उखाड़ दिया। बाद में थोड़ा बड़ा पौधा दिया, तो उसे उखाड़ने में थोड़ी मेहनत लगी, लेकिन उसे भी उखाड़ दिया। आखिर में महात्मा ने पेड़ को उखाड़ने को कहा, तो वह पेड़ को उखाड़ नहीं पाया। तब महात्मा ने कहा कि बुरी आदतों की भी यही स्थिति होती है। जब बुराई जीवन में अपनी जड़ें जमा लेंगी, तो उन्हें उखाड़ना मुश्किल हो जाएगा। यह सुनने के बाद व्यापारी पुत्र की आंख खुल गई।

नौकरी का झांसा देकर साइबर अपराध करवा रहे ठगों के एजेंट


अशोक मिश्र

साइबर क्राइम नेटवर्क कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है। इसका संबंध बेरोजगारी से भी जोड़ा जा रहा है। जैसे-जैसे बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, बेरोजगार युवा अपराध की ओर आकर्षित होते जा रहे हैं। अब तो हालात यह है कि कुछ साइबर ठग बेरोजगार युवाओं को नौकरी का झांसा देकर दूसरे देशों में ले जाकर साइबर अपराध करवा रहे हैं। फरीदाबाद के एक युवक आकाश महादेव को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया है जिस पर हरियाणा के पंद्रह युवकों को डंकी रूट से म्यांमार ले जाकर साइबर क्राइम करने वाले नेटवर्क को सौंप दिया था। 

इन युवकों को वहां मजबूर होकर यह अपराध करना पड़ता था। साइबर नेटवर्क खड़ा करने वाला आकाश महादेव दरअसल म्यांमार में दोबारा साइबर नेटवर्क खड़ा करना चाहता था। इससे पहले भी वह साइबर ठगी का नेटवर्क वह म्यांमार में खड़ा कर चुका था, लेकिन म्यांमार में पिछले कई साल से सैन्य शासन के खिलाफ चल रहे युद्ध के दौरान सेना ने इस आपराधिक नेटवर्क को छिन्न-भिन्न कर दिया था। 

महादेव पुराने आपराधिक नेटवर्क को फिर से खड़ा करना चाहता था। लेकिन म्यांमार पहुंचने से पहले ही मुंबई में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। फरीदाबाद पुलिस ने पहले से ही उसके खिलाफ लुकआऊट सर्कुलर जारी किया था क्योंकि महादेव ने फरीदाबाद के एक युवक को नौकरी दिलाने के नाम पर म्यांमार बुलाकर साइबर ठगी के जाल में फंसा दिया था। पीड़ित युवक ने इसकी शिकायत पुलिस से की थी। दरअसल, साइबर ठगी के आरोपी आकाश महादेव महाराष्ट्र के शोलापुर का रहने वाला है। 

वह खुद भी साइबर ठगों के चंगुल में फंस चुका था। बाद में उसने साइबर ठगों से हाथ मिला लिया था। साइबर ठगों से उसने भारत से युवकों को सप्लाई का जिम्मा लिया था। देश में जैसे-जैसे बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे बेरोजगार युवा निराश होकर अपराध की ओर उन्मुख हो रहे हैं। प्रदेश में लूटपाट, चोरी, छीनाछपटी जैसे अपराध भी बढ़ रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे अपराध करते समय  अपराधी का चेहरा सामने नहीं होता है, इसलिए अपराध करने वाला सोचता है कि वह पकड़ा नहीं जाएगा। यही वजह है कि साइबर ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध में सभी अपराधी अपना भाग्य आजमाने की कोशिश करते हैं। 

साइबर ठग आधुनिक तकनीक का फायदा उठाकर अपने शिकार पर कुछ दिन तक निगाह रखते हैं। साइबर ठग एक ही समय में कई टारगेट पर निगाह रखते हैं। अपने शिकार का विश्वास जीतने के बाद वह पूंजी निवेश के नाम पर ठगते हैं, लिंक भेजकर बैंक एकाउंट से पैसे निकाल लेते हैं। एटीएम कार्ड की क्लोनिंग करते हैं। इसी तरह के न जाने कितने अपराध साइबर अपराधी करते हैं।

Wednesday, February 4, 2026

मां ने बेटे से कहा, देश प्रेम की परीक्षा लूंगी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश को ब्रिटिश दासता से मुक्ति पाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हजारों युवकों ने देश की स्वाधीनता संग्राम के लिए अपना बलिदान दिया। इन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे अशफाक उल्ला खां। अशफाक का जन्म शाहजहांपुर के एक पठान खानदान में हुआ था। इनके परिवार में सभी लोग सरकारी नौकरी में थे। इनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन बचपन से ही अशफाक को ब्रिटिश दासता कचोटती रहती थी। वह उन लोगों की सहायता करने में आगे रहते थे जो लोग गुलामी से मुक्त होने के प्रयास में लगे हुए थे।

 इनकी मां मजहूरुन्निशाँ बेगम को बहुत खुशी हुई, लेकिन उन्हें डर भी था कि कहीं यह पुलिस के हाथों गिरफ्तार हुआ, तो ऐसा न हो कि यह अपने साथियों के बारे में बता दे। एक दिन उन्होंने अपने बेटे से कहा कि मैं तुम्हारी परीक्षा लूंगी। उनकी मां मजहूरुन्निशाँ बेगम ने एक दीपक जला दिया और उसकी लौ पर अशफाक को हाथ रखने को कहा। 

लौ पर हाथ रखने के बाद जब मांस जलने लगा और अशफाक ने उफ तक नहीं किया, तो उनकी मां ने उन्हें गले से लगा लिया। बाद में अशफाक क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के संपर्कमें आए। क्रांतिकारियों की एक बैठक शाहजहांपुर में हुई जिसमें तय किया गया कि क्रांति को आगे बढ़ाने अंग्रेजी खजाना लूट लिया जाए। 9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन से जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। 

बाद में ज्यादातर क्रांतिकारी पकड़े गए। 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद की जेल में क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां को फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय इतिहास में अमर हो गया।

अटल भूजल योजना को अतिरिक्त फंड मिलने से दूर होगा जल संकट


अशोक मिश्र

हरियाणा में पिछले दो दशकों से जल संकट धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। इसका कारण बड़े पैमाने पर भूगर्भ जल दोहन है। यह जल दोहन 135 प्रतिशत से अधिक हो जाने की वजह से 143 ब्लॉक में से 91 ओवर-एक्सप्लॉइटेड की श्रेणी में हैं। राज्य के 17 जिलों में भूजल में फ्लोराइड और नौ में यूरेनियम की अधिकता पाई गई है जिसका लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। शहरों और गांवों में जहां पानी का उपयोग जनसंख्या बढ़ने से बढ़ा है, वहीं कृषि में पानी के अधिक उपयोग और सतही जल की कमी से सिरसा, भिवानी, हिसार और सोनीपत जैसे जिलों में पेयजल संकट बढ़ गया है। 

पिछले दो दशकों में हरियाणा के 22 में से 16 जिलों में भूजल स्तर काफी नीचे गिर गया है। अम्बाला, कैथल और करनाल में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट (अप्रैल 2025-जनवरी 2026) बताती है कि प्रदेश में लिए गए 25,240 नमूनों में से 396 खराब पाए गए, जिनमें 17 जिलों में फ्लोराइड और नौ में यूरेनियम की मात्रा अधिक पाया गया है। इन्हीं सब स्थितियों से निपटने के लिए केंद्रीय बजट में इस वर्ष वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने हरियाणा को मूल बजट के अलावा उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण अतिरिक्त 144.85 करोड़ रुपये दिए है। इससे कुल प्रोत्साहन फंड 615.37 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। 

वैसे भी पिछले साल मिले बजट की बदौलत राज्य के पांच ब्लॉक और 90 से अधिक ग्राम पंचायतों ने भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार दिखाया है। पिछले साल भी फंड बढ़ने से जल संरक्षण के कामों में तेजी आई है, जिसमें 1,647 वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ के जरिये सरकारी भवनों और स्कूलों में वर्षा जल संचयन स्थापित किए गए। हरियाणा तालाब और अपशिष्ट जल प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से तालाबों को पुनर्जीवित किया जा रहा है। यमुनानगर जैसे जिलों में चेक बांधों को मजबूत और मरम्मत किया जा रहा है। 

लेजर लैंड लेवलिंग तकनीक को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। 'म्हारा पाणी म्हारी विरासत' योजना के तहत, पंचायतों को जल सुरक्षा योजनाएं बनाने के लिए सशक्त किया जा रहा है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। इस बार केंद्र सरकार से अटल भूजल योजना के लिए मिले 144 करोड़ रुपये का उपयोग प्रदेश के डार्क जोन में आए जल संकट को दूर करने में किया जा सकता है। 

 गांवों में जल बचाने, उसे सहेजन और भूजल का स्तर सुधारने के लिए तालाबों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसके लिए पूरे प्रदेश में अभियान चलाने की सरकार योजना बना रही है। गांवों में भूजल सुधरने से शहरी इलाकों में पड़ रहा दबाव भी कम होगा। इससे शहरों में लगे उद्योगों को भी आवश्यक पानी मिलेगा।

Tuesday, February 3, 2026

सन्त च्वांगत्सु ने खोपड़ी से मांगी क्षमा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लोगों को अपनी संपत्ति, अपने ओहदे और वैभव को लेकर बड़ा घमंड होता है। लेकिन वह नहीं जानते हैं कि यह सब कुछ इस जीवन भर के लिए है। मरने के बाद अमीर, अहंकारी, सदगुणी, गरीब सबकी गति एक जैसी होती है। मरने के बाद कुछ भी काम नहीं आता है। इस संबंध में चीन की एक रोचक कथा है। सन्त च्वांगत्सु चीन के लोकप्रिय संतों में माने जाते थे। 

एक बार की बात है। वह शाही मरघट की ओर से कहीं जा रहे थे। अंधेरी रात में उनका पैर एक खोपड़ी से टकराया। उन्होंने अंधेरे में टटोलकर देखा, तो वह उस खोपड़ी को अपने घर ले आए। उस खोपड़ी को अपने घर के दरवाजे पर रखकर उससे क्षमा मांगने लगे। उन्होंने कहा, मुझसे भूल हो गई। कृपया मुझे माफ करें। मेरा पैर आपकी खोपड़ी से गलती से टकरा गया था। 

अंधेरी रात होने की वजह से मुझे आपकी खोपड़ी नहीं दिखाई दी। सन्त च्वांगत्सु को ऐसा करते देखकर गांव के लोग जमा हो गए। उन्होंने सन्त च्वांगत्सु से कहा कि तुम पागल तो नहीं हो गए हो। इस खोपड़ी से क्षमा क्यों मांग रहे हो? सन्त च्वांगत्सु  ने कहा कि पागल मैं नहीं, तुम सब लोग हो गए हो। यह तो गनीमत है कि यह मर चुका है। यदि यह जिंदा होता और मेरा पैर इसकी खोपड़ी से लगा होता, तो न जाने यह मेरे साथ कैसा व्यवहार करता। जिस राजा की यह खोपड़ी है, उसने अपने जीवन में न जाने कितने लोगों को मौत की सजा दी होगी। 

इसी खोपड़ी में वह सारे विचार आए होंगे। इसी खोपड़ी की वजह से राजा जीवन भर अहंकारी रहा। लेकिन आज समय का फेर देखो कि इसकी खोपड़ी एक फकीर के ठोकर को सहने के लिए मजबूर है। आदमी को किसी तरह का अहंकार नहीं पालना चाहिए।