| प्रतीकात्मक एआई चित्र |
अशोक मिश्र
प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। कहीं पेड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, तो कहीं वनों को उजाड़कर बस्तियां बसाई जा रही हैं। इससे हमारा पर्यावरण संकट में पड़ता जा रहा है। जिस मौसम में गर्मी पड़नी चाहिए, उस मौसम में चक्रवात आ रहे हैं, तेज हवाओं के साथ बरसात हो रही है।पृथ्वी का तापमान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से मौसम चक्र में भारी बदलाव आता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारी संख्या में लोगों को विस्थापित होने पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के शुरुआती दौर यह कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में कई वर्षों से बरसात नहीं हुई। उस राज्य के लोगों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादातर पेड़ों को काट डाला था।
इसका नतीजा यह हुआ कि एक साल बादल आते और बिना बरसे निकल जाते। जैसे प्रकृति भी मानवों के कुकृत्य से नाराज थी। लोगों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। लोग भूख और प्यास से मर रहे थे। एक बच्चा भी कई दिनों से भूखा था। अनाज पैदा न होने की वजह से काफी संख्या में लोगों को अपनी जान देनी पड़ी थी। बच्चा भी काफी दुर्बल हो गया था। उसके पास थोड़ा सा पानी बचा था।
तभी उस बच्चे के सामने एक चिड़िया भूख-प्यास से बेहाल होकर गिर पड़ी। वह भी शायद कई दिनों से भूखी प्यासी थी। उस बच्चे ने चिड़िया को देखा और फिर अपने पास बचे हुए पानी को देखा। उसने एक-एक बूंद पानी चिड़िया के चोंच में डालनी शुरू की। थोड़ी देर में कुछ पानी चिड़िया के पेट में गया और कुछ पानी जमीन पर। थोड़ी देर बाद चिड़िया ने अपने पंख फड़फड़ाए और उड़ गई। उसके बाद बच्चा जमीन पर गिरा और हमेशा के लिए सो गया। कहते हैं कि इसके बाद उस राज्य में भारी बारिश हुई।






















