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Tuesday, May 19, 2026

विलासिता में खुदा को खोज रहे हो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अफगानिस्तान को प्राचीनकाल में बलख के नाम से जाना जाता था। हमारे देश का पड़ोसी मुल्क था। भारत और बलख के बीच एक सांस्कृतिक संबंध भी था। 718  ईस्वी में बलख में एक बादशाह हुआ करता था जिसका नाम था हजरत इब्राहिम। पुरानी किताबों में उसका नाम इब्राहिम इब्र अधम बताया जाता है। कहते हैं कि इब्राहिम ने बाद में राजपाट त्यागकर संन्यास ले लिया था। 

इसकी भी एक बड़ी रोचक कथा है। कहते हैं कि एक रात शाही महल की छत पर वह सो रहे थे, तो उन्होंने आवाज सुनी। नींद टूट गई। उन्होंने पूछा-कौन है? संतरी ने कहा कि हुजूर, मैं संतरी हूं। अपना ऊंट खोज रहा हूं। बादशाह ने कहा कि तुम शाही महल की छत पर ऊंट खोज रहे हो? संतरी ने जवाब दिया कि आप भी विलासिता के बीच रहकर खुदा को तलाश रहे हैं। 

कहते हैं कि इसी के बाद इब्राहिम राजपाट त्यागकर सूफी संत बन गए थे। एक बार की बात है। इब्राहिम ने एक गुलाम खरीदा। उन्होंने उस गुलाम से पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? गुलाम ने कहा कि जिस नाम से आप पुकारना चाहें। इब्राहिम ने पूछा, तुम क्या खाओगे? 

गुलाम ने जवाब दिया-जो आप खिलाना चाहें। उन्होंने फिर पूछा, तुम काम क्या करोगे? गुलाम ने विनम्रता से जवाब दिया, जो आप करवाना चाहें। बादशाह ने अगला सवाल किया-तुम क्या चाहते हो? गुलाम ने जवाब दिया-गुलाम की क्या इच्छा? जो आपकी इच्छा वही मेरी इच्छा। यह सुनकर बादशाह तुरंत तख्त से उतरे और गुलाम को गले से लगा लिया। उन्होंने कहा कि खुदा के सेवक को कैसा होना चाहिए। कहा तो यह भी जाता है कि हजरत इब्राहिम ने तत्काल उस गुलाम को मुक्त कर दिया।