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Monday, May 4, 2026

नहीं बहन! तुम्हारे प्रेम में स्वार्थ था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सच्चा प्रेम कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है। किसी को पीड़ा नहीं देता है।  सच्चा प्रेम करने वाला किसी से बदला लेने की बात भी नहीं सोचता है। सच्चे प्रेम में दया, करुणा, प्रेम और प्राणी मात्र के लिए सद्भावना रखता है। सच्चा प्रेम करने वाला ऊंच-नीच और अमीर-गरीब की भावना से भी ऊपर होता है। एक बार की बात है। स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गए हुए थे। 

वह जहां भी जाते थे, लोग उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने के लिए पहुंच जाते। स्वामी रामतीर्थ यथासंभव हर किसी की समस्याओं का समाधान करने का भरपूर प्रयास करते थे। उन्हीं दिनों एक महिला स्वामी रामतीर्थ के पास पहुंची। वह अपनी पीड़ा को भीतर ही दबाए बैठी हुई थ। उस महिला को देखते ही स्वामी रामतीर्थ समझ कि महिला इस समय अपार दुख में है। 

वह कुछ नहीं बोले। बस उसे सरल और अपार स्नेह भाव से देखते रहे। वह महिला स्वामी जी के स्नेहभाव वाली दृष्टि को देखकर एकाएक रोने लगी। वह काफी देर तक रोती रही। स्वामी रामतीर्थ कुछ नहीं बोले। बस, उसे पहली की तरह स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते रहे। काफी देर रोने के बाद उसने अपने हृदय की पीड़ा स्वामी जी के सामने खोलकर रख दी। उसने बताया कि वह प्रेम में छली गई है। उसने जिससे सच्चा प्रेम किया था, वह उसे छोड़कर चला गया। 

उसने स्वामी जी से पूछा कि क्या सच्चा प्रेम मिलना बहुत दुष्कर है। स्वामी जी ने प्रेम भाव से कहा कि सच्चा प्रेम हासिल थोड़ा कठिन है। उस महिला ने कहा कि क्या मेरा प्रेम सच्चा नहीं था। स्वामी जी ने कहा कि बहन! तुम्हारे प्रेम में स्वार्थ था। तुमने जिसस प्रेम किया वह कुटिल था। प्रेम तो दया, करुणा और सेवा के रूप में प्रकट होता है। यह सुनकर महिला चली गई और एक अस्पताल में नर्स का काम करने लगी।