बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
सुजाता बिहार के बोधगया के पास स्थित सेनानी (उरुवेला) गाँव के एक धनी जमींदार की पुत्री थीं। विवाह से पूर्व सुजाता ने एक वट (बरगद/पीपल) वृक्ष के देवता से मन्नत मांगी थी कि यदि उनका विवाह अच्छे कुल में हुआ और उन्हें प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई, तो वह हर वर्ष उस वृक्ष देवता को विशेष खीर (पायस) का भोग लगाएंगी। उनकी इच्छा पूरी हुई। उनका विवाह एक संभ्रांत परिवार में हुआ।समय आने पर उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। अपनी मन्नत के अनुसार वह हर साल उस वृक्ष पर खीर अर्पित करती थीं। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सुजाता ने दूध से अत्यंत स्वादिष्ट और शुद्ध खीर तैयार की। तभी उनकी दासी पूर्णा ने आकर उन्हें बताया कि वट वृक्ष के नीचे एक संन्यासी बैठा हुआ है। महात्मा बुद्ध कठोर तपस्या करते हुए कई वर्ष बीत गए थे। उनकी काया अत्यंत कमजोर हो गई थी।
उन्होंने सुजाता की पायस स्वीकार की, तो उनके शरीर को थोड़ी ऊर्जा मिली। इसके बाद उन्होंने समाधि लगाई जो सातवें दिन टूटी। बीच-बीच में सुजाता आकर बुद्ध को देख जाती थी। निरंजना नदी के किनारे वट वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ। संयोग से उसी समय एक शव यात्रा निकल रही थी। उसे देखकर बुद्ध हंस पड़े। सुजाता ने पूछा कि कल तक आप शव देखकर दुखी हो जाते थे, आज आप हंस रहे हैं।
बुद्ध ने कहा कि सुख-दुख तो मनुष्य की कल्पना मात्र है। मनुष्य का मोह ही सभी परेशानियां का कारण है। आज मैंने जान लिया है कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है। सुजाता तुम ही बताओ, जिसे सनातन वस्तु मिल गई हो जो न परिवर्तनशील हो, न नााशवान, तो फिर उसे कैसा शोक। यह सुनकर सुजाता संतुष्ट हुई और स्वगृह चली गई।