Monday, September 21, 2026

अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला लिया है। यह गणना नौ साल बाद होने जा रही है। राज्य सरकार का यह फैसला सराहनीय और स्वागतयोग्य है। जीवों की गणना का इंतजार पर्यावरण प्रेमियों के साथ-साथ वन विभाग भी कर रहा था। आखिरी व्यापक गणना वर्ष 2017 में हुई थी, जबकि उससे पहले 2012 में हुई थी यानी 2017 के बाद से वैज्ञानिक तरीके से गिनती नहीं हुई है।   

वन्य जीवों की गणना सिर्फ संख्या गिनने का आंकड़ा नहीं होता है, यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का हेल्थ कार्ड होता है। इससे यह भी पता चलता है कि किस प्रजाति की आबादी बढ़ रही है, किसकी घट रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? उनका आवास कितना सुरक्षित है और मानव दबाव का असर कितना है। इसी के आधार पर राज्य सरकार बजट, स्टाफ, वाटर होल, कॉरिडोर और मुआवजा नीति आदि तय करती है। 

अगर गणना न हो तो वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाई गई योजनाएं अंधेरे में तीर चलाने जैसा साबित होती हैं। 2017 की रिपोर्ट में दक्षिणी हरियाणा की अरावली में तेंदुए, लकड़बग्घा, सियार और कई अन्य प्रजातियाँ दर्ज की गई थीं, परंतु पिछले वर्षों में आवास में बदलाव, शहरीकरण और मानव हस्तक्षेप के कारण स्थिति बदल चुकी है। इसलिए नई गणना जरूरी हो गई है। अरावली क्षेत्र की प्रधानता की बात करें तो यहां का असली शासक तेंदुआ है जो शीर्ष शिकारी के रूप में पूरे तंत्र को संतुलित रखता है, लेकिन संख्या के लिहाज से सबसे अधिक नीलगाय, बंदर और सियार हैं। 

अरावली में कई जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं या संकटग्रस्त हैं। इनमें भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी लोमड़ी, कैरकल, रस्टी स्पॉटेड कैट तथा कुछ स्थानों पर चिंकारा और स्लोथ बियर शामिल हैं। इनके घटने का मुख्य कारण आवास का विखंडन, खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण तथा पानी के स्रोतों का सूखना है। जंगल सिकुड़ने से शिकार की कमी हो जाती है और जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ने को मजबूर हो जाते हैं जहाँ वे दुर्घटना या संघर्ष का शिकार हो जाते हैं। यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अरावली की जैव विविधता और अधिक क्षतिग्रस्त हो सकती है। 

नई गणना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है जो सही आंकड़ों के आधार पर प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाने में मदद करेगी। नौ साल बाद होने वाली यह गणना अगर ट्रैप, ट्रांसेक्ट और ड्रोन तीनों तरीकों से हुई तो यह बताएगी कि अरावली सच में जी रहा है या सिर्फ कैमरे में जीता हुआ दिख रहा है, और उसी के आधार पर तय होगा कि आने वाले दशक में यहां तेंदुआ दहाड़ेगा या सिर्फ कहानियों में रहेगा। फरीदाबाद के धौज गांव में हरियाणा का पहला निगरानी केंद्र भी इसी लिए बन रहा है जहां से हर दो साल में गणना और सतत निगरानी की योजना है। 

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