अशोक मिश्र
मगध के सम्राट बिंबिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने राज्य हथियाने के लिए उन्हें बंदी बना लिया था। बंदीगृह में उन्हें भूखा रखा गया, प्रताड़ित किया गया। इसी प्रताड़ना के चलते बिंबिसार की मृत्यु हो गई। इसके बाद अजातशत्रु निरंकुश हो गया। महात्मा बुद्ध से प्रभावित होने के बावजूद उसकी राज्य लिप्सा कम नहीं हुई। एक दिन जब महात्मा बुद्ध राजगृह बाहरी इलाके में स्थित गृध्रकूट आश्रम में पधारे, तो अजातशत्रु ने अपने मगध महामात्य वस्सकार को उनकी सेवा में भेजा और उनसे निवेदन करने को कहा।काफी देर तक बुद्ध का प्रवचन सुनने के बाद एकांत में कस्सकार ने कहा, भगवन! सम्राट वैशाली गणराज्य को पराभूत देखना चाहते हैं। कोई उपाय बताएं। उसकी बात सुनने के बाद तथागत गंभीर हो गए। उन्होंने पास बैठे अपने परम शिष्य आनंद से पूछा कि यह बताओ, क्या वज्जियों के सन्निपात यानी संसद अधिवेशन बार-बार होते हैं? आनंद ने कहा, हां।
तब बुद्ध ने फिर पूछा, भंते! क्या वज्जि संघबद्ध रहकर उद्यम करते हैं, वह राष्ट्रीय कर्तव्यों को मिलजुलकर करते हैं? क्या वैशाली का शासक सभा द्वारा नियमपूर्व स्वीकृत हुए बिना कोई आदेश पारित नहीं करते हैं? स्वीकृत विधि विधान का नियमपूर्वक पालन करते हैं? क्या उनके यहां सारे नियमों का पालन होता है? क्या वैशाली राज्य में बुजुर्गों का सम्मान होता है? उनके आदेशों का पालन होता है? क्या वैशाली में कुमारियों और महिलाओं का आदर सम्मान होता है? क्या नौकरों-चाकरों का सम्मान होता है, उनकी रक्षा की जाती है?
आनंद ने कहा, हां भगवन! वैशाली में यह सब कुछ होता है। महात्मा बुद्ध की मुख मुद्रा गंभीर हो गई। वह महामात्य वस्सकार की ओर देखते हुए आनंद से बोले, तो आनंद, यह धर्म गणतंत्र के प्राण तत्व हैं। जब तक लिच्छवि इनका पालन करते रहेंगे, वे अविजेय रहेंगे। यह सुनकर कस्सकार लौट गया।
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