Tuesday, September 22, 2026

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ के संबंध में यह बहुप्रचलित घटना है। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन की दो पत्नियां थीं, महामाया और महाप्रजापति गौतमी। महामाया और गौतमी दोनों सगी बहनें थीं। महामाया ने एक ही पुत्र सिद्धार्थ को जन्म दिया था और कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी, जबकि गौतमी ने पुत्र नंद और पुत्री नंदा को जन्म दिया था। एक बार की बात है। 

राजकुमार सिद्धार्थ राजवन में टहल रहे थे। उनके साथ मंत्री पुत्र देवदत्त भी था। इतने में सिद्धार्थ ने राजहंसों को आकाश में उड़ते हुए देखा। उन्होंने देवदत्त से कहा कि देखो, राजहंस आकाश में विचरते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं। यह देखकर देवदत्त ने अपने तरकश से तीर निकाला और धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच दी। तीर जाकर आकाश में उड़ रहे एक राजहंस के लगा और वह जमीन पर आ गिरा। 

घायल हंस को देखकर सिद्धार्थ का मन चीत्कार कर उठा। वह आंखों में अश्रु लिए उस हंस के पास पहुंचे और उसे उठाकर तीर निकाला और उसे बचाने का जो भी उपाय संभव था, वह किया। देवदत्त ने हंस पर अपना अधिकार बताते हुए मांगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस को देने से मनाकर दिया। राजपुत्र होने से देवदत्त उस समय तो सिद्धार्थ से कुछ नहीं कह सका, लेकिन उसने हंस पर अधिकार जताने के लिए राजा के यहां मामला पहुंचा दिया। राजदरबार में दोनों ने अपना-अपना पक्ष रखा। 

सिद्धार्थ ने कहा कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। अपने ही पुत्र का मामला होने से राजा शुद्धोदन फैसला नहीं कर पा रहे थे। अंत में उन्होंने हंस को मंगाया और उसे राज दरबार में छोड़ दिया। कहा कि यह हंस जिसके पास चला जाएगा, हंस पर उसका अधिकार होगा। अंतत: हंस सिद्धार्थ के पास गया और इस तरह हंस पर राजकुमार सिद्धार्थ का अधिकार हुआ।

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