Monday, August 18, 2025

मैंने तुम्हारे साथ यह क्या कर दिया?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दक्षिण भारत में संत और कवि वेमना की कविताएं आज भी जनमानस में पढ़ी पढ़ाई जाती है। वैसे दक्षिण भारतीय साहित्य में संत वेमना के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है, लेकिन माना जाता है कि उनका जन्म आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में 1652 ईस्वी में हुआ था। कुछ लोग वेमना का जन्म विभिन्न शताब्दियों में मानते हैं। वैसे वेमना का वास्तविक नाम गोना वेना बुद्धा रेड्डी बताया जाता है। 

तेलुगू साहित्य के इतिहास में वेमना की रचनाएं वेमना शतकालु नाम से संग्रहीत हैं। कहा जाता है कि बचपन में वेमना पढ़ाई लिखाई में बहुत कमजोर थे। जिस गुरुकुल में वह शिक्षा ग्रहण करते थे, उस गुरुकुल के आचार्य उनकी कम अकली के कारण परेशान रहते थे। गुरुकुल में जो कुछ पढ़ाया जाता था, वह उनके पल्ले नहीं पड़ता था। पंद्रह साल की उम्र तक वह अक्षरज्ञान तक हासिल नहीं कर पाए थे। गुरु को यह विश्वास हो चला था कि उनका यह शिष्य जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा। 

एक दिन नदी में स्नान करने जाते समय गुरु ने कपड़े देते हुए कहा कि इसे हाथ में पकड़े रहो, ताकि कपड़ों पर मिट्टी न लग जाए। स्नान के बाद जब गुरु जी ने आवाज दी, तो वह कपड़े जमीन पर फेंककर दौड़े आए। कपड़ों पर मिट्टी लगने से नाराज गुरु ने उन्हें खड़िया मिट्टी (चॉक) देते हुए कहा कि इस पत्थर पर राम राम लिखो। वेमना उस पत्थर पर राम राम लिखने लगे। थोड़ी देर बाद चाक खत्म हो गई। फिर भी वह लिखते रहे। थोड़ी देर बाद नाखून घिस गया, फिर अंगुलियां घिसने लगीं। 

लेकिन उन्होंने राम राम लिखना नहीं छोड़ा। शाम को गुरु जी लौटे, तो देखा कि वेमना अब भी राम राम लिख रहा है, लेकिन उसकी अंगुली पूरी तरह घिस चुकी है। उन्होंने वेमना को रोते हुए गले लगा लिया और बोले, मैंने तुम्हारे साथ यह क्या कर दिया। इसके बाद वेमना ने मन लगाकर पढ़ाई की और एक संत और कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए।

ठीक से विरोध भी नहीं कर पातीं घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं

अशोक मिश्र

हमारे देश में घरेलू हिंसा और उत्पीड़न को लेकर शहरों की महिलाएं तो थोड़ा बहुत जागरूक हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की ज्यादातर महिलाएं इसको लेकर सजग नहीं है। सामाजिक परंपराओं और सोच के चलते गांवों की नब्बे फीसदी महिलाएं इसे भाग्य का लेखा-जोखा मानकर जीवन भर उत्पीड़न सहती रहती है और इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाती हैं। यदि कोई महिला इसके खिलाफ आवाज भी उठाना चाहे, तो घर की बड़ी बूढ़ी महिलाएं उसको समझा बुझाकर शांत कर देती हैं। 

शनिवार को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की है कि घरेलू हिंसा के मामले में अदालतों को शिकायत का आकलन करते समय लाइन के बीच पढ़ना जरूरी है क्योंकि ज्यादातर उत्पीड़न घर पर ही होती है और इसे साबित कर पाना महिला के लिए आसान नहीं होता है। हाईकोर्ट की यह बात बिल्कुल सही है। उत्पीड़न या घरेलू हिंसा होने पर जब मामला कचहरी तक पहुंचा है, तो घर के लोग पुरुष को ही बचाने की जुगत में लग जाते हैं। 

इसमें पीड़ित महिला की सास, ननद, देवरानी, जेठानी जैसी महिलाएं भी शामिल होते हैं। कई बार तो यह भी देखने में आया है कि उसके मां-बाप, बहन और भाभियां दबाव में या स्वेच्छा से पुरुष का ही साथ देते हैं। इस तरह के मामलों में अदालतें आम तौर पर यह देखती हैं कि पीड़ित महिला ने जो आरोप लगाए हैं, उसमें तथ्य कितने सही हैं। मामले में दम है या नहीं। ऐसे मामले में अदालत को फैसला लेते समय इन सभी परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए। वैसे भी महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 में घरेलू हिंसा की परिभाषा सीमित नहीं है। अधिनियम में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक और आर्थिक हिंसा को भी घरेलू हिंसा के दायरे में रखा गया है। यदि कोई व्यक्ति मौखिक रूप से महिला को अपशब्द कहता है, उस को किसी भी प्रकार प्रताड़ित करता है, तो वह घरेलू हिंसा के दायरे में आता है। 

अगर किसी महिला को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के तहत किसी प्रकार की धन-संपत्ति, रुपये पैसे प्राप्त हैं, उसका उपयोग न करने देना आर्थिक उत्पीड़न माना जाएगा। यदि किसी कारणवश दंपति में तलाक हो गया हो तो पत्नी और बच्चों के भरण पोषण के लिए व्यवस्था अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। दरअसल, घरेलू हिंसा और वैवाहिक जीवन के सुचारू रूप से न चलने का सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे-छोटे बच्चों पर पड़ता है। 

उनका भविष्य अधर में लटक जाता है। कई बार तो बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। घरेलू हिंसा का प्रभाव न केवल उनकी पढ़ाई लिखाई पर पड़ता है, बल्कि उनके भविष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

Sunday, August 17, 2025

यह सीता रमैय्या की हार नहीं मेरी हार है

 बस यों ही बैठे ठाले-23-------रचनाकाल 2 अगस्त 2020

अशोक मिश्र
अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन के बाद क्रांतिकारियों (मुख्यत: अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों) को पहले लगा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का उपयोग क्रांतिकारी नवयुवकों को राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति के पक्ष में संगठित करने में किया जा सकेगा। कालांतर में उनकी यह योजना ध्वस्त हो गई क्योंकि यह संगठन भी कांग्रेस का ही उप संगठन यानि गांधीवादी कांग्रेसियों की दूसरी पंक्ति ही साबित हुई। इन्हीं दिनों कांग्रेस में विप्लवी राष्ट्रवादी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रभाव बढ़ रहा था।
विप्लवी राष्ट्रवादी नेता जी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि स्वाधीनता राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति द्वारा ही हासिल की जा सकती है। यह तभी संभव है, जब देश की जनता इसके लिए संगठित और तैयार हो। यही वजह है कि कांग्रेस में और कांग्रेस से बाहर सक्रिय अनुशीलन समिति के शीर्ष नेताओं का पूर्ण समर्थन और सहयोग नेताजी को प्राप्त था। वे नेताजी को आगे करके अपने कार्यों को अंजाम दे रहे थे। अपनी कार्यनीतियों को लागू करने का प्रयास कर रहे थे। वर्ष 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब सुभाष बाबू अध्यक्ष चुने गए, तो अनुशीलन समिति ने सुभाष बाबू को आगे करके मजदूरों, किसानों, छात्रों और युवाओं का संगठन खड़ा करके उन्हें मार्क्सवाद और लेनिनवाद के दर्शन और सिद्धांतों से लैस करने में जुट गए।
हरिपुरा कांग्रेस में सुभाष बाबू के अध्यक्ष चुने जाने के बाद महात्मा गांधी समझ गए कि यदि सुभाष बाबू के बढ़ते प्रभाव को रोका नहीं गया, तो कांग्रेस क्रांतिकारियों के हाथ में चला जाएगा या फिर उनका प्रभाव कम हो जाएगा। सुभाष बाबू की कार्यशैली उन्हें पसंद नहीं आ रही थी। उन्हीं दिनों अनुशीलन समिति के शीर्ष नेताओं में से एक केशव प्रसाद शर्मा के क्रांतिकारी प्रयासों से बाराबंकी के हड़हा और लखनऊ के कान्य कुब्ज कालेज में एक-एक महीने के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए। हड़हा (बाराबंकी) शिविर का उद्घाटन कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने किया। यह देखकर महात्मा गांधी, गांधी भक्त कांग्रेसी नेताओं के हाथों के तोते उड़ गए।
वे समझ गए कि यदि कुछ किया नहीं गया, तो कांग्रेस से उन्हें हाथ धोना पड़ेगा। यही वजह है कि अगले वर्ष 1939 में त्रिपुरा अधिवेशन में जब सुभाष बाबू ने चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो महात्मा गांधी खुलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सामने आ खड़े हुए और उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया को अपना उम्मीदवार घोषित किया। हालांकि अधिवेशन के समय सुभाष बाबू बहुत बीमार थे। उन्हें स्ट्रेचर पर लादकर अधिवेशन में लाया गया। गांधी भक्त कांग्रेसी नेताओं को लगता था कि महात्मा गांधी के विरोध के बाद सुभाष बाबू चुनाव हार जाएंगे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आया, तो पता चला कि महात्मा गांधी के लाख विरोध के बावजूद सुभाष बाबू को 1580 मत मिले थे। महात्मा गांधी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को 1377 मत हासिल हुए थे। 203 मतों से सुभाष बाबू कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीत गए थे। तब इस पर महात्मा गांधी ने बयान देते हुए कहा था, यह सीता रमैय्या की हार नहीं मेरी हार है।
इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ महात्मा गांधी ने एक और चाल चली। उन्होंने कांग्रेस कार्यकारिणी सदस्यों से कहा कि जो नेताजी के कार्य करने के तौर तरीकों से सहमत नहीं हैं, वे कांग्रेस से हट सकते हैं। नतीजा यह हुआ कि चौदह सदस्यीय कार्यकारिणी में से बारह सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। जवाहर लाल नेहरू तटस्थ रहे। केवल नेताजी के बड़े भाई शरद कुमार बोस (शरद बाबू) उनके साथ रहे। इतना ही नहीं, गांधी भक्त गोविंद बल्लभ पंत ने सम्मेलन में एक प्रस्ताव रखा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस कार्यकारिणी का चुनाव गांधी जी की सहमति के बिना न करें। (मालूम हो कि उस समय महात्मा गांधी कांग्रेस के साधारण सदस्य तक नहीं थे।)
यह सीधा सीधा नेताजी सुभाष चंद्र बोस और कांग्रेस के संविधान के खिलाफ था। इतिहास में इस प्रस्ताव को पंत प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है। उन दिनों स्टालिन पंथी कम्युनिष्ट सुभाष बाबू और क्रांतिकारियों के खिलाफ थे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे कथित समाजवादियों ने महात्मा गांधी का ही साथ दिया और वे पंत प्रस्ताव मामले में तटस्थ बने रहे। नतीजा यह हुआ कि जयप्रकाश और लोहिया के विश्वासघात के कारण नेता जी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ लाया गया पंत प्रस्ताव पारित हो गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के कुछ ही महीने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्वामी सहजानंद सरस्वती कांग्रेस से निष्कासित कर दिए गए और कांग्रेसियों के मजदूरों, किसानों और छात्रों के संगठनों और आंदोलन में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
इसके अगले वर्ष जब कांग्रेस का रामगढ़ बिहार (अब झारखंड में) में अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में गांधी और उनके भक्त भारतीय पूंजीपतियों के व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अधिक से अधिक सुविधाएं हासिल करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत पर समझौते के लिए दबाव डालने लगे थे। तब अनुशीलन समिति के शीर्ष नेताओं ने कांग्रेस के अधिवेशन स्थल के ठीक सामने समझौता विरोधी अधिवेशन आयोजित किया। यह समझौता विरोधी सम्मेलन नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्वामी सहजानंद सरस्वती के संयोजकत्व में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में अनुशीलन समिति और एचएसआरए के शीर्ष नेताओं ने भाग लिया। योगेश चंद्र चटर्जी, केशव प्रसाद शर्मा जैसे क्रांतिकारियों ने भाग लिया।
स्वामी सहजानंद सरस्वती और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के समर्थक भी इसमें भाग लेने आए थे। इसी सम्मेलन में 19 मार्च 1940 को आरएसपीआई का गठन किया। प्रख्यात क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी इसके महामंत्री बनाए गए। मालूम हो कि 19 मार्च 1940 से पहले ही अनुशीलन समिति और एचएसआरए के शीर्ष नेताओं को ब्रिटिश हुकूमत गिरफ्तार कर चुकी थी। जो नेता बचे थे, उन्हें रामगढ़ समझौता विरोधी सम्मेलन के बाद लौटते समय या कुछ दिनों बाद गिरफ्तार कर लिया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, स्वामी सहजानंद सरस्वती, योगेश चंद्र चटर्जी और केशव प्रसाद शर्मा आदि क्रांतिकारी विभिन्न जगहों और विभिन्न तिथियों में पकड़कर जेल में डाल दिए गए। एक बात और कहना चाहता हूं कि जब रामगढ़ में आरएसपीआई गठन किया गया, तो सुभाष बाबू ने फारवर्ड ब्लाक का आरएसपीआई में विलय का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अनुशीलन समिति के अधिकांश सदस्यों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। इसका कारण यह था कि फारवर्ड ब्लाक के लक्ष्य स्पष्ट नहीं थे। वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति द्वारा देश को स्वाधीन करना चाहते थे, लेकिन आजादी के बाद क्या होगा? इस संबंध में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके फारवर्ड ब्लाक के साथी बहुत स्पष्ट नहीं थे।
(समाप्त)

जो तुमने दिया, उसे वापस कर दूंगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश में प्राणि मात्र के कल्याण की बात की है। वह हर मायने में अहिंसा का पालन करने पर जोर देते थे। किसी का उपहास उड़ाना भी उनकी नजर में हिंसा थी। वह कहा करते थे कि किसी को दुख पहुंचाना, सबसे बुरा कर्म है। वह मन को पवित्र रखने की सीख देते हुए कहते थे कि यदि मनुष्य अपने मन को पवित्र रखना सीख जाए, तो दुनिया भर में हिंसक घटनाएं होनी बंद हो जाएंगी। 

मन की चंचलता ही कई बार हिंसा के लिए प्रेरित करती है। महात्मा बुद्ध वर्षाकाल को छोड़कर बाकी समय भ्रमण ही किया करते थे। एक बार की बात है। वह किसी गांव से गुजर रहे थे। उनके साथ उस समय कुछ शिष्य भी थे। गांव वालों ने जब उनकी वेशभूषा को देखा तो वह उनका उपहास उड़ाने लगे। गांव वालों को भला बुरा कहते और उपहास उड़ाते देखकर तथागत वहीं शांत चित्त से खड़े हो गए। 

गांववालों ने काफी देर तक उनको भला बुरा कहा और उपहास उड़ाया। लोग जब थक गए, तो गौतम बुद्ध ने उन गांववालों से कहा कि अभी कुछ और करना है या नहीं। अगर कुछ और नहीं करना है, तो मैं अगले गांव जाऊं? गांव वाले काफी हैरान हुए कि हमने इस आदमी का इतना अपमान किया और यह शांत खड़ा हुआ है। एक व्यक्ति ने कहा कि आपका हम लोगों ने इतना उपहास उड़ाया, अब आप क्या करेंगे? महात्मा बुद्ध ने कहा कि वही करूंगा जो पिछले गांव वालों के साथ किया था। 

पिछले गांववाले मेरे लिए खूब खाने पीने की वस्तुएं लाए थे। खूब स्वागत सत्कार किया था, लेकिन मैंने उनसे कहा कि मेरा पेट भरा हुआ है। मैंने सब वापस कर दिया। अब आप लोगों ने मेरे साथ जो किया, वह सब मैं आपको वापस करता हूं। यह सुनकर गांववाले बहुत शर्मिंदा हुए और माफी मांगी।

शहर को साफ-सुथरा रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी

अशोक मिश्र

मिलेनियम सिटी के नाम से विख्यात गुरुग्राम में फैली गंदगी के बारे में कुछ सप्ताह पहले मीडिया और सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हुई थी। फ्रांसीसी महिला मैथिलडे आर ने तो इसे सुअरों के रहने लायक बताते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी। इसको लेकर काफी चर्चा भी हुई थी। एक पूर्व सेनाधिकारी ने कूड़े के ढेर पर अपना भोजन तलाशते पशुओं की एक वीडियो डालकर गुरुग्राम की गंदगी पर अपना रोष भी जाहिर किया था। मिलेनियम सिटी गुरुग्राम में फैली गंदगी और कूड़े के ढेर से शायद ही कोई इनकार करे। सच बात तो यह है कि हर चमचमाते शहर का दो चेहरा होता है। 

शहर में चमचमाते होटल, शापिंग माल्स और पाश कालोनियां बाहर से देखने पर मन मोह लेती हैं। लेकिन इन चमचमाती कालोनियों, होटलों और शापिंग माल्स के पीछे जाकर देखिए। आगे से चमचमाने के अनुपात में ही पीछे कूड़ा कचरा पड़ा होता है। यह सब अपने आगे का हिस्सा बहुत साफ रखते हैं, लेकिन इस सफाई के दौरान निकला कूड़ा-कचरा पीछे ही फेंक देते हैं। अगर उधर से कोई शख्स निकलना चाहे तो उसे अपनी नाक पर रुमाल रखने को मजबूर होना पड़ेगा। यह लगभग हर शहर की सच्चाई है। लेकिन जिस गुरुग्राम की गंदगी को लेकर कुछ दिनों पहले तक इतनी हाय-तौबा मची हुई थी। 

उसी बीच सर्बिया के एक युवक चुपचाप गुरुग्राम को साफ करने में भी लगा हुआ था। पिछले एक साल से गुरुग्राम में सर्बिया के नागरिक 32 वर्षीय लेजर जेनकोविक रोज एक फावड़ा और बड़े कचरे का बैग लेकर निकल पड़ते हैं गुरुग्राम की किसी गली को साफ करने। वैसे तो लेजर वर्ष 2018 को भारत में माडलिंग करने आए थे। छह साल तक बेंगलुरु में रहकर मॉडलिंग की, लेकिन पिछले साल वह गुरुग्राम आ गए थे। तब से वह रोज ‘एक दिन एक गली’ अभियान चला रहे हैं। वह सुबह निकलते हैं और जो भी गली उन्हें गंदी दिखाई देती है, तो वह उसे साफ करने में जुट जाते हैं। 

वह यह नहीं सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे? शुरुआत में तो कुछ लोगों ने उन्हें सिरफिरा समझकर तंज भी किया था, लेकिन अब लोग उनकी मुहिम में हंसी-खुशी से हिस्सा ले रहे हैं। गुरुग्राम के लोग जब उनसे पूछते हैं कि तुम क्या कर रहे हो? तो वह पूछने वाले से ही पूछ बैठते हैं कि आप खुद से पूछिए कि आप क्यों नहीं कर रहे हैं? वैसे भी वह इससे पहले ऋषिकेश में सफाई अभियान चला चुके हैं। यह एक नई मिसाल है। यदि लेजर से ही सीखकर लोग सिर्फ अपनी गली को ही साफ सुथरा रखने का प्रण कर लें, तो शायद देश का हर शहर साफ सुथरा और प्रदूषण रहित होगा। लोग स्वच्छ वातावरण में सांस ले सकेंगे।

Saturday, August 16, 2025

स्वाधीनता दिवस पर अपने शहीद क्रांतिकारियों को हरियाणा ने किया याद

अशोक मिश्र

पंद्रह अगस्त को हम आजादी के उन्यासीवें वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे। देश को आजाद कराने के लिए हजारों रणबांकुरों ने अपनी शहादत दी, ब्रिटिश हुकूमत की लाठियां गोलियां खाईं, कारागार की यातनाएं सही। न जाने कितने लोगों को फांसी दी गई। भारत का स्वाधीनता संग्राम बीसवीं सदी का सबसे लंबा चलने वाला संग्राम था। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह अत्तिंगल विद्रोह था, जो 1721 में हुआ था। इस विद्रोह में मालाबार के लोगों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के 140 सैनिकों की हत्या कर दी थी और अंजेंगो किले को घेर लिया था। इसके बाद तो छिटपुट विद्रोह होते रहे, लेकिन 1857 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ रजवाड़ों ने संगठित विद्रोह किया। इसके बाद होने वाले विद्रोह में जनता भी शामिल होती गई। 

भारत के स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा (तब पंजाब प्रांत) की भूमिका रही है। वर्तमान हरियाणा की यदि बात की जाए, तो राव तुलाराम और राजा नाहर सिंह 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी शहादत देने वालों में अग्रगण्य हैं। इन्होंने बड़ी बहादुरी से अंग्रेजी फौजों का मुकाबला किया और अंतत: अपनी शहादत देकर अमर हो गए। हरियाणा के क्रांतिकारियों में सर छोटूराम का नाम गर्व से लिया जाता है। इसके अलावा सुल्तान सिंह गहलोत, शेर सिंह कादयान, मतू राम हुड्डा, गुलाब सिंह बुराक, धर्मपाल सिंह भालोठिया, देवक राम सूरह, बंसी लाल, भोपाल सिंह आर्य, बुजा राम खीचर ने भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर अपना नाम प्रदेश के इतिहास में अमर कर लिया। 

1857 की जंग में मेवात के दस हजार लड़ाकों ने अपनी शहादत देकर अपना नाम अमर कर लिया। ऐसे रणबांकुरों और अपनी मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करने वालों की जन्म और कर्मभूमि पर 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। 15 अगस्त को पूरे प्रदेश के लोग अपने पूर्वज शहीदों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देकर उनको नमन करेंगे। देश भर के क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की मूर्तियों पर फूल चढ़ाकर उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाएगा क्योंकि इनकी ही शहादत के परिणाम स्वरूप हमें आजादी हासिल हुई थी। 

प्रदेश की सैनी सरकार ने भी बड़े पैमाने पर स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम आयोजित किए हैं जिसमें सरकार के नुमाइंदे भाग लेंगे। प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष, सांसद, मंत्रियों, विधायकों को प्रत्येक जिले में होने वाले कार्यक्रमों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ-साथ प्रदेश की सभी संस्थाएं स्वाधीनता दिवस बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे। स्कूल-कालेजों में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम होंगे और झांकियां निकाली जाएंगी।

वैज्ञानिक समाजवाद को जानने-समझने को उद्यत होने लगे युवा

 बस यों ही बैठे ठाले---23---रचनाकाल----1 अगस्त 2020

अशोक मिश्र
जब पहला विश्व युद्ध (28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918) छिड़ा, तो उसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ना ही था। भारत में इसका प्रभाव पड़ा। भारत में पूंजीपति वर्ग ने अपने व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए विश्व युद्ध काल में ब्रिटिश हुकूमत से अधिक से अधिक रियायतें हासिल करने की कोशिश करनी शुरू कर दी। इसीलिए विश्व युद्ध काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश हुकूमत का न केवल खुलेआम समर्थन किया, बल्कि उसका सहयोग भी किया। वहीं दूसरी ओर भारत के क्रांतिकारी विश्वयुद्ध को अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का एक बेहतरीन अवसर जानकर अपने लक्ष्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राणपण से लग गए थे। इसलिए वे भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करने की कोशिश करने लगे।
ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता और आंतक के खिलाफ सशस्त्र बगावत करने लगे। वे भारत की आम जनता को क्रांति के पक्ष में खड़ा करने की कोशिश में लग गए। इसी बीच सात नवंबर 1917 को रूस में लेनिन के नेतृत्व में क्रांति हुई और उन्होंने पूरी दुनिया के क्रांतिकारी संगठनों और क्रांतिकारियों के लिए नारा दिया कि विश्व युद्ध को गृहयुद्ध यानी समाजवादी क्रांति में बदलो।
रूस में पूंजी की सत्ता को मिटा कर श्रम की सत्ता की स्थापना हुई थी। इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ा। भारत फिर इससे अछूता भला कैसे रह सकता था। भारत के क्रांतिकारियों, अनुशीलन समिति और उसके मूर्धन्य नेताओं द्वारा गठित विकसित पहले एचआरए और उसकी अगली कड़ी के रूप में एचएसआरए ने रूसी क्रांति से प्रेरणा लेकर देश के नवयुवकों को मार्क्सवादी लेनिनवादी दर्शन और सिद्धांतों से लैस करने का प्रयास करना शुरू किया।
उधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाकर भारतीय पूंजीपतियों के व्यावसायिक हितों की प्रतिपूर्ति का प्रयास करती रही। लेकिन इसी कांग्रेस में कुछ नेता ऐसे भी थे, जो महात्मा गांधी के विचार और कार्यक्रम से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। उनके लिए वहां रहकर कार्य करना मुश्किल हो रहा था। हालांकि ये नेता अनुशीलन समिति के मूर्धन्य नेता थे और कांग्रेस को राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति के पक्ष में एक अनुकूल मंच की तरह उपयोग करने की योजना बनाकर आए थे।
महात्मा गांधी इस बात को शायद समझ चुके थे और यही वजह थी कि कांग्रेस में ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा रही थीं जिससे क्रांतिकारी नेता या तो कांग्रेस छोड़कर चले जाएं या फिर वे गांधी के हिसाब से कार्य करें। ऐसे में भारत के क्रांतिकारी राष्ट्रीय स्तर पर एक मार्क्सवादी–लेनिनवादी विचारों से लैस एक पार्टी की आवश्यकता महसूस कर रहे थे। हालांकि उन परिस्थितियों ऐसा संभव नहीं हो सका, लेकिन बाद में अनुशीलन समिति के शीर्ष नेताओं ने बिहार के रामगढ़ (अब झारखंड में) अप्रैल 1940 में आरएसपीआई का गठन किया।
ट्रेड यूनियन डिस्प्यूट बिल के विरोध 6 अप्रैल 1929 में असेंबली हाल में अमर शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के बम फेंकने और क्रांतिकारी भाषण देने का पूरे भारत में ऐतिहासिक प्रभाव पड़ा। भारत के नौजवान में क्रांतिकारियों, मार्क्सवाद और लेनिनवाद के प्रति गहरी उत्सुकता पैदा हुई। वे वैज्ञानिक समाजवाद को जानने-समझने को उद्यत होने लगे। यह देखकर कांग्रेस के अंदर बड़ी हलचल मची। उन्हें लगने लगा कि यदि हिंदुस्तान का युवा समुदाय अनुशीलन समिति के मूर्धन्य क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी, केशव प्रसाद शर्मा, राम प्रसाद बिस्मिल और सरदार भगत सिंह आदि के रास्ते पर चल पड़ा, तो उनके सुधारवादी और समझौतावादी कार्यक्रमों का क्या होगा। देश के युवाओं को क्रांतिकारी राजनीति की ओर जाने से रोकने और क्रांतिकारियों का प्रभाव कम करने की नीयत से 1934 में जय प्रकाश नारायण, मीनू मसानी और अशोक मेहता जैसे लोगों ने कांग्रेस में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया।
शुरुआती दौर में इसने कांग्रेस के सुधारवादी पूंजीवादी नेतृत्व को हटाकर क्रांतिकारियों को नेतृत्व देने की मांग की। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों को लेकर जयप्रकाश नारायण से अनुशीलन समिति के योगेश चंद्र चटर्जी, केशव प्रसाद शर्मा ने लंबी बातचीत की। योगेश चंद्र चटर्जी और केशव प्रसाद शर्मा ने यह बातचीत अनुशीलन समिति के शीर्ष नेता महाराज त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती, रमेश आचार्य, प्रतुल गांगुली आदि से सलाह मशविरा के बाद की थी। अनुशीलन समिति की योजना कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का उपयोग एक मंच के रूप में करने की थी। लेकिन बाद की घटनाओं ने अनुशीलन समिति के मनसूबे पर पानी फेर दिया।
जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी और अशोक मेहता के नेतृत्व में गठित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी मोहनदास करमचंद गांधी के प्रभाव में आ चुकी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा विंग साबित हुई। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन ही इसलिए किया गया था, ताकि हिंदुस्तान के युवाओं को भ्रमित किया जा सके और भारत के क्रांतिकारियों का प्रभाव कम किया जा सके।

ईश्वर को पाना है, तो मोम की तरह बनो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तेरहवीं शताब्दी में फारसी साम्राज्य के वाल्ख (वर्तमान अफगानिस्तान) में जलालुद्दीन रूमी का जन्म 30 सितंबर 1207 में हुआ था। वह सूफी फकीर, न्यायविद्, फारसी कवि और धर्मशास्त्री थे। भारत के पड़ोसी राज्य में पैदा होने की वजह से भारतीय दर्शन का भी रूमी पर अच्छा खासा प्रभाव था। 

रूमी सूफीवाद के एक प्रमुख स्तंभ थे। सूफीवाद में प्रेम, एकता और ईश्वर से मिलन को प्रधानता दी गई है। इनकी प्रसिद्ध साहित्यिक रचना मनसवी है जिसमें उन्होंने सूफीवाद से संबंधित आध्यात्मिक कविताएं और कहानियां संग्रहीत हैं। कहा जाता है कि रूमी की मौत 13 दिसंबर 1273 को कोन्या वर्तमान तुर्की में हुई थी जहां आज भी उनकी कब्र विराजमान है। इस कब्र को देखने दुनिया भर के  पर्यटक तुर्की जाते हैं। 

एक बार की बात है। एक युवक रूमी के पास आया और उसने कहा कि वह ईश्वर को पाना चाहता है, उनसे मिलना चाहता है, लेकिन जब भी वह ध्यान लगाने के लिए बैठता है, तो उसके मन में बुरी भावनाएं पैदा होने लगती हैं। उसका ध्यान भटकने लगता है। मुझे कई बार ऐसा लगता है कि मैं ईश्वर को नहीं प्राप्त कर पाऊंगा। यह सुनकर रूमी ने अपने एक शिष्य से जलता हुआ दीपक मंगवाया और उस युवक से कहा कि तुम इस दीपक की लौ को ध्यान से देखो। यह लौ चारों ओर अपना प्रकाश बिखेर रही है। लौ भी बहुत शांत दिख रही है। यदि तुम इसमें अंगुली डालोगे, तो क्या होगा? 

युवक ने कहा कि अंगुली जल जाएगी। रूमी ने कहा कि क्या तुम कह सकते हो कि लौ बुरी है। या तुमने बिना जाने बूझे लौ में अंगुली डाली, इसलिए अंगुली जल गई। ईश्वर भी इस लौ की तरह है। अगर तुम्हें ईश्वर को पाना है, तो तुम्हें मोम की तरह होना होगा। तब ईश्वर तुम्हें अपना लेंगे। युवक की समझ में अब बात आ गई थी।

विशाल भारत के अंग-भंग ने ली थी लाखों लोगों की बलि

 अशोक मिश्र

अगर 14 अगस्त को भारत के संदर्भ में अंग-भंग दिवस के रूप में याद किया जाए, तो शायद गलत नहीं होगा। आज के ही दिन 14 अगस्त 1947 को विशाल भारत को काटकर दो हिस्सों में तब्दील कर दिया गया था। इसका परिणाम भी दोनों हिस्सों के लिए दुखद ही रहा था। भारत विभाजन यानी भारत के अंग-भंग होने के बाद लाखों लोग सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गए थे। मनुष्य के रूप में दानव हिंसा, हैवानियत और सांप्रदायिकता का नंगा कर रहे थे। इधर भी और उधर भी। कोई पाक साफ नहीं था। लेकिन यह भी सच है कि इंसान के रूप में दानव चंद मुट्ठी भर लोग ही बने थे, लेकिन इन लोगों ने असहाय, निरीह और निर्दोष जनता को ऐसे-ऐसे घाव दिए थे कि इंसानियत कांप उठी थी। मानवता त्राहि-त्राहि कर उठी थी।

 भारत और पाकिस्तान में कौन किससे बिछड़ा, किसका घर तबाह हुआ, किसके साथ बलात्कार हुआ, कितने लोगों ने बलात्कार किया, किसके स्तन काटे गए, किसका बेटा मारा गया, किसका पति लौट कर नहीं आया, इन सब बातों का कोई हिसाब न तब था और न अब उनहत्तर सालों बाद हो सकता है। बीसवीं सदी का ही नहीं, शायद मानव समाज के इतिहास का सबसे बड़ा पलायन हुआ था भारत-पाक बंटवारे के समय। विशाल भारत के अंग भंग दिवस के बाद। उन दिनों को आधार बनाकर रचे गए साहित्य इसकी विभीषिका को दर्शाते हैं। वैसे तो भीष्म साहनी का तमस, यशपाल का झूठा सच, अमृता प्रीतम का पिंजर, खुशवंत सिंह का ट्रेन टू पाकिस्तान और कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान जैसे न जाने कितने साहित्य उस विभीषिका को लेकर रचे गए। इन सबमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली और मार्मिक चित्रण सहादत हसन मंटों ने अपने साहित्य में किया है। टोबा टेक सिंह और खोल दो जैसी कहानियां पढ़कर आज भी हिंसा, कामुकता और सांप्रदायिक सोच के प्रति घृणा पैदा होती है।

वैसे तो 14-15 अगस्त 1947 से  काफी पहले ही भारत में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी, लेकिन भारत का अंग-भंग होने के बाद तो जैसे हिंसा का तांडव खुलेआम होने लगा था। महात्मा गांधी की अपील भी बेअसर साबित हो रही थी। दोनों तरफ लगी हिंसा की आग को बुझाने दोनों ओर के नेता लगे हुए थे, लेकिन यह आग थी कि और भड़कती जा रही थी। हिंसा, प्रतिहिंसा और कामुकता की आग को दोनों ओर के नए-नए शासक बने नेता इसलिए भी नहीं रोक पा रहे थे क्योंकि इन्हीं लोगों की राजनीतिक इच्छाओं की बलिवेदी पर विशाल भारत चढ़ गया था। स्वतंत्रता के बाद सत्ता पर काबिज होने की अदमनीय लालसा की भेंट दोनों ओर की करोड़ों जनता चढ़ गई थी।

द्विराष्ट्र की थ्योरी को जन्म देने वाले लोग आजादी के नाम पर जश्न मना रहे थे। शांति का पाठ पढ़ा रहे थे। लोगों को गरीबी, बेकारी, भुखमरी से निजात मिलने के सपने दिखा रहे थे। भारत और पाकिस्तान में नित नई घोषणाएं की जा रही थीं, लेकिन जनमानस में ही छिपे चंद भेड़िये अपना शिकार करने में लगे हुए थे। भारत विभाजन जैसी आपदा में भी वे अवसर खोजने से बाज नहीं आ रहे थे। शरणार्थी शिविरों में खुलेआम बलात्कार हो रहे थे, लोग दवा, पानी और भोजन के अभाव में मर रहे थे, लेकिन सत्ताधीश आजादी के नारे लगा रहे थे। मानवता लहूलुहान पड़ी कराह रही थी।

कहा जाता है कि भारत विभाजन से पहले और उसके काफी बाद दोनों ओर से लाखों लोग मारे गए थे। करोड़ों लोगों को अपनी जमीन जायदाद, घर-दुकान छोड़कर इधर से उधर और उधर से इधर आना पड़ा था। मानव समाज के इतिहास के सबसे बड़े इस विस्थापन की पीड़ा कई दशकों तक लोगों के दिलोदिमाग को सर्पदंश की तरह पीड़ित करती रही। अपने घर से उजड़े लोग बाद में स्थिर नहीं हो पाए। वह आजीवन चैन की नींद नहीं सो पाए। उनकी बाद की पीढ़ी ने भी अपने पूर्वजों की उस विभीषिका को शायद भुला दिया।

Thursday, August 14, 2025

एक विप्लवी क्रांतियोद्धा की तरह आजीवन संघर्ष करते रहे केशव प्रसाद शर्मा

 बस यों ही बैठे ठाले-21-----रचनाकाल -29 जुलाई 2020

अशोक मिश्र
कांग्रेस के नेताओं का ढुलमुल रवैया और सिद्धांतहीनता ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों को तोड़ने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति में बाधा बनने लगी थी। इसी दौरान अनुशीलन समिति के तमाम वरिष्ठ क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल आदि काकोरी षड़यंत्र केस में गिरफ्तार करके जेल में डाल दिए गए, तो सन 1924-25 तक आते एचआरए की बागडोर सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव जैसे विप्लवी नवयुवकों के हाथों में आ गई। एचआरए ने अपने गठन (जिसमें सबसे बड़ी भूमिका योगेश चंद्र चटर्जी की थी) के चार-पांच साल बाद अपने लक्ष्य और उद्देश्य में समाजवाद को शामिल कर लिया और अपना नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी रख लिया। इससे पहले प्रख्यात क्रांतिकारी अवनि मुखर्जी रूसी क्रांति के नायक विल्यादिमिर इल्यीच लेनिन से मिल चुके थे।
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता अवनि मुखर्जी को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सिंगापुर में सैनिक विद्रोह कराने के अभियोग में फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वे फांसी से एक दिन पहले जेल से भाग निकले थे। लेनिन और अवनि मुखर्जी की मुलाकात हुई। मुलाकात के दौरान अवनि मुखर्जी ने भारत के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के लिए मदद मांगी, लेनिन ने अवनि मुखर्जी के सामने कुछ शर्तें रखीं। लेनिन ने कहा कि रूस की ओर से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के लिए हथियार, साहित्य और रुपये-पैसे की मदद तो मिलेगी, लेकिन रूसी सेना भारत में क्रांतिकारियों के पक्ष में लड़ने नहीं जाएगी। यह लड़ाई आप लोगों को खुद लड़नी होगी। हां, अगर आप लोगों की लड़ाई में कोई दूसरा देश हस्तक्षेप करेगा, तो ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। अब आप भारत जाकर अपने साथियों से विचार-विमर्श कर लें। तब मुझे आकर बताएं, जैसा होगा, वैसा किया जाएगा।
लेनिन से मुलाकात के बाद अवनि मुखर्जी भारत आए और बंगाल में अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों योगेश चंद्र चटर्जी, त्रिलोक्यनाथ चक्रवर्ती महाराज आदि से मिले। इसके बाद 1923 के अंतिम दिनों में अवनि मुखर्जी वापस रूस गए, लेकिन लेनिन से उनकी मुलाकात न हो सकी। 21 जनवरी 1924 को विल्यादिमीर इल्यीच लेनिन की असामयिक मृत्यु हो गई थी। इसके बाद रूस की बागडोर घोर अवसरवादी और प्रतिक्रियावादी स्टालिन के हाथों में आ गई थी।
अवनि मुखर्जी के बारे में इसके बाद कोई जानकारी नहीं मिलती है। शायद रूस के किसी रजिस्टर में लिखा हुआ है कि वे लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। रूस में स्टालिन के शासन काल में जिसको फांसी दी जाती थी या साइबेरिया भेज दिया जाता था, उसके बारे में उस रजिस्टर में यही लिखा जाता था कि अमुक व्यक्ति लंबी छुट्टी पर चला गया है। रूस की सत्ता हाथ में आने के बाद स्टालिन का व्यवहार तानाशाहों जैसा होता गया। लेनिन की वैश्विक समाजवादी क्रांति की अवधारणा, लक्ष्य और सिद्धांत के विपरीत स्टालिन ने एक देशीय समाजवाद और शांति पूर्ण सह अस्तित्व का नारा देकर रूसी क्रांति के साथ विश्वासघात किया। पूरी दुनिया में समाजवादी क्रांतियां कराने का कार्यभार त्यागकर स्टालिन के निर्देश पर तृतीय इंटरनेशनल ने 1928 में रूस को बचाना प्रमुख कार्यभार तय किया।
इधर भारत में काकोरी षडयंत्र के केस में अनुशीलन समिति के वरिष्ठ क्रांतिकारियों के गिरफ्तार होकर जेल भेज दिए जाने के परिणाम स्वरूप सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव, भगवती चरण वोहरा आदि नए युवकों ने एचआरए का नेतृत्व संभाला। तत्कालीन समय में अनुशीलन समिति के प्रमुख संगठनकर्ता योगेश चंद्र चटर्जी, केशव प्रसाद शर्मा और अन्य क्रांतिकारियों का झुकाव मार्क्सवाद और लेनिनवाद की तरफ हो चुका था। वे जेलों में इससे संबंधित साहित्य का अध्ययन करने लगे थे।
एचआरए से जुड़े क्रांतिकारियों ने दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में 7-8 अगस्त 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी की अगली कड़ी के रूप में उसका नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी रख लिया। याद रहे कि एचआरए का घोषणापत्र शचींद्र नाथ सान्याल ने रिवोल्यूशनरी नाम से लिखा था। सान्याल आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। चूंकि एचआरए का घोषणा पत्र रिवोल्यूशनरी पीले कागज पर लिखा गया था, इसलिए इतिहास में उसे यलो पेपर के नाम से भी जाना जाता है। एचएसआरए का घोषणा पत्र लिखने का कार्यभार अमर विप्लवी भगवती चरण बोहरा को दिया गया और उन्होंने फिलास्फी आफ बम (बम का दर्शन) नाम से घोषणा पत्र लिखा। (प्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी इन्हीं की पत्नी थीं। बाद में उन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी से विवाह कर लिया था। कहा जाता है कि जापान से रास बिहारी बोस का आजाद हिंद फौज के लिए बुलावा आने पर योगेश बाबू को ही जापान जाना था, लेकिन जापान का पता दुर्गा भाभी ने जानबूझ कर छिपा दिया था। इस पर आवेश में आकर योगेश दा ने दुर्गा भाभी को तलाक दे दिया था। यह किस्सा योगेश चंद्र चटर्जी के बाद आरएसपीआई के महामंत्री और अनुशीलन समिति के सदस्य क्रांतिकारी केशव प्रसाद शर्मा जी अक्सर बताया करते थे।
एक बात यहां गौर करने लायक है कि 26 जुलाई 1945 को ब्रिटेन में हुए आम चुनाव में विस्टन चर्चिल की करारी हार के बाद जब क्लेमेंट एटली प्रधानमंत्री चुने गए, तो उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भारत को अब स्वतंत्र कर देने में ही भलाई है, तो सन 1946 में ब्रिटिश हुकूमत ने सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ने का फैसला किया। उसमें आरएसपीआई के महामंत्री योगेश चंद्र चटर्जी और केशव प्रसाद शर्मा सहित तमाम क्रांतिकारियों के नाम शामिल थे। ये सभी रिहा कर दिए गए और कांग्रेस ने 15 अगस्त 1947 को समझौते के आधार पर कथित आजादी हासिल की। अनुशीलन समिति और आरएसपीआई के क्रांतिकारी इस आजादी को आजादी मानने को तैयार नहीं थे।
25 जनवरी 1948 को क्रांतिकारी केशव प्रसाद शर्मा इलाहाबाद पहुंचे और 26 जनवरी 1948 को वे कथित आजाद भारत में गिरफ्तार कर लिए गए। उस समय महात्मा गांधी भक्त गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे। लाल बहादुर शास्त्री पंत मंत्रिमंडल में पुलिस एवं परिवहन मंत्री थे। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन उत्तर प्रदेश के विधान सभा अध्यक्ष थे। जब क्रांतिकारी केशव प्रसाद शर्मा की गिरफ्तारी की जानकारी उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन (बाबू जी) और स्वामी सहजानंद सरस्वती को मिली, तो उन्होंने शर्मा जी की गिरफ्तारी का विरोध किया।
लाल बहादुर शास्त्री ने तब टंडन जी से कहा कि केशव प्रसाद शर्मा को मैं भी जानता हूं। यदि उन्हें आजाद कर दिया गया, तो या तो कांग्रेस रहेगी या फिर शर्मा जी। शर्मा 1950 में रिहा किए गए। क्रांतिकारी शर्मा जी ने आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का ताम्रपत्र और सुख सुविधाएं नहीं ली। पूछने पर कहा करते थे कि मैंने स्वाधीनता संग्राम में ताम्रपत्र और सुख सुविधाएं जुटाने के लिए भाग नहीं लिया था। बस अफसोस यह है कि हिंदुस्तान को क्रांतिकारियों के रास्ते आजादी नहीं मिली। कांग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत से समझौता किया और हिंदुस्तान कथित रूप से आजाद हो गया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति के बाद विप्लवी समाजवादी क्रांति की प्रक्रिया को कांग्रेस ने भंग कर दी।
शर्मा जी आजीवन एक विप्लवी क्रांतियोद्धा की तरह संघर्ष करते रहे। उनकी मृत्यु 1986 (जहां तक मुझे याद है) में पटना के एक नर्सिंग होम में हो गई थी।) राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी फांसी से पूर्व हिंदुस्तान के नौजवानों के लिए कहा कि आज हिंदुस्तान के क्रांतिकारी नौजवानों को बम और पिस्तौल की जगह मार्क्सवाद और लेनिनवाद को हथियार बनाकर लड़ने की जरूरत है। यही वजह थी कि देश में ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में जितने भी क्रांतिकारी थे, वे मार्क्सवाद और लेनिनवाद के गहन अध्ययन में जुट गए। इन क्रांतिकारी तत्वों ने अनुकूल मौका समझ कर नेता जी सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस में शामिल होकर अपने लक्ष्य और उद्देश्य के लिए राजनीतिक मंच के तौर पर कांग्रेस का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।