था, उस समय अर्जुन अपने बंधु-बांधवों को देखकर विचलित हो गए थे। वह युद्ध क्षेत्र से भाग जाना चाहते थे। अपने ही भाइयों, चाचाओं और पितामह से युद्ध करना, उचित नहीं लग रहा था। वह राज्य पाने के लिए अपने ही लोगों की हत्या नहीं करना चाहते थे।
तब श्रीकृष्ण ने उनको उपदेश दिया था। उसी उपदेश का संग्रह गीता के नाम से किया गया। गीता पुस्तक में जीवन के विविध आयामों पर प्रकाश डाला गया है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था और यहीं पर कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया था। इसलिए गीता और कुरुक्षेत्र का हरियाणा के लिए बहुत अधिक महत्व है। यही कारण है कि हरियाणा सरकार पिछले कई वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव मनाती आ रही है।
इस महोत्सव में कई देशों से श्रद्धालु आते हैं। भारतीय नागरिकों की तो महोत्सव में भरमार रहती है। सैनी सरकार ने इस बार अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन किया है जो 15 नवंबर से शुरू हो चुका है, जो पांच दिसंबर तक चलेगा। इस बार चार चरणों में देशभर से आए साढ़े चार सौ कलाकार अपनी लोककलाओं का मुजाहिरा करेंगे। हमेशा की तरह इस बार भी अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों के लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे।
केंद्र की ओर से विभिन्न राज्यों के छह कलाकार गीता महोत्सव में पहुंचे हैं। हिमाचल प्रदेश के 15 कलाकार लुड्डी और गिद्दा, राजस्थान के 11 कलाकार कालबेलिया, लांगा गायन और भवई नृत्य पेश करेंगे। पिछले कई वर्षों से महोत्सव में उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक कला केंद्र के कलाकार लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। गीता महोत्सव जहां लोगों को अध्यात्म की दुनिया में ले जाकर उनमें अच्छे गुणों और संस्कारों का बीजारोपण करता है। वहीं महोत्सव में आए लोग विभिन्न राज्यों की लोककलाओं, रहन-सहन और पहनावे से परिचित होते हैं। भारत में प्राचीन काल से ही मेले-ठेले और महोत्सवों को मानने की परंपरा रही है।
इसका उद्देश्य यही रहा है कि जिस जगह पर मेला या महोत्सव आयोजित किया जा रहा है, वहां के लोग दूर-दूर से आने वाले लोगों से परिचित हों, उनमें मेलजोल बढ़े, लोग एक दूसरे की सभ्यता और संस्कृति से परिचित हों। यह अनेकता में एकता की भावना को पैदा करने का सबसे बेहतरीन जरिया था। आज भी यही उद्देश्य है। गीता महोत्सव सचमुच एक पवित्र उद्देश्य से किया जाने वाला आयोजन हैै।

No comments:
Post a Comment