बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बंगाल के हुगली जिले के एक गरीब किंतु धर्म परायण ब्राह्मण परिवार में स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ था। परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को हुआ था। उनका वास्तविक नाम रामकृष्ण चटोपाध्याय था। वह देवी काली के परम भक्त थे। बीस साल की उम्र में ही वह कलकत्ता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी बन गए थे। परमहंस के ही शिष्य विश्वविख्यात स्वामी विवेकानंद थे। स्वामी विवेकानंद में अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा थी। एक बार की बात है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास एक युवक आया। वह बहुत परेशान था। उसने स्वामी जी मिलने के बाद कहा कि मैं संन्यास लेना चाहता हूं। स्वामी जी ने उस युवक से पूछा कि तुम संन्यास क्यों लेना चाहते हो? उस युवक ने कहा कि इस दुनिया की विषमता, अन्याय और लोगों की दुख भरी जिंदगी को देखते हुए मैं काफी परेशान हो गया हूं।समाज में फैले ऊंच-नीच की भावना भी मुझे बहुत परेशान
करती है। इसलिए मैं संन्यास लेकर मुक्ति चाहता हूं। स्वामी ने पूछा कि तुम्हारे घर में कौन कौन है? उस युवक ने बताया कि उसके घर में केवल एक बूढ़ी मां है। उसके अलावा कोई नहीं है। स्वामी परमहंस ने कहा कि तुम संन्यास की आड़ लेकर पलायन कर रहे हो। संन्यास लेने पर तुम्हारा जीवन तो किसी न किसी तरह से बीत ही जाएगा। लेकिन तुम्हारी बूढ़ी मां का क्या होगा?
संन्यास लेने से अच्छा है कि तुम अपनी मां की अच्छी तरह से सेवा करो। मां की सेवा से बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है। मां भी ईश्वर का ही दूसरा रूप है। यह सुनकर युवक समझ गया कि स्वामी जी उसे क्या समझाना चाह रहे हैं। युवक ने घर लौटकर अपनी मां की खूब सेवा की।

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