अशोक मिश्र
केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने की स्वीकृति दे दी है। केंद्र सरकार के इस फैसले का विपक्षी दलों ने स्वागत किया है। जाति जनगणना कब होगी और इसका प्रारूप क्या होगा? इस बारे में विचार किया जाएगा। जाति जनगणना के बाद आने वाली रिपोर्ट को किस तरह लागू किया जाएगा? यह भी अभी अंधेरे में है। मोटे तौर पर यही कहा जा रहा है कि जिन जातियों की जैसी भागीदारी होगी, उसी हिसाब से उनके कार्यक्षेत्र में हिस्सेदारी दी जाएगी। लेकिन इस संबंध में एक आशंका है। जब सभी जातियों के लोगों की गिनती हो जाएगी, जातियों में भी उपजातियों का वर्गीकरण हो जाएगा, तो सभी जातियां अपनी संख्या के हिसाब से हिस्सेदारी मांगेंगी, उस समय क्या हालात होंगे? क्या ऐसी स्थिति में जातीयता का जहर और गाढ़ा नहीं हो जाएगा?
वैसे भी राजनीतिक दलों ने अपनी करनी से देश में जातीयता और धार्मिकता का जहर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसकी एक बानगी सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने पंजाब के एडिशनल सेशन जज प्रेम कुमार के मामले में सुनवाई के दौरान समाज के सामने पेश कर दी है। सुप्रीमकोर्ट ने जज प्रेम कुमार के मामले की सुनवाई करते हुए ओपन कोर्ट में कहा कि उपेक्षित समुदाय वाला अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर जज बना, तो ऊंचे समुदाय वालों से बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने षड्यंत्र रचकर उपेक्षित समुदाय के प्रेम कुमार की ईमानदारी को ही संदिग्ध करवा दिया और उन्हें बर्खास्त करवा दिया गया। दरअसल, सुप्रीमकोर्ट की यह टिप्पणी समाज के सामने एक सवाल बनकर खड़ी है कि जब समाज में सबसे सम्मानित और विश्वनीय पद पर बैठे प्रेम कुमार की ईमानदारी और निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उन्हें न्यायिक सिस्टम से हटाने की कोशिश की जा सकती है, ऐसी स्थिति में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को यह व्यवस्था कैसे न्याय दिला पाएगी? कैसे उन्हें उनकी भागीदारी के हिसाब से सिस्टम में समाहित किया जा सकेगा।
बता दें कि सेशन जज प्रेम कुमार के पिता मोची का काम करते थे और उनकी मां मजदूरी करके परिवार के भरण पोषण में सहायता करती थीं। समाज में मोची का काम करने वाले व्यक्ति को कितना सम्मान मिलता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। अपनी मेहनत, लगन और समाज में कुछ बनकर दिखाने की लालसा ने उन्हें जज बना दिया, लेकिन यह बात पढ़े-लिखे और ऊंचे समुदाय के लोगों को यह रास नहीं आया कि उपेक्षित समुदाय का व्यक्ति उनके बराबार बैठे, उनकी ही तरह सम्मान पाए। ऐसा हर तरह के न्यायालय में होता है, कार्यपालिका या विधायिका में होता है, यह नहीं कहा जा सकता है। कार्य जगत के हर क्षेत्र में ऐसी प्रवृत्ति के लोग मौजूद हैं, ऐसा कहना भी गलत होगा। अच्छे और बुरे लोग समाज के हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर समूह में मिल जाएंगे। कुछ लोगों के आचरण और व्यवहार के आधार पर सबको अच्छा या बुरा नहीं कहा जा सकता है।
लेकिन व्यावहारिक जीवन में जातीयता का दंभ गाहे-बगाहे दिख ही जाता है। कहीं कोई किसी आदिवासी के सिर पर पेशाब कर जाता है, तो कहीं निचली जाति के दूल्हे की बारात को अपने घर के सामने से पैदल जाने पर मजबूर कर दिया जाता है। समाज के सबसे निचले तबके की लड़कियों के साथ छेड़खानी, दुराचार करने वाला ऊंचे समुदाय का व्यक्ति खुलेआम घूमता है और कई बार दंड से भी बच जाता है।
सच तो यह है कि हम अभी जातीय उच्चता की भावना से मुक्त नहीं हो पाए हैं। शहरों में भले ही उच्चता की भावना कम दिखाई देती हो, लेकिन गांवों में यह भावना अक्सर लड़ाई झगड़ों के दौरान दिखाई दे जाती है। यह भी सही है कि कानून के भय ने लोगों को समान व्यवहार करने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन दिल में यह भावना कहीं न कहीं दबी रह गई है जो समय-समय पर सामने आ ही जाती है। ऐसी स्थिति में जाति जनगणना के क्या परिणाम होंगे, कह पाना मुश्किल है।
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