अशोक मिश्र
सेव अरावली जैसी संस्थाओं ने अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए सराहनीय कार्य किया है। इस संस्था ने अब फरीदाबाद पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर अरावली क्षेत्र के शांत और संवेदनशील वन क्षेत्र में वीकेंड पर स्टंट करने और मॉडिफाइड बाइकों से तेज आवाज करने वाले राइडर्स ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनकी यह मांग जायज भी है। इन बाइक राइडर्स की वजह से अरावली क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। अरावली पर्वत श्रृंखला जो लगभग 150 करोड़ वर्ष पुरानी है, गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक फैली हुई है।यह पाँच राज्यों के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करती है। थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकना, मानसून को थामना, भूजल स्तर को बनाए रखना और दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र के लिए फेफड़ों का काम करना, ये सभी कार्य अरावली करती है। लेकिन आज जो व्यवस्था पूरे उत्तर-पश्चिम भारत को प्रदूषण से बचा रही थी, वही खुद वायु प्रदूषण, धूल, अवैध खनन, कचरा डंपिंग और सबसे नया खतरा ध्वनि प्रदूषण का शिकार बन रही है। खनन, अतिक्रमण, शहरीकरण और बढ़ते मानवीय दबाव के अलावा हाल के वर्षों में सप्ताहांत पर आने वाले ग्रुप बाइकर्स का शोर-शराबा भी इसके संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है।
ट्रस्ट का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर से बड़ी संख्या में आने वाले ये बाइकर्स लगातार हॉर्न बजाते, मॉडिफाइड साइलेंसर से तेज आवाज निकालते और अत्यधिक गति से दौड़ते हुए वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास में ध्वनि प्रदूषण, व्यवधान, भय और तनाव पैदा करते हैं। आसपास के गांवों में भी बुजुर्गों और ग्रामीणों को इससे परेशानी होती है तथा सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। वन्य जीवों पर इस तरह के शोर का प्रभाव बहुआयामी होता है। जानवर शोर को खतरे के संकेत के रूप में ग्रहण करते हैं। वे पहले सतर्क होते हैं, फिर स्थिति का आकलन करते हैं और अंतत: भाग खड़े होते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण से वन्य जीवों में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता घटती है, हृदय गति बिगड़ती है और वे अपना प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी वाले इलाकों की ओर भागने लगते हैं। आवागमन बढ़ने से सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती है, जिससे धूल उड़ती है, मिट्टी का कटाव होता है, वनस्पति नष्ट होती है और वन्य जीव गलियारे खंडित हो जाते हैं। सेव अरावली जैसी संस्थाओं की मांगें इस दिशा में दबाव बना रही हैं कि सामान्य यातायात नियमों से आगे बढ़कर पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाए जाएं।
बढ़ते आवागमन और शोर से होने वाले सूक्ष्म लेकिन दीर्घकालिक नुकसान को भी गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है, ताकि यह पर्वतमाला न केवल मानव आबादी बल्कि वन्य जीवों के लिए भी सुरक्षित बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा तथा संतुलित पर्यावरण उपलब्ध कराया सके।
No comments:
Post a Comment