अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध के ही जीवनकाल में एक राजा था। वह बहुत ही दयालु और प्रजापालक था। उसकी महारानी भी अपने महाराज के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी। लेकिन इस राज दंपति को एक ही कष्ट था। उनका पुत्र बहुत ही क्रूर और उदंड था। वह अपनी मनमानी हरकतों से पूरी प्रजा को परेशान किए रहता था। राजा ने उसे बहुत सुधारने की कोशिश की।महारानी भी अपने पुत्र को समय समय पर सुधारने का प्रयत्न करती रहती थी। राज्य की प्रजा को अपने राजा और महारानी से बहुत प्रेम था, लेकिन वह राजकुमार से घृणा करती थी। राज्य की जनता में राजकुमार के प्रति विरोध बढ़ता जा रहा था। किसी तरह यह बात महात्मा बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने राजकुमार को सुधारने का फैसला किया। वह उस राजा के राज्य में पहुंचे।
महात्मा बुद्ध ने राज कुमार को अपने पास बुलाने की अपेक्षा खुद उसके पास पहुंचे। राजा-रानी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया। मौका देखकर बुद्ध ने राज कुमार बातचीत करते हुए टहलने लगे। वह टहलते-टहलते एक नीम के पौधे के पास पहुंचे और राज कुमार से कहा कि तुम इस पेड़ के पत्ते को देखो तो कैसा है? राज कुमार ने नीम का एक पत्ता तोड़कर मुंह में डाला। चबाते ही उसने क्रोध में आकर उस पौधे को जड़ से उखाड़ डाला।
महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस पौधे क्यों उखाड़ डाला? राज कुमार ने कहा कि जब यह पौधा है, तो इतना कड़वा है। बड़ा होगा, तो यह विष की तरह कड़वा होगा। महात्मा बुद्ध ने कहा कि यदि तुम्हारे व्यवहार से क्रुद्ध होकर जनता भी वैसा व्यवहार करे, जैसा तुमने नीम के साथ किया है, तो क्या होगा? यह सुनकर राज कुमार अवाक रह गया। उसकी समझ में आ गया था कि महात्मा बुद्ध उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसी दिन से राजकुमार बदल गया।
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