अशोक मिश्रहरियाणा की खेती हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और आज भी यह देश में रासायनिक आदानों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में से एक है। सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार फसल की जरूरत, मिट्टी परीक्षण और फसल चक्र के आधार पर ही खाद और कीटनाशक का उपयोग होना चाहिए, जिसमें संतुलित एनपीके लगभग 150 से 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। पंजाब के बाद हरियाणा देश में सर्वाधिक कीटनाशक उपयोग करने वाला राज्य बन गया है।
2000 से 2021 के बीच तकनीकी ग्रेड कीटनाशकों की वार्षिक खपत 4000 से 5025 टन के बीच स्थिर रूप से ऊंची रही है। इस अत्यधिक उपयोग का फसल और मिट्टी पर सीधा प्रभाव दिखता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधा बढ़ता तो तेजी से है पर जड़ें कमजोर होती हैं, फसल कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है और किसान फिर और कीटनाशक डालता है, यह एक दुष्चक्र बन जाता है। मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है, सूक्ष्म जीव मरते हैं, जलधारण क्षमता कम होती है और जमीन सख्त हो जाती है।
इससे पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से दाने का भराव और पोषण गुणवत्ता दोनों गिरते हैं। अधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का मानव शरीर पर प्रभाव दो तरीकों से होता है, प्रत्यक्ष छिड़काव के दौरान और अप्रत्यक्ष भोजन, पानी और दूध के जरिये। हरियाणा में किए गए अध्ययन में केवल दो से चार प्रतिशत किसान ही मास्क, दस्ताने और जूते जैसे सुरक्षात्मक कपड़े पहनते हैं, इसलिए त्वचा और सांस के जरिये अवशोषण आम है। जब ये अवशेष लंबे समय तक शरीर में जाते हैं तो वे अंत:स्रावी तंत्र को बाधित करते हैं यानी हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों के रूप में काम करते हैं।
हरियाणा और पंजाब दोनों में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग को कैंसर के मामलों का प्रमुख कारण माना गया है, जिसे पंजाब की कुख्यात कैंसर ट्रेन के उदाहरण से समझा जाता है जो रोगियों को लेकर जाती है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने भी हरियाणा और पंजाब में कैंसर वृद्धि को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जोड़ा है। अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जुड़े रोगों की सूची लंबी है।
सरकारी स्वास्थ्य निगरानी में कैंसर के अलावा बांझपन, प्रजनन संबंधी विकार, गुर्दे की विफलता, तंत्रिका तंत्र के विकार, सांस की पुरानी बीमारियां, त्वचा रोग, दृष्टि दोष और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं बार-बार सामने आई हैं। एक ग्रामीण स्वास्थ्य अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कीटनाशक विभिन्न पुराने रोगों जैसे कैंसर, बांझपन, गुर्दे की विफलता, प्रजनन समस्याओं और तंत्रिका विकारों से जुड़े हैं।
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