Saturday, September 26, 2026

जो चलता ही नहीं, वह थकेगा कैसे?

बोधिवृक्ष़

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध आत्म ज्ञान प्राप्त करने में छह साल लगे। बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह सिद्धार्थ से बुद्ध कहे जाने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। कहते हैं कि जब उन्होंने अपना पहले उपदेश दिया था, तो उस समय केवल पांच शिष्य ही उपस्थित थे। 

इसके बाद तो मानो तथागत को एक तरह का जुनून सवार हो गया। वह चल पड़े पूरे भारतवर्ष को आत्म ज्ञान देने। वह चलते ही रहते थे। जहां रात हो गई, वहीं रुक गए। भिक्षा मांगकर खा लिया। किसी से भिक्षा नहीं मिली, तो भूखे रहकर रात गुजार ली। बस एक ही जुनून सवार था कि सबको आत्म ज्ञान देकर सबको मुक्ति दिलानी है। महात्मा बुद्ध का परम शिष्य आनंद भी उनके साथ गांव-गांव, शहर-शहर डोल रहा था। 

एक दिन उसने महात्मा बुद्ध से कहा कि जब से आपको ज्ञान प्राप्त हुआ है, आप सतत चलते ही रहते हैं। आप इससे थके या उकताए हुए नहीं प्रतीत होते हैं। आप रुकते भी नहीं हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि आपको थोड़ा विश्राम करना चाहिए? अपने शिष्य की बात सुनकर बुद्ध ने कहा कि जो चलेगा, वही थकेगा। जो चलेगा ही नहीं, वह थकेगा कैसे? बुद्ध का यह उत्तर सुनकर आनंद चकरा गया। 

उसने कहा कि मैंने आपको नित्य अपनी आंखों से चलते देखा है। यह सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद तुमने जिसको चलते हुए देखा है, वह शरीर है। बाहर से यह चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर की आत्मा तो स्थिर है। जब आत्मा चली ही नहीं तो थकेगी कैसे? शरीर तो आत्मा की छाया है। छाया के चलने से कोई थकता है क्या? बुद्ध की बात सुनकर आनंद समझ गया कि भंते  उसे क्या समझाना चाहते हैं।

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