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Monday, September 28, 2026

नशे के खिलाफ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन में दौड़े लोग

अशोक मिश्र

आज फरीदाबाद में नशा मुक्ति के संदेश के साथ हुई हाफ मैराथन महज एक दौड़ नहीं थी, वह एक सामाजिक घोषणा थी। यह उस सामाजिक बुराई के खिलाफ घोषणा है जिसने हमारे प्रदेश के युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों को अपनी गिरफ्त में सदियों से जकड़ रखा है। सूरजकुंड मेला ग्राउंड से शुरू हुई इस नशा-मुक्त हरियाणा फरीदाबाद नमो मैराथन-2026 में 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर और 21 किलोमीटर की तीन श्रेणियां रखी गई थीं और आयोजकों के अनुसार जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि एक साथ 1.35 लाख से अधिक लोगों ने दौड़ लगाई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी रविवार की सुबह सूरजकुंड पहुंचे और ‘ड्रग-फ्री हरियाणा’ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन-2026 को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 

इस दौरान भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन ने लोगों का उत्साह बढ़ाया। सच यह है कि कोई भी मैराथन सीधे किसी के हाथ से नशे की पुड़िया नहीं छीनती। इसका प्रभाव तत्काल और मापने योग्य नहीं होता। कितने लोगों ने इस दौड़ के बाद नशा छोड़ा, इसका कोई रजिस्टर नहीं बनता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह निरर्थक है। नशा एक अकेलेपन की बीमारी है, जो अंधेरे में पनपती है। जब सवा लाख लोग सुबह-सुबह सड़क पर एक साथ दौड़ते हैं, भारत माता की जय के जयघोष के साथ, तो वह अंधेरा टूटता है। युवा देखता है कि ऊर्जा का विकल्प भी है। दौड़, पसीना, समूह का उत्साह, यह सब नशे के विरुद्ध एक सकारात्मक नशा है। 

यह जागरूकता की पहली सीढ़ी है, अंतिम इलाज नहीं। ऐसी प्रतियोगिताओं का औचित्य इसी प्रतीकात्मक शक्ति में है कि राज्य यह कहना चाह रहा है कि हम लड़ रहे हैं और तुम अकेले नहीं हो। हरियाणा में 18 हजार 847 नशा पीड़ित हैं। यह तो केवल दर्ज आंकड़ा है। जमीन पर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। पंजाब से सटे होने के कारण ड्रग रूट, बेरोजगारी का दबाव, जिम और बॉडी बनाने के भ्रम में स्टेरॉयड और फिर नशे की ओर फिसलन और तेजी से बढ़ता शहरी अकेलापन, यह सब मिलकर हरियाणा को एक नए तरह के संकट में डाल रहा है। 

नशा मुक्ति अभियान को सफल बनाना है तो उसे दौड़ से आगे ले जाना होगा। इसे शर्म से निकालकर बीमारी के रूप में देखना सिखाना होगा। जैसे बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही नशे के लिए भी डॉक्टर के पास जाना होगा। इसके लिए हर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गोपनीय काउंसलिंग हो। स्कूलों में उत्तर रटाने के बजाय सवाल पूछने की आदत और जीवन कौशल सिखाना होगा, तनाव से कैसे निपटें, ना कैसे कहें। 

प्रयोगशालाओं को मंदिरों के बराबर सम्मान देना होगा। जब तक बच्चा यह नहीं देखेगा कि वैज्ञानिक सोच से भी जीवन सुधरता है, तब तक वह चमत्कारिक समाधान की ओर ही भागेगा। फरीदाबाद की यह दौड़ एक अच्छी शुरुआत है, पर दौड़ना ही काफी नहीं है, टिके रहना भी सीखना होगा।