Tuesday, September 29, 2026

सड़क हादसों का कारण बन रहे लावारिस पशु, जिम्मेदार कौन?

अशोक मिश्र

पलवल में 24 सितंबर की रात दो सांडों की लड़ाई से बचने के प्रयास में डिपो संचालक सुनील पांडेय की मौत हो गई। अभी लोग डिपो संचालक की मौत को भूल भी नहीं पाए थे कि ठीक दो दिन बाद 26 सितंबर को अमरपुर गांव के पास मोहना-अमरपुर मार्ग पर हुई दूसरी घटना ने हरियाणा की सड़कों पर लावारिस पशुओं के खतरे को फिर से सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। चांदहट थाना क्षेत्र में शनिवार शाम लावारिस पशु को बचाने के प्रयास में बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पेड़ से टकरा गई। 

इस हादसे में बाइक सवार राजवीर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि हरकेश ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। ये दोनों घटनाएं अलग-अलग लगती हैं, लेकिन इनका मूल कारण एक ही है, सड़क पर बेसहारा गोवंश की मौजूदगी और उनका अनियंत्रित व्यवहार। हरियाणा में यह समस्या अब रोज की हकीकत बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में हर महीने औसतन 10 लोग ऐसे हादसों में जान गंवा देते हैं। पिछले पांच महीनों में ही फरीदाबाद सहित पूरे प्रदेश में 17 लोगों की मौत लावारिस पशुओं के कारण हुए हादसों में हो चुकी है। 

ऐसी घटनाओं के लिए किसी एक व्यक्ति या निकाय को दोषी नहीं माना जा सकता है। सबसे पहली जिम्मेदारी तो उन पशुपालकों की है जो दूध देना बंद करने पर गाय को लावारिस छोड़ देते हैं। नंदी को तो पैदा होने के कुछ ही दिनों बाद खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद नंबर आता है स्थानीय निकायों और पंचायतों का जिनके पास लावारिस पशुओं को पकड़ने की जिम्मेदारी है। 

यह संस्थाएं कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही करती हैं। पांच महीने में पूरे प्रदेश में पशु को सड़क पर छोड़ने वालों से केवल 62,600 रुपये जुर्माना वसूला गया है। यह आंकड़ा स्थानीय निकायों और पंचायतों की कारगुजारी का सबसे बेहतरीन प्रमाण है। लोगों में दंड का डर जैसे रह ही नहीं गया है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जो दशकों से इस समस्या को अस्थायी समाधान करके अब तक टालती आ रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कई बार कहा है कि प्रदेश में बेसहारा गोवंश सड़कों पर नजर नहीं आना चाहिए, लेकिन सड़कों पर स्थिति जस की तस है। 

व्यवस्था से जुड़े लोग सीएम को भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। राज्य में होने वाले इन हादसों को रोका जा सकता है। लेकिन केवल नारे लगाने या एक-दो हफ्ते अभियान चलाने से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले तो पशु की पहचान और मालिक की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी है। टैगिंग का विचार एकदम सही दिशा में है, लेकिन जब तक हर पशु की टैगिंग और आधार-लिंक्ड डाटाबेस नहीं बनता और जुर्माना वसूली वाकई सख्त नहीं होती, लोग पशु छोड़ते रहेंगे। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। केवल दान से काम चलने वाला नहीं है।

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