अशोक मिश्र
गौतम बुद्ध ने जब भिक्षुक संघ का गठन किया, तो यह नियम बनाया कि हर भिक्षुक अपने भोजन के लिए भिक्षा मांगेगा। कुछ ग्रंथों में तो यह भी कहा गया है कि बौद्ध भिक्षु केवल एक ही घर से भिक्षा मांगेगा और जो कुछ उसे उस घर से मिलेगा, उसी पर उसे उस दिन गुजारा करना पड़ेगा।अपने लिए भिक्षा मांगने के नियम से केवल बीमार और बहुत ज्यादा बुजुर्ग भिक्षु को ही छूट मिलती थी। गौतम बुद्ध अपने लिए नियम से भिक्षा मांगने जाया करते थे। संघ में रहने वाले भिक्षुओं को खाने-पीने के लिए एक बर्तन और पहनने के लिए दो वस्त्र ही मिलते थे। वस्त्र पुराना या फट जाने पर उसे फेंका नहीं जाता था, बल्कि यदि उसको दूसरे काम में उपयोग किया जाता था। वस्त्र तभी फेंका जाता था, जब वह किसी काम का नहीं रह जाता था।
एक बार की बात है। गौतम बुद्ध काशी में उपदेश देने के लिए पहुंचे थे। नियम के अनुसार गौतम बुद्ध भिक्षा मांगने निकले। वह पहुंच गए काशी के एक संपन्न किसान के दरवाजे पर। उन्होंने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। किसान घर से बाहर निकला और उसने कहा, मैं खेती पर दिन रात परिश्रम करता हूं। बीज बोता हूं। फसल की रखवाली करता हूं, तब जाकर मुझे खाने के लिए अनाज मिलता है। आप बिना खेती किए अनाज पाना चाहते हैं।
बुद्ध ने कहा कि मैं आत्मा की खेती करता हूं। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूं। उस फसल को तपस्या के जल से सींचता हूं। विनय मेरे हल की नोक, विचार शीलता फल है। मैं अमरता की खेती करता हूं, जहां न दुख है, न संताप। यह सुनकर किसान समझ गया कि उसके सामने युग प्रवर्तक महात्मा बुद्ध खड़े हैं। उसने गौतम को प्रणाम किया और भिक्षा लाकर दी।
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