भारत दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन आयातक न बनकर यदि हिसार जैसे हब से युवाओं को निर्माण और ट्रेनिंग देगा तो लागत घटेगी, मेंटेनेंस लोकल होगा और युवाओं का पलायन रुकेगा। केंद्र की उदार ड्रोन नीति, पीएलआई योजना और हरियाणा की औद्योगिक जमीन, गुरुग्राम-मानेसर का इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरिडोर इस सपने को व्यावहारिक बनाते हैं। हिसार के सिसाय में देश के पहले और दक्षिण एशिया के सबसे बड़े ड्रोन प्रशिक्षण संस्थान और ड्रोन विनिर्माण यूनिट का ई-शुभारंभ हो चुका है, जहाँ अब तक 252 ड्रोन पायलट तथा 136 ड्रोन तकनीशियन तैयार किये जा चुके हैं।
युवाओं के लिए इसका लाभ बहुस्तरीय है। दृश्या जैसी सरकारी कंपनी विभिन्न विभागों के उम्मीदवारों को ड्रोन पायलट ट्रेनिंग दे रही है। ड्रोन दीदी योजना के तहत पांच हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है ही, साथ ही हरियाणा ड्रोन उद्यमी योजना के तहत अनुसूचित जाति वर्ग के 18 से 45 वर्ष के 500 युवाओं को बिल्कुल मुफ्त ड्रोन पायलट ट्रेनिंग, डीजीसीए सर्टिफिकेशन और ड्रोन खरीदने के लिए रियायती ऋण की सुविधा दी जा रही है। फसल निगरानी, कीटनाशक छिड़काव, स्वास्थ्य सेवाओं में दवा पहुंचाना, ट्रैफिक मॉनिटरिंग, आपदा प्रबंधन में राहत सामग्री गिराना और शादी-समारोह की फोटोग्राफी से लेकर घर की छत की लीकेज जांच तक ड्रोन आम जीवन में प्रवेश कर रहा है।
कृषि क्षेत्र में ड्रोन का उपयोग सबसे अधिक व्यावहारिक है। हरियाणा कृषि विभाग ने एग्रीशक्ति नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत एक लाख एकड़ जमीन पर ड्रोन से एग्रोकेमिकल छिड़काव का लक्ष्य रखा है। परंपरागत स्प्रे में मजदूर को एक एकड़ में घंटों लगते हैं और जहर का असर शरीर पर पड़ता है, ड्रोन 10 मिनट में एक एकड़ कर देता है, 70 प्रतिशत पानी बचता है।
निजी जीवन में ड्रोन का सीधा उपयोग कम है, पर अप्रत्यक्ष उपयोग बढ़ा है। जैसे-जैसे ड्रोन की लागत घटेगी और सर्विस मॉडल मजबूत होगा, आम किसान और आम नागरिक भी इसे मोबाइल की तरह किराये पर ले सकेगा, तभी हरियाणा का ड्रोन कैपिटल का सपना खेत और घर दोनों तक पहुंचेगा।
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