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Friday, March 20, 2026

कायर को कभी नहीं मिलती सफलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आयरलैंड के प्रसिद्ध नाटककार और उपन्यासकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ को अपना जीवन अत्यंत गरीबी में बिताना पड़ा। उनका जन्म 26 जुलाई 1858 को डबलिन में हुआ था। वैसे वह एक कुलीन परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन पिता जार्ज कैर शॉ के अव्यावहारिक जीवन और शराब में डूबे रहने की वजह से गरीबी में जीवन बिताने को अभिशप्त थे। 

उनकी मां लुसिंडा एलिजाबेथ गर्ली शॉ अपनी दो बेटियों को साथ लेकर अपने पति को छोड़कर लंदन चली गई थीं। बर्नार्ड शॉ की प्रारंभिक शिक्षा कुछ ही साल हुई थी। इसके बाद उन्होंने जीवनयापन के लिए कई प्रकार के काम करने पड़े। सोलह साल की उम्र से शुरू हुआ संघर्ष का दौर तब खत्म हुआ जब 1912 में उनके नाटक पिग्मेलियन को खूब प्रशंसा मिली। 

शुरुआती दौर में बर्नार्ड शॉ बातचीत करने से घबराते थे। स्वभाव से संकोची और हीनभावना से ग्रसित बर्नार्ड शॉ को इससे छुटकारा पाने के लिए डिबेटिंग सोसाइटी ज्वाइन की और भाषण देने की कला सीखने लगे। अंतत: यह कला काम आई। उन्होंने अपनी हीन भावना पर विजय पाई। इसका नतीजा यह हुआ कि जिस लेखन को पहले लोगों ने अस्वीकार कर दिया था, चर्चित होने पर वही लोग उनके नाटकों और उपन्यासों को पढ़ने के लिए लालायित रहने लगे। 

सन 1925 में उन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला। शॉ ने यह नियम बना रखा था कि वह प्रतिदिन पांच पेज लिखा करेंगे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष तक लेखन किया। वह अकसर कहा करते थे कि यदि सच्चे दिल से प्रयास किया जाए और मन में दृढ़ निश्चय हो, तो जीवन में सफलता मिलनी अनिवार्य है। कायर व्यक्ति को कभी सफलता नहीं मिलती है।