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Thursday, March 26, 2026

हमेशा लोगों के साथ प्रेमभाव से रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंजाब के गुजरांवाला जिले में पैदा हुए स्वामी रामतीर्थ ने अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बिताया था। इनका बचपन का नाम तीर्थराम था, लेकिन संन्यास ग्रहण करने के बाद रामतीर्थ कर दिया गया था। हालांकि इनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था, लेकिन जब संन्यास ग्रहण किया, तो परिवार का त्याग कर दिया। संन्यासी बनने से पहले वह एक स्नातक कालेज में शिक्षक थे। 

1891 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में सर्वोच्च अंक हासिल किया था। एक दिन जब वह अपने क्लास में बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि कुछ छात्र आपस में लड़ रहे हैं। उन छात्रों का आपस में लड़ना, उन्हें पसंद नहीं आया। वह सोचने लगे कि उनके छात्र आपस में वैरभाव रखते हैं। जबकि वह चाहते थे कि लोग आपस में प्रेमभाव से रहें, एक दूसरे की मदद करें। 

पहले तो उन्होंने सोचा कि इन छात्रों को समझाया जाए, लेकिन उस दिन उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन जब वह क्लास में पहुंचे, तो उन्होंने ब्लैक बोर्ड पर एक लाइन खींच दी। उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि इसे छोटा करके दिखाओ। एक छात्र ने डस्टर लिया और उस लाइन को थोड़ा मिटाने लगा। इस पर रामतीर्थ ने रोकते हुए कहा कि इसे छोटा नहीं करना है। 

तब कई छात्रों ने कहा कि यदि इसे मिटाया नहीं गया, तो इसे छोटा करना संभव नहीं है। तब स्वामी रामतीर्थ ने उस लाइन के नीचे एक लंबी रेखा खींच दी और बोले, हो गई न छोटी। तब उन्होंने समझाया कि किसी की उपलब्धि पर ईर्ष्या करने से बेहतर है, उससे भी बढ़कर काम किया जाए। अपने काम से किसी उपलब्धि की रेखा को छोटी कर दो। बिना लड़े आगे बढ़ने का यही तरीका है। छात्रों की समझ में अब बात आ गई थी।  उन्होंने भविष्य में आपस में न लड़ने का संकल्प लिया।