Tuesday, December 23, 2025

शार्गिद ने जीवन भर उस्ताद का कहा माना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अलाउद्दीन खान का जन्म 1862 ईस्वी में बंगाल (अब बांग्लादेश) के ब्राह्मणबारिया जिले के शिवपुर में हुआ था। मैहर घराने की नींव रखने वाले विश्व प्रसिद्ध सरोदवादक उस्ताद अलाउद्दीन खान को बीसवीं सदी का सबसे महान संगीतकार माना जाता है। उन्होंने कई नए रागों की रचना की थी। एक साधारण मुस्लिम बंगाली परिवार में जन्म लेने वाले अलाउद्दीन खान पंडित रवि शंकर, निखिल बनर्जी, पन्नालाल घोष, वसंत राय, बहादुर राय आदि सफल संगीतकारों के गुरु भी रहे। 

अलाउद्दीन खान ने अपने जीवन में कई गुरुओं से संगीत की शिक्षा ली। उन्होंने कड़ी मेहनत के बाद मशहूर वीणावादक रामपुर के वजीर खाँ से भी संगीत के गुर सीखे। कहा जाता है कि जब अलाउद्दीन वजीर खां को अपना गुरु बनाने पहुंचे, तो पहले उन्होंने मना कर दिया। वह वजीर खां को कई दिनों तक मनाते रहे, लेकिन आखिर में वे वजीर खां की बग्घी के नीचे लेट गए और कहा कि आप मुझे अपना शार्गिद बना लीजिए। नहीं तो मुझ पर अपनी बग्घी चढ़ा दीजिए। 

वजीर खां मान गए। उन्होंने वीणा सिखाना शुरू किया। कठोर साधना की बदौलत अलाउद्दीन ने सरोद पर असाधारण पकड़ बना ली। एक दिन उस्ताद वजीर खां को लगा कि उनका शिष्य उनके वंशजों से आगे न निकल जाए। पंद्रह साल बाद जब वह विदा होने लगे, तोवजीर खां ने कहा कि अलाउद्दीन कभी सीधे हाथ से सरोद न बजाना। शार्गिद ने जीवन भर उस्ताद के वचन की लाज रखी। 

अलाउद्दीन सरोद ही नहीं, बहुत सारे वाद्य यंत्र बजाने में माहिर थे। भारत सरकार ने 1958 में अलाउद्दीन खां को पद्म भूषण सम्मान दिया। इसके अलावा और भी पुरस्कार से वह नवाजे गए।

सूरजकुंड मेले में दिखेगी भारतीय संस्कृति और शिल्पकला की झलक



अशोक मिश्र

मेला लगाने की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। सदियों से देश के हर गांव और शहर में कोस-दो कोस पर लगने वाले मेले भारतीय संस्कृति के आदान-प्रदान के स्रोत हुआ करते थे। ये मेले लोगों के आपस में मिलने और एक दूसरे का हालचाल जानने का जरिया भी हुआ करता था। गांव और शहर के लोग इन मेलों में अपने दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं की खरीदारी करते थे और मेले में आने वाले अपने रिश्तेदारों से इसी बहाने मुलाकात भी कर लिया करते थे। दूसरे रिश्तेदारों का हालचाल भी उन्हें मालूम हो जाता था। लेकिन जैसे-जैसे आवागमन के साधन बढ़े, नगरीय सभ्यता का प्रभाव गांवों तक पहुंचा, मेलों का आयोजन खत्म होने लगा। 

एक तरह से मेलों की प्रासंगिकता खत्म होने लगी। लेकिन हरियाणा में हस्तशिल्प, धार्मिक और सांस्कृतिक मेलों की परंपरा किसी न किसी रूप में अभी तक विद्यमान है। आगामी 31 जनवरी से 15 फरवरी तक फरीदाबाद के सूरज कुंड पर लगने वाले अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले की तैयारियां इन दिनों बड़े जोरशोर से हो रही हैं। सूरज कुंड मेले में विदेश और देश के विभिन्न राज्यों के कलाकार, संस्कृति कर्मी, शिल्पकार और नागरिक शामिल होंगे। हर बार मेले की एक थीम हुआ करती है। इस बार भी मेले में पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति प्रेम, स्वच्छता अभियान, राष्ट्र प्रेम, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, जल संरक्षण जैसे सरोकार पर आधारित रंगोली तथा चित्रकला प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। 

देशभक्ति और कला-संस्कृति से जुड़ी गायन और नृत्य प्रतियोगिताएं भी होंगी। जिला शिक्षा विभाग के सहयोग से मेला परिसर स्थित नाट्यशाला में विद्यार्थियों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं होंगी। इस दौरान होने वाली विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिदिन अलग-अलग स्कूलों के 300 से अधिक बच्चों को प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया जाएगा। हरियाणा पर्यटन निगम का उद्देश्य है कि बच्चों को प्रतिभा प्रदर्शन के साथ ही सामाजिक सरोकार से भी जोड़ा जाए। बच्चों की प्रस्तुति से मेले में आने वाले पर्यटकों तक भी सामाजिक सरोकार का संदेश जाएगा। मेले में भाग लेने के लिए देश-विदेश से कलाकारों और शिल्पकारों को आमंत्रित किया गया है। 

यह कलाकार और शिल्पकार अपनी अनूठी कला, संस्कृति और परंपराओं का सूरजकुंड मेले में आए लोगों के सामने प्रदर्शन करेंगे। यहां आने वाले शिल्पकार आदि और आम नागरिक एक दूसरे की कला, संस्कृति और परंपराओं से परिचित होंगे। यहां विभिन्न देशों की वेशभूषा, लोककला आदि प्रदर्शित की जाएगी। सचमुच, हर साल आयोजित होने वाला यह मेला सूरजकुंड की ऐतिहासिकता को भी प्रकट करती है। वैसे तो सूरजकुंड का इतिहास दसवीं शताब्दी से जुड़ा है। तोमर वंश के शासक  सूरजपाल ने इस कुंड का निर्माण करवाया था।

स्वेटर बुनती औरतें और उधड़ते जीवन के रहस्य

संजय मग्गू

जिंदगी भी किसी सधे हुए हाथों से बुने हुए स्वेटर जैसी होती है। एक भी फंदा गलत हुआ, पूरे जीवन की सलाइयां उधेड़नी पड़ती हैं। लेकिन आज जिस तरह स्वेटर हाथों से नहीं मशीनों से बुना जाता है, उसी तरह हमारी तेज भागती जिंदगी में हाथों की जगह मशीनों ने ले ली है। आज से तकरीबन दो-ढ़ाई दशक पहले जैसे ही हल्की ठंडक पड़ने लगती थी, लगभग सभी घरों में ऊन के गोले, सलाइयां बाहर निकल आती थी। कहीं कोई पुराना स्वेटर उधेड़कर गोले बना रहा है, तो कोई ऊन का रंग फीका पड़ जाने की वजह से उसी रंग का घोल तैयार कर रहा है, ताकि ऊन को रंगकर नया जैसा बनाया जा सके। 

दादी, नानी, चाची, बुआ, भाभी अपना घर का काम निबटाने के बाद घर के आंगन में, घर के दरवाजे पर या छत पर बैठी स्वेटर बुन रही होती थीं। कहां फंदा घटाना है, कहां फंदा बढ़ाना है, सब कुछ पहले से ही तय है जिंदगी की तरह। छत, आंगन या घर के दरवाजे पर बैठी महिलाएं एक लय में स्वेटर बुनती जाती थीं और फिर खोल बैठती थीं यादों का पिटारा। एक से बढ़कर एक किस्से। रोचक, चटपटे और कभी-कभी गमगीन कर देने वाले किस्से। यदि ननद-भावज हों, तो एक दूसरे से चुटकी भी लेती चलती हैं। हास-परिहास के साथ-साथ अंगुलियां चलती रहती हैं। अंगुलियों को जैसे पता है, उन्हें कितने फंदे के बाद का फंदा घटा देना है। कई बार तो मन के ऐसे-ऐसे राज खुलते थे स्वेटर की बुनाई के दौरान जिसको महिला ने अपने अंतरमन में बहुत गहरे दबाकर रखा था। स्वेटर बुनती महिलाएं कभी खिलखिलाती थीं, तो कभी उदास हो जाती थीं। 

पीड़ा भरी कहानियां या घटनाएं उनकी संवेदना को झकझोर देती थीं, आंखों में अश्रु की बूंदे आ जाती थीं। आत्मीयता की गांठ बांधकर बड़े से बड़ा रहस्य अपने अंदर दफन कर लेती थीं स्वेटर बुनने वाली महिलाएं। मजाल है कि यह राज किसी के सामने खुल जाए। वैसे तो स्वेटरों की डिजाइन सबका अपना-अपना होता था जीवन की तरह। लेकिन बुनने का तरीका सबका एक जैसा। स्वेटर में डाला गया हर एक फंदा प्रेम, आत्मीयता और स्नेह का फंदा होता था। एकदम मजबूत। स्वेटर तैयार होने पर जो खुशी मिलती थी, वह आज बाजार से स्वेटर खरीदकर लाने पर नहीं मिलती है। हाथ से बुने गए स्वेटर में जो अपनापन, प्रेम और समर्पण की गर्माहट होती थी, वह आज की मशीनों से बुने हुए स्वेटर में कहां नसीब हो सकती है। 

यह अपनापन, संबंधों की गर्माहट ट्रांसफर भी होती रहती थी। अगर स्वेटर साल-दो साल बाद छोटा पड़ गया, तो फेंक नहीं दिया जाता था। जिसको आ जाए, उसको दे दिया जाता था। यदि किसी काम का नहीं भी रह गया, तो उसे उधेड़कर किसी बच्चे का कनटोप, मफलर या दस्ताना बुन लिया जाता था। मितव्ययता तो जैसे इन महिलाओं को घुट्टी में पिला दी जाती थी। मशीन से बुना स्वेटर कटने, फटने या छोटा हो जाने के बाद किसी काम का नहीं। फेंकने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है।

Monday, December 22, 2025

रेगिस्तानी लोमड़ी के नाम से विख्यात थे रोमेल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जर्मनी के सेनापति जोहान्स इरविन यूजेन रोमेल को उनके विरोधी रेगिस्तानी लोमड़ी कहकर पुकारते थे। रोमेल का जन्म 15 नवंबर 1891 में हेइडेनहाइम में हुआ था। वह दूसरे विश्वयुद्ध के समय जर्मनी के सेनापति बनाए गए थे। वह अपने दुश्मनों में भी नफरतरहित बातचीत के लिए विख्यात थे। रोमेल 1910 में जर्मन सेना में शामिल हुए और प्रथम विश्वयुद्ध में वीरता के लिए आयरन क्रॉस प्राप्त किया; उन्होंने युद्ध की नई रणनीतियाँ सीखीं और एक कुशल प्रशिक्षक बने। 

कहा जाता है कि वह जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर के काफी नजदीकी थे। लेकिन उनके नाजीवादी विचारधारा और दुश्मनों की हत्या के विरोधी थे। उन्होंने कई युद्धों में जर्मनी की सेना को विजय दिलाई थी। दूसरे विश्वयुद्ध की बात है। वह उन दिनों जर्मनी की सेना लेकर अफ्रीका में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे। काफी दिनों से युद्ध चलने की वजह से उनके तोपखाने में गोला बारूद खत्म हो गया था। 

अंग्रेजी सेना जर्मन की सेना पर हमला करने के लिए आगे बढ़ती चली आ रही थी। तभी उनके पास सेनाधिकारी दौड़ता हुआ आया और सच्चाई बताई। यह भी बताया कि अंग्रेजी सेना नजदीक आती जा रही है। रोमेल ने कहा कि घबड़ाने से काम नहीं चलेगा। तोपों में बारूद की जगह धूल भरकर अंग्रेजों पर फेंको। वायुसेना से कहो कि अंग्रेजों की सेना के ऊपर उड़ान भरते रहें। 

तोपों से धूल उड़ने  लगी तो अंग्रेजों को लगा कि जर्मनी बहुत बड़ी फौज बढ़ती चली आ रही है। उनके हौसले टूट गए और वह युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। हिटलर की हत्या की साजिश में फंसने के बाद उन्होंने साइनाइड की गोली खाकर 14 अक्टूबर 1944 को आत्महत्या कर ली।

अरावली पर्वत शृंखलाओं को बचाने के लिए होना होगा एकजुट

 


अशोक मिश्र

देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला है अरावली। सुप्रीमकोर्ट के हालिया फैसले ने पर्यावरणविदों और आम जनता को चिंता में डाल दिया है। सुप्रीमकोर्ट ने कुछ समय पहले लिए गए फैसले में कहा है कि अरावली पर्वतमाला के सौ मीटर से कम ऊंचाई वाले हिस्से को वन के रूप में पारिभाषित नहीं किया जा सकता है। लोगों का मानना है कि कोर्ट के इस फैसले से वन और खनन माफिया को अरावली के वन क्षेत्र को बर्बाद करने का मौका मिल जाएगा।

अगर सौ मीटर वाले फैसले के आधार पर देखा जाए तो हरियाणा में अरावली की पहाड़ियां दो ही जगहों पर सौ मीटर से ज्यादा ऊंची हैं। पहली भिवानी जिले में तोसाम और दूसरी महेंद्रगढ़ जिले में मधेपुरा। इसका मतलब यही है कि हरियाणा का बाकी क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा। लोगों का मानना है कि अगर इस फैसले को वापस नहीं लिया गया, तो निकट भविष्य में पूरे प्रदेश की जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। सौ मीटर से ज्यादा ऊंचे इन दोनों जगहों की चोटियों को छोड़कर बाकी हिस्सा असंरक्षित हो जाएगा जिसका फायदा खनन और वन माफियाओं को होगा। 

यही वजह है कि गुरुग्राम में कल अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर मंडरा रहे संभावित खतरे को देखते हुए ‘अरावली बचाओ सिटिजन मूवमेंट’ के आह्वान पर डेढ़ सौ से अधिक लोगों ने कई घंटों तक प्रदर्शन किया। इन लोगों ने दूसरे लोगों को भी इस मूवमेंट से जुड़ने की अपील की ताकि राज्य सरकार और सुप्रीमकोर्ट तक इस बात को पहुंचाई जा सके। अरावली को बचाने के लिए प्रयासरत लोगों का कहना था कि यदि सुप्रीमकोर्ट ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, तो पूरे उत्तर भारत के लोगों को सांस लेने के लिए आक्सीजन प्रदान करने वाली अरावली पहाड़ियां बरबाद होकर रह जाएंगी। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। 

अरावली पर्वत शृंखलाएं वाटर रिचार्ज, बायो डायवर्सिटी और लाखों  लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन हैं। लोगों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि पूरे अरावली क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया जाए। वैसे भी पर्यावरणविद बहुत पहले से कहते आ रहे हैं कि यदि अरावली का संरक्षण नहीं किया गया, तो पूरे उत्तर भारत में गर्मी पड़ेगी। भूजल रिचार्ज नहीं हो पाएगा जिसकी वजह से लोगों का पलायन बढ़ेगा। 

जब पानी ही नहीं होगा, तो खेती से लेकर व्यावसायिक गतिविधियों पर बुरा प्रभाव पडेÞगा। ऐसी स्थिति में उनके पास पलायन के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचेगा। इससे उद्योगपतियों को तो फायदा होगा क्योंकि खनन होने से भवन निर्माण आदि की सामग्री आसानी से उपलब्ध होगी और वे उसे बेचकर अपना मुनाफा बढ़ा सकेंगे। लेकिन लोकहित में यही है कि अरावली पर्वत शृंखलाओं का संरक्षण किया जाए।

Sunday, December 21, 2025

मेहनत करो, बीमारी ठीक हो जाएगी

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। मेहनत नहीं करने से तमाम तरह के रोग पैदा हो जाते हैं। यही वजह है कि सदियों से हमारे देश में श्रम की महत्ता ग्रंथों में गाई गई है ताकि लोग श्रम करने से पीछे न रहें। इस बात को हमारे देश के ऋषि-मुनि बहुत पहले ही समझ गए थे। 

एक बार की बात है। किसी जगह पर एक व्यापारी रहता था। व्यापारी ने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी बहुत सुखी थी। उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी। वह सबके साथ मधुर व्यवहार करता था। लोग उसकी दयालु प्रवृत्ति की प्रशंसा भी करते थे। लेकिन कुछ साल बाद उसे एक समस्या होने लगी। उसे रात में नींद आनी बंद हो गई थी। 

नींद न आने की वजह से वह कुछ चिढ़चिढ़ा भी होता जा रहा था। यदि थोड़ी देर के लिए नींद आ भी जाती तो वह बुरे-बुरे सपने देखता था। उसने अपना इलाज भी बहुत कराया लेकिन फायदा नहीं हुआ। उन्हीं दिनों उसने सुना कि उसके शहर में एक संत आए हैं जिनके पास लोग समस्याएं लेकर जाते हैं और वह उसकी समस्याओं का हल बता देते हैं। एक दिन बड़ी हिम्मत करके व्यापारी भी संत के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई। 

संत ने छूटते ही कहा कि तुम जैसे अपंग के साथ ऐसा ही होता है। व्यापारी तिलमिलाकर बोला, मैं अपंग कैसे हूं? मेरे सारे अंग तो काम कर रहे हैं। संत ने कहा कि अपंग वह भी होता है, जो अपना काम खुद नहीं करता है। तुम तो मेहनत ही नहीं करते हो, तो नींद कैसे आएगी। जाओ, दिन में इतनी मेहनत जरूर करो कि तुम थककर चूर हो जाओ। व्यापारी ने ऐसा ही किया। अब वह थकने के बाद बिस्तर पहुंचता, तो उसे गहरी नींद आ जाती थी। ठीक होने पर व्यापारी संत के पास गया और उसको धन्यवाद दिया।

पाला पड़ने से पहले किसान करें फसलों को बचाने का उपाय


अशोक मिश्र

इन दिनों पूरे उत्तर भारत में कोहरा पड़ने लगा है। इस कोहरे के कारण जहां रात और सुबह सड़क हादसों की घटनाएं बढ़ गई हैं, वहीं कोहरे के चलते रबी की फसलों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है। आमतौर पर दिसंबर के आखिरी पखवाड़े से लेकर फरवरी के पहले पखवाड़े तक उत्तर भारत में जमकर पाला पड़ता है। रबी की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान कोहरे, स्मॉग और पाले से होता है। कोहरे और स्मॉग के मुकाबले में पाला ज्यादा नुकसानदायक होता है। इससे फसल के पौधों की पत्तियों और तनों पर ओस की बूंदें जमा हो जाती हैं। यह जमी हुई बूंदें पत्तियों और तनों की कोशिकाओं को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी वजह से पौधा मरने लगता है। पत्तियां पीली पड़कर झड़ जाती हैं। 

हरियाणा में भी पिछले चार-पांच दिनों से कोहरा छाने लगा है। इसकी वजह से सब्जियों, दलहनी और तिलहनी फसलों के पौधों को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है। आने वाले कुछ ही दिनों बाद प्रदेश में पाला गिरना भी शुरू हो सकता है। ऐसी अवस्था में यदि किसान पहले से ही पाले से फसलों की सुरक्षा के उपाय करें, तो होने वाले संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है। किसानों को चाहिए कि वह गंधक के तेजाब के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव फूल आने से पहले फसलों पर करें, तो लगभग एक पखवाड़े के लिए फसलों की सुरक्षा पाले से हो सकती है। 

इस छिड़काव के चलते पाले की बूंदें पत्तियों और तनों को नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं। जरूरत महसूस हो, तो किसान इसी प्रक्रिया को दो से तीन बार दोहरा सकते हैं। प्रदेश के किसान पाले और कोहरे को लेकर पहले से ही आशंकित हैं। पिछली फसल भी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के चलते काफी बरबाद हो गई थी। खेतों में पानी भर जाने की वजह से रबी फसलों की बुआई भी थोड़ी बहुत पिछड़ गई थी। ऐसी स्थिति में यदि पाला गिरता है, तो फसल को अधिक नुकसान होने की आशंका है। 

कुछ किसान यदि फूल आने से पहले पाले से फसलों को बचाने का उपाय नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें थायोयूरिया का छिड़काव तब करना चाहिए, जब आधी फसलों पर पुष्प आ गए हों। इससे नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी। इससे भी पहले किसानों को चाहिए, जब उन्हें पाला गिरने की आशंका हो, तो वह खेतों की हल्की सिंचाई कर दें। खेत में पानी या नमी होने पर फसलों पर पाले का असर बिल्कुल कम होगा। 

इससे फायदा यह होगा कि खेत का तापमान संतुलित रहेगा। इसके अलावा किसान बहुत मजबूरी में खेत के आसपास के कूड़ा-करकट को इकट्ठा करके जला सकते हैं। इससे धुंआ पैदा होगा और पत्तियों पर ओस की बूंदें जमा नहीं होंगी। हालांकि ऐसा करना कतई उचित नहीं होगा। धुंआ करने से प्रदूषण बढ़ेगा।

Saturday, December 20, 2025

पिता ने पुत्र को दिया यशस्वी होने का आशीर्वाद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विख्यात कवि और साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर को बंगाल में सांस्कृतिक नवजागरण का पुरोधा माना जाता है। वह बचपन से ही बैरिस्टर बनना चाहते थे। उनका नाम भी लंदन विश्वविद्यालय में लिखवाया गया था, लेकिन बाद में वह डिग्री लिए बिना ही भारत लौट आए थे। 

टैगोर के पिता काफी समृद्ध थे। टैगोर के भाई बहन सरकारी सेवा, साहित्य आदि क्षेत्रों में अपना नाम कमा रहे थे। उनकी मां का देहांत बचपन में ही हो गया था। रवींद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। उनका ज्यादातर समय घूमने-फिरने में ही लगा रहता था। देवेंद्रनाथ अपने बेटों की प्रतिभा के कायल थे। लेकिन उन्हें रवींद्रनाथ के प्रति कुछ ज्यादा ही स्नेह था। सन 1905 में उनके पिता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे, तो एक दिन शाम को उन्होंने अपने बेटे रवींद्रनाथ से कहा कि तुम कोई भक्ति गीत सुनाओ जिससे मन को शांति का अनुभव हो। 

पुत्र रवींद्रनाथ ने अपने पिता की आज्ञा मानी और एक कविता पेश की। उस कविता में आत्मा का मौन, ईश्वर की शांति और समर्पण जैसे तमाम भावनाएं व्यक्त की गई थीं। रवींद्रनाथ ने कई गीत सुनाए और इतने तन्मय होकर सुनाए कि उनके पिता की आंखों में आंसू आ गए। यह देखकर रवींद्रनाथ की भी आंखें नम हो गईं। वह जान गए कि पिता से उनके विछोह का समय नजदीक है। 

पिता ने अपने पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि आज तुमने इतना अच्छा गाया कि मन प्रफुल्लित हो गया। मैं तुमको ईनाम देना चाहता हूं। इतना कहकर उन्होंने रवींद्रनाथ को सौ रुपये का पुरस्कार दिया। उस समय सौ रुपये की बहुत बड़ी कीमत हुआ करती थी। पिता ने पुत्र को यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।

कानूनों का बेजा लाभ उठाने वाली महिलाओं को मिले कठोर सजा

अशोक मिश्र

दुष्कर्म किसी भी महिला के साथ किया गया सबसे जघन्य अपराध है। दुराचार का दंश उसे जीवन भर सालता रहता है। समाज भी उसी को दोषी मान बैठता है। हालांकि यह भी सही है कि समाज के बहुसंख्यक लोग पीड़िता को निर्दोष मानते हैं, लेकिन वह आरोपी के खिलाफ डटकर खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाते हैं। यदि ऐसा हो, तो कोई भी किसी भी महिला या बच्ची के साथ छेड़छाड़, दुराचार या उसको ब्लैकमेल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। हमारे देश में ऐसे मामलों में पीड़िता को न्याय दिलाने केलिए कई सख्त कानून बनाए गए हैं। न्यायपालिका भी पीड़िता से सहानुभूति रखते हुए भी सबूत और गवाहों के बयान की रोशनी में न्याय करती है। 

लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि महिलाएं सख्त कानून का बेजा फायदा उठाने की कोशिश करती हैं। वह दुराचार का आरोप लगाकर निर्दोष व्यक्ति को भी सलाखों के पीछे भिजवा देती हैं। कई साल मुकदमा चलने और आरोपी के जेल में रहने के बाद पता चलता है कि महिला ने झूठा आरोप लगाया था। आरोपी तो निर्दोष था। इस प्रक्रिया में निर्दोष व्यक्ति कुछ साल तक जेल की सजा भुगतता है और समाज में उसकी बदनामी होती है, वह अलग। 

ऐसे ही दो मामले फरीदाबाद में सामने आए हैं। फरीदाबाद के जवाहर कालोनी में रहने वाली एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए अपने दोस्त पर चालीस बार विभिन्न होटलों में ले जाकर दुराचार करने का आरोप लगाया। ढाई साल तक चले मुकदमे में आरोपी युवक को जेल में ही रहना पड़ा। अदालत में महिला अपने साथ हुए दुराचार को साबित नहीं कर पाई। अदालत ने भी 14 लोगों की गवाही सुनने के बाद पाया कि पूरा मामला बेबुनियाद और फर्जी है। यहां तक कि लड़की की मां ने कथित पीड़िता के खिलाफ बयान दिया। ऐसा ही एक दूसरा मामला भी सामने आया। 

एक महिला ने एक युवक पर नशीला पदार्थ खिलाकर कई बार दुष्कर्म करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। अदालत में जब मामला गया, तो महिला अपने बयान से मुकर गई। अदालत ने युवक को आरोपों से बरी कर दिया। इस तरह की घटनाएं साबित करती हैं कि कानून का फायदा उठाकर कुछ महिलाएं पुुरुषों को बेवजह जेल भिजवा देती हैं। नारियों की सुरक्षा और उनके सम्मान की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का फायदा उठाकर किसी निर्दोष को जेल भिजवाने वाली महिलाओं को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि कोई ऐसा करने का साहस न करे। 

जो वास्तव में पीड़िताएं हैं, उनको जल्दी से जल्दी न्याय मिले, इसके लिए जरूरी है कि अदालतों में इस तरह के झूठे मामले न पहुंचें। अदालत पर ऐसे झूठे मुकदमे एक बोझ की तरह हैं और वास्तविक पीड़िताओं को न्याय मिलने मे ंदेरी का कारण बनते हैं।

Friday, December 19, 2025

नाच लोक नाट्य कला के जनक भिखारी ठाकुर

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भिखारी ठाकुर को नाच लोक नाट्य कला का जनक माना जाता था। वह महिला पात्रों की भूमिकाएं पुरुषों से करवाते थे। 18 दिसंबर 1887 को बिहार के छपरा जिले के कुतुबपुर दियारा में जन्मे भिखारी ठाकुर के पूर्वज बाल काटने का पेशा करते थे। कहते हैं कि जब 1914 में अकाल पड़ा तो उन्हें मजबूरन अपना गांव छोड़कर पश्चिम बंगाल के खड़गपुर आना पड़ा। 

पहले से ही खड़गपुर में उनके चाचा और गांव के अन्य लोग रहते थे। थोड़ा घुमक्कड़ प्रवृत्ति का होने की वजह से वह कलकत्ता और पुरी भी गए। वहां उन्होंने सिनेमा, नौटंकी और रामलीला आदि देखने का अवसर मिला। नाट्यकला और काव्य रचना की प्रतिभा तो जैसे उनमें जन्मजात थी ही, बस एक अवसर की तलाश थी। नौटंकी और रामलीला आदि को देखने के बाद वह सोचने लगे कि यदि मैं इसमें अपना भाग्य आजमाऊं, तो शायद कुछ बात बन जाए। 

यही सोचकर वह अपने गांव लौट आए। गांव के लोगों ने जब यह सुना कि वह नौटंकी में काम करेंगे, तो  लोगों ने अपमानजनक शब्द कहे। भिखारी ठाकुर ने उनके अपमान जनक शब्दों को ही अपनी ताकत बना ली। वह गीत रचते, उन्हें लय में गुनगुनाते और जब मंच पर पहुंचते तो उसे एकदम जीवंत कर देते थे। उनके गीतों, नाटकों में दलित जातियों की व्यथा, स्त्री जाति के साथ होने वाले अन्याय का मुखर विरोध होता था। 

कहा जाता है कि गबरघीचोर की तुलना अक्सर बर्टोल्ट ब्रेख्त के नाटक द कॉकेशियन चॉक सर्कल से की जाती है। एक दिन वह भी आया जब भिखारी ठाकुर की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई। बिदेशिया, बेटी बेचवा, गबरघीचोर जैसी रचनाओं ने समाज को जागृत करने का काम किया।