Saturday, January 31, 2026

सीने पर तलवार लटकी हो तो नींद कैसे आएगी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया में मृत्यु ही शाश्वत सत्य है, लेकिन ज्यादातर लोग इस बात को भूल जाते हैं। धन, संपत्ति और वैभवशाली जीवन को ही वह जीवन की उपलब्धि मान बैठते हैं। वह इस बात को कतई ध्यान नहीं रखते हैं कि मृत्यु के बाद सारी संपदा और वैभव को यहीं छोड़कर जाना होगा। 

इस संबंध में एक बहुत ही रोचक कथा है। एक व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई। वह सोचने लगा कि वह किससे मिले जिससे उसकी जिज्ञासा का शमन हो। काफी सोचविचार करने के बाद वह एक गुरुकुल के आचार्य के पास पहुंचा और उसने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। आचार्य ने कुछ देर सोच विचार के बाद उसे राजा के पास भेज दिया। 

वह व्यक्ति राजा के पास पहुंचा। राजा उसे अपने साथ लेकर राजदरबार में पहुंचा, जहां नर्तकियां उत्तेजक नृत्य कर रही थीं। वह आदमी घबरा गया। उसने राजा से कहा कि वह ऐसे माहौल में क्या ज्ञान प्राप्त करेगा। वह तो यहां पर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने आया था। राजा ने उससे कहा कि तुम बस केवल एक दिन यहां रुक जाओ, कल यहां से चले जाना। 

राजा ने उस व्यक्ति की खूब आवभगत की। इसके बाद जब रात हुई, तो उस व्यक्ति को महल के ही एक कमरे में आलीशान मुलायम गद्दे पर सोने के लिए भेज दिया। वह व्यक्ति लेटकर कुछ सोच ही रहा था कि उसकी निगाह छत की ओर गई। एक भारी भरकम तलवार सूत से बंधी हुई लटक रही थी। उस व्यक्ति को रातभर नींद नहीं आई। 

उसे आशंका थी कि कहीं धागा टूट गया, तो तलवार उसके सीने में घुस जाएगी। सुबह राजा ने उससे पूछा कि नींद तो आई होगी? उस व्यक्ति ने कहा कि जब मौत सामने हो, तो नींद कैसे आ सकती है। राजा ने कहा कि मैं भी हमेशा याद रखता हूं कि मृत्यु ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या है।

जब भ्रूण लिंग जांच में लिप्त हों नेता, तो कैसे रुकेगी भ्रूण हत्या

अशोक मिश्र

सरकार और सरकारी मशीनरी अपनी पूरी ताकत से हरियाणा में लड़कियों की संख्या बढ़ाने का हरसंभव प्रयास कर रही है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने भ्रूण हत्या और लिंग जांच रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग को हर अधिकार प्रदान किए हैं। आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता, एएनएम और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अन्य महिला कर्मियों को कन्या भ्रूण हत्या और लिंग जांच को लेकर सतर्क रहने को कहा ताकि प्रदेश में लिंगानुपात को बढ़ाया जा सके। सरकारी प्रयास का ही नतीजा है कि पिछले दिनों हरियाणा में लिंगानुपात बढ़ा है। इसके बावजूद भ्रूण लिंग जांच करने वाले मान नहीं रहे हैं। 

हिसार में जजपा नेता डॉ. अनंतराम बरवाला को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने भ्रूण लिंग जांच करते हुए पकड़ा है। कितने अफसोस की बात है कि जिस नेता को कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए समाज को जागरूक करना चाहिए था, वही नेता ऐसे जघन्य अपराध में लिप्त पाया गया है। अनंतराम पर पहले भी पीएनडीटी एक्ट में सात बार मुकदमा दर्ज किया गया है। 

पुराने मामले में जमानत पर बाहर आने के बाद डॉ. अनंतराम फिर पुराने धंधे में शामिल हो गया था। ऐसे ही लोगों की वजह से प्रदेश में लिंगानुपात संतोषजनक नहीं होने पा रहा है। डॉ. अनंतराम जैसे लोगों की  पिछड़ी और लालची सोच की वजह से कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुक रही है। राज्य के हर जिले में अवैध रूप से खुले अस्पताल, क्लीनिक और भ्रूण की जांच करके लिंग बताने वाले समाज विरोधी डॉक्टर और उनके दलाल उठाते हैं। वह लिंग जांच करके कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप चंद पैसों की लालच में करते हैं। 

स्वास्थ्य विभाग, सीएम फ्लाइंग स्क्वाड और पुलिस के सहयोग से ऐसे तत्वों के खिलाफ अभियान चलते रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश में कन्याभ्रूण हत्याएं हो रही हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। कन्याभ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने सभी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया है। इसके लाभ भी अब सामने आने लगे हैं। बिना पंजीकरण वाली गर्भवती महिलाओं को सरकारी और ज्यादातर निजी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधा नहीं मिल रही है। 

हर गर्भवती महिला की देखरेख की जिम्मेदारी आशा कार्यकर्ता, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को देकर लिंगानुपात सुधारने की दिशा में नई पहल की गई है। लाडो सखी योजना से लिंगानुपात सुधरेगा, ऐसी आशा है। प्रदेश की सैनी सरकार काफी प्रयास कर रही है कि किसी भी तरह लड़के-लड़कियों के जन्म का अनुपात लगभग बराबर हो जाए ताकि समाज में पैदा होने वाले असंतुलन को ठीक किया जाए। 

इसके लिए प्रदेश सरकार हर गर्भवती महिला पर नजर रखने का प्रयास कर रही है ताकि उसका सुरक्षित प्रसव हो जाए और वह कन्याभू्रण हत्या भी न करवा सके।

Friday, January 30, 2026

एक की गलती केलिए पूरी क्लास सजा क्यों भुगते?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

केशव गंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षक, वकील और समाज सुधारक थे। उन्हें जनमानस लोकमान्य तिलक के नाम से पुकारता था। वह कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते थे। कांग्रेस में उन दिनों दो तरह की विचारधारा वाले नेता पाए जाते थे। 

तिलक गर्म दल के नेताओं में प्रमुख थे। सन 1916 में तिलक ने गरम दल के नेता के रूप में घोषणा की थी कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा। बात उन दिनों की है, जब वह स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक इतिहास पढ़ा रहे थे। सभी छात्र अपनी कापियां निकालकर नोट बनाते जा रहे थे। 

पढ़ाने के दौरान अध्यापक ने ध्यान दिया कि सभी छात्र तो नोट बना रहे हैं, लेकिन एक छात्र ने कापी तक नहीं निकाली है। नोट न बनाने वाले छात्र थे केशव गंगाधर तिलक। तिलक से अध्यापक ने पूछा कि तुम नोट क्यों नहीं कर रहे हो? तिलक ने जवाब दिया, जो आप पढ़ा रहे हैं, वह मुझे पहले से ही याद है। अध्यापक नाराज हो गया। उसने कहा कि यदि तुम मुझे नहीं सुना पाए, तो तुम्हें छड़ी से पीटूंगा। 

तिलक ने पूरा पाठ ज्यों का त्यों सुना दिया। अध्यापक चुप रह गए। तिलक को दंडित नहीं कर पाए। अगले दिन उस अध्यापक ने देखा कि सीट के पास मूंगफली के छिलके पड़े हुए हैं। बस फिर क्या था? बिना तहकीकात किए वह हर छात्र की पिटाई करने लगे। जब तिलक का नंबर आया, तो उन्होंने सजा स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि आप पहले पूछ लीजिए कि किसने छिलके बिखराए हैं। उसके बाद उसको सजा दीजिए। किसी एक की गलती के लिए पूरी क्लास सजा क्यों भुगते। बाद वाजिब थी। अध्यापक को चुप रह जाना पड़ा।

सुरक्षित और प्रदूषणरहित जीवन जीना है तो पेड़ पौधों की करनी होगी सुरक्षा


अशोक मिश्र

वृक्ष न केवल पर्यावरण को साफ सुथरा रखते हैं, वायु प्रदूषण को खत्म करते हैं, बल्कि पृथ्वी में जल संग्रहण में भी सहायक होते हैं। नदियों और नहरों के किनारे उगे पेड़ पौधे भूमि का कटाव भी बाढ़ के दिनों में रोकते हैं। वृक्ष मानव जीवन के लिए एक वरदान की तरह हैं, लेकिन इंसान इस वरदान को अभिशाप में बदलने की हठधर्मिता पाले हुए है। देश और विभिन्न प्रदेशों में अवैध पेड़-पौधों की कटान ने हमारी सांसों को कठिन कर दिया है। वायु प्रदूषण के चलते हर साल लगभग सत्रह लाख लोगों की मौत हो जाती है। हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या इन दिनों प्रदूषण ही है। 

पिछले कई दशक से दिल्ली एनसीआर के इलाके भीषण वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। ऐसी स्थिति में यदि सरकारी नियमों और अधिकारियों की लापरवाही के चलते वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचता है, तो इसे प्रदेशवासियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। चंडीगढ़ में सेक्टर छह में कामर्शियल क्षेत्र विकसित करने के लिए 12 हजार वृक्षों की बलि दी जाने वाली है। हालांकि इसका मामले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं। लेकिन मामले की जानकारी मिलने हाईकोर्ट ने काफी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि क्या आप लोग नहीं चाहते हैं कि आपके बेटे-बेटियां या पोते-पोतियां जीवित रहें। 

हाईकोर्ट ने तत्काल 12 हजार पेड़ों की कटान पर रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया है। दरअसल मामला यह है कि चंडीगढ़ के सेक्टर छह में 23 साल पहले कामर्शियल क्षेत्र विकसित करने के लिए सन 2002 में भूमि अधिग्रहण किया गया था। इतने साल बीतने के बाद भी सेक्टर छह में वाणिज्यिक क्षेत्र विकसित नहीं किया, तो प्राकृतिक रूप से वहां पर 12 हजार पेड़ उग आए। यह पेड़ करीब 21-22 साल पुराने और पूर्ण विकसित हैं। स्वाभाविक रूप से उगे इन पेड़ों को वन संरक्षण अधिनियम 1980 और हरियाणा सरकार की 18 अगस्त 2025 को जारी की गई अधिसूचना के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की वन क्षेत्र की परिभाषा के अंतर्गत भी आता है। 

इस वजह से इन पेड़ों को काटा नहीं जा सकता है। यही वजह है कि स्थानीय लोगो, पर्यावरणविद और प्रकृति प्रेमी वहां पेड़ों को काट करके वाणिज्यिक क्षेत्र विकसित करने का विरोध कर रहे हैं। वैसे भी केंद्र सरकार की अनुमति के बिना एक भी पेड़ काटा नहीं जा सकता है। सुप्रीमकोर्ट ने भी वन क्षेत्र की भूमिको व्यावसायिक क्षेत्र में बदलने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। 

अफसोस की बात यह है कि 19 जनवरी से यहां पर कटान जारी थी। वन माफिया ने अरावली क्षेत्र के पेड़ पौधों को काट करके खाली कर दिया है। अरावली के वन क्षेत्र को वन माफियाओं ने बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इसका खामियाजा प्रदूषण के रूप में दिल्ली-एनसीआर को भुगतना पड़ रहा है।

Thursday, January 29, 2026

आलसी का कभी भला नहीं हो सकता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करना नहीं जानता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता है। समय मुट्ठी से फिसलती रेत के समान होता है। धीरे-धीरे कब वह हाथ से फिसल जाता है, इसका आभास तक नहीं होता है। जब मुट्ठी खाली हो जाती है, तब जाकर एहसास होता है कि अरे, अब तो कुछ नहीं बचा है। एक आलसी की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। 

एक बार किसी गांव में एक साधु आया। उसकी काफी दिनों तक एक ऐसे युवक ने सेवा की, जो खुद बहुत आलसी था। लेकिन उसने साधु की सेवा बड़े मन से की थी, इसलिए साधु उसकी सेवा से प्रसन्न हो गया। उसने उसे पारस पत्थर देते हुए कहा कि इस पत्थर से सात दिनों तक लोहे को सोने में बदल सकते हो। सातवें दिन मैं आऊगा तब तुम्हें यह पारस पत्थर वापस करना होगा। 

यह सुनकर वह युवक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने घर में लोहे को खोजना शुरू किया। उसके यहां बहुत थोड़ा सा लोहा मिला जिसे उसने सोने में बदल दिया। अगले दिन वह बाजार लोहा खरीदने गया। लोहा बहुत महंगा था। उसने सोचा कि इतना महंगा लोहा खरीदने से बेहतर है कि वह थोड़े दिन रुक जाए, जब लोहा सस्ता हो जाएगा, तब वह लोहा खरीदेगा। तीन दिन बाद वह फिर बाजार पहुंचा। 

लोहे का दाम पहले की अपेक्षा कई गुना ज्यादा हो गया था। उसने सोचा कि कुछ दिन और इंतजार कर लेता है। यही सोचते-सोचते सातवां दिन आ पहुंचा। साधु उस पत्थर को लेने आ पहुंचा। युवक ने विनती की कि वह कुछ दिन और पत्थर उसके पास रहने दे, लेकिन साधु नहीं माना और पत्थर ले लिया। साधु ने कहा कि तुम आलसी आदमी हो। तुम्हारा भला नहीं हो सकता है। कोई दूसरा होता तो अब तक अपने घर में सोने का पहाड़ खड़ा कर लेता। तुम निरे आलसी हो।

बच्चे को पढ़ाइए, पहले मानसिक रूप से उसे तैयार तो होने दीजिए


अशोक मिश्र

पहली कक्षा में छह साल की आयु में ही प्रवेश देने के मामले में काफी सख्त हो गई है। जिन बच्चों की आयु छह साल से कम है, उन बच्चों को प्री-प्राइमरी में समायोजित करने का निर्देश सरकार जारी कर चुकी है। पिछले कुछ दशक से निजी स्कूलों ने डेढ़ या दो साल में ही बच्चों को प्रवेश देना शुरू कर दिया था। डेढ़ साल या दो साल के बच्चों को वह प्री नर्सरी या नर्सरी में एडमिशन दे देते थे। इससे इन स्कूलों को फायदा यह होता था कि उन्हें एडमिशन फीस के नाम पर एक मोटी रकम मिल जाती थी। 

हर महीने की फीस मिलती थी, वह अलग से। इतनी कम उम्र में बच्चे सीखने के नाम पर कुछ अक्षर या गिनतियां ही सीख पाते थे। माता-पिता भी निश्चिंत हो जाते थे कि उनका बच्चा स्कूल में कुछ न कुछ सीख रहा है। लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में वह कुछ सोचते ही नहीं थे। कुछ निजी स्कूलों में तो यह सब कुछ आज भी जारी है, लेकिन केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति ने सरकारी स्कूलों के लिए तय कर दिया है कि पहली कक्षा में प्रवेश के समय बच्चा छह साल की उम्र से कम नहीं होना चाहिए। 

कम उम्र में ही बच्चों को स्कूल भेजने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों के मस्तिष्क का विकास बाधित हो जाता है। वह मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। यही नहीं, वह शारीरिक रूप से कमजोर भी हो जाते हैं। सच कहा जाए, तो पांच-छह साल तक की उम्र बस खेलने कूदने और खाने-पीने की होती है। इतनी उम्र तक आते-आते बच्चों का मस्तिष्क आयु के हिसाब से परिपक्व हो चुुका होता है। वह सीखने के लायक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में जब कोई बच्चा सीखना शुरू करता है, तो वह कम उम्र में ही पढ़ाई शुरू कर देने वाले बच्चों की अपेक्षा जल्दी सीखता है। उसके सीखने की क्षमता काफी तेज होती है।

उसका मानसिक विकास भी जरूरत के मुताबिक हो चुका होता है। कुछ ही दिन पहले फरीदाबाद में ही एक पिता ने अपनी चार साल की बेटी को पचास तक गिनती न लिख पाने की वजह से पीट-पीटकर मार डाला था। चार साल की बच्ची को मानसिक दबाव देने ही गलत था। अगर वह बच्ची पचास तक गिनती नहीं लिख पाई थी, तो भी यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। इस उम्र के बच्चों में सीखने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन उसके पिता की अधीरता ने उसकी जान ले ली। 

दरअसल, शिक्षा का मतलब यही है कि भीतर की निहित शक्तियों को विकसित करना। अब कोई जरूरी तो नहीं है कि हर बच्चे की शक्तियां दो-तीन साल की उम्र से ही विकसित हो जाएं। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों को अपने शरीर और मस्तिष्क को विकसित होने का अवसर प्रदान किया जाए। राज्य सरकार ने तय किया है कियदि किसी निजी स्कूल ने भी इस मामले में नियमों का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

Wednesday, January 28, 2026

मूर्ख किसान! तू दिशाशूल की ओर जा रहा है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो व्यक्ति अपने कर्म पर विश्वास करता है, वह भाग्य के भरोसे नहीं रहता है। कर्मशील व्यक्ति के लिए हर दिन एक समान होते हैं। वह किसी भी दिन को बेहतर या खराब नहीं समझता था। महाराज वसुसेना को ज्योतिष पर बहुत ज्यादा भरोसा था। उनके राज ज्योतिषी ने उन्हें ज्योतिष के मामले में इतना ज्यादा उलझा दिया था कि वह हर काम में मुहूर्त और शुभ समय का ध्यान रखने लगे। 

जब उनका राज ज्योतिषी बताता कि महाराज, यह समझ अनुकूल नहीं है, तो वह उस समय में वह काम कतई नहीं करते थे। जब उनकी इस कमजोरी का पता पड़ोसी राज्य के राजाओं को चला तो वह ऐसे अवसर की फिराक में रहने लगे कि जब राजा राज्य में न हो या ज्योतिष के हिसाब से राजा के लिए अनुकूल न हो। एक दिन की बात है। राजा वसुसेना अपने राज ज्योतिषी के साथ नगर के बाहर निकले। 

राज ज्योतिषी ने देखा कि एक किसान अपने हल बैल के साथ खेत जोतने जा रहा था। राज ज्योतिषी ने अपना पांडित्य प्रदर्शन करने के लिए उस किसान से कहा, अरे मूर्ख! तू जिस दिशा में जा रहा है, उस  ओर आज दिशाशूल है। तेरा सर्वनाश हो जाएगा। उस किसान ने अपने बैलों को रोकने के बाद पसीना पोछते हुए कहा, पंडित जी, मैं रोज इसी दिशा में आता-जाता हूं। हो सकता है कि किसी दिन दिशाशूल हो। अगर ऐसा हो, तो मेरा अब तक सर्वनाश हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ। 

ज्योतिषी ने कहा कि अपने हाथ दिखा। किसान ने उल्टा हाथ उसके सामने कर दिया। ज्योतिषी ने कहा कि हाथ सीधे करो। किसान ने कहा कि मैंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। हाथ वह फैलाते हैं जो किसी से कुछ मांगते हैं। मेरे लिए तो साल का हर दिन पवित्र है। यह सुनकर राजा वसुसेना की आंख खुल गई। इसके बाद उनका समय लोगों की भलाई में बीतने लगा।

विकास के पथ पर उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा हरियाणा


अशोक मिश्र

हरियाणा धीरे-धीरे प्रगति के पथ पर अग्रसर है। हरियाणा उत्तरोत्तर विकास कर रहा है। यह विकास अब दिखाई भी देने लगा है। किसानों से लेकर निम्न आय वर्ग के लोगों की आय में बढ़ोतरी होने लगी है। विभिन्न सरकारी योजनाओं ने प्रदेश के कायाकल्प में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का कहना है कि  हरियाणा समृद्धि की नई परिभाषा लिख रहा है। 

वैसे यह बात सही है कि जब कोई राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, तो वह अपने राज्य की ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है। राज्यों की मजबूत अर्थव्यवस्थाएं ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती हैं। हरियाणा कहने को देश के कुल क्षेत्रफल का 1.34 प्रतिशत हिस्सा है और जनसंख्या के मामले में 2.09 प्रतिशत भागीदार है। लेकिन जहां बात आर्थिक भागीदारी की आती है, देश की जीडीपी में 3.7 प्रतिशत हिस्सेदारी हरियाणा की है। यह भागीदारी बताती है कि प्रदेश धीरे-धीरे समृद्धि की ओर बढ़ता जा रहा है। 

यही नहीं, हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 3.53 लाख रुपये है। हरियाणा जितनी प्रति व्यक्ति आय कई बड़े राज्यों की भी नहीं है। कई छोटे और बड़े राज्य इस मामले में कहीं ज्यादा पीछे हैं। हरियाणा प्रति व्यक्ति जीएसटी कलेक्शन के मामले में भी देश में पहले स्थान पर है। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। स्टेट ईज आफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में हरियाणा टाप अचीवर्स की श्रेणी में शामिल है। इन सारी उपलब्धियों के पीछे मातृशक्ति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। 

मातृशक्ति के सहयोग के बिना कोई भी देश या राज्य उन्नति नहीं कर सकता है। यह बात समझते हुए राज्य सरकार ने महिलाओं को स्वस्थ, सुरक्षित और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रखी हैं। प्रदेश की साढ़े छह लाख से अधिक महिलाओं को प्रतिमाह इक्कीस सौ रुपये मासिक प्रदान किया जा रहा है। गरीब महिलाओं को राहत प्रदान करने के लिए 15 लाख से अघिक परिवारों को पांच सौ रुपये में गैस सिलेंडर उपलब्ध कराया जा रहा है। पंचायती राज में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देकर उनकी आर्थिक और सामाजिक दशा को संवारा जा रहा है। 

इसके अतिरिक्त सुरक्षित हरियाणा की दिशा में कई तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। जिस राज्य की कानून व्यवस्था सुदृढ़ होती है, उस राज्य में पूंजी निवेश करने के लिए देशी-विदेशी पूंजीपति उत्सुक रहते हैं। इसके लिए हरियाणा पुलिस ने कई तरह के अभियान चलाकर अपराधियों, गैंगस्टरों और नशीले पदार्थ बेचने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। कई भगोड़े अपराधियों को भी सलाखों के पीछे डाला गया है। विदेश भाग गए अपराधियों को भी डिपोर्ट कराकर गिरफ्तार किया गया है।

Tuesday, January 27, 2026

कर्म के अनुसार तय होता है भाग्य


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध हमेशा अपने शिष्यों को कर्म की शिक्षा दिया करते थे। वह कहा करते थे कि कर्म ही सब कुछ है। जिसका कर्म मानव समाज के लिए लाभदायक होगा, उसी का जीवन सुखी रहेगा। वह शिक्षा देने के लिए सामान्य जीवन से ही प्रसंग लिया करते थे। एक बार की बात है। 

किसी गांव के बुजुर्ग की मौत हो गई। उसका पुत्र अपने पिता को अत्यंत प्यार करता था। उसने होश संभालने के बाद से ही अपने पिता का हर तरह से ख्याल रखा था। पिता की मौत से पुत्र अत्यंत व्यथित था। वह सोचा करता था कि उसके पिता की आत्मा स्वर्ग गई होगी या नरक। एक दिन उसने सुना कि उसके नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। वह महात्मा बुद्ध के पास जाकर बोला, भंते! क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि मेरे पिता की आत्मा स्वर्ग जाए। यदि कोई उपाय हो तो बताएं। 

महात्मा बुद्ध ने कुछ देर उस युवक की बात पर विचार किया। फिर बोले, ऐसा करो, कल तुम एक घड़े में पत्थर और दूसरे घड़े में घी लेकर नदी में जाना और दोनों घड़ों को फोड़ देना। जो परिमाण निकले, उसका आकर मुझे बताना। यह सुनकर वह व्यक्ति चला गया और उसने महात्मा बुद्ध ने जो कहा था, वैसा ही किया। यह सब कुछ करने के बाद वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा। 

महात्मा बुद्ध को उसने बताया कि जब मैंने पत्थर वाला घड़ा फोड़ा, तो सारे पत्थर नदी में बैठ गए। लेकिन घी का घड़ा फोड़ने पर सारा घी बह गया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि पत्थर बहने लगे और घी नदी के नीचे बैठ जाए। उस आदमी ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है। तब महात्मा बुद्ध ने कहा कि जिसने जैसा कर्म किया है, उसको उसी के हिसाब से स्वर्ग या नरक में भेजा जाएगा। इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर होने वाली बैठक से फिर जगी आस


अशोक मिश्र

पिछले लगभग पांच दशकों से सतलुज यमुना लिंक नहर का मुद्दा पंजाब और हरियाणा के बीच घड़ी के पेंडुलम की तरह लटका हुआ है। दोनों राज्य अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इस मामले में हरियाणा का पक्ष मजबूत और न्यायोचित दिखाई देता है। पंजाब से उसे उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए। पिछले 46 वर्षों से पंजाब हरियाणा के हिस्से का पानी दबाए हुए बैठा है और हरियाणा के हक जताने पर वह ऊलजुलूल तर्क देकर मामले को लटका देता है। 

सतलुज यमुना लिंक नहर नहीं बनने से अब तक लगभग बीस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। इतना ही नहीं, नहर नहीं बनने का सबसे ज्यादा असर दक्षिण हरियाणा की कृषि जमीनों का बंजर होने के रूप में दिखाई दे रहा है। यदि समय पर सतलुज यमुना लिंक नहर बन गई होती, तो प्रदेश की दस लाख एकड़ कृषि भूमि बंजर होने से बच जाती और इस इलाके में अनाज का उत्पादन भी बढ़ जाता। एक अनुमान के मुताबिक, हर साल सिंचाई पानी नहीं मिलने से 42  लाख टन खाद्यान्न का नुकसान हरियाणा को उठाना पड़ रहा है। इन सबके बावजूद एक नई आशा फिर जगी है सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर। 

आगामी 27 जनवरी को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में दोनों राज्यों के अधिकारियों की एक बैठक होने जा रही है। मुख्यमंत्री सैनी ने बैठक की तैयारियों को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक भी की है और सबको अपने तथ्यों को दुरुस्त रखने को कहा है। मंगलवार की सुबह चंडीगढ़ के हरियाणा हाउस में होने वाली बैठक में तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ जल की उपलब्धता, कानूनी स्थिति और संभावित आपसी सहमति को लेकर बातचीत हो सकती है। वैसे यह मामला सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है। 

पहले भी एसवाईएल के मामले में सुप्रीमकोर्ट पंजाब को कड़ी फटकार लगा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से कहा कि वह मनमानी कर रहा है। नहर बनाने का आदेश पारित होने के बाद अधिगृहीत जमीन को गैर-अधिसूचित कर देना, कहां तक जायज है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पंजाब हरियाणा को किसी भी हालत में पानी देने को तैयार नहीं है, जो कि हरियाणा का अधिकार है। मंगलवार को होने वाली बैठक में केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि मौजूद रहेगा या नहीं, इस बारे में कोई सूचना नहीं है। वर्ष 1981 में दोनों राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। 

इसके लिए सतलुज यमुना लिंक नहर बनाने का फैसला लिया गया था। हरियाणा ने अपने हिस्से की 92 किमी लंबी नहर भी बना ली थी, लेकिन पंजाब ने 122 किमी नहर निर्माण के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तब से यह मुद्दा दोनों राज्यों के बीच झूल रहा है।


Sunday, January 25, 2026

अत्याचार का हमेशा विरोध करें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अत्याचार करने से बड़ा गुनाह अत्याचार को सहन करना है। सच तो यह है कि जब हम अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहन करते हैं, तो इससे अत्याचार करने वाले का साहस बढ़ जाता है। वह और अत्याचार करने लगता है। यदि अत्याचार का विरोध किया जाए, तो अत्याचार करने वाला अपना साहस खो देता है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद रेल से कहीं जा रहे थे। 

वैसे भी स्वामी विवेकानंद बहुत ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रहते थे। पैदल, रेल या बस से वह यात्रा किया करते थे। वह पूरे भारत का भ्रमण करके देश की दशा को समझना चाहते थे। एक स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रुकी, तो दो अंग्रेज अफसर उस डिब्बे में चढ़े जिसमें स्वामी विवेकानंद बैठे हुए थे। वह दोनों अंग्रेज एक महिला के बगल में बैठ गए। उस महिला की गोद में बच्चा था। 

एक अंग्रेज कभी बच्चे का कान पकड़कर उमेठ देता,तो कभी उसके गाल पर चुटकी काट लेता। बच्चा रोने लगता। यह सब कुछ स्वामी विवेकानंद काफी देर से देख रहे थे। उन्हें गुस्सा आ रहा था। ट्रेन जब अगले स्टेशन पर रुकी, तो वह महिला चुपचाप उठकर दूसरे डिब्बे में बैठ गई। उन दिनों अंग्रेज भारतीय को बहुत परेशान किया करते थे। वह इस तरह की हरकतें किया करते थे। 

अब अंग्रेज अफसरों ने दूसरे लोगों को परेशान करना शुरू किया। तब स्वामी विवेकानंद उठे और उन अंग्रेज अफसरों के सामने खड़े हो गए। पहले तो उन्हें घूरा, फिर अपने कुर्ते की बांह ऊपर किया। फिर उन्हें अपनी सुगठित भुजाएं दिखाईं। यह देखकर अंग्रेज डर गए। वह चुपचाप बैठ गए और अगले स्टेशन पर वह दूसरे डिब्बे में बैठ गए। तब विवेकानंद ने कहा कि कभी अत्याचार को सहन नहीं करना चाहिए।

पचास तक गिनती न लिख पाने पर पिता ने बेटी को दी मौत की सजा

एआई तस्वीर

 अशोक मिश्र

पिता इतना क्रूर हो सकता है, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक पिता जो अपनी संतान का पालन-पोषण करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। पिता अपनी संतान के लिए कई बार चोरी करने पर भी मजूबर हो जाता है। कई बार वह खुद भूखा रहता है, उसके कपड़े फटे रहते हैं, लेकिन वह अपनी संतान को अच्छे से अच्छा खिलाने और अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनाने की कोशिश करता है। 

एक पिता अपने बेटे-बेटी को देश और समाज का सभ्य नागरिक बनाने का हरसंभव प्रयास करता है। लेकिन अफसोस है कि इस समाज में कुछ पिता ऐसे भी पाए जाते हैं, जो अपनी संतान को मौत के मुंह में ढकेल देते हैं। वह उनकी हत्या तक कर देते हैं और उन्हें कोई पश्चाताप नहीं होता है। फरीदाबाद के झाड़सेंतली गांव में किराये के मकान में रहने वाले एक पिता ने पीट-पीटकर केवल इसलिए मार डाला क्योंकि वह पचास तक गिनती नहीं लिख पाई थी। 

पिता ने अपनी चार साल की बेटी को पचास तक गिनती लिखने को कहा था। कई बार कहने के बाद भी वह सही गिनती नहीं लिख पाई। इससे क्रोधित पिता ने अपनी बेटी को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। बेटी को लेकर अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। पत्नी और डॉक्टर से उसने यही बताया कि बेटी सीढ़ियों से गिर गई थी, लेकिन जब पत्नी ने अपनी बेटी की पीठ पर चोट के निशान देखे, तो उसने पुलिस से शिकायत कर दी। तब जाकर मामले का खुलासा हुआ। 

दरअसल, लोग जब अपने बच्चे की उम्र और क्षमता का ध्यान न रखते हुए जरूरत के ज्यादा अपेक्षा कर लेते हैं, तब ऐसी घटनाएं घटित होती हैं। जिस बेटी को पिता ने पीट-पीटकर मार डाला, उस की आयु चार साल थी। चार साल की बच्ची अगर पचास तक गिनती नहीं लिख पाई,तो इसमें गलत क्या था? हर बच्चे की क्षमता अलग अलग होती है। बहुत सारे बच्चे तो ढाई-तीन साल में ही सौ तक गिनती लिख लेते हैं। यह उन बच्चों की क्षमता है, कोई बच्चा सात साल की उम्र में भी सौ तक गिनती नहीं लिख पाता, यह उस बच्चे की क्षमता है। 

जब हम अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने लगते हैं, तो वहीं गलत हो जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सभी बच्चों की क्षमता एक समान नहीं होती है। यही वजह है कि आज बच्चों में कुंठा और उग्रता बढ़ती जा रही है। जब उनके मां-बाप अपने बच्चे की तुलना दूसरों से करते हैं, उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं, ऐसी स्थिति में बच्चा मन ही मन घुटता रहता है, उसमें कुंठा पैदा हो जाती है। वह उग्र होने लगता है। कई बार बच्चे तो वह काम कर बैठते हैं जिसे देश और समाज अपराध मानता है। बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए बहुत संयम और शांति दिमाग की जरूरत होती है।

Saturday, January 24, 2026

जो जैसा होता है, उसको हर आदमी वैसा दिखता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोई भी व्यक्ति जैसा जीवन जीता है, उसके विचार भी वैसे ही होते हैं। यदि कोई व्यक्ति सादगी से रहता है, तो उसके विचार भी सादगीपूर्ण होंगे। विलासिता में जीवन बिताने वाले को सादगी भरा व्यवहार पसंद ही नहीं आएगा। इस बात को साबित करता है महाभारत का एक प्रसंग। कौरव और पांडवों के गुरु थे द्रोण। गुरु द्रोण अपने समय के सबसे बड़े अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता और धर्म प्रवीण थे। 

यही वजह है कि उन्होंने राजकुमारों को शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया गया था। गुरु द्रोण के सभी शिष्य मन लगाकर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शिक्षा देते हुए कई वर्ष बीत गए थे। एक बार गुरु द्रोण के मन में आया कि राजकुमारों की परीक्षा ली जाए कि उन्होंने मेरी शिक्षाओं को कितना ग्रहण किया है। उन्होंने सभी राजकुमारों को बुलाया और दुर्योधन से कहा कि तुम पूरी पृथ्वी में एक अच्छे आदमी को खोजकर लाओ। दुर्योधन चला गया। उसने अपने राज्य में सब जगह तलाशा लेकिन उसे कोई भी अच्छा आदमी नहीं मिला। 

कुछ दिनों बाद दुर्योधन ने लौटकर बताया कि उसने सब जगह खोज लिया, उसे कोई अच्छा आदमी नहीं मिला। तब द्रोण ने युधिष्ठिर को बुलाया और कहा कि तुम किसी एक बुरे आदमी को खोज लाओ। यह सुनकर युधिष्ठिर भी चले गए। काफी दिनों बाद वह भी खाली हाथ लौटकर आए। गुरु द्रोण के सामने सिर झुकाकर बोले, गुरुजी! मुझे कोई बुरा आदमी नहीं मिला। 

तब सभी शिष्यों ने पूछा कि गुरुजी! ऐसा कैसे हो सकता है कि दोनों को एक आदमी नहीं मिला। तब द्रोण ने कहा कि जो आदमी जैसा होता है, उसको पूरी दुनिया में हर आदमी वैसा ही दिखाई देता है। यही वजह है कि दोनों को एक आदमी नहीं मिला।

बजट में मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योगों पर ध्यान देन की जरूरत


अशोक मिश्र

हरियाणा में बजट सत्र की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर प्री बजट तैयारियां कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न जिलों में बैठकें करके आम जनता से बजट के लिए सुझाव मांगे हैं। इन बैठक में शामिल न होने वाले लोग भी 31 जनवरी तक अपने सुझाव सरकार को भेज सकते हैं। अगर सरकार को लोगों के सुझाव पसंद आए या जनहित में लगे, तो उन्हें बजट में शामिल किया जा सकता है। पिछले काफी दिनों से वह प्रदेश के उद्यमियों से कारोबार से जुड़ी समस्याओं को जानने का प्रयास कर रहे हैं। वह यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि किन प्रावधानों से उनको कारोबार में दिक्कत हो रही है? 

ऐसी कौन से व्यवस्था बनाई जाए जिससे उन्हें कारोबार करने में आसानी हो। उद्योगपति भी अपनी समस्याओं और सहूलियतों के बारे में बता रहे हैं। मुख्यमंत्री का विचार विमर्श केवल उद्योगपतियों तक ही सीमित नहीं है। वह किसानों, मजदूरों, महिलाओं और बच्चों तक से बजट के संबंध में राय लेने की कोशिश कर रहे हैं। वह जानना चाहते हैं कि पिछली बार जो बजट पेश किया गया था, उसमें कौन सी कमियां रह गई थीं। पिछले बजट में किए गए कौन-कौन से वायदे पूरे हुए और कौन से वायदे पूरे होने से रह गए। 

अगर रह गए, तो उनकी पीछे कारण क्या थे? यह सब कुछ जानने के बाद नया बजट बनाने में काफी सहूलियत होगी। अभी तक जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक सीएम सैनी इस बार का बजट हरियाणा विजन@2047 को समर्पित हो सकता है। बजट में किसान, उद्योगपति, छोटे कारोबारी, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, महिलाओं, विद्यार्थियों जैसे आमजन को समर्पित किया जा सकता है। प्री बजट के दौरान सीएम सैनी कई बार कह चुके हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी ने 2047 में भारत को विकसित बनाने का संकल्प लिया है। हम सभी इस दिशा में सामूहिक प्रयास करे और देश व हरियाणा को विकसित बनाने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि सरकार और उद्योग दो रास्ते नहीं बल्कि दो पहिए हैं, जो विकसित भारत और विकसित हरियाणा बनाने का सपना पूरा करेंगे। 

यह बात सही है कि हरियाणा में बड़े-बड़े उद्योगों की आवश्यकता है। यह उद्योग ही प्रदेश के लोगों की अर्थव्यवस्था को सुधार सकते हैं। प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। बड़े उद्योग लगने से जहां बेरोजगारी कम होगी, वहीं लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे उद्योग की भी बहुत आवश्यकता है। छोटे और मध्यम उद्योग जहां अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, वहीं रोजगार के अवसर सृजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बजट में अगर छोटे, लघु और मध्यम उद्योगों पर ध्यान दिया जाए, तो हरियाणा की वर्तमान तस्वीर बदल सकती है।

Friday, January 23, 2026

जिम हेंसन की रोती, हंसती, गाती कठपुतलियां


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यदि कल्पनाशील व्यक्ति चाहे, तो अपनी लगन, हिम्मत और कला के सहारे समाज में काफी बदलाव ला सकता है। आज की यह रंग-बिरंगी दुनिया कल्पनाओं का ही परिणाम है। कल्पना जब साकार होती है, तो वह बदलाव लाती है। मनोरंजन और टेलिविजन की दुनिया में ऐसा ही बदलाव लाए थे जिम हेंसन। जिम हेंसन का जन्म अमेरिका के मिसिसिपी में 24 सितंबर 1934 को हुआ था। 

वह सबसे अधिक प्रसिद्ध अमेरिकी कठपुतली कलाकार थे। उन्होंने कल्पना के सहारे अपने पात्रों को इतना जीवंत बना दिया कि लोग उसे एक पात्र की जगह अपना दोस्त मानने लगे थे। कहा जाता है कि जब वह बच्चे थे, तो वह सामान्य बच्चों की तरह खेलते कूदते नहीं थे। वह कपड़ों की कतरन, धागा, सुई लेकर कुछ न कुछ बनाते रहते थे। वह किसी तरह स्कूली शिक्षा पूरी करके कालेज पहुंचे, तो उन्होंने सैम एंड फ्रेंड्स नाम से छोटा सा कठपुतली शो बनाया। 

भारतीय कठपुतलियों की तरह हेंसन की कठपुतलियां भी रोती थीं, गाती थीं, हंसती थी और अपने भावों को व्यक्त करती थीं। भारत की कठपुतलियां ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों का अभिनय करती थीं, लेकिन अमेरिका में कठपुतलियां तब तक वर्तमान समय के हिसाब से ही बन रही थीं। अमेरिकी टीवी नेटवर्क्स ने उनके शो द मपेट शो को यह कहकर नकार दिया कि यह न बच्चों का शो है और न बड़ों का। 

इससे निराश होकर हेंसन ब्रिटेन आए और ब्रिटिश टीवी चैनल्स ने उन्हें हाथों हाथ लिया। इसके बाद इनका यह शो पूरी दुनिया में छा गया। अब अमेरिका वालों को उनके शो की अहमियत समझ में आई। अपने कठपुतली पात्रों से दुनियाभर में नाम कमाने वाले इस महान कलाकार की 16 मई 1990 में मौत हो गई।

कांग्रेस में अनुशासनहीनता पर लगाम लगाए बिना नहीं बनेगी बात

 


अशोक मिश्र

बुधवार को कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कुरुक्षेत्र आए। उनका कुरुक्षेत्र आने का मकसद उत्तराखंड और हरियाणा के जिला अध्यक्षों को प्रशिक्षण देना था। करीब सवा पांच घंटे कुरुक्षेत्र में रहे राहुल गांधी ने अपने अध्यक्षों को नसीहत देते हुए कहा कि किसी बड़े नेता की गणेश परिक्रमा करने से बेहतर है कि वह जनता के बीच जाएं। किसी बड़े नेता के आगे-पीछे घूमने से कोई बड़ा नेता नहीं बनता है। 

राहुल गांधी की यह बात सौ फीसदी सही है कि कोई भी नेता तब तक प्रभावशाली और लोकप्रिय नहीं होता है, जब तक उसके पीछे जनता नहीं खड़ी होती है। हमारे देश में जितने भी लोकप्रिय नेता रहे हैं, उनके पीछे अपार जनसमर्थन रहा है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक सभी को जन समर्थन हासिल था और है। नेता की पहचान जनता से होती है। 

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि उसके प्रदेश स्तर के नेताओं में एकता नहीं है। कांग्रेस में कई गुट देखने को मिल रहे हैं। जब कोई बड़ा नेता प्रदेश में आता है, तो सारे गुट अपने नेता को दिखाने के लिए एक होने का अभिनय करते हैं। उस नेता के प्रदेश से जाने के तुरंत बाद सब अपनी-अपनी ढफली और अपना अपना राज करने लगते हैं। हरियाणा कांग्रेस में कई गुट हैं और गुटबाजी के चलते अपनी ही पार्टी की छवि को बट्टा लगाते रहते हैं। कांग्रेस की आपसी कलह का फायदा दूसरे दल उठाते हैं। 

यही नहीं, विरोधी दल कांग्रेस की गुटबाजी को लेकर जनता में जब तंज कसते हैं तो हालात और खराब हो जाते हैं। राहुल गांधी को सबसे पहले तो इस गुटबाजी को जड़ से खत्म करना होगा। वैसे तो खुद राहुल गांधी ने कई बार यह चेतावनी दी है कि कांग्रेस में गुटबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। गुटबाजी को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, लेकिन यह कड़ी कार्रवाई होती कभी नहीं दिखी है। इसी ढुलमुल रवैये के चलते गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। 

कुरुक्षेत्र में राहुल गांधी ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक सकारात्मक पहल जरूर की है। उन्होंने प्रदेश के 27 जिला अध्यक्षों के साथ बातचीत जरूर की, लेकिन इन जिला अध्यक्षों के माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ भी बातचीत की। उनको कांग्रेस से जोड़ने और लोगों में एकजुटता पैदा करने के लिए सबको एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। राहुल गांधी से मिलने के बाद इन जिलाध्यक्षों के परिजनों ने आत्मीय जुड़ाव पार्टी के साथ महसूस किया होगा। 

यह सच है कि कांग्रेस हरियाणा में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन पिछले कई वर्षों से नेता और कार्यकर्ता आम जनता से कट गए हैं। जब कोई दल आम जनता से दूर हो जाता है, तो जनता भी उसे भुला देती है। कार्यकर्ता भी निराश होकर अपने घरों में बैठ जाते हैं।

Thursday, January 22, 2026

खुद घायल थे, लेकिन घायलों की सेवा की


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आज पूरी दुनिया परमाणु बमों के ढेर पर बैठी है। 9 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी में जो परमाणु बम गिराया गया था। उससे सैकड़ों गुना ज्यादा खतरनाक परमाणु बम दुनिया में बनाए जा चुके हैं। जापान के दोनों शहरों में हजारों लोग बम गिराए जाने के तुरंत बाद अपनी जान गंवा बैठे थे। कई लाख लोग रेडिएशन के शिकार हुए और काल के गाल में समा गए। 

कहते हैं कि इन दोनों शहरों में उस दिन सड़कों पर लोग तड़प रहे थे, अपनी जान गंवा रहे थे, लेकिन लोगों को बचाने के लिए आदमी ही नहीं थे। सब पीड़ित थे। कौन किसकी मदद करता। ऐसी स्थिति में भी एक पीड़ित ताकाशि नागाई आगे आए। वह खुद भी घायल थे। उनकी पत्नी का 9 अगस्त 1945 को ही निधन हुआ था। नागाई के शरीर में रेडिएशन फैल चुका था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 

वह नाकासाकी मेडिकल कालेज के रेडियोलाजिस्ट थे। उन्होंने लोगों का उपचार करना शुरू किया। वह लोगों से मिलते और उन्हें ढांढस बंधाते। इलाज के दौरान वह घायलों को साहस दिलाते और कहते थे कि सब ठीक हो जाएगा। घायल और अनाथ बच्चों की सेवा करने में उन्हें विशेष सुख मिलता था। हालांकि वह खुद बहुत पीड़ा में थे। उन्होंने हर उस आदमी के लिए कुछ न कुछ करने का प्रयास किया, जो दुखी था, पीड़ा में था। वह खुद एक झोपड़ी में रहते थे। 

अपना जो कुछ भी था, वह घायलों और रोगियों पर खर्च कर दिया था। उन्होंने परमाणु युद्ध की भयावहता को लेकर कई किताबें लिखीं। परमाणु युद्ध से होने वाले नुकसान के बारे में अपनी पुस्तकों में काफी विस्तार से बताया। रेडिएशन के चलते वह बहुत ज्यादा दिन जी नहीं सके। सन 1951 में उनका निधन हो गया।

गणतंत्र दिवस के मद्देनजर सतर्क हो गई पुलिस और खुफिया एजेंसियां


अशोक मिश्र

देश और विभिन्न राज्यों में गणतंत्र दिवस को धूमधाम और गरिमा के साथ मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि भारतीय संविधान को लागू करने के बाद हम पूर्ण गणतांत्रिक देश के रूप पूरी दुनिया के सामने आए थे। हमारा देश एक संप्रभु देश के रूप में सबके सामने आया था। 26 जनवरी 1950 को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के रूप देश के सभी नागरिकों को भेदभावरहित शासन देने की हमारे नेताओं ने शपथ ली थी। 

हर साल हमारे देश के नागरिक गणतंत्र दिवस को मनाकर उस शपथ को याद रखते हैं। अन्य राज्यों की तरह हरियाणा में भी गणतंत्र दिवस को धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाने की तैयारियां चल रही हैं। सरकार इस पुनीत कार्य में लगी हुई है। सरकारी दफ्तरों से लेकर राज्य के स्कूल कालेज तक सजाए जा रहे हैं, इस अवसर पर प्रस्तुत किए जाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियां की जा रही हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से देश में सक्रिय कुछ देश विरोधी संगठन इस पुनीत अवसर पर व्यवधान पैदा कर सकते हैं। 

आतंकी संगठन और उनसे जुड़े लोग देश और राज्य को नुकसान पहुंचाने की साजिश रच सकते हैं। इस बात को मद्देनजर रखते हुए खुफिया एजेंसियां और पुलिस सतर्क हो गई है। वह अभी से राज्य के चप्पे पर निगाह रखे हुए है। इसके बावजूद गणतंत्र दिवस के दिन किसी चूक की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। पंजाब पुलिस ने हरियाणा के जींद जिले के सफीदों से कुलदीप उर्फ कालू को गिरफ्तार किया है। कुलदीप के बारे मे पंजाब पुलिस को हाल ही लुधियाना में गिरफ्तार किए गए दो खालिस्तानी आतंकियों से पूछताछ के बाद जानकारी मिली। उन्होंने तत्काल हरियाणा पुलिस से सम्पर्क साधा और कुलदीप को गिरफ्तार कर लिया गया। 

दिल्ली बम ब्लास्ट मामला सामने आने के बाद उत्तर भारत के राज्यों की पुलिस ने सक्रिय होकर आतंकी नेटवर्क की कमरतोड़ दी है। फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी के कई प्रोफसरों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यही लोग दिल्ली बम ब्लास्ट मामले के मुख्य आरोपी थे। इन लोगों का इरादा भारी तबाही मचाकर लोगों को आतंकित करना था। मामला सामने के बाद राज्य सरकार सतर्कहो गई है। गणतंत्र दिवस को लेकर भी पुलिस और राज्य की खुफिया विभाग ने संदिग्ध लोगों पर निगाह रखनी शुरू कर दी है। 

राज्य के नागरिकों का भी यह कर्तव्य है कि वह अगर कहीं कुछ असामान्य लगे या दिखे, तो वह चुपचाप पुलिस को सूचित करें। अगर उन्हें कोई व्यक्ति संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त दिखाई देता है, तो उसकी भी जानकारी वह नजदीकी पुलिस चौकी या किसी भी पुलिस कर्मी को दें ताकि किसी तरह के हादसे को रोका जा सके। यदि लोग थोड़े जागरूक हो जाएं, तो आंतकियों के मनसूबों को विफल किया जा सकता है।

Wednesday, January 21, 2026

व्यापारी की चारों बहुओं में होने लगा झगड़ा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जहां आपसी प्रेम होता है, वहां सुख-समृद्धि अपने आ जाती है। कलह की वजह से परिवार बिखर जाते हैं। वहीं प्रेम बिखरे परिवार को भी जोड़कर एक कर देता है। किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसने जीवन भर कठिन मेहनत करके काफी संपत्ति जोड़ ली थी। 

वह नगर का सबसे बड़ा व्यापारी था। वह लोगों से बहुत अच्छे से बात करता था। समय पड़ने पर लोगों की छोटी-मोटी सहायता भी किया करता था। उसके चार बेटे थे। जब यह बेटे जवान हो गए, तो सेठ ने अपने चारों बेटों का विवाह करा दिया। बेटों का विवाह करने के बाद कुछ दिनों तक सभी बड़े प्रेम से रहे, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद बहुओं में झगड़ा होने लगा। घर की कलह धीरे-धीरे बढ़ती गई। चारों बहुएं एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहती थीं। 

पारिवारिक कलह से सेठ भी परेशान रहने लगा। एक दिन जब वह रात को सो रहा था कि उसने सपने में देखा कि एक सुंदर स्त्री उसके घर से जा रही है। उसने पूछा कि तुम कौन हो? उस स्त्री ने जवाब दिया कि मैं लक्ष्मी हूं। अब तुम्हारे घर में नहीं रह सकती हूं क्योंकि जहां कलह और आपसी ईर्ष्या द्वेष होता है, वहां मैं नहीं रहती हूं। लेकिन तुम अच्छे और गुणवान व्यक्ति हो, मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुम एक वरदान मांग सकते हो। 

व्यापारी ने कहा कि मुझे यही वरदान दीजिए कि मेरे परिवार के सारे लोग मिलजुलकर रहें। तथास्तु कहकर लक्ष्मी उसके घर से चली गईं। कुछ दिन बाद उसने देखा कि लक्ष्मी दोबारा उसके घर में प्रवेश कर रही हैं। नगर सेठ ने जब उनसे लौटने का कारण पूछा, तो लक्ष्मी ने कहा कि अब जब सब लोग मिलकर रहने लगे हैं, तो मैं फिर से लौट आई हूं। जहां लोग प्रेम से रहते हैं, लक्ष्मी वहीं रहती है।

गरीबों के लिए लाभकारी आयुष्मान योजना से किया जा रहा खिलवाड़

अशोक मिश्र

मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब उनके यहां कोई बीमार पड़ जाता है। बीमारी गरीबों और मध्यम आय वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा परेशान करती है। इससे उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह गड़बड़ा जाती है। बीमारी के समय किसी तरह की लापरवाही भी नहीं की जा सकता है। यदि आदमी के पास कोई बचत नहीं होती है, तो वह दूसरों से कर्ज लेकर भी अपना या परिजनों का इलाज कराता है। 

लोगों की इन्हीं दिक्कतों को समझते हुए केंद्र सरकार ने आयुष्मान योजना की शुरुआत की थी। हरियाणा सरकार ने उस योजना को आयुष्मान चिरायु योजना का नाम देकर गरीबों को इलाज कराने की सुविधा प्रदान की है। आयुष्मान चिरायु योजना राज्य के सभी लाभार्थी परिवारों को पांच लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कवर देती है, जिसमें परिवार की आय सीमा बढ़ाकर तीन लाख रुपये तक कर दी गई है। तीन लाख से छह लाख रुपये तक आय वाले परिवारों के लिए नाममात्र के प्रीमियम पर कवरेज उपलब्ध है, जो कैशलेस और पेपरलेस इलाज की सुविधा देती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह देखने में आ रहा था कि आयुष्मान चिरायु योजना से जुड़े निजी अस्पताल इलाज के मामले में काफी गड़बड़ियां कर रहे हैं। 

आखिरकार जांच के बाद राज्य सरकार को 45 निजी अस्पतालों को आयुष्मान योजना के पैनल से निकालने का निर्णय लेना पड़ा। राज्य में इस योजना के तहत गरीबों का इलाज करने के लिए 1304 निजी अस्पतालों को संबद्ध किया गया था। इसमें से 641 सरकारी अस्पताल हैं। बाकी 663 अस्पताल निजी हैं। पैनल से हटाए गए निजी अस्पतालों के बारे में इलाज कराने वाले मरीजों की कई शिकायतें आई थीं। इन शिकायतों की जांच के बाद सही पाए जाने पर सरकार को इन्हें पैनल से बाहर निकालने का फैसला लेना पड़ा। 

सबसे ज्यादा परेशानी उन मरीजों को झेलनी पड़ी जो योजना में शामिल होने के बाद भी निजी अस्पतालों को पैसे देने पर मजबूर किए गए। ऐसे अस्पतालों ने मरीज से तो पैसे वसूले ही, उधर सरकार के सामने भी बिल पेश करके पैसे वसूले। निजी अस्पतालों की यह कार्रवाई सरासर गलत थी। कुछ महीने पहले हरियाणा आयुष्मान भारत प्राधिकरण ने छह अस्पतालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी। पैनल से बाहर निकाले गए अस्पतालों में से कुछ के पास जरूरी संसाधन तक नहीं थे। जरूरी सुविधाएं न होते हुए  कुछ अस्पताल अपने को पैनल में शामिल कराने में सफल हो गए थे। 

जब इन अस्पतालों की जांच हुई, तो सारी सच्चाई सामने आ गई। कुछ अस्पताल तो योजना के दिशा निर्देशों का पालन ही नहीं कर रहे थे। आखिरकार इन अस्पतालों को पैनल से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। वहीं कुछ अस्पतालों ने इलाज का बिल तो पेश कर दिया,लेकिन सबूत नहीं दिखा पाए।

Tuesday, January 20, 2026

शिष्य नहीं समझ पाए धर्म का सार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

धर्म का सार यही है कि संकट में फंसे इंसानों और जीव-जंतुओं की मदद की जाए, उनकी रक्षा की जाए। पूजा-पाठ, धर्म की तमाम क्रियाएं व्यक्ति के मन की शुद्धि के लिए ही होती हैं। यदि मन शुद्ध हो गया, तो वह व्यक्ति प्राणीमात्र के प्रति दयालु और संवेदनशील हो जाता है। अगर हम दिनभर पूजा-पाठ करने के बाद भी लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं हैं, तो ऐसी पूजा बेकार है। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक गुरु जी रहते थे। उनके आश्रम में कई शिष्य थे। वह सभी शिष्यों को धर्मशास्त्रों, व्याकरणों और धर्म-कर्म की शिक्षा दिया करते थे। सभी शिष्यों को गुरुजी के पास शिक्षा ग्रहण करते हुए कई साल बीत गए थे। उनकी शिक्षा भी पूरी हो चुकी थी। जिस दिन सभी शिष्यों की शिक्षा पूरी होने वाली थी, उस दिन गुरुजी अपने सभी शिष्यों को साथ लेकर नदी में स्नान करने गए।

 स्नान के बाद नदी के किनारे बैठकर गुरु जी और उनके शिष्य पूजा पाठ करने लगे। तभी वहां एक बच्चे की चीख पुकार गूंजी। वह नदी में डूब रहा था। वह लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था। तभी पूजा कर रहा एक शिष्य उठा और वह बिना कुछ सोचे-समझे नदी में कूद गया। उस बच्चे को बचाकर तट पर ले आया। यह सब कुछ गुरुजी बैठे देख रहे थे। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि नदी में डूबता हुआ एक बच्चा बचाने की गुहार लगा रहा था। 

आप लोगों ने उसकी पुकार नहीं सुनी, लेकिन तुम्हारे ही साथी ने उसे बचा लिया है। एक शिष्य ने कहा कि पूजा अधूरी छोड़कर साथी ने अधर्म किया है। यह सुनकर गुरुजी बोले, उसने अधर्म नहीं किया है। शिक्षा का असली मतलब समझा है। संकट में फंसे मनुष्य को बचाना ही सच्चा धर्म है। तुम लोगों ने धर्म का सार नहीं समझा है।

अगर ग्रेप नियमों का पालन नहीं किया, पड़ेगा पछताना


अशोक मिश्र

ग्रेप नियमों का पालन न करने का नतीजा है कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जमीनी स्तर पर नियमों को लागू करा पाने में जिला प्रशासन नाकाम रहे, इसी का परिणाम है कि हरियाणा के कई जिलों में वायु गुणवत्ता सूचकांक सामान्य स्तर पर नहीं पहुंच पाया है। यदि हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो लोगों की परेशानियां और भी बढ़ती जाएंगी। 

ग्रेप नियमों के मुताबिक, हवा चलने पर सड़कों से धूल नहीं उड़नी चाहिए। इससे बचने के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव बहुत जरूरी है, लेकिन हालत यह है कि जरा सी हवा चलने पर ही धूल उड़ रही है। लोगों ने भवन निर्माण कार्य भी अभी तक बंद नहीं किया है, जबकि पिछले दो महीने से किसी न किसी स्तर का ग्रेप पूरे राज्य में लागू रहा है। यहां तक कि सरकारी विभागों के कर्मचारी भी खुलेआम निर्माण कार्य कर रहे हैं। इन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। 

इतना ही नहीं, बालू, मौरंग और सीमेंट आदि भी सड़कों पर ही रखी जा रही है जिसकी वजह से आते-जाते वाहनों की वजह से बालू, मौरंग और सीमेंट के अंश हवा में मिल रहे हैं। इससे भी लोगों को काफी परेशानी हो रही है। यदि कोई जागरूक नागरिक शिकायत भी करना चाहता है, तो संबंधित विभागों के अधिकारी फोन ही नहीं उठाते हैं जिसकी वजह से लोग हतोत्साहित हो जाते हैं और अगली बार वह शिकायत करने के बारे में सोचने से भी कतराने लगते हैं। सड़कों और खुली  जगहों पर कूड़ा फेंकने की प्रवृत्ति लोगों में बदस्तूर जारी है। 

कूड़ा-कचरा आज भी जलाया जा रहा है। यही कारण है कि बच्चों, बुजुर्गों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। सांस के रोगी दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। हृदयरोग, हार्ट अटैक और त्वचा रोग भी लोगों में फैल रहा है। राज्य में प्रदूषण के चलते आंखों में जलन जैसी समस्याओं को लेकर काफी संख्या में मरीज अस्पताल पहुंचे। आंखों में जलन, पलकों और उसके आसपास सूजन जैसी समस्याएं प्रदूषण की ही देन हैं। लोगों को गले में खराश जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है। गनीमत यह है कि इस बार किसानों ने पराली जलाने में रुचि नहीं ली। हरियाणा में सरकार की सख्ती, अधिकारियों की सजगता और किसानों की जागरूकता की वजह से पराली जलाने की घटनाएं बहुत कम हुईं। 

जिन किसानों ने पराली जलाई उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की गई। नतीजा यह हुआ कि पराली से होने वाला प्रदूषण का प्रतिशत लगभग शून्य रहा, लेकिन दूसरे मामलों में नागरिकों और स्थानीय निकायों के अधिकारियों-कर्मचारियों ने जागरूकता नहीं दिखाई। वाहन भी प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। राज्य की सड़कों पर डीजल चालित वाहन भारी संख्या में चल रहे हैं। इनको रोकने का भी प्रयास नहीं किया जा रहा है।

ठगी के साथ अब युवतियों का यौन शोषण भी करने लगे साइबर ठग


अशोक मिश्र

साइबर ठगी से पहले ही लोग परेशान थे, अब उसमें एक नया आयाम जुड़ चुका है। वह युवतियों का यौन शोषण करना। साइबर ठगी वैसे तो अब वैश्विक समस्या बन चुकी है, लेकिन भारत में साक्षरता दर कम होने और लोगों के जागरूक कम होने की वजह से काफी घटनाएं सामने आ रही हैं। इस मामले में ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो साइबर ठगों का शिकार बनते ही हैं, शहरी क्षेत्र के पढ़े-लिखे लोग भी झांसे में आ जाते हैं। नतीजा यह होता है कि लोग अपनी जमा पूंजी गंवा बैठते हैं। 

फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में तीन ऐसे साइबर ठगों को गिरफ्तार किया गया है जो देश के विभिन्न शहरों में नौकरी तलाश रही युवतियों का यौन शोषण करते थे। गिरफ्तार किए गए साइबर ठगों ने बताया कि वह विभिन्न जॉब दिलाने वाले पोर्टल से लड़के-लड़कियों का पता और मोबाइल नंबर लेकर वह एयरपोर्ट पर नौकरी दिलाने का झांसा देते थे। पहले वह लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि वह उन्हें एयरपोर्ट पर नौकरी दिलाने में सक्षम हैं। फर्जी अप्वाइंटमेंट लैटर भी बनाकर अपने शिकार को दे दिया करते थे। इसके बदले में यह काफी मोटी रकम लेकर फरार हो जाते थे। 

इनकी शिकार यदि कोई लड़की हुई और वह इनके द्वारा मांगी गई रकम दे पाने में असमर्थ होती थी, तो यह साक्षात्कार के बहाने किसी होटल में बुलाकर उसका यौन शोषण करते थे। मजबूर लड़कियां इनकी बात मानने को तैयार हो जाती थीं। यौन शोषण के दौरान मोबाइल से वीडियो बनाकर उनका बार-बार शोषण किया जाता था। यदि कोई लड़की इनका विरोध करती थी, तो उसे इंटरनेट पर डाल देने की धमकी दी जाती थी। अपनी मान-मर्यादा के भय से लड़कियां चुप रह जाती थीं और इनके शोषण को चुपचाप बर्दाश्त करती थीं। 

एक तो साइबर ठगी से लोग पहले से ही बहुत परेशान हैं। हरियाणा में रोज लगभग चार-पांच घटनाएं साइबर ठगी की सामने आ ही जाती हैं। अब इसमें यौन शोषण जैसी प्रवृत्ति जुड़ जाने से लोगों की परेशानी दो गुनी हो गई है। जिस युवती का यौन शोषण होता है, वह आजीवन इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो पाती है। इस मामले में वह किसी से मदद भी नहीं मांग सकती है। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। यदि पीड़िता अविवाहित है और यौन शोषण की बात उजागर हो जाए, तो उसका विवाह होना लगभग असंभव हो जाता है। विवाहित होने पर पति भी उपेक्षा करने लगता है। 

ज्यादातर मामलों में खुलासा होने पर पति तलाक तक दे देता है। ऐसी स्थिति में हर तरह से नुकसान पीड़िता का ही होता है। इन्हीं सब बातों को सोचकर ज्यादातर पीड़िताएं पुलिस से शिकायत करने से कतराती हैं। यदि पीड़िता थोड़ा सा साहस जुटाकर अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास जाए तो निश्चित रूप से साइबर ठगों को उनकी करनी का दंड मिलेगा।

Sunday, January 18, 2026

तुम किस बात की माफी मांग रहे हो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर कोई इंसान अपनी कमियों को ताकत बना ले, तो वह असंभव काम को भी संभव बना सकता है। बस, उसे अपनी कमी का भान होना चाहिए और उस कमी को ताकत बनाने की प्रबल इच्छा होनी चाहिए। इस संदर्भ में एक बहुत ही रोचक कथा है। किसी गांव में किसान रहता था। वह अपने घर से कुछ दूर स्थित नदी से पानी लाता था। इसके लिए उसके पास दो घड़े थे। 

पानी भरने के बाद वह दोनों घड़ों को एक मजबूत डंडे से दोनों ओर बांध लेता था और डंडे को कंधे पर लेकर घर जाता था। मजे की बात यह है कि उनमें से एक घड़े में हलकी सी दरार थी जिसकी वजह से घर पहुंचते-पहुंचते उस घड़े में आधा पानी ही रह जाता था। इस बात से साबुत घड़े को अपने ऊपर बहुत घमंड था। दरार वाला घड़ा अपनी इस कमी पर शर्मिंदा भी रहता था। 

एक दिन दरार वाले घड़े ने किसान से कहा कि मुझे माफ कर दीजिए। किसान ने आश्चर्य से पूछा कि तुम किस बात के लिए माफी मांग रहे हो। घड़े ने कहा कि मुझमें हल्की सी एक दरार है जिसकी वजह से मैं पिछले दो साल से आधा पानी ही घर तक पहुंचा पा रहा हूं। यह सुनकर किसान ने कहा कि कल तुम नदी से आते समय अपनी ओर के रास्ते को ध्यान से देखना।
अगले दिन घड़े ने देखा कि जिस ओर उसका पानी गिरता था, उधर काफी सुंदर-सुंदर फूल खिले हुए हैं। किसान ने कहा कि तुममें हल्की सी दरार है, यह मैं पहले से ही जानता था। इसलिए रास्ते में मैंने फूलों के बीज बो दिए थे। तुमने रोज इनकी सिंचाई की, तो यह उग आए और अब फूल भी देने लगे हैं जिससे मैं कम से कम पूजा तो कर पाता हूं। कमी तो हर किसी में होती है। तुम्हारी कमी को मैंने उपयोगी बना दिया।

लावारिस पशुओं और कुत्तों के हमले की बढ़ रही घटनाएं

अशोक मिश्र

जैसे जैसे धरती गर्म होती जा रही है, वैसे वैसे कुत्तों सहित कुछ पशुओं में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। सड़कों पर लावारिस घूम रहे पशु बेवजह आक्रामक हो रहे हैं। तीन साल पहले हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ने 70 हजार डॉग बाइट्स मामलों का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला था कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, कुत्तों में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। निकट भविष्य में इसके कम होने के आसार नहीं हैं। गर्म, प्रदूषित और अधिक धूप वाले दिनों में डॉग बाइट्स की घटनाएं बढ़ जाती हैं। अत्यधिक गर्मी कुत्तों के शरीर का तापमान बढ़ा देती है जिसकी वजह से वह चिड़चिड़े और आक्रामक हो जाते हैं। 

गर्मी के कारण कुत्तों में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है, जिससे वे असामान्य व्यवहार करने लगते हैं, जैसे कि बेवजह भौंकना, काटना या आक्रामक होना। यही अन्य पशुओं के साथ भी होता है। ऐसी स्थिति में डॉग बाइट्स यानी कुत्तों के काटने की घटनाएं गर्मी के दिनों में बढ़ जाती हैं। कुत्तों से लोगों को होने वाली परेशानी और काटने की घटनाओं में होने वाली बढ़ोतरी को लेकर सुप्रीमकोर्ट भी काफी चिंतित है। उसने उन लोगों को फटकार भी लगाई है जिन्होंने सड़कों से कुत्तों को हटाने और शेल्टर हाउसों में भेजने का विरोध किया है। 

कोर्ट ने तो सार्वजनिक तौर पर कुत्तों को खिलाने के मामले में भी कड़ी टिप्पणी की है। पिछले कुछ महीनों से यह मुद्दा देश में काफी गरमाया हुआ है। हरियाणा सरकार ने भी लावारिस पशुओं और कुत्तों के हमले से होने वाली मौतों का काफी गंभीरता से लिया है। पशुओं और कुत्तों के हमले से होने वाली मौत के लिए सरकार ने पांच लाख रुपये मुआवजा तय किया है। इसके लिए सरकार ने हर जिले में उपायुक्त के नेतृत्व में नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और लोकनिर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक कमेटी बनाई है जो ऐसे मामलों पर निगाह रखेगी और त्वरित कार्रवाई करेगी। दयालु 2 योजना के तहत पांच विभागों को एक मंच पर लाकर उन्हें समाधान की दिशा में सक्रिय कर दिया है। 

अब कुत्ते के काटने पर नब्बे दिनों के भीतर आनलाइन आवेदन करना होगा। सरकार उम्र के हिसाब से मुआवजा देगी। नवजात से लेकर चालीस साल की आयु के व्यक्ति की पशु या कुत्तों के हमले से मौत होती है, उसके परिजनों को पांच लाख रुपये तक मुआवजा दिया जाएगा। घायल होने पर उम्र के हिसाब से ही मुआवजा दिया जाएगा। वैसे सरकार के मामले में यह योजना पीड़ित परिवार को थोड़ा सा आर्थिक सहयोग तो देगी, लेकिन सरकार को चाहिए कि वह ऐसी घटनाओं को न्यूनतम करने का हर संभव प्रयास करे। इसके लिए जो भी संभव उपाय किए जा सकते हैं, वह करने चाहिए। मुआवजा देना समस्या का समाधान नहीं, थोड़ी राहत प्रदान करना है।

Saturday, January 17, 2026

मन ही मित्र है, मन ही शत्रु भी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यूनान के सबसे बड़े दार्शनिकों में सुकरात का नाम बड़े आदर के साथ  लिया जाता है। उनका जन्म 470 ईस्वी पूर्व एथेंस में हुआ था। उन्हें लोगों को राजसत्ता के खिलाफ भड़काने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। उन दिनों जब किसी को मौत की सजा दी जाती थी, तो उसे जहर का प्याला पीने को दे दिया जाता था। सुकरात के साथ भी यही किया गया। 

कहते हैं कि जब सुकरात को जहर का प्याला पीने को दिया गया, इससे पहले वह अपने शिष्यों को ज्ञान की बातें बता रहे थे। एक बार की बात है। उनसे एक व्यक्ति ने पूछा कि आपका सबसे बड़ा मित्र कौन है? उन्होंने उत्तर दिया-मेरा मन। उस व्यक्ति ने दोबारा पूछा-आपका सबसे बड़ा शत्रु कौन है? सुकरात ने उत्तर दिया-मेरा मन। मित्र और शत्रु दोनों को मन मानने से वह व्यक्ति बात को समझ नहीं पाया। 

उसने सुकरात से  कहा कि यह कैसे हो सकता है। आपका मन ही आपका मित्र भी है और शत्रु भी। यह बात मेरी समझ में नहीं आई। इस बात को विस्तार से समझाने की कृपा करें। तब सुकरात ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरा मन ही मुझे अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। वही जीवन में सही राह दिखाता है। तब वह मेरा मित्र होता है। जब यही मन मुझे सही राह से भटकाकर कुमार्ग पर ले जाता है, तब वह मेरा सबसे बड़ा शत्रु होता है। 

उस व्यक्ति ने पूछा तो सबसे ज्यादा प्रभावी कौन सा मन होता है, मित्र वाला या शत्रु वाला। सुकरात ने हंसते हुए कहा कि यह तो मुझ पर निर्भर करता है कि मैं अपने ऊपर किस मन को हावी होने देता हूं। अगर मुझे अच्छे राह पर चलना है, तो मुझे मित्र वाले मन को ही अपने ऊपर हावी होने देना है। नहीं तो शत्रु मन विनाश करने के लिए बैठा ही है।

नदियों का दमघोट रहे बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज और कचरा


अशोक मिश्र

हरियाणा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वायु प्रदूषण की वजह से लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। सर्दियों में घना कोहरा और धुआँ लोगों को बीमार बना रहा है। हरियाणा का भूगर्भ जल तक प्रदूषित हो चुका है। फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक कचरा नदियों और नालों के माध्यम से भूगर्भ जल में मिलता जा रहा है। सरकार भले ही इन कल कारखानों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कहती हो, लेकिन कोई न कोई रास्ता अख्तियार करके कल-कारखानों के कर्ताधर्ता बच जाते हैं। 

फैक्ट्रियों और छोटे-छोटे उद्योगों से निकला कचरा सीधे नालों के माध्यम से नदियों तक पहुंच रहा है। हरियाणा से निकलने वाली नदियां यमुना और घग्गर नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। औद्योगिक कचरे का बहाव, बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज, प्लास्टिक कचरा और खेती से निकलने वाला गंदा पानी जैसे कारणों से ही यमुना नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित हुई है। अभी हाल में हरियाणा स्टेट पॉल्यूशन बोर्ड ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि फरीदाबाद से होकर गुजरने वाली  बुढ़िया और गौंछी नाले यमुना को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रहे हैं। इन नालों से बिना ट्रीटमेंट किए बहने वाला पानी यमुना नदी को जहरीला बना रहा है। 

इनका पानी बिना ट्रीट मेंट किए सीधे यमुना नदी में डाला जा रहा है जिससे  यमुना नदी के जल का उपयोग करने वाले लोग कई तरह की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हरियाणा के आठ जिलों में बहने वाले 11 नाले यमुना नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। जहां इन नालों का मिलन यमुना नदी से होता है, वहां आक्सीजन का लेबल शून्य हो जाता है। यमुना नदी के प्रदूषित होने का सबसे ज्यादा प्रभाव पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ रहा है। जब पानी में बायोलाजिकल आक्सीजन डिमांड का स्तर बढ़ता है, तो पानी से आक्सीजन खत्म होने लगती है। इसका परिणाम यह होता है कि ऐसे पानी में रहने वाले जीव जंतु मरने लगते हैं। 

मछलियां, कछुए और अन्य जलचर बीओडी बढ़ने की वजह से सांस नहीं ले पाते हैं। इससे इन जीवों का प्रजनन तंत्र प्रभावित होता है और इनकी प्रजनन क्षमता नष्ट हो जाती है। प्रदूषित पानी में पनपने वाले सूक्ष्म जीव-जंतु जैसे काई आदि को जब यह मछलियां खाती हैं, तो जहर इनके शरीर में जमा हो जाता है। इन मछलियां का उपयोग करने वाले इंसान कई तरह की बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। बगुले इन मछलियों का खाने के कुछ दिनों बाद मर जाते हैं। हरियाणा में यमुना और घग्गर नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित है। 

काफी प्रयास करने के बाद भी यमुना और घग्गर को प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सका है। इसमें सबसे बड़ी बाधा हैं वे उद्योग जो अपने अपशिष्ट को संशोधित नहीं करते हैं। अपने उद्योगों से निकला अपशिष्ट यमुना या घग्गर में सीधा प्रवाहित कर रहे हैं जिसकी वजह से इन नदियों के पानी को साफ करने के लिए लगे अपशिष्ट उपचार संयंत्र (ईटीपी) विफल हो रहे हैं