Sunday, August 31, 2025

विवेकानंद ने घायल अंग्रेज की सेवा की

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद ही वह आदमी थे जिन्होंने सनातन धर्म की ध्वजा पूरे विश्व में फहराई थी। अमेरिका के शिकागो शहर में 1893 को आयोजित विश्व धर्म संसद में उन्होंने सनातन धर्म के बारे में जितने विस्तार से दुनिया के सामने रखा, लोग उनके प्रशंसक हो गए। स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका ही नहीं, कई देशों में जाकर धर्म का प्रचार किया। गेरुआ वस्त्रधारी स्वामी विवेकानंद ने हमेशा युवाओं को यह प्रेरणा दी कि वह कमजोर बनने की जगह बलिष्ठ बनें। 

बलिष्ठ शरीर होगा, तो वह अपने देश को आजाद कराने में सक्षम हो सकेंगे। स्वामी विवेकानंद को भी कसरत आदि करने का शौक था। वह जब भी मौका मिलता, वह व्यायाम जरूर करते थे। यात्रा के दौरान भी वह समय निकालकर व्यायाम कर लेते थे। एक बार की बात है। वह व्यायामशाला में कसरत कर रहे थे। उनके साथ कई युवक थे। उसी समय वहां एक अंग्रेज भी व्यायाम कर रहा था। 

उससे किसी बात को लेकर स्वामी जी की बहस हो गई। बहस बढ़ते-बढ़ते उग्र हो गई। अंग्रेज ने विवेकानंद पर हमला कर दिया। वह चाहते तो उसे उठाकर पटक देते, लेकिन उन्होंने बचाव में थोड़ा सा धक्का दिया। अंग्रेज का सिर व्यायामशाला के खंभे से टकराया और वह अंग्रेज गिरकर बेहोश हो गया। उसके सिर से खून निकलने लगा। वहां मौजूद सारे युवक भाग निकले, लेकिन स्वामी जी ने पानी लाकर उसके चोट की सफाई की। 

घाव पर पट्टी बांधने को कुछ नहीं मिला, तो अपने कुर्ते का एक हिस्सा फाड़कर मरहम पट्टी की। अंग्रेज के मुंह पर पानी का छींटा मारा। अंग्रेज होश में आया, तो देखा कि विवेकानंद उसकी देखभाल कर रहे हैं। वह अपने ऊपर लज्जित हो गया। बाद में दोनों लोग एक दूसरे के दोस्त हो गए। वह जीवन भर विवेकानंद का गुणगान करता रहा।

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