Thursday, April 3, 2025

किलेंथिस पर लगाया चोरी का आरोप

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कुछ लोगों को अपनी मेहनत और प्रतिभा पर इतना भरोसा होता है कि वह उसके बलबूते पर बहुत कुछ हासिल कर लेते हैं। उनके जीवन की परिस्थितियां लाख विपरीत हों, लेकिन वह अपना साहस और परिश्रम करना नहीं छोड़ते हैं। दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने परिश्रम से दुनिया का हर सुख हासिल किया है। 

ऐसे ही एक बालक की कथा बहुत लोकप्रिय है। उसका नाम किलेंथिस बताया जाता है। किलेंथिस यूनान में रहने वाले प्रसिद्ध तत्वज्ञानी जीनो के विद्यालय में पढ़ता था। पढ़ने में काफी तेज होने की वजह से दूसरे विद्यार्थियों की नाराजगी का वह केंद्र बन गया था। गुरु जीनो भी किलेंथिस को उसकी प्रतिभा और लगन के चलते बहुत मानने लगे थे। इससे दूसरे विद्यार्थी उससे जलते थे। 

चूंकि वह गरीब घर का था, तो उसके कपड़े भी अच्छे नहीं थे। हां, विद्यालय को दी जाने वाली फीस वह नियत समय पर जरूर जमा कर देता था। उससे ईर्ष्या करने वाले विद्यार्थियों को उस पर प्रहार करने का एक अच्छा मौका मिल गया। उन्होंने किलेंथिस पर चोरी करके फीस जमा करने का आरोप लगाकर पकड़वा दिया। इस पर वह डरा कतई नहीं। जब उसका मामला अदालत में गया, तब उसने निर्भीकता से अपने को निर्दोष बताते हुए जज के सामने दो गवाह पेश करने की इजाजत मांगी। 

इजाजत मिलने पर उसने दो लोगों को अदालत में पेश कर दिया। एक गवाह माली था। उसने बताया कि कलेंथिस उसके बाग में आकर पौधों को पानी आदि देता है जिसके बदले कुछ पैसे मैं उसे देता हूं। दूसरी गवाह एक बुढ़िया ने बताया कि वह घर आकर रोज मेरा आटा पीस देता है। मैं भी कुछ पैसे दे देती हूं। इससे वह फीस और अपने खर्चे पूरे करता है। दोनों गवाहों के बयान सुकर जज ने उसे बरी कर दिया। जज ने मदद का प्रस्ताव रखा तो उसने मना कर दिया।





Tuesday, April 1, 2025

धुल गया श्वेतकेतु का अहंकार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अहंकार कभी कभी व्यक्ति को चैन से बैठने नहीं देता है। व्यक्ति बैराए पशु के समान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन अहंकार उसका सुख-चैन सब कुछ छीन लेता है। यही अहंकार कभी श्वेतकेतु को हुआ था। श्वेतकेतु के बारे में एक बात बता दें कि उन्होंने विवाह नाम की संस्था को मजबूत करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी। 

पतिव्रता और पत्नीव्रता होने की परंपरा की शुरुआत श्वेतकेतु ने ही की थी, ऐसा माना जाता है। कहते हैं कि उनके पिता आरुणि ने उन्हें समय पर अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा। जिस गुरुकुल में वे पढ़ने के लिए भेजे गए थे, वे अपने समय के सबसे विद्वान और विचारवान गुरु थे। चौबीस साल बाद जब श्वेतकेतु जब गुरुकुल से लौटा, तो उसके पिता ने पाया कि उसकी चाल में मस्ती कम, अहंकार ज्यादा है।

आरुणि ने पूछा कि गुरुकुल से तुम क्या सीखकर आए हो। श्वेतकेतु ने कहा कि सब कुछ। कुछ भी नहीं छोड़ा। वेद, पुराण, उपनिषद, विज्ञान, तर्क और भी सारा कुछ सीख कर आया हूं। 

उसके पिता ने कहा कि तुम उस एक को जानकर आए हो जिसको जानने के बाद सारा ज्ञान-विज्ञान अपने आप ही मालूम हो जाता है। अब वह चकराया कि यह एक क्या है जिससे जानने के बाद कुछ भी जानने की जरूरत नहीं पड़ती है।

उसने अपने पिता से पूछा कि वह एक क्या है? उसके पिता ने कहा कि स्वयं को जाने बिना तुम्हारा सारा ज्ञान अधूरा है। तुम गुरुकुल जाओ और फिर से पढ़कर आओ। गुरुकुल में उसके गुरु ने चार सौ गाएं देकर कहा कि जब एक हजार एक गायें हो जाएं, तब आना मैं तुम्हें ज्ञान दूंगा। 

वन में रहते उसे कई साल बीत गए। अब श्वेतकेतु एक निर्मल बालक की तरह हो गया था। उसका सारा अहंकार धुल गया था। तब उसे गुरु ने कहा कि अब तुम स्वयं को जान चुके हो।



आप मुझे अपना बेटा मान लीजिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में नारी को पूजनीय माना गया है। कहा भी गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवता। कहने का मतलब यह है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। नारी की महत्ता प्रदर्शित करने के लिए ही साल में दो बार नवरात्र मनाए जाते हैं और कन्याओं का पूजन किया जाता है। यह भारतीय संस्कृति है। यहां हर पराई स्त्री को मां, बहन और बेटी समझने की शिक्षा दी जाती है। 

इस बात को स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े एक प्रसंग से अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद की बातों और व्यवहार से एक विदेशी महिला बहुत प्रभावित हुई। उसने कई बार स्वामी जी से मिलने का प्रयास किया। लेकिन वह सफल नहीं हो पाई। 

एक दिन वह उस जगह पहुंच गई जहां स्वामी विवेकानंद प्रवचन दे रहे थे। जब प्रवचन खत्म हो गया, तो वह स्वामी विवेकानंद से मिली। उसने स्वामी जी से कहा कि वह उनसे बहुत प्रभावित है। वह उनसे शादी करना चाहती है। स्वामी जी ने कहा कि यह संभव नहीं है। मैं संन्यास ले चुका हूं। मैं शादी नहीं कर सकता हूं। महिला उदास हो गई। स्वामी जी ने उस महिला से पूछा कि आप मुझसे शादी क्यों करना चाहती हैं। 

उस महिला ने स्वामी जी से कहा कि वह उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित है। वह उनसे शादी इसलिए करना चाहती है ताकि उसके स्वामी जी की ही तरह बेटा पैदा हो। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि वह शादी तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन उसकी यह इच्छा जरूर पूरी कर सकते हैं। 

उन्होंने महिला से कहा कि आप मुझे अपना बेटा मान लीजिए। मैं आपको मां समान मान लेता हूं। यह सुनकर वह विदेशी महिला बहुत प्रसन्न हुई। वह उनके सद्गुणों से अत्यंत प्रभावित हुई।