Thursday, January 1, 2026

मौत के बाद प्रसिद्ध हुए फ्रांज काफ्का


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बीसवीं सदी में कहानियों, लघु कथाओं और उपन्यास के मामले में जर्मनी के लेखक फ्रांज काफ्का महान माने जाते हैं। 3 जुलाई 1883 को  काफ्का का जन्म एक जर्मन यहूदी परिवार में हुआ था। काफ्का के पिता हरमन्न काफ्का जर्मनी में एक दुकान चलाते थे। वह बहुत क्रूर किस्म के दुकानदार थे। उनकी मां जूली दुकान में अपने पति का हाथ बंटाती थीं। 

काफ्का ने भी बड़े होने पर बीमा कंपनी में नौकरी की थी। जिस दौर में काफ्का का जन्म हुआ था, प्रगतिशीलता धीरे-धीरे जन्म ले रही थी। उनके लेखन में भी आधुनिकता काफी देखने को मिलती है। उनके समकालीन समीक्षकों ने काफ्का को बीसवीं सदी के महान साहित्यकारों में से एक माना है। दुनिया के साहित्यकारों में काफ्का शायद पहले व्यक्ति हैं जिनको मरने के बाद प्रसिद्धि मिली। 

अपने जीवनकाल में वह बहुत कम चर्चित रहे। वह जीवन भर अपने लेखन को छापने और पढ़ने के अयोग्य मानते रहे। उनका मानना था कि उनके लेखन में कोई नई और विशेष बात नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने अपने घनिष्ठ दोस्त इस्राइली लेखक, संगीतकार और पत्रकार मैक्स ब्राड से जीवन के अंतिम दिनों में अपनी पांडुलिपियां सौंपते हुए कहा था कि इसे जला देना, यह पाठकों के पढ़ने योग्य नहीं है। 

असल में काफ्का को जीवन के अंतिम दिनों में तपेदिक रोग हो गया था। उनकी मौत के बाद ब्राड ने मित्र के अनुरोध को अस्वीकार करते हुए साहित्य को प्रमुखता दी। उन्होंने उनकी पांडुलिपियों को संशोधित करके प्रकाशित किया। द ट्रायल, अमेरिका और द कैसल जैसे उपन्यासों ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। लोगों ने उनकी मौत के बाद उनके लेखन को पहचाना। वह मरने के बाद प्रसिद्ध हो गए।

नए साल पर वही संकल्प लें जिसको पूरा कर सकें

अशोक मिश्र

नया साल 2026 आपके दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। नई आशा, नए उमंग और उल्लास के साथ पूरी दुनिया नए वर्ष का स्वागत कर रही है। पहली जनवरी केवल तारीख बदलने का अवसर नहीं है। यह बीते वर्ष की समीक्षा का भी मौका होता है। पीछे मुड़कर पिछले साल की गई गलतियों को जानने और समझने का भी अवसर होता है। ऐसा नहीं है कि पिछले साल केवल गलतियां ही गलतियां हुई थीं। 

कुछ ऐसा भी हुआ होगा जिसने हमें प्रसन्नता दी होगी, खुश होने का मौका दिया होगा। कुछ ऐसी भी घटनाएं हुई होंगी, जो सुखद होने के साथ-साथ हमें जीवन भर याद रहेंगी। उपलब्धियों को यों ही बिसार पाना, इतना आसान नहीं है। ऐसे अवसरों को दिलोदिमाग में सहेज कर रखने की जरूरत है। ऐसे क्षण जीवन की थाती बनकर रह जाते हैं। नया साल हमें इस बात का भी अवसर उपलब्ध कराता है कि हम यह पता करें कि पिछले साल हमने जो संकल्प लिए थे, वे कितने पूरे हुए। 

अगर पूरे नहीं हुए, तो उसके कारण क्या थे? हमने कहां गलती की। किस वजह से हमारे संकल्प पूरे नहीं हुए। बीता हुआ वर्ष हमें यही सिखाता है कि इस साल हमें वो गलतियां नहीं करनी है जो पिछले साल कर चुके हैं। बीता साल भी हमें उतना ही प्यारा होना चाहिए जितना नया वर्ष है। बीते हुए साल ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। विपरीत परिस्थितियों से लड़ना, हार न मानना और अपनी जिजीविषा को हर हालत में कायम रखना। एक शिक्षक की भूमिका निभाकर बीता साल चला गया। 

बीते साल ने जो कुछ दिया, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। बीते साल में जो कुछ दुख मिले, तकलीफें झेलीं, उसको भूलकर अब आगे बढ़ने का अवसर आ गया है। यही नए साल का संदेश भी है। बीती बातों को मन में बोझ की तरह ढोने से कोई फायदा नहीं है। उन्हें भुलाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। आत्ममंथन करके ही सपनों की नींव को रखा जा सकता है। अब बारी आती है नए साल पर संकल्प लेने की। कोई जरूरी नहीं है कि बड़े संकल्प लिए जाएं। संकल्प वही लिए जाएं, जिन्हें पूरा कर सकते हैं। 

लोगों को दिखाने या जोश में आकर बड़े-बड़े संकल्प ले लिए और बाद में पता चला कि इसे पूरा नहीं किया जा सकता है। ऐसे संकल्प लेने का कोई फायदा नहीं है। पहले लक्ष्य तय कीजिए। नए साल में हमें करना क्या है? जो हमें करना है, उसको कैसे किया जा सकता है। नया वर्ष केवल व्यक्तिगत बदलाव का समय नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का भी समय है। हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी समस्याओं से हम अछूते नहीं रह सकते। छोटे-छोटे प्रयास—जैसे ईमानदारी, संवेदनशीलता, पर्यावरण के प्रति जागरूकता—समाज को बेहतर बना सकते हैं। अगर हर व्यक्ति नए साल में केवल एक अच्छी आदत अपना ले तो बदलाव अपने आप दिखने लगेगा।