अशोक मिश्र
अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान के चलते वन्य जीवों का गलियारा काफी संकुचित हुआ है। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव यदा कदा मानव बस्तियों में घुस आते हैं। इससे कई बार जनहानि भी होती है। ज्यादातर मामलों में समय पर पता लग जाने की वजह से लोग उन्हें विभिन्न उपायों से जंगल की ओर भगा देते हैं। मानव हस्तक्षेप की वजह से वन्य जीवों के लिए स्वाभाविक ईको सिस्टम अरावली क्षेत्र में प्रभावित हो रहा है।लेकिन यह प्रभाव किस रूप में पड़ रहा है, वन्य जीवों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है, इसका भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सन 2017 से अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती ही नहीं हुई है। हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि जल्दी ही अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती कराई जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी आबादी कितनी बढ़ी या घटी।
पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2017 के सर्वे में 31 तेंदुए मिले थे। अनुमान है कि अब यह संख्या बढ़कर 80-90 के करीब हो सकती है। उस सर्वे में यह भी पता चला था कि सन 2017 में 167 नीलगाय, 126 लकड़बग्घे, 26 जंगली बिल्लियाँ, 91 पोरक्यूपाइन (साही), 50 नेवले, चार लोमड़ी, और 61 ताड़ के सिवेट भी रिकॉर्ड किए गए थे। रिपोर्ट में 14 चिंकारा और 23 मोर के साथ दूसरे जानवर दिखने की बात भी कही गई थी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वन्यजीवों की गिनती कराने का प्रयास नहीं किया था।
2017 के बाद देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को सर्वे का काम सौंपा गया था। अरावली क्षेत्र में बड़े जोर-शोर से सर्वे भी किया गया था, लेकिन इंस्टीटूयूट ने अभी तक सर्वे रिपोर्ट भी जारी नहीं की है। प्रदेश सरकार ने कई बार सर्वे रिपोर्ट भी मांगी, लेकिन इंस्टीट्यूट ने जवाब देना उचित ही नहीं समझा। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि एक बार नए सिरे से वन्यजीवों की गिनती कराई जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक स्थिति क्या है? यदि वन्य जीवों की संख्या घट रही है, तो इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए।
यह पता लगाया जाए कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से जीवों की संख्या घट रही है। उन कारणों को दूर करके वन्य जीवों की आबादी बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाए। यदि बढ़ रही है, तो भी उन कारणों को चिन्हित किया जाए, ताकि इसका उपयोग दूसरी जगहों पर किया जा सके। हमें दोनों हालात की जानकारी होनी चाहिए। पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।
रसूख वाले लोग अपने फार्म हाउस, मैरिज हाल आदि बनवाकर वन्य जीवों के रहन-सहन को बाधित कर रहे हैं। वन्यजीव गलियारे में इंसानों के आवागमन की वजह से उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

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