अशोक मिश्र
शहरों की स्वच्छता को लेकर राज्य सरकार और सरकारी संस्थाएं बड़े-बड़े दावे करने से नहीं चूकती हैं। स्वच्छता रैंकिंग में अव्वल आने के लिए सरकारें कई तरह की योजनाएं बनाती हैं, लेकिन शहरी स्वच्छता का दम भरने वाली सरकारें यह भूल जाती हैं कि जिनकी बदौलत शहर स्वच्छ होते हैं, उनकी जिंदगी गंदगी और गंदे वातावरण में ही बीत जाती है। शहरों की गंदगी कई बार उनके लिए जानलेवा साबित होती है। इनकी मौत पर दो-चार दिन बयानबाजी होती है और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।रविवार को फरीदाबाद के सेक्टर 84 में बीपीटीपी की सड़क के पास सीवर की सफाई में उतरे दो कर्मचारी राजेंद्र और सुनील की मौत दम घुटने से हो गई। दोनों बीपीटीपी बिल्डर कंपनी के कर्मचारी थे। कंपनी ने इन दोनों कर्मचारियों को बिना सुरक्षा उपकरण के ही सीवर में उतार दिया था। दो दिन पहले ही पलवल में भी सीवर की जहरीली गैस की वजह से एक सफाई कर्मचारी की मौत हो गई थी।
नूंह जिले के फिरोजपुर झिरका में 15 अप्रैल को सीवर की जहरीली गैस में दम घुटने से दो कर्मचारियों की मौत हो गई थी। ठेकेदार और निजी कंपनियां बिना गैस डिटेक्टर, मास्क या आॅक्सीजन सिलेंडर के ही सीवर में कर्मचारियों को उतार देते हैं। हालांकि सीवर मौतों को रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने दिसंबर 2022 में एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी जारी की थी जिसके अनुसार सीवर की सफाई मुख्य रूप से मशीनों से ही की जाएगी, न कि इंसानों द्वारा।
इसके बावजूद आए दिन ऐसी घटनाएं प्रदेश में हो रही हैं। पिछले 5 वर्षों (2021 से 2025) में हरियाणा में सीवर/सेप्टिक टैंक साफ करते समय 43 श्रमिकों की मौत हुई है। कुछ अन्य सरकारी आंकड़ों में 2017 से 2026 के बीच हरियाणा में 76 मौतों का जिक्र है, जो देश में सर्वोच्च में से एक है। ऐसी लगातार होती घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि खतरनाक और स्थापित होती जा रही व्यवस्था बन चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में होती मौतें बार-बार यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर कब तक गरीब मजदूर अपनी जान की कीमत पर हमारी स्वच्छता की जिम्मेदारी ढोते रहेंगे?
संवैधानिक अधिकारों और मानव गरिमा की रक्षा के दावों के बीच भी इन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर अगर बात की जाए तो कानूनों और न्यायिक आदेशों की मौजूदगी के बावजूद जमीन पर बदलाव न दिखना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। 2013 का मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध और पुनर्वास अधिनियम इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मैकेनाइज्ड सफाई अनिवार्य करते हुए मृतक परिवारों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। लेकिन कानून और नियमों पर अमल होता कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।

No comments:
Post a Comment