Wednesday, January 7, 2026

बुजुर्ग ने कहा, मैं ही हूं माइकल फैराडे

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

माइकल फैराडे का जन्म 22 सितंबर 1791 को लंदन में हुआ था। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता था। अदम्य जिज्ञासा और सफलता की प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर फैराडे ने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी विज्ञान की बहुत बड़ी सेवा की। उन्होंने मानव समाज को दो प्रमुख उपकरण प्रदान किए जिन्हें सामान्य भाषा में जेनरेटर और ट्रांसफार्मर कहा जाता है। 

उन्होंने और भी कई खोज किए जिसने समाज को नई दिशा दी। जब वह प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तो एक दिन उनके अध्यापक ने उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा। इतना पीटा कि वह फर्श पर बिना हिले डुले काफी देर तक पड़े रहे। उसी दिन से उनकी मां ने स्कूल की पढ़ाई बंद करवा दी। वह कमाने के लिए एक बुक बाइंडर के यहां नौकरी करने लगे। उनकी पढ़ाई लिखाई खासतौर पर विज्ञान में रुचि होने की वजह से वह एक बड़े वैज्ञानिक के संपर्क में आए और आगे चलकर एक महान वैज्ञानिक बने। 

एक बार की बात है। एक ब्रिटिश अधिकारी उनसे मिलने रायल सोसायटी पहुंचा। उसने देखा कि रायल सोसायटी की इमारत में कोई नहीं है। दरबान से उसने कहा कि उसे माइकल फैराडे से मिलना है। वह कहां मिलेंगे? उस गार्ड ने इमारत के एक हिस्से की ओर संकेत कर दिया। वह अधिकारी उस ओर गया, लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं दिया। बस, एक बुजुर्ग सिंक में कुछ गंदी बोतलें धो रहा था। 

उस अधिकारी ने उनसे बेरुखी से पूछा कि तुम यहां के कर्मचारी हो। उस बुजुर्ग ने कहा कि जी हां, मैं चार दशक से यहां सेवा दे रहा हूं। अधिकारी ने कहा कि मुझे एक महान वैज्ञानिक से मिलना है, लेकिन वह दिखाई नहीं दे रहे हैं। बुजुर्ग ने कहा कि आपको जिससे मिलना है, उसका नाम क्या है? अधिकारी ने कहा कि  मुझे माइकल फैराडे से मिलना है। बुजुर्ग ने कहा कि वह मैं ही हूं। अधिकारी उनकी सादगी को देखकर दंग रह गया।

हरियाणा के गांवों में पानी के नाम पर धीमा जहर पी रहे हैं लोग



अशोक मिश्र

एक ओर जहां हरियाणा जल की कमी से जूझ रहा है, वहीं राज्य में पेयजल की गुणवत्ता काफी खराब हो चुकी है। पानी में रसायन घुल जाने की वजह से कई तरह की घातक बीमारियां फैल रही हैं। हालात कितने खराब हो चुके हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के 3489 गांवों में पानी पीने लायक नहीं रहा है। यदि पानी ही प्रदूषित और विषैला होगा, तो स्वास्थ्य समस्याओं का जन्म लेना निश्चित है। 

जल में घातक रसायन घुले होने की वजह से लोगों में कैंसर, त्वचा, हृदय रोग और मधुमेह सहित कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। प्रदेश के 20 जिलों के 136 गांव भूजल में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा पाई गई है जिसकी वजह से हड्डियां कमजोर हो रही हैं। जनस्वास्थ्य एवं आपूर्ति विभाग या अन्य स्रोतों द्वारा सप्लाई किया जा रहा पेयजल हो या फिर भूमिगत जल, निर्धारित मानकों से अधिक मात्रा में मौजूद रसायनिक पदार्थ इसे जहरीला बना रहे हैं। जल संसाधन, कृषि एवं भूजल विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक संगठन केंद्रीय भूजल बोर्ड की नवंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक न हो। 

विभिन्न स्थानों पर फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और यूरेनियम के साथ ही ईसी (विद्युत चालकता) की अत्यधिक मात्रा चिंताजनक है। भूजल में अपशिष्ट पदार्थों का मिश्रण बढ़ने से ब्लड प्रेशर, पथरी, दिमागी कमजोरी, शरीर में दर्द, पेट के रोग, पीलिया की शिकायतें बढ़ी हैं। यह स्थिति काफी बड़े संकट की ओर इशारा कर रही है। यदि हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो पूरा प्रदेश गंभीर बीमारियों की चपेट में होगा। इसके लिए सबसे पहले कृषि क्षेत्र में उपयोग किए जा रहे रासायनिक उर्वरकों पर रोक लगानी होगी। किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा ताकि मिट्टी में कम से कम रसायन घुले। 

अधिक उपज लेने के लिए किसान बिना सोचे समझे हर साल रासायनिक उर्वरकों की मात्रा बढ़ाते जा रहे हैं। इससे न केवल पैदा किए गए अनाज में रसायन घुल रहा है, बल्कि मिट्टी के जरिये भारी मात्रा में रसायन पानी में घुल रहा है। इसी पानी का उपयोग लोग अपने दैनिक जीवन में कर रहे हैं और किसान फसलों की सिंचाई में कर रहा है।  किसानों के साथ-साथ प्रदेश में चलने वाले छोटे-बड़े उद्योग भी राज्य के पानी को दूषित करने के लिए जिम्मेदार हैं। उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक कचरा बिना संशोधित किए सीधे नदियों और नालों में डाला जा रहा है। इससे नदियां प्रदूषित हो रही हैं। 

बहुत सारे उद्योग अपने यहां पैदा होने वाले अपशिष्टों को गड्ढा खोदकर जमीन में दबा देते हैं। धीरे-धीरे अपशिष्टों में मौजूद रसायन और कचरा जमीन के नीचे मौजूद जल में मिल जाता है। बाद जब इसका उपयोग किया जाता है, तो यह इंसानों और पशुओं के लिए काफी खतरनाक  साबित होता है। यदि राज्य के लोगों को साफ पानी उपलब्ध नहीं कराया गया,तो निकट भविष्य में प्रदेश में तमाम घातक रोग महामारी की तरह फैलेंगे।

Tuesday, January 6, 2026

यतींद्रनाथ दास ने कहा, चलो मां! घर चलते हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ब्रिटिश हुकूमत की जेल में क्रांतिकारियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को लेकर 63 दिन तक भूख हड़ताल करके मौत को गले लगाने वाले क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कोलकाता में हुआ था। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण सोलह साल की अवस्था में वह दो बार जेल गए। अपने जीवन में तो वह कई बार गिरफ्तार किए गए और जेल भेजे गए। 

एक बार की बात है। वह गर्मी की तपती दोपहरी में कलकत्ता की सड़कों पर कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे लोगों की भीड़ लगी हुई है। उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला गर्मी में चक्कर खाकर गिर पड़ी थी। वहां खड़े लोग उस महिला से सहानुभूति जता तो रहे थे, लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। यह देखकर यतींद्रनाथ आगे आए और उन्होंने बुजुर्ग महिला को उठाते हुए कहा, चलो! मां घर चलते हैं। 

उन्होंने उस महिला की गठरी अपने सिर पर रख लिया। घर पहुंंचने पर उन्होंने उस महिला से पूछा कि आपका कोई नहीं है क्या? उस महिला ने रोते हुए बताया कि मेरा एक बेटा था जिसकी महामारी के दौरान मौत हो गई है। तब यतींद्रनाथ ने कहा कि आपका बेटा मरा नहीं है। मैं हूं न आपका बेटा। इसके बाद उन्होंने कुछ रुपये उस महिला के हाथ पर रख दिया। 

वह महिला जब तक जीवित रही, वह आर्थिक सहायता करते रहे। लाहौर षड्यंत्र केस में छठी बार गिरफ्तार होने के बाद जब भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने क्रांतिकारियों के साथ जेल में होने वाले दुर्व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की, तो लोगों ने उनसे भी भूख हड़ताल के लिए कहा। उन्होंने कभी न तोड़ने के वायदे के साथ भूख हड़ताल शुरू की और 63 दिन तक भूख हड़ताल करने के बाद 13 सितंबर 1929 को वह शहीद हो गए।

संभलकर करें पानी का उपयोग हरियाणा में गहरा रहा जल संकट


अशोक मिश्र

जल ही जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन जगहों पर पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां लोगों में पानी की कोई कद्र ही नहीं है। पानी का दुरुपयोग इन जगहों पर आम बात है, लेकिन जिन जगहों पर पानी की उपलब्धता कम है, वहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। हरियाणा में भी पानी की उपलब्धता कफी कम है। राज्य में वर्तमान समय में 35 लाख करोड़ लीटर पानी की मांग बनी हुई है। लेकिन सारे प्रयास करने के बावजूद सिर्फ  21 लाख करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति हो पा रही है। बाकी बचे 14 लाख करोड़ पानी की आपूर्ति के लिए राज्य सरकार कई तरह के प्रयास कर चुकी है और आज भी कर रही है। 

ऐसी स्थिति में लोगों को पानी खर्च करने के मामले में मितव्ययता से काम लेना चाहिए। हरियाणा में करीब 86 प्रतिशत पानी की खपत खेती के काम में होती है। 14 प्रतिशत पानी पीने के काम में आता है। सरकार का फोकस ऐसी फसलों का उत्पादन घटाने की तरफ बन रहा है, जिनमें पानी की अधिक खपत होती है। प्रदेश सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है कि वह एक तो प्राकृतिक खेती की ओर लौटें और दूसरे वह उन्हीं फसलों की खेती करें जिसमें पानी की खपत कम से कम होती है। खेती में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग होने की वजह से प्रदेश के कई जिले डार्क जोन में आ गए हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए सीएम सैनी ने राज्य में जल शक्ति अभियान को गति देने का निर्णय लिया है। 

केंद्र सरकार के सहयोग से कैच द रेन 2025 जैसे अभियानों के माध्यम से जल संरक्षण और वन संरक्षण पर जोर दिया जा चुका है। पानी बचाने के लिए इन योजनाओं को पहले ही जल जीवन मिशन के साथ जोड़ा जा चुका है। सैनी सरकार ने वाटर सिक्योर हरियाणा कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व बैंक की मदद से 5700 करोड़ रुपये की योजना पर काम चालू कर दिया है। इस योजना के तहत राज्य को 2032 तक देश का पहला जल सुरक्षित राज्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 14 रणनीतिक सिंचाई क्लस्टर शामिल हैं। हरियाणा में पानी की बर्बादी रोकना केवल सरकार का ही काम नहीं है। 

इस जनभागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। प्रदेश के हर व्यक्ति को इस बात का एहसास होना चाहिए कि पानी की बूंद-बूंद बचाना उनका भी दायित्व है। जल संरक्षण के लिए सरकार ने कानून और नीतियां बनाई हैं। इनमें हरियाणा जल संसाधन (संरक्षण, विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम 2020 प्रमुख है, जो जल संरक्षण को अनिवार्य बनाता है। अधिनियम में पानी की चोरी और बर्बादी पर जुर्माना लगाने और कनेक्शन काटने का प्रविधान किया गया है। सरकारी तंत्र के बार-बार समझाने के बाद भी जो लोग पानी की आवश्यकता को नहीं समझ पा रहे हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

Monday, January 5, 2026

ऐसा न हो, मैं हल चलाना ही भूल जाऊँ

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान को अपने कर्म पर हमेशा भरोसा करना चाहिए। यदि परिस्थितियां विपरीत हों, तो भी न साहस छोड़ना चाहिए और न ही अपना कर्तव्य। यदि अपने कर्तव्य से विमुख हो गए, तो विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल कैसे बना पाएंगे। जो विपरीत परिस्थितियों से लड़कर उसे अपने अनुकूल बना लेता है, असली विजेता वही है। है तो यह एक काल्पनिक कथा, लेकिन इस संदर्भ में सटीक उदाहरण बन सकता है। 

एक बार की बात है। किसी गांव में एक ज्योतिषी आया। उस ज्योतिषी ने सभी गांव वालों को एक जगह इकट्ठा किया और घोषणा की कि इस इलाके में अगले बारह साल तक बारिश नहीं होगी। यह सुनकर गांववाले काफी घबरा गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। जब बारिश ही नहीं होगी, तो वह करेंगे क्या? उनके परिवार का पालन पोषण कैसे होगा? काफी सोच विचार के बाद लोगों ने गांव छोड़ने का फैसला किया। एक किसान ने वहीं रहने का फैसला किया। 

गांववालों ने उस किसान को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना। लोगों के गांव छोड़ने के सात-आठ दिन तक तो किसान परेशान रहा, लेकिन एक दिन उसने अपने खेत को जोतना शुरू कर दिया। एकाध दिन बाद बादल का एक टुकड़ा उधर से गुजरा। किसान को हल जोतते देखकर कहा, तुम्हें नहीं मालूम है कि इस इलाके में बारह साल तक बरसात नहीं होगी। 

किसान ने कहा कि मुझे मालूम है, लेकिन खेत इसलिए जोत रहा हूं कि कहीं मैं खेत जोतना ही भूल न जाऊं। किसान की बात सुनकर बादल के उस टुकड़े ने सोचा कि मैं भी कहीं बरसना न भूल जाऊँ। यही सोचकर उसने बरसना शुरू कर दिया। उसको बरसता देखकर दूसरे बादल भी बरसने लगे। गांव के लोग भी इस दौरान लौट आए।

कुपोषण के कारण हरियाणा में पैदा हो रहे हैं कमजोर बच्चे

अशोक मिश्र

दो दिन पहले ही हरियाणा में लिंगानुपात सुधरने की खबर आई थी। यह उपलब्धि खुश करने वाली थी, लेकिन इसके साथ ही साथ चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं में पोषण की कमी के कारण कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। फरीदाबाद के बीके (बादशाह खान) अस्पताल के नीकू वार्ड में हर महीने पहुंचने वाले बच्चों में बहुत सारे बच्चे शारीरिक रूप से कमजोर पाए जा रहे हैं। इसका कारण गर्भवती महिलाओं में पोषण की कमी माना जा रहा है। 

बीके अस्पताल में हर हफ्ते सात से दस बच्चों का जन्म होता है। इनमें से तीन-चार बच्चे कमजोर पैदा होते हैं। इन कमजोर बच्चों को बाद में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शिशुओं में कम वजन, सांस लेने में दिक्कत, खून की कमी, कुछ अंगों का सही से विकास न होना जैसी समस्याएं अब तो आम हो चली हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि यदि गर्भवती स्त्री को ठीक ढंग से पोषण न मिले, तो उसका गर्भस्थ शिशु कमजोर रह सकता है क्योंकि शिशु को पोषण उसकी मां के माध्यम से ही मिलता है। 

अब अगर मां ही कमजोर होगी, तो गर्भस्थ शिशु कैसे हष्ट-पुष्ट हो सकता है। गर्भवती महिलाओं को सही पोषण न मिल पाने का सबसे पहला कारण उनकी गरीबी है। परिवार की आय कम होने की वजह से उनकी अनिवार्य  जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती हैं। सामान्य दिनों में भी महिलाओं और लड़कियों को भर पेट भोजन नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में यदि महिला गर्भवती हो जाए, तो हालात और बिगड़ जाते हैं। यह भी सच है कि राज्य सरकार आंगनबाड़ी, एएनएम और आशा वर्कर्स के जरिये गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार देने का प्रयास करती है। 

इस स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने गर्भवती महिलाओं महीने में तीन दिन 9, 10, 23 और माह के अंतिम दिन गुड़ और चना बांटने का फैसला किया है। गुड़ और चना शरीर में रक्त आपूर्ति का बेहतरीन माध्यम माना जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गुड़ और चना वितरण का फैसला लिया है। इसके बावजूद राज्य में गर्भवती महिलाएं एनीमिया और पौष्टिक आहार की कमी से जूझती हुई मिल जाती हैं। गरीबी, भुखमरी और कुपोषण जैसे तमाम कारणों से देश की आधी आबादी यानी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित पाई जाती हैं। 

गर्भवती महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा कुछ और बढ़ जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि पांच में से एक गर्भवती महिला खून की कमी का शिकार होती है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। गर्भवस्था के दौरान पोषण युक्त भोजन करने की सलाह सरकारी अस्पतालों में अपनी जांच कराने आने वाली गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर और नर्सें देती रहती हैं, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इस बात पर ध्यान ही नहीं देती हैं। बाद में जब परेशानी होती है, तो पछताती हैं।

Sunday, January 4, 2026

आप मेरी झोपड़ी नहीं देख सकते क्या?

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

धन का अहंकार हो या सत्ता का, कभी अच्छा नहीं माना गया है। धन हो या सत्ता इस दुनिया में किसी के पास स्थायी नहीं रही है। धन या सत्ता आज है, कल कोई दूस
रा उसका मालिक हो जाएगा। इसलिए किसी भी स्थिति में अहंकार को अच्छा नहीं माना गया है। अरब देश में कोई राजा था। वैसे वह बड़ा दयालु और प्रजापालक था। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। मृदुभाषी भी था। 

एक बार की बात है। वह अपने राज्य में एक बार घूमने निकला। उसे एक जगह बहुत पसंद आई। उसने उस जमीन पर अपना महल बनाने का फैसला किया। उसने जिस स्थान पर महल बनाने का निर्णय लिया था, उस जमीन के मालिकों को अच्छे दाम देकर जमीन खरीद ली। बस एक छोटा सा टुकड़ा बचा था जिसकी मालकिन एक बुजुर्ग महिला थी। वह अपनी उस जमीन पर झोपड़ी बनाकर रहती थी। 

बाकी बची जमीन पर थोड़ा बहुत कुछ अनाज सब्जी उगाकर अपना गुजारा करती थी। जब महल बनकर तैयार हुआ, तो राजा बहुत खुश हुआ। लेकिन सुबह उठने के बाद जब भी वह और उसके परिवार वाले महल के बगल में बनी झोपड़ी को देखते तो उन्हें बहुत बुरा लगता था। राजा ने अपने दरबारियों को उस बुजुर्ग महिला को समझाने को भेजा, लेकिन वह नहीं मानी तो उसे दरबार में तलब किया। 

राजा ने उस बुजुर्ग महिला से कहा कि मैं चाहता तो आपकी जमीन छीन सकता था। उस महिला ने जवाब दिया, आप राजा हैं। आपके पास शक्ति है। उस शक्ति का उपयोग मुझ जैसी शक्तिहीन पर करना क्या आपको शोभा देता। जब मैं आपके महल को रोज देख सकती हूं, तो क्या आप मेरी झोपड़ी को नहीं देख सकते। यह सुनकर राजा बहुत लज्जित हुआ। उसने ससम्मान महिला को वापस भेज दिया।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहिम से सुधरा हरियाणा में लिंगानुपात

अशोक मिश्र

हरियाणा के संदर्भ में बहुत दिनों बाद एक अच्छी खबर पढ़ने-सुनने को मिली। काश कि भविष्य में भी यह प्रक्रिया इसी तरह चलती रहे। हरियाणा ने वर्ष 2024 के मुकाबले में वर्ष 2025 में लिंगानुपात के मामले में 13 अंकों की बढ़ोतरी हासिल की। वर्ष 2025 में लिंगानुपात का आंकड़ा 923 पहुंचा है। सच कहा जाए, तो यह आंकड़ा भी कम है, लेकिन राज्य ने लिंगानुपात के मामले में जिस मील के पत्थर को पार किया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह लिंगानुपात के मामले में आगे ही बढ़ता रहेगा। 

जिस प्रदेश को आज से कई दशक पहले तक कुड़ीमार प्रदेश कहा जाता था, उस संदर्भ में देखें, तो यह उपलब्धि गौरवान्वित करने वाली है। यह उपलब्धि बता रही है कि अब राज्य के लोगों की मानसिकता बदल रही है। वह अब अपनी लड़कियों को लेकर सकारात्मक ढंग से सोचने लगे हैं। उन्हें अब बेटियां-बहनें बोझ नहीं लगती हैं। जिस तरह राज्य की लड़कियां आगे बढ़कर हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल करती जा रही हैं, खेलकूद, पढ़ाई-लिखाई में वह उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जा रही हैं। 

अच्छे अंकों से परीक्षाएं पास कर रही हैं, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतिस्पर्धाओं में मेडल हासिल कर रही हैं, उससे लोगों को अपनी बहन-बेटियों पर गर्व हो रहा है। अंतरमन में जरूर उन्हें अपने पूर्वजों की बेटियों को जन्म लेते ही मार देने की प्रवृत्ति पर अफसोस हो रहा होगा। वैसे भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए स्त्री की जरूरत होती है। प्रकृति ने यह गुरुत्तर दायित्व स्त्रियों को ही सौंप रखा है। ऐसी स्थिति में यदि लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले में कम रह गई, तो स्वाभाविक तौर पर कुछ लड़के कुंवारे रह जाएंगे। 

यह भी एक तरह की सामाजिक विकृत्ति है, जिस तरह लड़कियों की संख्या का कम होना एक सामाजिक बुराई है। संतोष की बात यही है कि अब जनमानस में  लड़कियों को लेकर चेतना पैदा हो चुकी है। लिंगानुपात सुधार में सबसे अहम भूमिका बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की मानी जा रही है। जब से यह मुहिम शुरू हुई है, लोग ने इसे गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। प्रदेश सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसका प्रचार भी बहुत किया है। पूरे प्रदेश में जहां भी जाइए, आपको बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के स्लोगन लिखे हुए मिल जाएंगे। जब कोई बात या विचार बार-बार आंखों के सामने आता है, तो वह मन के दरवाजे पर दस्तक जरूर देता है। 

वैसे भी लिंगानुपात में सुधार के लिए अवैध गर्भपात को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कठोर कदम उठाए हैं। गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करके अवैध गर्भपात पर एक तरह से रोक लगा दी है। सरकार ने एएनएम, आशा वर्कर्स आदि की जिम्मेदारी भी तय कर दी थी। इसका भी लिंगानुपात मामले में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

Saturday, January 3, 2026

जो हुआ, बहुत ही अच्छा हुआ


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि प्रकृति में जितनी भी घटनाएं होती हैं, वह अकारण नहीं होती हैं। उसके पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है। इसी बात को धार्मिक लोग यह कहते हैं कि भगवान जो कुछ भी करता है, वह अच्छे के लिए करता है। भगवान के हर काम के पीछे कोई न कोई भलाई छिपी होती है जिसे हम पहचान नहीं पाते हैं।
इसी संदर्भ में एक कथा पेश करने जा रहा हूं। कहते हैं कि एक राजा शिकार खेलने के लिए अपने मंत्री के साथ वन को गया। शिकार करने का उस राजा को बहुत शौक था। वह जब भी फुरसत मिलती, वह शिकार खेलने के लिए वन को निकल जाता था। 

इस बार उसे काफी भटकने के बाद एक हिरन दिखाई दिया। उसने उस हिरन पर अपना तीर छोड़ने ही वाला था कि तभी पता नहीं कहां से एक सुअर आया और उसने राजा पर छलांग लगा दी। इसी चक्कर में राजा की अंगुली कट गई। राजा की अंगुली से खून निकलने लगा। यह देखकर मंत्री ने कहा कि जो हुआ अच्छा हुआ। यह सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आया। एक तो वह संकट में था। उसकी अंगुली से खून बह रहा था। ऊपर से मंत्री कहता है कि जो हुआ अच्छा हुआ। 

राजा ने गुस्से में मंत्री को अपने राज्य से निकाल दिया। राजा का आदेश मानकर मंत्री एक ओर को चल दिया। राजा आगे बढ़ा, तो उसे कबीलों ने घेरकर बंदी बना लिया और अपने सरदार के पास ले गया। सरदार ने पुजारी से राजा की बलि देने को कहा। पुजारी ने राजा की कटी अंगुली देखी तो उसे छोड़ दिया। अब राजा को मंत्री को निकाल देने को लेकर पछतावा हुआ। उन्होंने उसे खोजना शुरू किया, काफी दूर जाने के बाद एक जगह मंत्री भजन करता हुआ मिला। राजा ने माफी मांगी, तो मंत्री ने कहा कि आपने मुझे निकाल दिया था, तो अच्छा किया वरना आपकी जगह मेरी बलि दे दी जाती।

लाडो लक्ष्मी योजना की लाभार्थी महिलाओं का बढ़ा दायरा


अशोक मिश्र

महिलाएं परिवार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं। जब भी परिवार पर संकट आता है, तो महिलाएं उस धन को संकट से निपटने के लिए अपने पति, पुत्र या पिता को सौंप देती हैं जिसे उन्होंने परिवार को चलाने के लिए मिले पैसे में से कटौती करके बचाया होता है। भारतीय महिलाओं की यह परंपरागत आदत है कि वह अपने पिता, पति और पुत्र के सामने अर्थाभाव का रोना रोती रहती हैं। 

घर खर्च के लिए दिए गए पैसे पूरे नहीं पड़ते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर वह उस रकम में भी कुछ न कुछ हर महीने बचा ही लेती हैं। यह हर महीने बचाया हुआ पैसा एक दिन परिवार के संकट के समय काम आता है। महिलाएं अब स्वयं अपने पैसे में कटौती करके बचा सकें या परिवार की सुख-सुविधाओं में योगदान दे सकें, इसके लिए सैनी सरकार ने लाडो लक्ष्मी योजना की शुरुआत की है। 

1 नवंबर को हरियाणा दिवस पर सीएम नायब सिंह सैनी ने प्रदेश की 5,22,162 महिलाओं के बैंकखातों में 109 करोड़ रुपये डाले थे। प्रत्येक महिला के खाते में 21सौ रुपये आए थे। 21 सौ रुपये उन महिलाओं के बैंक खाते में डाले गए थे जिनके परिवार की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम थी। लेकिन अब सैनी सरकार ने लाडो लक्ष्मी योजना में विस्तार किया है। इस योजना में अब उस परिवार की महिलाओं को भी शामिल किया गया है जिनके परिवार की वार्षिक आय एक लाख अस्सी हजार से कम है। लेकिन इस मामले में एक शर्त भी है। 

विस्तारित योजना में उस परिवार की महिला को ही शामिल किया जाएगा जिसने सामाजिक विकास में योगदान दिया है। अर्थात जिसने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके विकास पर ध्यान दिया है। दसवीं और बारहवीं कक्षा में जिन बच्चों ने अस्सी प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए हैं, उन्हीं महिलाओं को 21 सौ रुपये मासिक प्रदान किए जाएंगे। इसमें से 11 सौ रुपये तो महिला के बैंकखाते में सीधे डाले जाएंगे। बाकी बचे एक हजार रुपये की एफडी या आरडी खाता खोला जाएगा और पांच साल या सरकार द्वारा तय की गई अवधि के बाद ब्याज सहित रकम महिला के खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी। 

यदि किसी कारणवश महिला की बीच में ही मौत हो जाती है तो आरडी या एफडी की रकम उसके नामिनी को उसी समय सौंप दी जाएगी। यही नहीं, बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान देने के लिए भी भारत सरकार के निपुण मिशन के तहत कक्षा एक से चार तक ग्रेड लेवल निपुणता प्राप्त करने वाले बच्चों की माताओं को भी लाडो लक्ष्मी योजना में शामिल किया जाएगा। 

विस्तारित योजना से कुछ महिलाओं को लाभ जरूर होगा। लेकिन जो शर्तें लगाई गई हैं, उसके चलते लाभार्थी महिलाओं की संख्या काफी कम होने की उम्मीद है। हालांकि यह भी सही है कि इससे कम से कम कुछ महिलाओं को तो लाभ मिलेगा।