Wednesday, February 25, 2026

ब्राह्मण की मदद करने को खतरे में डाला जीवन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

छत्रपति शिवाजी में युद्ध नीति बनाने की असाधारण प्रतिभा थी। उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता शाहजी राजे भोसले एक शक्तिशाली सामंत परिवार में जन्मे थे। शाहजी राजे की दो पत्नियां थीं। शिवाजी की माता जीजाबाई ने ही अपने पुत्र का पालन-पोषण किया था। 

बचपन से ही जीजाबाई ने अपने बेटे को युद्ध और रणनीति बनाने की शिक्षा दी थी। यह उस युग की मांग थी। शिवाजी का 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति की उपाधि धारण की थी। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब से कई लड़ाइयां लड़ी थीं। एक बार की बात है। मुगलों की सेना से बचने के लिए वह वेष बदलकर गांव-गांव घूम रहे थे। 

एक दिन वह एक ब्राह्मण के यहां रहने गए। ब्राह्मण काफी गरीब था। उसको अपना और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन उसने शिवाजी को प्रतिदिन भरपेट भोजन कराया। कई दिनों तक वह खुद भूखा रहा। जब यह बात शिवाजी को पता चली, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह सोचने लगे कि इस ब्राह्मण की कैसे मदद की जाए। उन्होंने वहां के एक मुगल सूबेदार को पत्र लिखा कि इस ब्राह्मण के घर में शिवाजी छिपे हुए हैं। 

शिवाजी को गिरफ्तार कर लो, लेकिन इस ब्राह्मण को दो हजार अशर्फियां दे दो। मुगल सूबेदार ने दो हजार अशर्फियां देने के बाद शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया। जब यह बात ब्राह्मण को पता चली तो वह फूटफूटकर रोने लगा। उसी दिन तानाजी ने हमला करके शिवाजी को कैद से छुड़ा लिया। इस तरह अपना जीवन खतरे में डालकर भी शिवाजी ने ब्राह्मण की मदद की। लोगों की मदद करने में शिवाजी हमेशा आगे रहते थे।

विवशता से उपजे क्रोध के कारण बढ़ रही आपराधिक घटनाएं

अशोक मिश्र

अंबाला कैंट में मामूली सी बात को लेकर हुई बहस के दौरान हुए झगड़े में बीच बचाव करने आए एक युवक की हमलावरों ने हत्या कर दी। वैसे तो यह घटना एक सामान्य घटना की ही तरह है। लेकिन इस घटना से आजकल युवाओं में छोटी-छोटी बात पर उग्र रूप धारण कर लेने की प्रवृत्ति का खुलासा होता है। रविवार को अंबाला कैंट के जगाधरी रोड पर सिया वाटिका में शादी रिसेप्शन पार्टी आयोजित की गई थी। सिया वाटिका पैलेस में डेकोरेशन का काम जसराज उर्फ जस्सा को मिला था। 

रविवार होने की वजह से अंबाला के जैन स्कूल में ड्राइवर का काम करने वाला सोनू भी अपने दोस्त जस्सा के साथ वहां आया हुआ था। पार्किंग एरिया में सात-आठ युवकों ने जस्सा को घेर लिया और बहस करने लगे। यह बहस थोड़ी देर में मारपीट में बदल गई। मारपीट होता देख सोनू और भूपेंद्र बीच-बचाव करने आए। हमलावरों ने सोनू को घेर कर चाकू से हमला किया। पीठ में चाकू घोंप देने से सोनू की तत्काल मौत हो गई और भूपेंद्र गंभीर घायल हो गया। हमलावर भाग खड़े हुए। 

लोगों का अनुमान है कि किसी छोटी-मोटी बात को लेकर हमलावरों में से किसी एक के साथ जस्सा की बहस हुई थी। इस बहस ने ही बात में विकराल रूप धारण कर लिया और बात हत्या तक पहुंच गई। पिछले कुछ दशकों से युवा पीढ़ी लगातार उग्र होती जा रही है। मामूली बात पर हत्या कर देने, आत्महत्या कर लेने या फिर मारपीट कर लेने जैसी घटनाएं अब सामान्य रूप से देखने को मिल रही हैं। इसके कई कारण भी बताए जाते हैं। जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

कम से कम आठ-दस घंटे एकाकी जीवन बिताने वाले बच्चों के मन में अपने परिजनों को लेकर एक आक्रोश पनपने लगता है। ऐसी स्थिति में वह मनमानी करने पर उतारू हो जाते हैं। माता-पिता यदि उनके किसी काम का विरोध करते हैं, तो मन में पहले से ही संचित आक्रोश फूट पड़ता है और वह अपराध कर बैठते हैं। पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती है अथवा माता-पिता कोई स्वरोजगार करवा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, तो वह अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। अपना खर्च चलाने के लिए वह लूटपाट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे अपराध में लिप्त हो जाते हैं। 

मोबाइल पर खेले जाने वाले कुछ गेम्स भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। वह दिमाग को इतना कुंठित कर देते हैं कि वह सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं और अपराध कर बैठते हैं। अशिक्षा, गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं ने युवाओं को इतना निराश कर दिया है कि वह अपने को असहाय समझने लगे हैं। इस असहायता से उपजे क्रोध के कारण भी समाज में आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।

Tuesday, February 24, 2026

चिकित्सक के साथ राजनेता भी थे एंटोनियो एगास मोनिज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एंटोनियो एगास मोनिज ने अपनी खोजों से मानवता की बहुत सेवा की। उन्होंने मस्तिष्क में होने वाली बीमारियों के इलाज और आपरेशन का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने ल्यूकोटॉमी नामक शल्य क्रिया विकसित की जिससे दिमागी बीमारियों के इलाज का रास्ता खुला। 

मोनिज को बचपन से ही दिमाग के रहस्यों को सुलझाने में दिलचस्पी थी। वह मनुष्य के दिमाग को सबसे रहस्यमय मानते थे। जब बड़े हुए तो भी उनके दिमाग में यही बात आती रही कि दिमाग में होने वाली बीमारियों का इलाज कैसे किया जाए और कैसे पता लगाया जाए कि दिमाग के अमुक हिस्से में परेशानी है। मोनिज का जन्म 29 नवंबर 1874 को पुर्तगाल में हुआ था। 

मोनिज ने स्नातक करने के बाद लिस्बन विश्ववद्यिालय में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। इसके बाद मोनिज की यात्रा कभी रुकी नहीं। करीब बारह साल तक बार-बार विफल होने के बाद 1927 में उन्होंने सेरेबल एंजियोग्राफी तकनीक विकसि की जिससे मस्तिष्क की रक्त नलिकाओं की तस्वीर लेना संभव हुआ। इस खोज ने चिकित्सा जगत में नई क्रांति लगा दी इससे मस्तिष्क के रोगों का इलाज संभव हो पाया। 

इस नई खोज के लिए सन 1929 में मोनिज को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। मोनिज को बचपन से ही राजनीति में भी दिलचस्पी थी। वह लोकतंत्र के समर्थक थे। इसके लिए कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन 1900 में वह सासंद चुने गए। उनका परिवार राजशाही का समर्थक था, लेकिन मोनिज लोकतंत्र समर्थक थे। वह स्पेन के राजदूत भी नियुक्त किए गए। 1917 में वह विदेश मामलों के मंत्री भी बनाए गए। 1919 को उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। 13 दिसंबर 1955 को 81 वर्ष की आयु में चिकित्सक और राजनेता मोनिज की मृत्यु हो गई।

सड़कों पर बेलगाम दौड़ती गाड़ियों पर कब लगेगा अंकुश?

अशोक मिश्र

पिछले शनिवार को दिल्ली में एक बेलगाम वर्ना कार ने डिलीवरी ब्वाय  हेम शंकर को कुचल दिया। इलेक्ट्रिक स्कूटी सवार हेम शंकर को टक्कर मारने के बाद भी कार सवार रुका नहीं। राजधानी दिल्ली में आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। अगर हादसों के आंकड़े इकट्ठे किए जाएं, तो पता चलता है कि हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों में अमीरजादों की एक अच्छी खासी संख्या है। कानपुर में ही दस करोड़ की गाड़ी में सवार शिवम मिश्रा ने एक युवक को कुचल दिया और मौके से भाग खड़ा हुआ। 

बाद में लोगों के दबाव पर शिवम मिश्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। उसे गिरफ्तार किया गया। हमारे देश और प्रदेश में ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। अमीर परिवार के लड़के-लड़कियां ट्रैफिक नियमों का पालन करना, अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वह यह समझ लेते हैं कि पैसे के बल पर कुछ भी किया जा सकता है और कुछ भी हासिल किया जा सकता है। 

उन्हें अपने परिवार के पैसे और ओहदे पर बड़ा अभिमान होता है। लग्जरी गाड़ियों पर नंबर प्लेट तक ठीक ढंग से नहीं लगवाते हैं। बेतुकी नंबर प्लेटों को देखकर पता नहीं चलता है कि गाड़ी का नंबर क्या है? ट्रैफिक पुलिस कर्मी भी इन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं। नंबर प्लेटों के साथ खिलवाड़ तो जैसे आम बात हो गई है। कई गाड़ियों में तो नंबर प्लेट बहुत छोटी होती है और उसके ऊपर या नीचे बड़े बड़े अक्षरों में जाति या धर्म सूचक शब्द लिखा होता है, पार्टी का नाम लिखा होता है या फिर कोई धार्मिक चिह्न बना होता है। 

नंबर प्लेट के आसपास ही बड़े बड़े अक्षरों में अटपटे शब्द लिखे होते हैं। यह हाल पूरे हरियाणा का है। राज्य के हर जिले में ऐसी कई गाड़ियां देखने को मिल जाएंगी जिनका नंबर नजदीक से भी देखने पर पता नहीं चलता है। ऐसी स्थिति में इन गाड़ियों के मालिक यदि कोई हादसा करके भाग जाएं, तो इनका पता लगाना काफी मुश्किल होता है। राज्य के हर जिले के प्रमुख चौराहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं। इसके बावजूद इनके खिलाफ शायद ही कार्रवाई की जाती हो। केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के तहत गाड़ियों पर गलत, फैंसी, धार्मिक या अपठनीय नंबर प्लेट लगाने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। 

वैसे तो वाहनों पर हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट को अनिवार्य किया गया है, लेकिन ऐसी प्लेट बहुत ही कम गाड़ियों पर लगी मिलती है। नंबर प्लेट  पर अंग्रेजी अक्षर और अंक ही होने चाहिए, लेकिन कुछ लोग नंबर प्लेट पर ऐसी कलाकारी करवाते हैं कि उसे देखने पर पागल लिखा दिखाई देता है। ऐसी गाड़ियों को चलाना अपराध की श्रेणी में आता है। ट्रैफिक पुलिस यदा-कदा ऐसी गाड़ियों के खिलाफ मुहिम भी चलाती है, लेकिन गाड़ी मालिक जुर्माना अदा करने के बाद फिर से वही करने लगते हैं। ऐसे लोगों पर यदि भारी जुर्माना लगाया जाए या उनका लाइसेंस ही सस्पेंड कर दिया जाए, तो शायद सुधार हो सकता है।

Monday, February 23, 2026

आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, काम से होती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैडम क्यूरी पहली महिला थीं जिन्हें भौतिक और रसायन का नोबल मिला था। पियरे क्यूरी से विवाह करने के बाद वह पूरी दुनिया में मैडम क्यूरी के नाम से जानी गईं। पोलैंड में जन्मी मैडम क्यूरी का वास्तविक नाम मारिया स्क्लाडोवका था। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। 

बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। यह पहला परिवार था जिसने पांच नोबेल पुरस्कार हासिल किया था। इतनी प्रसिद्धि के बावजूद मैडम क्यूरी सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती थीं। पूरी दुनिया में ख्याति के बावजूद वह दिन-रात जब भी मौका मिलता था, वह अपने प्रयोगशाला में प्रयोग करती रहती थीं। पति-पत्नी दोनों वैज्ञानिक थे, इस वजह से दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे। 

एक बार की बात है। एक युवा पत्रकार उनका साक्षात्कार लेने उनके घर आया। उस समय मैडम क्यूरी एक बहुत ही साधारण कपड़े पहनकर बाहर बैठी हुई थीं। उस पत्रकार ने मैडम क्यूरी से पूछा कि क्या तुम यहां की नौकरानी हो? मैडम क्यूरी ने जवाब दिया है-हां, मैं इस घर की नौकरानी हूं। उस पत्रकार ने कहा कि क्या मैडम क्यूरी घर में हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-वह बाहर गई हैं। 

पत्रकार ने पूछा कि वह कब तक आएंगी? क्यूरी ने जवाब दिया-पता नहीं। पत्रकार ने फिर पूछा, कुछ कहकर गई हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-हां, उन्होंने कहा है कि आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, उसके काम से होती है। यह सुनते ही उस पत्रकार ने उन्हें गौर से देखा तो पता लगा कि यही तो मैडम क्यूरी हंै। वह उनकी सादगी से बहुत प्रभावित हुआ।

पेड़ों की अवैध कटान के चलते संकुचित हुआ वन्यजीव गलियारा

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान के चलते वन्य जीवों का गलियारा काफी संकुचित हुआ है। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव यदा कदा मानव बस्तियों में घुस आते हैं। इससे कई बार जनहानि भी होती है। ज्यादातर मामलों में समय पर पता लग जाने की वजह से लोग उन्हें विभिन्न उपायों से जंगल की ओर भगा देते हैं। मानव हस्तक्षेप की वजह से वन्य जीवों के लिए स्वाभाविक ईको सिस्टम अरावली क्षेत्र में प्रभावित हो रहा है। 

लेकिन यह प्रभाव किस रूप में पड़ रहा है, वन्य जीवों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है, इसका भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सन 2017 से अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती ही नहीं हुई है। हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि जल्दी ही अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती कराई जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी आबादी कितनी बढ़ी या घटी। 

पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2017 के सर्वे में 31 तेंदुए मिले थे। अनुमान है कि अब यह संख्या बढ़कर 80-90 के करीब हो सकती है। उस सर्वे में यह भी पता चला था कि सन 2017 में 167 नीलगाय, 126 लकड़बग्घे, 26 जंगली बिल्लियाँ, 91 पोरक्यूपाइन (साही), 50 नेवले, चार लोमड़ी, और 61 ताड़ के सिवेट भी रिकॉर्ड किए गए थे। रिपोर्ट में 14 चिंकारा और 23 मोर के साथ दूसरे जानवर दिखने की बात भी कही गई थी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वन्यजीवों की गिनती कराने का प्रयास नहीं किया था। 

2017 के बाद देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को सर्वे का काम सौंपा गया था। अरावली क्षेत्र में बड़े जोर-शोर से सर्वे भी किया गया था, लेकिन इंस्टीटूयूट ने अभी तक सर्वे रिपोर्ट भी जारी नहीं की है। प्रदेश सरकार ने कई बार सर्वे रिपोर्ट भी मांगी, लेकिन इंस्टीट्यूट ने जवाब देना उचित ही नहीं समझा। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि एक बार नए सिरे से वन्यजीवों की गिनती कराई जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक स्थिति क्या है? यदि वन्य जीवों की संख्या घट रही है, तो इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए। 

यह पता लगाया जाए कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से जीवों की संख्या घट रही है। उन कारणों को दूर करके वन्य जीवों की आबादी बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाए। यदि बढ़ रही है, तो भी उन कारणों को चिन्हित किया जाए, ताकि इसका उपयोग दूसरी जगहों पर किया जा सके। हमें दोनों हालात की जानकारी होनी चाहिए। पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। 

रसूख वाले लोग अपने फार्म हाउस, मैरिज हाल आदि बनवाकर वन्य जीवों के रहन-सहन को बाधित कर रहे हैं। वन्यजीव गलियारे में इंसानों के आवागमन की वजह से उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

Sunday, February 22, 2026

अपनी समस्या तुम्हें खुद सुलझानी होगी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मन की शांति, सुख और दुख जैसी भावनाएं प्रत्येक मनुष्य में पैदा होती हैं। लेकिन अगर किसी को सुख की अनुभूति हो रही है, तो वह किसी दूसरे के काम आने वाली नहीं है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति प्रसन्न है, तो उसकी अनुभूति उस व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और बेटा-बेटी को नहीं होगी। 

हर व्यक्ति को अपना सुख-दुख खुद ही भोगना पड़ेगा। यही प्रकृति का नियम है। एक समय की बात है। एक सेठ किसी नगर में रहता था। उसने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी काफी सभ्य और सुशील था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस सेठ के मन में शांति नहीं थी। 

वह हर समय परेशान रहता था। वह सोचता रहता था कि उसके मन को शांति कैसे मिले? एक दिन उसने सुना कि उसके शहर में एक साधु आए हैं। वह लोगों की समस्याओं का निराकरण करते हैं। सेठ भी अपनी समस्या को लेकर साधु के पास गया। साधु ने उसकी परेशानी सुनकर अगले दिन आने को कहा। सेठ अगले दिन साधु के पास पहुंचा, तो साधु ने कड़कती धूप में बिठा दिया और खुद पेड़ की छांव में बैठ गया। 

तीन चार घंटे बाद साधु ने अगले दिन दोबारा आने को कहा। अगले दिन सेठ को तो साधु ने भूखा-प्यासा रखा और खुद तरह-तरह के पकवान खाता रहा। साधु ने तीसरे दिन उसे आने को कहा। तीसरे दिन सेठ गुस्से से तमतमाता हुआ साधु के पास पहुंचा और बोला-मैं आपके पास अपनी समस्या का हल पाने आया था, आप तो मुझ पर अत्याचार कर रहे हैं। 

साधु ने कहा कि मैं आपको यही समझाना चाहता था कि आपको अपनी समस्या खुद ही सुलझानी होगी। आपको ऐसे कर्म करने होंगे जिससे आपके मन को शांति मिले। सेठ की समझ में अब बात आ गई थी।

दुष्कर्म पीड़िताएं सहानुभूति की हकदार, घृणा की नहीं

अशोक मिश्र

गुरुग्राम के सेक्टर 37 में गुरुवार को एक ऐसी घटना सामने आई जिससे लगा कि अब इंसान हैवान से भी बदतर होता जा रहा है। सेक्टर 37 में रहने वाले एक युवक ने तीन साल की मासूम बच्ची को पहले बहलाया-फुसलाया और घर से करीब साढ़े तीन किमी दूर ले जाकर पहले उसके साथ दुराचार किया और बाद में गला दबाकर हत्या कर दी। आरोपी युवक को पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पहचाना। 

इंसान अब इतना पतित हो गया है कि वह मासूम बच्चियों के साथ दुराचार करने में भी नहीं हिचक रहा है। गुरुवार को ही उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पचास  से अधिक बच्चों के यौन शोषण और उनकी वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डालने के दोषी पति-पत्नी को फांसी की सजा सुनाई गई है। बांदा जिला कोर्ट के जज तो इन हैवानों की करतूत से इतना नाराज थे कि उन्होंने कहा, इन दरिंदों को तब तक फांसी पर लटाए रखो, जब तक इनकी मौत न हो जाए। पति रामभवन सिंचाई विभाग में इंजीनियर था और उसकी पत्नी दुर्गावती हाउस वाइफ। सीबीआई ने इन दोनों को 18 नवंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। 

इन दोनों पर बच्चों का यौन शोषण करने, अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने का आरोप था। बताया जाता है कि पचास से अधिक बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए थे। ऐसे लोगों को फांसी की सजा ही मिलनी चाहिए थी। इन दोनों दोषियों ने बच्चों का जीवन नर्क बना दिया है। जितने बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए हैं, वह आजीवन इस घटना को भूल नहीं पाएंगे। बलात्कार और दुष्कर्म का दंश पीड़ितों को आजीवन सालता रहेगा। भारतीय समाज में बलात्कार का शिकार हुए लोग आजीवन सुख की नींद नहीं सो पाते हैं। 

यदि किसी पुरुष के साथ दुराचार होता है, तो वह समाज में अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं माना जाता है। ऐसा ही महिलाओं के साथ भी होता है। समाज और रिश्तेदार तो सबसे पहले पीड़िता को ही दोष देने लगते हैं। वह यह समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि पीड़िता किस परेशानी के दौर से गुजर रही है। उसकी मनस्थिति क्या है? पीड़िता के परिजन भी पहले मामले को दबाने का प्रयास करते हैं, ताकि समाज में उन्हें नीचा न देखना पड़े। वहीं दूसरी ओर बलात्कार करने वाला समाज में अपना सिर उठाकर चलता है, मानो उसने कोई बहादुरी का काम किया हो। समाज की यह दोहरी मानसिकता पीड़िता को और भी परेशान करती है। 

यहि किसी को पीड़िता के बारे में पता चल जाए, तो लोग उसे सहज उपलब्ध मान लेते हैं। कई बार तो पीड़िता को उन लोगों की भी हैवानियत का शिकार होना पड़ता है जिससे उसे सहायता की उम्मीद होती है। जब तक समाज अपनी दोहरी मानसिकता से मुक्त नहीं होता, तब तक दुष्कर्म पीड़िताओं को सहानुभूति और न्याय नहीं मिल सकता है। पीड़िताएं सहानुभूति और सम्मान की हकदार हैं, घृणा की नहीं।

Saturday, February 21, 2026

महात्मा बुद्ध ने सुप्पिया को दिलाई मुक्ति


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के एक शिष्य थे सुप्पिया। सुप्पिया का जन्म उस जाति में हुआ जिसमें पैदा हुए लोगों को मरे हुए पशुओं की खाल उतारना और उन्हें ठिकाने लगाना था। इसकी वजह से उन्हें बहुत अपमान सहना पड़ता था। उस समय का समाज छुआछूत और जाति-पाति के विचारों को बहुत मानता था। उच्च जाति के लोग अपने से निम्न जाति के लोगों को बहुत हेय दृष्टि से देखते थे। 

उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार भी होता था। सुप्पिया इस बात से बहुत परेशान थे। वह इस अपमान से मुक्त होना चाहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि उसके गांव के पास में ही महात्मा बुद्ध आए हैं, जो अपने उपदेशों से लोगों का जीवन बदल देते हैं। सुप्पिया के मन में भी इच्छा जागी कि वह उस संत से मिलें। लेकिन फिर उनके मन में आया कि लोग उन्हें उनसे मिलने नहीं देंगे। लेकिन वह अपने मन को कड़ा करके महात्मा बुद्ध से मिलने गए। 

महात्मा बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा कि तुम कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो। सुप्पिया ने अपनी दशा बताते हुए इन परेशानियों से मुक्ति की कामना प्रकट की। महात्मा बुद्ध  ने सुप्पिया को समझाते हुए कहा कि जब भी निर्मल मन से प्रत्येक व्यक्ति को  एक समान समझता है। लोगों के साथ दया, ममता और अहिंसक व्यवहार करता है, वह किस जाति में पैदा हुआ है, इससे कोई फर्कनहीं पड़ता है। 

मानवता का किसी जाति से कोई लेना देना नहीं है। सुप्पिया ने बुद्ध से कहा कि मैं मुक्त होना चाहता हूं। बुद्ध ने अपने संघ में भिक्षुक बना लिया। सुप्पिया ने बुद्ध के मार्गदर्शन में कठोर साधना की। वे संघ के अन्य भिक्षुओं की तरह नियमों का पालन करते थे और अपनी साधना में पूरी तरह से लीन रहते थे। 

बुद्ध ने उन्हें शिक्षा दी कि समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखना चाहिए और उनके दु:ख को समझकर उनकी मदद करनी चाहिए। धीरे-धीरे सुप्पिया ने अपनी साधना में प्रगति की और अंतत: उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। 

परीक्षा के तनाव में जी रहे विद्यार्थी शादियों में बज रहा कानफोड़ू डीजे


अशोक मिश्र

हरियाणा में जहां वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है, वहीं ध्वनि प्रदूषण भी कम परेशान करने वाला नहीं है। सड़कों पर तेज हार्न बजाकर दौड़ती हुई गाड़ियां सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण पैदा करती हैं। हरियाणा में विशेषकर गुरुग्राम, फरीदाबाद और रोहतक जैसे शहरी व औद्योगिक क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर खतरनाक है, जो अक्सर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों (दिन में 55 डेसिबल से कम) से काफी ऊपर रहता है। इन दिनों शादियों का मौसम है। 

रात में निकलने वाली बारात के दौरान बजने वाले डीजे लोगों को काफी परेशानी में डाल रहा है। उच्च रक्तचाप की बीमारी से ग्रसित लोगों के हृदय में डीजे बजते समय कांपने लगते हैं। आसपास की इमारतों में कंपन पैदा होने लगता है। कई बार तो ऐसा महसूस होता है कि यदि तनिक भी डीजे का शोर अधिक हुआ, तो इमारत भरभरा कर गिर जाएगी। राज्य के औद्योगिक शहरों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा है। 

ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहनों का हॉर्न, निर्माण कार्य और जनरेटर के साथ-साथ शादियों में बजने वाले डीजे हैं। ध्वनि प्रदूषण पर नजर रखने के लिए तो फरीदाबाद में पहले वास्तविक-समय ध्वनि निगरानी स्टेशन स्थापित किए गए हैं। वैसे तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग अलग मानक तय किए हैं, लेकिन इन मानकों का उल्लंघन हर जगह होता दिखाई दे जाएगा। बोर्ड के नियमानुसार, अस्पतालों के आसपास दिन में 50 डेसिबल और रात में 40 डेसिबल से कम ही शोर होना चाहिए ताकि मरीजों की नींद में किसी प्रकार का खलल न पड़े, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। 

गाड़ियों के हॉर्न बजते रहते हैं। डीजे वाले भी अस्पताल का ध्यान नहीं रखते हैं। कुछ ही दिनों में राज्य में बोर्डों की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। इसके बाद नौवीं और ग्यारहवीं की परीक्षाएं होंगी। छोटे बच्चों की भी परीक्षाएं निकट भविष्य में होनी हैं। बच्चे तनाव में हैं। जल्दी से जल्दी कोर्स पूरा करने का उन पर दबाव भी है। वह अधिक से अधिक समय तक पढ़ाई करना चाहते हैं। लेकिन उनके आसपास होने वाला शोर उनकी मेहनत पर पानी फेर रहा है। बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं। 

ध्वनि प्रदूषण के चलते उनकी मानसिक शांति खत्म हो रही है। उनमें हाईपर टेंशन, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है। कई बार तो तनाव में वह उग्र भी हो रहे हैं। चिकित्सकों का यह भी कहना है कि तेज आवाज वाले डीजे या हाई डेसिबल वाली ध्वनि केवल कानों के पर्दे को ही नुकसान नहीं पहुंचाती है, बल्कि दिल के रोगियों के लिए कई बार जानलेवा हो जाती है। अचानक तेज आवाज होने से शरीर स्ट्रेस रिस्पांस सक्रिय करके एड्रेनॉलिन बढ़ाता है जिसकी वजह से धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। इससे लोगों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।