Thursday, April 9, 2026

ईरान का न्यायप्रिय बादशाह नौशेरवां


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ईरान में एक बहुत ही न्यायप्रिय और राज्य संचालन में कुशल बादशाह हुआ है जिसे नौशेरवां के नाम से जाना जाता है। इतिहास और ईरानी कथाओं में उसका वास्तविक नाम खुसरो प्रथम बताया जाता है। वह सासानियन बादशाह कोबाद का पुत्र था। बाद में वह नौशेरवां-ए-आदिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

कहा जाता है कि जब खुसरो छोटा था, तो उसके पिता कोबाद के दरबार में सीरिया निवासी माजदक नामक व्यक्ति आया और उसने खुद को पैगंबर बताया। बादशाह कोबाद उसके विचार से बहुत प्रभावित हुआ। उसे अपना मंत्री और कोषाध्यक्ष बना दिया। माजदक ने बाहशाह को समझाया कि संपत्ति और महिलाओं पर सबका साझा अधिकार होना चाहिए। पुरुषों को इनसे कोई लगाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिशोध, लोभ और वासना जैसे पाँच दुर्गुणों को जन्म देते हैं। 

कुछ ही दिनों में माजदक ने ईरान में अपने हजारों अनुयायी बना लिए जो समाज के निचले तबके के लोग थे। एक दिन माजदक ने बादशाह की पत्नी यानी खुसरो की माता पर अपना हक जताया। इसका खुसरो ने विरोध किया। माजदक ने बादशाह से खुसरो की शिकायत की। खुसरो ने अपने पिता से माजदक को विश्वासघाती और समाज के लिए बुरा आदमी बताया। 

उन्होंने छह महीने में उसके खिलाफ सबूत पेश करने का भी दावा किया। कुछ ही दिनों में खुसरो ने सबूत के साथ माजदक का पर्दाफाश कर दिया। माजदक और उसे शिष्यों को मृत्युदंड दिया गया। पिता के बाद खुसरो ने  531 ईस्वी से 579 ईस्वी तक शासन किया। वे ईरान के सबसे प्रसिद्ध और सफल शासकों में से एक थे। शतरंज और बैकगैमोन जैसे खेलों की शुरुआत उनके शासनकाल में हुई थी। उनके शासनकाल में किसानों से लगान की वसूली भी खत्म कर दी थी।

किसानों को रुला रही बेमौसमी बारिश और मंडियों की अव्यवस्था


अशोक मिश्र

मार्च के साथ-साथ अप्रैल में भी पश्चिमी विक्षोक्ष के कारण उत्तर पश्चिमी और मध्य भागों में कुछ दिनों के अंतराल में बारिश हो रही है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ओलावृष्टि भी हुई है। तेज रफ्तार से हवाएं भी चली हैं। अप्रैल महीने का पहला पखवाड़ा भी कुछ ही दिनों में बीत जाएगा। इसके बावजूद होने वाली बरसात से निजात मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। 

वैसे तो हरियाणा सरकार ने घोषणा की है कि प्रदेश की मंडियों में पहुंचने वाली फसलों को जरूर खरीदा जाएगा। प्रदेश के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राजेश नागर ने तो यहां तक घोषणा की है कि किसानों की फसल का एक-एक दाना न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा। लेकिन प्रदेश की मंडियों के जो हालात हैं, उसको देखते हुए ऐसा नहीं लगता है। हथीन अनाज मंडी की ही बात करें, तो मंगलवार को मंडी में किसानों द्वारा लाए गए गेहूं के 540 गेट पास तो काटे गए, लेकिन खरीद एजेंसी हरियाणा वेयर हाउस ने एक दाना गेहंू की खरीद नहीं की। यह स्थिति तो केवल एक बानगी है। 

एजेंसी ने गेहूं की खरीद इसलिए नहीं की क्योंकि बेमौसमी बरसात के चलते गेहूं में नमी बढ़ गई थी और गेहूं के दाने का रंग भी बदल गया था।  बेमौसमी बरसात के चलते किसानों को काफी नुकसान हो रहा है। प्रदेश में जब भी बादल मंडराते हैं, तो किसानों के चेहरे रुआंसे हो जाते हैं। मौसम पर उनका कोई नियंत्रण भी नहीं है। जब-जब  बरसात होती है, तो उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। वह बेबस होकर अपनी मेहनत से उगाई गई फसल को बरबाद होते देखते हैं और मन मसोसकर रह जाते हैं। 

जिन किसानों ने गेहूं की फसल काट ली है और अभी दाना नहीं निकाला है, उन किसानों को चिंता यह सता रही है कि दाने भीग गए, तो उनकी गुणवत्ता कम हो जाएगी। मंडियों में उन्हें कम दाम मिलेगा। दानों के अंकुरित हो जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। यह समय कटाई का है। खेतों में खड़ी फसल तेज हवाओं और बारिश के चलते बिछ गई है। इससे पैदावार में 20-30 से लेकर 50-70 प्रतिशत तक नुकसान की आशंका है। सरसों, चने और मटर की फसल को भी ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से पहले ही भारी नुकसान पहुँच चुका है। 

रह-रह कर बरसात होने की वजह से फसलों की कटाई में भी देरी हो रही है। उधर जो किसान किसी तरह अपनी फसल को लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं, उन्हें वहां भी अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। कहीं नमी ज्यादा बताकर फसल खरीदी नहीं जा रही है, तो कहीं ज्यादा किसानों के आ जाने से उनका अनाज मंडी के बाहर खुले में पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में यदि बारिश हो जाती है, तो उनकी फसलों को भीगना पड़ता है। उनकी कीमत भी भीगने की वजह से कम हो जाती है।

Wednesday, April 8, 2026

अरे मूरख! तू किस भगवान की आराधना करेगा?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महाराष्ट्र के पैठण में संत एकनाथ का जन्म 1533 में हुआ था। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास की तरह इनका भी जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। संयोग से इनके माता रुक्मिणी और पिता सूर्य नारायण की मृत्यु भी इनके जन्म के कुछ समय बाद हो गई थी। इनका पालन पोषण इनके दादा  चक्रपाणि की देख-रेख में हुआ था। 

चक्रपाणि के पिता संत भानुदास बिट्ठल के अनन्य भक्त थे। संत एकनाथ ने भी अपने पड़दादा संत भानुदास के ही मार्ग का अनुसरण किया। महाराष्ट्र में सबसे बड़े संत के रूप में पूजे जाने वाले संत एकनााथ ने उन्हीं लोगों को दीक्षा दी जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों को पूरा कर लिया था। वे लोग भी एकनाथ के शिष्य बने जिन्होंने सांसारिक दायित्वों को स्वीकार ही नहीं किया था। 

अपने गुरु जनार्दन स्वामी के आदेश पर एकनाथ ने गृहस्थ जीवन स्वीकार किया था। एक दिन की बात है। एक गृहस्थ उनके पास आया और बोला, गुरुजी, मुझे अपना शिष्य स्वीकार कीजिए। मुझे दीक्षा दीजिए। मैं सांसारिक मोह त्यागकर संन्यास धारण करना चाहता हूं। 

संत एकनाथ ने उससे पूछा कि क्या तुमने अपने गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों को पूरा कर लिया है? क्या तुम्हारे परिवार ने तुम्हें संन्यास धारण करने की अनुमति प्रदान कर दी है? उस आदमी ने कहा कि गुरु जी, मैं अपनी पत्नी और बच्चों को सोते समय छोड़कर आया हूं। 

एकनाथ ने उस व्यक्ति को फटकारते हुए कहा कि अरे अज्ञानी, तू किस भगवान की आराधना, सेवा करेगा। असली भगवान को तो तू घर ही छोड़कर चला आया है। तेरा परिवार ही भगवान का स्वरूप है। ऐसे में तेरा संन्यास विफल ही रहेगा। यह सुनकर गृहस्थ को अपनी गलती का एहसास हुआ और क्षमा मांगते हुए अपने घर को लौट गया।

बच्ची से दुष्कर्म मामले में पुलिस का रवैया रहा संवेदनहीन


अशोक मिश्र

बलात्कार का मामला हमेशा संवेदनशील माना जाता रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से पहले भी जब समाज में सामंती व्यवस्था थी, तब भी यह संवेदनशील ही रहा है। इन दिनों गुरुग्राम की तीन साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार का मामला चर्चा में है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट ने जो रवैया अख्तियार किया है, उससे समाज में यह संदेश जरूर गया है कि लोगों को अगर अदालतों पर भरोसा होता है, तो वह कतई गलत नहीं है। 

अदालतों में बैठे न्यायमूर्ति किसी भी हालत में पीड़ित को न्याय दिलाकर ही रहते हैं। गुरुग्राम के सेक्टर 54 की एक सोसायटी में रहने वाली तीन साल की एक बच्ची के साथ दो नौकरानियों और उनके एक पुरुष साथी ने दो महीने तक कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया। बच्ची को डराया धमकाया भी गया। जब उत्पीड़न कुछ ज्यादा ही होने लगा, तो चार फरवरी को बच्ची ने अपने साथ हो रहे अमानवीय कृत्य की जानकारी अपनी मां को दी। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। जब कोई मामला पुलिस तक पहुंचता है, तो लोगों को यह विश्वास होता है कि पुलिस अब दोषियों को पकड़कर न्याय दिलाएगी। 

लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। पुलिस ने बच्ची का बयान लेते वक्त आरोपियों को भी वहीं खड़े रहने की इजाजत दी। आरोपियों की मौजूदगी में बच्ची घबराई रही। मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर ने भी लापरवाही बरती। कुल मिलाकर जब यह मामला सुप्रीमकोर्ट के सामने आया, तो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश यह जानकर दंग रह गए कि इतने संवेदनशील मामले में कितनी लापरवाही बरती गई। 

सुप्रीमकोर्ट पुलिस, डॉक्टर सहित उस घटना से जुड़े सभी पक्षों की लापरवाही पर न केवल नाराज हुआ, बल्कि कड़ी फटकार लगाई। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में एक विशेष जांच टीम गठित करने के साथ-साथ बच्ची का बयान दोबारा लेने का आदेश दिया है। टीम में महिला अधिकारी अनिवार्य रूप से रहेगी। सादी वर्दी में बच्ची के घर जाकर पुलिस जांच करेगी। 

बच्ची से बातचीत करते समय मनोचिकित्सक और चाइल्ड काउंसलर भी मौजूद रहेंगे ताकि बच्ची सहज होकर अपनी बात कह सके। जिस तरह सुप्रीमकोर्ट ने अपनी संवेदनशीलता परिचय देते हुए मामले को सुलझाने का प्रयास किया है, वह वंदनीय है। सच तो यह है कि दुराचार किसी भी महिला या बच्ची के साथ किया गया हो, उसकी पीड़ा पीड़िता को आजीवन भोगती है। वह बलात्कार के दंश से जीवन भर उबर नहीं पाती है। वह काफी प्रयास के बावजूद एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन नहीं गुजार पाती है। 

उसका अतीत उसे चैन से जीने नहीं देता है। दुख की बात तो यह है कि ज्यादातर मामले में समाज पीड़िता को ही दोषी मानकर उपेक्षा करता है। उसकी खिल्ली उड़ाता है। उसे प्रताड़ित करता है। यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में पीड़िता न्यायालय की चौखट तक नहीं पहुंच पाती है।

Tuesday, April 7, 2026

द मदर ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट रोजा पार्क्स


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रोजा लुईज मक्कॉली पार्क्स का नाम अमेरिकी-अफ्रीकी अश्वेत नागरिकों में आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। पार्क्स का जन्म 4 फरवरी 1913 को अमेरिका के टस्कागी में एक साधारण परिवार में हुआ था। जीवन यापन के लिए उन्होंने कई तरह के काम किए। बचपन में पार्क्स ने अपनी दादी और मां से रजाई सिलना सीखा था। ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने अपनी स्कूल की पोशाक तक सिल ली थी। 

सन 1932 में रोजा ने मोंटगोमरी के रेमंड पार्क्स से विवाह कर लिया जो पेशे से नाई थे। रेमंड उन दिनों सामाजिक सुधार के लिए आंदोलन चलाने वाले संगठन के सदस्य भी थे। इसका प्रभाव रोजा पार्क्स पर भी पड़ा। 1 दिसंबर 1955 की बात है। एक दिन अपने काम से वापस आते समय वह एक बस में चढ़ी और टिकट लेकर अश्वेतों के लिए तय सीट पर बैठ गईं।  

उन दिनों अमेरिका में बसों में श्वेत और अश्वेत लोगों के लिए अलग-अलग सीटें तय थीं। जब श्वेत लोगों की संख्या ज्यादा होने पर उनकी निर्धारित सीटें भर जाती थीं, तो अश्वेतों को अपनी सीट खाली करनी पड़ती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। श्वेत लोगों की सभी सीटें भर गई थीं। बस चालक जेम्स एफ. ब्लेक ने एक श्वेत यात्री के लिए पार्क्स से अपनी सीट छोड़ने के आदेश दिया। 

पार्क्स ने सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। पार्क्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय ने बस सेवा का 381 दिनों तक बहिष्कार किया। इस आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर सहित कई प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया। अंत में अदालत ने बसों में किए जाने वाले नस्लीय भेदभाव को असंवैधानिक करार दिया। 

अपने साहस से पार्क्स ने अमेरिकी इतिहास बदल दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस ने द फर्स्ट लेडी आॅफ सिविल राइट्स (नागरिक अधिकारों की पहली औरत) और द मदर आॅफ द फ्रीडम मूवमेंट (आजादी लहर की माँ) नामों से पुकारा। 

हरियाणा में हार्ट अटैक से होने वाली मौत का आंकड़ा बढ़ना चिंताजनक

अशोक मिश्र

करीब तीन दशक पहले तक लोग बातचीत के दौरान कहा करते थे कि अगर पहले से ही कोई हृदय संबंधी रोग नहीं है, तो तीस-पैंतीस साल की उम्र वाले व्यक्ति को हार्टअटैक नहीं आता है। यह केवल एक मिथक था। अब तो हालत यह है कि पंद्रह सोलह साल तक के बच्चों की हार्टअटैक या हार्ट फेलियर से मौत हो रही है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कोरोना काल के बाद हार्ट अटैक या हार्ट फेल से होने वाली मौत के आंकड़ों में भारी वृद्धि हुई है। कुछ लोगों ने तो यहां तक अफवाह फैलाई थी कि कोरोना से बचने के लिए लगाए गए टीके की वजह से हार्ट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। 

हालांकि केंद्र सरकार ने इस बात को सख्ती से नकार दिया था। स्वास्थ्य विभाग की तमाम जांच रिपोर्टों में भी इस बात की पुष्टि नहीं हुई थी। लेकिन यह बात भी सच है कि हार्टअटैक की वजह से हरियाणा में भी मौतों के आंकड़े बढ़ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण लोगों की खराब जीवन शैली और खानपान को माना जा रहा है। इसके अलावा कम उम्र में लोगों का डायबिटीज अथवा ब्लड प्रेशर जैसे रोग का शिकार होना भी हार्ट अटैक का कारण बन रहा है। जैसे-जैसे परिवार में सुख-सुविधाओं का स्तर बढ़ रहा है, लोगों ने पैदल चलना या शारीरिक श्रम करना एक तरह से बंद ही कर दिया है। 

सड़कों पर अब तो साइकिल चलाता हुआ कोई शायद ही दिखता हो। पैदल चलने से भी लोग कतराने लगे हैं। शारीरिक श्रम और देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने की संस्कृति ने लोगों को बीमारियों का घर बना दिया है। पिछले महीने हरियाणा विधानसभा सत्र के दौरान प्रदेश में हार्ट अटैक या हार्ट फेल से होने वाली मौतों का आंकड़ा पेश किया गया था। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में 17,973 (लगभग 18 हजार) युवाओं की मौत हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर से हुई है।

 इन आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा में हर दिन 18 से 45 वर्ष के करीब आठ युवाओं की जान हार्ट अटैक से जा रही है। इसी वर्ष जनवरी में ही प्रदेश में 391 लोग हार्ट अटैक से अपनी जान गंवा चुके थे। अगर पिछले छह साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 2020 में 2,394 मौतें हुई थीं। साल 2021 में 3,188, 2022 में 2,796, 2023 में 2,886, 2024 में 3,063 और साल 2025 में 3,255 लोग हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर से अपनी जान गंवा चुके हैं। यमुनानगर में पिछले छह वर्षों में सबसे अधिक 2400 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं, जबकि गुरुग्राम में 594 और रोहतक में 201 मौतें रिकॉर्ड की गईं।

इसके बावजूद सरकार सरकारी अस्पतालों में हृदय रोगियों के लिए अच्छी व्यवस्था कर पाने में विफल रही है। सरकारी अस्पतालों में दिल की बीमारियों के इलाज के लिए सस्ती और अच्छी सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में लोगों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।

Monday, April 6, 2026

एक पतवार से कहीं नाव चलती है क्या?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बहुत सारे व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो लक्ष्य तो तय कर लेते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम होता है कि वह लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी होता है कि किसी योग्य व्यक्ति का मार्ग दर्शन मिले। फिर उस व्यक्ति में अपने लक्ष्य के प्रति संकल्प और समर्पण हो, तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। 

यही बात एक संत ने अपने शिष्यों को समझाया था। बात कुछ ऐसी है कि एक दिन एक संत अपने शिष्यों को लक्ष्य के बारे में बता रहे थे। संत के एक शिष्य ने पूछा, गुरुदेव! लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या करना चाहिए। संत ने जवाब दिया कि जिस प्रकार पक्षियों को उड़ने के लिए दो पंख चाहिए. ठीक उसी प्रकार अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यक्ति को संकल्प और समर्पण चाहिए। 

शिष्य ने पूछा कि संकल्प या समर्पण में से किसी एक से काम नहीं चल सकता है क्या? तब संत ने कहा कि कल हम इस बात का जवाब देंगे। अगले दिन संत अपने शिष्यों को एक नाव पर बैठ गए। जब पतवार चलाने की बारी आई, तो संत ने कहा कि आज मैं नाव खेता हूं। 

उन्हें एक पतवार ली और नाव चलाने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि एक ही पतवार की वजह से नाव वहीं चक्कर काटने लगी। संत के ऐसा करते हुए आधा घंटा बीता, एक घंटा बीता, फिर भी नाव वहीं चक्कर काटती रही। तब एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी, एक पतवार से कहीं नाव चलती है? संत ने मुस्कुराते हुए कहा कि तो फिर केवल संकल्प या समर्पण में से किसी एक से लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? 

शिष्यों की समझ में अब बात आ गई थी कि अगर किसी लक्ष्य को हासिल करना हो, तो उसके लिए संकल्प के साथ-साथ समर्पण की आवश्यकता होती है।

जानलेवा साबित हो रही वाहन चलाते समय युवाओं की लापरवाही

अशोक मिश्र

पिछली 27 मार्च को करनाल में नाबालिग कार चालक ने जो कारनामा अंजाम दिया, उससे यह पता चलता है कि आज की युवा पीढ़ी को न तो कानून का भय है, न ही किसी की जान जाने की रत्ती भर फिक्र। 27 मार्च को करनाल स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलिस कर्मी कुलबीर और एक अन्य कर्मचारी के सााथ ड्यूटी कर रहे थे। उन दोनों के सामने एक नई स्विफ्ट गाड़ी आई जिसके शीशों पर काली फिल्म चढ़ी थी और कार का नंबर प्लेट भी गायब था। कुलबीर ने उस गाड़ी को रोकने का इशारा किया, लेकिन कार चालक ने गाड़ी रोकने की जगह पर रफ्तार तेज कर दी और कुलबीर को टक्कर मार दिया। 

नतीजा यह हुआ कि टक्कर लगने से कुलबीर आगे की ओर उछले और कार के बोनट पर लटक गए। चालक काफी दूर तक कुलबीर को बोनट पर लटकाकर ले गया। किसी तरह जान बचाकर कुलबीर बोनट से उतरा। इसी बीच कुछ लोगों ने घटना की वीडियो बना ली। मामले की रिपोर्ट दर्ज होने के सात दिन बाद नाबालिग कार चालक को गिरफ्तार कर लिया गया है। 

कहा जाता है कि घटना के वक्त कार में एक लड़की भी थी। नाबालिग के इस आचरण से साफ पता चलता है कि आज की युवा पीढ़ी यानी जेन-जेड को किसी कायदे-कानून की फिक्र नहीं है। उन्हें मालूम है कि यदि उनसे कुछ गलत भी हो गया, तो उनके मां-बाप उन्हें बचाने में अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। इस तरह के मामलों में दोषी पाए गए कुछ युवाओं को अपने अमीर मां-बाप पर बहुत ज्यादा भरोसा होता है। वैसे भी कई जेन जेड युवाओं को 'हेलिकॉप्टर पेरेंट्स' यानी अत्यधिक सुरक्षा देने वाले माता-पिता ने पाला होता है। 

इससे उनकी आत्म निर्भरता की कमी आ जाती है, लेकिन वह अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी अपने परिजनों पर निर्भर होकर रह जाते हैं। उनके माता-पिता भी अपने व्यवहार से यह एहसास दिलाते रहते हैं कि वे स्पेशल हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वह काफी हद तक लापरवाह और जिद्दी हो जाते हैं। इस वजह से उनमें 'एंटाइटेलमेंट' यानी हर चीज पर हक जताने का भाव पैदा हो जाता है। यही भाव जेन जेड को लापरवाह बना देता है। 

जेन जेड के मामले में अक्सर यह देखा गया है कि उनमें पैदा हुई लापरवाही उनके मानसिक थकान का परिणाम होती है। नई पीढ़ी के सोशल मीडिया और इंटरनेट ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की वजह से इन्हें अगर किसी चीज की जरूरत है, तो वह चीज तुरंत चाहिए। धैर्य की कमी इनके व्यवहार में लापरवाही के रूप में दिखती है। हमेशा आॅनलाइन रहने के कारण, दूसरों के जीवन की तुलना अपने वास्तविक जीवन से करने से यह पीढ़ी चिंता, अवसाद और सामाजिक अलगाव का शिकार हो रही है। यही वजह है कि नई पीढ़ी हर मामले में लापरवाह दिख रही है। सड़क पर वाहन चलाने के मामले में भी।

Sunday, April 5, 2026

लोग कमियां ही कमियां गिना देंगे

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान चाहे जितना भी गुणी हो, लोग उसमें कोई न कोई दोष निकाल ही लेते हैं। यही इंसान की प्रवृत्ति होती है। यदि किसी को खुद के दोष खोजने को कहा जाए, तो वह अपने आपको दुनिया का सबसे अच्छा आदमी ही बताएगा। लोगों को अपने अवगुण और दूसरों में गुण कभी दिखाई नहीं देते हैं। 

एक बार की बात किसी जगह पर एक चित्रकार रहता था। वह बहुत अच्छा चित्रकार था। लोग उसके चित्रों के मुरीद थे। वह कई कला प्रतियोगिताओं में विजेता भी रह चुका था। उसके बावजूद उसके मन में भावना बार-बार घर कर जाती थी कि लोग उसकी कला को किस रूप में लेते हैं, इसका पता लगाया जाए। यदि उसकी कला में किसी प्रकार की कमी है, तो उसको सुधारा जाए। 

एक दिन उसने एक बहुत सुंदर चित्र बनाया और उसे ले जाकर एक चौराहे पर यह लिखते हुए टांग दिया कि यदि कोई कमी रह गई हो, तो बताएं। अगले दिन वह जब उस जगह पहुंचा, तो देखा कि चित्र बदरंग हो चुका था और उस पर लोगों ने कमियां ही कमियां अंकित कर रखी थीं। लोगों ने कमी बताने में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती थी। 

चित्रकार दुखी हुआ। उसने यह बात अपने एक मित्र से बताई। उस मित्र ने कहा कि अच्छा एक काम करो, एक चित्र दूसरी जगह लगाकर लिखों कि इस चित्र की कमियों को सुधार दो। चित्रकार ने ऐसा ही किया। दूसरे दिन उसने देखा कि चित्र ज्यों का त्यों था। 

किसी ने उसे सुधारा नहीं था। जबकि यह चित्र पहले की अपेक्षा साधारण किस्म का था। तब चित्रकार को उसके मित्र ने समझाया कि लोग अच्छे भले आदमी में भी हजार कमियां निकाल देंगे, लेकिन अगर उसमें सुधार करना हो, तो कोई कुछ नहीं करेगा।

नहरों, नालियों और नालों की सफाई के लिए सैनी सरकार ने कसी कमर


अशोक मिश्र

मानसून आने में मुश्किल से दो-ढाई महीने ही बचे हैं। मानसून के दौरान होने वाली परेशानियों से निपटने के लिए सैनी सरकार ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। वैसे तो सैनी सरकार ने जनवरी महीने में भी संबंधित विभागों से सूखा और बाढ़ राहत से जुड़े कामों की तैयारियां करने का निर्देश दिया था। इसका कारण यह था कि पिछले साल बरसात के दिनों में पंजाब और हरियाणा में बाढ़ से जो तबाही हुई थी, दोनों राज्यों की एक बड़ी आबादी इससे प्रभावित हुई थी, उसकी याद उन दिनों सीएम सैनी के दिमाग में ताजा थी। 

यही वजह थी कि जब पूरा उत्तर भारत कड़ाके की ठंड में ठिठुर रहा था, तभी उन्होंने संबंधित विभागों को मानसून के दौरान होने वाली दिक्कतों से निपटने की तैयारियां करने का आदेश दिया था। लेकिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनके आदेश को कितनी गंभीरता से लिया, यह तो नहीं पता चला है, लेकिन शुक्रवार को सिंचाई, जनस्वास्थ्य एवं स्थानीय निकाय विभाग के साथ हुई समीक्षा बैठक में सीएम नायब सिंह सैनी ने एक बार फिर अधिकारियों को चेताया कि वह मानसून आने से पहले ही सभी ड्रेन, नदियों और नालों की सफाई कर लें। 

आबादी क्षेत्र में आने वाले ड्रेनों और नहरों के किनारों को ऊंचा करने के साथ-साथ तटबंधों को मजबूत कर लें। उन्होंने सख्त आदेश देते हुए कहा कि प्रदेश में इस बार मानसून से पहले सभी ड्रेन, नहरों एवं नालों की सफाई का कार्य पूरा कर लिया जाए। शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी के अनुसार नई जल निकासी परियोजनाओं के प्रस्ताव तैयार किए जाएं ताकि भविष्य में उन क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति न बनें। 

पिछले साल पंजाब और हरियाणा में आई बाढ़ की वजह से पैदा हुए जलभराव के चलते किसानों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा था। काफी लोग संक्रामक रोगों के शिकार भी हुए थे। बैठक के दौरान अधिकारियों ने सीएम सैनी को बताया कि 87 स्थानीय निकायों में 2655 किलोमीटर लंबाई की 2382 ड्रेनों में से 1116 किलोमीटर लंबी ड्रेनों की सफाई की कार्य कर लिया गया है। 

शेष ड्रेनों का कार्य जून तक पूरा कर लिया जाएगा। जनस्वास्थ्य विभाग की 85 शहरों में 100 किलोमीटर लंबी ड्रेनों की सफाई का कार्य मई के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। शेष के लिए अप्रैल अंत तक टेंडर पूरे कर लिए जाएंगे। जलभराव की स्थिति में निकासी हेतु 1678 क्यूसेक क्षमता के 839 डीजल पंप, 4466 क्यूसिक क्षमता के 1389 इलेक्ट्रिक पंप तथा 3465 क्षमता के 495 मोबाइल पंप तैयार हैं। 

इस प्रकार प्रदेश में 9609 क्यूसेक क्षमता के 2723 पंप तैयार कर लिए गए हैं। अभी तक जिन ड्रेनों में सफाई का कार्य कर लिया गया है, वह जनवरी में दिए गए निर्देश का नतीजा भी हो सकता है। बहरहाल, सैनी सरकार की सक्रियता को देखते हुए लगता है कि इस बार पिछले साल जैसी कहानी नहीं दोहराई जाएगी।