Saturday, January 10, 2026

कबीरदास की सादगी और मखमल का कुर्ता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कबीरदास अनपढ़ जरूर थे, लेकिन वैचारिक स्तर पर वह काफी ऊंचे स्तर पर थे। वह काम भले ही जुलाहे का करते थे, लेकिन वह अपने युग के तमाम उच्च पदस्थ लोगों से कहीं ज्यादा उदार और सोच में बहुत आगे थे। वह किसी भी प्रकार के पाखंड के प्रबल विरोधी थे। 

दिखावा तो उन्हें पसंद ही नहीं था। कबीर दास का जीवन जितना सादगी भरा था, उनका समझाने का ढंग भी उतना ही निराला था। वह जीवन के तमाम प्रसंगों के माध्यम से ही शिक्षा दे दिया करते थे। वह जैसा जीवन जीते थे, उसी प्रकार के उनके विचार भी थे। यही वजह है कि आज भी कबीरदास की बातें समाज में ग्राह्य हैं। एक बार की बात है। कबीर दास अपना काम-धाम निपटाने के बाद लोगों के बीच बैठे ज्ञान चर्चा कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए एक धनी व्यक्ति रोज आता था। 

वह जानना चाहता था कि कबीरदास की बातों में ऐसा क्या है जिसको सुनने के लिए इतनी ज्यादा मात्रा में लोग आते हैं। तभी उसका ध्यान कबीरदास के कुर्ते पर गया। कुर्ता बहुत ही साधारण था। उसने सोचा कि कबीरदास को एक अच्छा कुर्ता भेंट किया जाए। दो-तीन दिन बाद वह एक अच्छा सा कुर्ता बनवाकर लाया। कबीर ने ग्रहण कर लिया। दूसरे दिन कबीरदास वही कुर्ता पहनकर प्रवचन देने लगे। धनी व्यक्ति ने जब उन्हें देखा तो अपना माथा पीट लिया। कबीरदास ने कुर्ता उल्टा पहन लिया था।

कुर्ते का बाहरी कपड़ा तो मखमल का था, लेकिन अंदर का कपड़ा साधारण था। उस व्यक्ति ने कहा कि आपने कुर्ता उल्टा पहना है। कबीर ने लोगों से कहा कि यह कुर्ता इन्हीं महोदय ने दिया है। नरम हिस्सा शरीर को छू रहा है। साधारण हिस्सा दिखाने के लिए काफी है। यह सुनकर वह व्यक्ति शरमा गया।

पैदल चलने वालों के लिए खतरा बनते जा रहे आवारा कुत्ते


अशोक मिश्र

इन दिनों कुत्तों के मामले को लेकर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सड़कों पर लगातार बढ़ते कुत्ते और उनके काटने की बढ़ती घटनाएं सचमुच चिंताजनक है। दो-तीन महीने पहले जब सुप्रीमकोर्ट ने सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम भेजने और उनका बधियाकरण करने के निर्देश दिए थे, तो देश भर के लोगों ने इसकी आलोचना की थी। पशु प्रेमियों ने जगह-जगह प्रदर्शन भी किया था। सच कहा जाए, तो यह समस्या केवल दिल्ली एनसीआर की ही नहीं है। यह पूरे देश की समस्या है। हरियाणा भी इस समस्या से अछूता नहीं है। सरकारी आंकड़ा बताता है कि वर्ष 2024 में हरियाणा में ही 37 लाख लोग डॉग बाइट यानी कुत्तों के काटने के शिकार बने थे। इनमें से 54 लोगों की मौत भी हो गई थी। 

पिछले साल दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में ताबड़ू में 72 घंटे में आवारा और पागल कुत्तों ने 58 लोगों को अपना शिकार बनाया था। वैसे सैनी सरकार कई बार सड़कों को आवारा कुत्तों और लावारिस पशुओं से मुक्त कराने की घोषणा कर चुकी है। लेकिन अभी तक सरकारी घोषणाओं पर पूरी तरह अमल नहीं किया जा सका है। सड़कों के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि लोगों का चलना मुश्किल हो रहा है। चार-पांच साल के बच्चों का अकेले सड़कों पर निकलना खतरे से खाली नहीं है। देश में कुछ ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं जिसमें चार-पांच साल के बच्चे को कुत्तों का एक झुंड घेर लेता है। 

चारों तरफ से हुए हमले को देखकर बच्चा भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह नाकाम रहता है। कुत्ते उसे नोचते-घसीटते रहते हैं। जब तक लोग उसे बचाने के लिए पहुंचते, बच्चा दम तोड़ चुका होता है। हरियाणा में ही कई जिलों में कुत्ते झुंड बनाकर रहते हैं और आने जाने वालों पर हमला कर देते हैं। रात में तो लोगों का पैदल चलना काफी जोखिम भरा होता है। कब और कहां से आकर कुत्ता या कुत्तों का झुंड आक्रमण कर दे, कोई पता नहीं होता है। 

पिछले कुछ वर्षों से कुत्तों में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। वह अकारण लोगों पर हमला कर रहे हैं। इसका एक कारण तो यह भी है कि कुत्तों की बढ़ती संख्या के चलते उन्हें भोजन मिलने में काफी दिक्कत हो रही है। लोगों ने भी कुत्तों को बचा खुचा खाना देना बंद कर दिया है। इसकी वजह से भूखे रहने पर कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं। कुत्तों के काटने पर लोग जब सरकारी अस्पतालों में रैबीज का टीका लगवाने पहुंचते हैं, तो उन्हें दूसरे किस्म की परेशानी झेलनी पड़ती है। 

पता लगता है कि अस्पताल में रैबीज का टीका ही अनुपलब्ध है। ऐसी स्थिति में उसके पास निजी अस्पतालों में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं रहता है। निजी अस्पताल भी उन्हें महंगे दामों पर टीका उपलब्ध कराते हैं। सरकार को चाहिए कि वह कुत्तों को पकड़ने और उनका बन्ध्याकरण की ओर विशेष ध्यान दे।

Friday, January 9, 2026

हम अपने गुलाम के गुलाम के आगे क्यों झुकें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लोग कहते हैं कि सिकंदर महान था। गंभीरता से सोचें, विश्व इतिहास का सबसे अभागा इंसान था सिकंदर। वह एक प्यास के पीछे आजीवन भटकता रहा। प्यास थी धन-दौलत की, प्यास थी विश्व विजेता कहलाने की। प्यास थी बहते हुए रक्त देखने की, प्यास थी पूरी पृथ्वी को अपने पैरों तले रौंदने की। कहते हैं कि इतना वैभवशाली, विश्व विजेता और दुनिया के कई देशों को लूटकर धन संपत्ति जोड़ने वाला सिकंदर अपनी मौत को चौबीस घंटे भी टाल नहीं सका। 

जब वह मर रहा था, तो उसके वैद्य ने उसके सेवकों से कहा था कि केवल चौबीस घंटे उसे किसी तरह जिंदा रखो, मैं 24 घंटे में उसके पास पहुंच जाऊंगा और उसे हर हालत में बचा लूंगा। लेकिन वह सारे प्रयास करने के बाद भी वैद्य के पहुंचने से पहले ही मर गया। एक बार की बात है। जब वह विश्व विजय के बाद अपने राज्य में प्रवेश कर रहा था, तो राज्य की जनता सड़क के दोनों ओर कतारबद्ध होकर उसे देखने के लिए खड़े हो गए। 

वह जिसकी ओर देख लेता, वह अपने को धन्य मानने लगता था। संयोग से उसी समय संतों का एक दल उधर से गुजरा जिसने सिकंदर की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सिकंदर क्रोधित हो उठा। उसने सैनिकों को संतों को पकड़कर दरबार में पेश करने का हुक्म दिया। दरबार में पेश हुए संतों के चेहरे पर निडरता थी। सिकंदर गरजा -तुम नहीं जानते थे कि विश्व विजेता सिंकदर तुम्हारे सामने से गुजर रहा है। 

एक संत ने कहा कि तुम एक अमिट प्यास के गुलाम हो। इस गुलामी में तुमने पूरी दुनिया रक्तरंजित कर दी। उस प्यास को हमने गुलाम बना रखा है। फिर हम गुलाम के गुलाम के आगे क्यों झुकें। यह सुनकर सिकंदर का सिर झुक गया। उसने संतों को रिहा कर दिया।

बाल विवाह रोकने के लिए लोगों का जागरूक होना बहुत जरूरी

अशोक मिश्र

भारत सरकार ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान चला रखा है। देश के सभी राज्यों में लोगों को बाल विवाह के संबंध में जागरूक करने के लिए अभियान चलाया है। कई राज्यों में इसके बेहद सकारात्मक परिणाम आए हैं। हरियाणा में भी यह अभियान बड़े जोर-शोर से चलाया जा रहा है। बुधवार को फरीदाबाद में कई जगहों पर जिला प्रशासन की पहल पर विभिन्न कालोनियों, मंदिरों और मस्जिदों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

इन कार्यक्रमों में काफी संख्या में स्त्री, पुरुषों ने भाग लिया जिसमें स्त्रियों की संख्या ज्यादा बताई गई है। ऐसे कार्यक्रम राज्य के सभी जिलों में विभिन्न अवसरों पर चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद बाल विवाह मुक्त हरियाणा नहीं बन पाया है। हर साल कुछ घटनाएं जरूरत प्रकाश में आ जाती हैं। बाल विवाह रोकने के लिए कार्य करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकार को ऐसे विवाह होने की सूचना मिलती है, तो ऐसे विवाह को तुरंत रोकने का प्रयास किया जाता है। 

कई मामलों में तो दोनों पक्षों को समझा बुझाकर इस बात के लिए राजी किया जाता है कि जब लड़का और लड़की बालिग हो जाएंगे, तब इनका विवाह कराया जाएगा। कई मामले ऐसे भी सामने आ चुके हैं, जब लड़की या लड़के वाले बाल विवाह रोकने को राजी नहीं होते हैं, तब उन्हें कानून का भय दिखाया जाता है, उनके खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। कुछ लोग मान जाते हैं, कुछ मामलों में मजबूरीवश दोनों पक्षों या एक पक्ष के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी है। कई बार तो लड़की ने खुद पुलिस या स्वयंसेवी संस्थाओं से संपर्ककर बाल विवाह रोकने की गुहार लगाई है। 

ऐसी लड़कियां शाबाशी और पुरस्कार की हकदार हैं। दरअसल, हमारे देश में बाल विवाह की परंपरा सदियों पुरानी है। किसी न किसी रूप में दुनिया के हर देश में बाल विवाह की परंपरा लागू रही है। तब समाज में बाल विवाह से होने वाले नुकसान के बारे में लोग जागरूक नहीं हुआ करते थे। बाल विवाह के कारण लड़कियों को आजीवन जो परेशानियां होती हैं, उसके बारे में परिचित नहीं थे। कुछ देशों में बाल विवाह को धार्मिक चोला पहनाकर जायज बना दिया गया था। कुछ देशों ने ऐसे मामलों में सफलता हासिल कर ली है और उनके यहां बाल विवाह पूरी तरह से प्रतिबंधित हो गया है। 

हमारे देश में भी धीरे-धीरे यह परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है। इसके बावजूद कुछ राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जारी है। हरियाणा और उत्तर भारत के कई राज्यों में अक्षय तृतीया को विवाह करने की प्रथा रही है। इस दिन विवाह करने के लिए किसी शुभ घड़ी का इंतजार करने की जरूरत नहीं होती है। हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में बहुत कम संख्या में लोग अपनी नाबालिग बेटी या बेटे का विवाह कर देना, शुभ मानते हैं। ऐसे अवसर पर राज्य की संस्थाएं सतर्करहती हैं और बाल विवाह रोकने का भरसक प्रयाकस करती है।

Thursday, January 8, 2026

मैंने बदले की भावना से काम नहीं किया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रंगभेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला
ने आजीवन संघर्ष किया। वह दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे। मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। मंडेला के पिता हेनरी म्वेजो कस्बे के जनजातीय सरदार थे। 

स्थानीय भाषा में सरदार के बेटे को मंडेला कहते हैं। नेल्सन मंडेला सदियों से चल रहे रंगभेद का विरोध करने वाले अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और इसके सशस्त्र गुट उमखोंतो वे सिजवे के अध्यक्ष रहे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण उन्होंने 27 वर्ष रॉबेन द्वीप के कारागार में बिताये जहां उन्हें कोयला खनिक का काम करना पड़ा था। घटना मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद की है। 

एक बार वह अपने मित्रों के साथ एक रेस्तरां में वह भोजन करने गए। रेस्तरां में पहुंचने के बाद वह अपनी सीट पर मित्रों के साथ बैठ गए। उन्होंने इधर-उधर नजर दौड़ाई, तो थोड़ी दूरी पर लगी सीट पर एक व्यक्ति बैठा नजर आया। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मियों को बुलाया और उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि जाकर उस व्यक्ति से कह दो कि वह आज हमारे साथ भोजन करे। 

वह व्यक्ति मंडेला वाली टेबल पर आ गया। खाना परोसे जाने पर उसने कांपते हाथों से खाना खाया। उसके माथे पर बार-बार पसीना आ रहा था। वह चुपचाप खाता रहा और खाना खत्म होने पर चला गया। जब वह व्यक्ति चला गया, तो मंडेला के एक मित्र ने कहा कि शायद वह आदमी बीमार था। मंडेला ने कहा कि वह आदमी रॉबेन द्वीप के जेल का जेलर था। इस व्यक्ति ने 27 साल तक मुझ पर बहुत जुल्म ढाए थे। तब मित्रों ने कहा कि उसे सबक सिखाना चाहिए था। मंडेला ने कहा कि मेरा वैसा चरित्र नहीं है। मैंने उसे माफ कर दिया है। बदले की भावना से मैंने कभी कोई काम नहीं किया है।

कड़ाके की ठंडक और प्रदूषित हवा लोगों को बना रही बीमार

अशोक मिश्र

पूरा उत्तर भारत कड़ाके की ठंड पड़ रही है। पाला गिरने की वजह से जहां फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है, वहीं लोगों की भी परेशानियां बढ़ रही हैं। पशुओं को भी कड़ाके की ठंड का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते जाड़े के दिनों में कमी तो आई ही है, लेकिन ठंड की भयावहता बढ़ गई है। तीन-चार दशक पहले दशहरा पर्व से ही हलका जाड़ा पड़ना शुरू हो जाता था। तब ऐसे जाड़े को गुलाबी जाड़ा कहा जाता था। 

दीपावली तक आते-आते लोगों को फुल स्वेटर तक पहनना पड़ जाता था। हलका फुलका जाड़ा दिसंबर के पहले पखवाड़े तक पड़ता था और दिसंबर और जनवरी में तापमान नौ दस तक आ जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे जाड़ा विदा होने लगता था। कुल मिलाकर तीन-साढ़े तीन महीने तक जाड़ा पड़ता था। ग्लोबल वार्मिंग के चलते अब नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर जनवरी तक जाड़ा पड़ता है। जाड़े के दिन कम जरूर हुए, लेकिन जाड़े की प्रचंडता काफी बढ़ गई है। 

आज  कल जब जाड़ा पड़ता है, तो हड्डी तक कंपा जाता है। इन दिनों हरियाणा में भी हड्डियों को कंपा देने वाला जाड़ा पड़ रहा है। कई इलाकों में धूप तो निकल रही है, लेकिन रात में हवा चलने और पाला गिरने से लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। ऐसी ठंडक में सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और बूढ़े हो रहे हैं। थोड़ी सी भी लापरवाही बच्चों और बूढ़ों के लिए भारी पड़ रही है। इन दिनों सर्दी बढ़ जाने की वजह से रूखी त्वचा, एक्जिमा, खुजली, जलन और लाल चकत्तों की शिकायत लेकर लोग सिविल अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। निजी अस्पतालों में भी ऐसे मरीज बहुतायत में पाए जा रहे हैं। 

इसका कारण ठंडक के साथ-साथ हवा में घुला प्रदूषण है। ठंड और प्रदूषित हवा के चलते लोगों को फेफड़े से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। हार्ट अटैक की वजह से होने वाली मौतों का आंकड़ा ठंडक के दिनों में बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा सर्दी का पड़ना, कई बार जानलेवा साबित हो रहा है। ऐसी स्थिति में इन रोगों के मरीजों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। थोड़ी सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है। रूखी त्वचा ज्यादा सर्दी पड़ने और हवा के प्रदूषित होने से एक्जिमा का रूप ले लेती है। 

यह समस्या महिलाओं, बच्चों के साथ-साथ बुजुर्गों में अधिक दिखाई देती है। कुछ लोग सर्दी ज्यादा पड़ने पर हाथ-पैर की अंगुलियों में सूजन की समस्या को लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। महिलाओं में यह दिक्कत ज्यादा देखने को मिल रही है क्योंकि उन्हें आमतौर पर पुरुषों की अपेक्षा ठंडे पानी के संपर्क में ज्यादा रहना पड़ता है। कपड़े धोने, बर्तन आदि मांजने जैसे तमाम काम ज्यादातर महिलाएं करती हैं, इस वजह से उनको ज्यादा परेशानी हो रही है।

Wednesday, January 7, 2026

बुजुर्ग ने कहा, मैं ही हूं माइकल फैराडे

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

माइकल फैराडे का जन्म 22 सितंबर 1791 को लंदन में हुआ था। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता था। अदम्य जिज्ञासा और सफलता की प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर फैराडे ने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी विज्ञान की बहुत बड़ी सेवा की। उन्होंने मानव समाज को दो प्रमुख उपकरण प्रदान किए जिन्हें सामान्य भाषा में जेनरेटर और ट्रांसफार्मर कहा जाता है। 

उन्होंने और भी कई खोज किए जिसने समाज को नई दिशा दी। जब वह प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तो एक दिन उनके अध्यापक ने उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा। इतना पीटा कि वह फर्श पर बिना हिले डुले काफी देर तक पड़े रहे। उसी दिन से उनकी मां ने स्कूल की पढ़ाई बंद करवा दी। वह कमाने के लिए एक बुक बाइंडर के यहां नौकरी करने लगे। उनकी पढ़ाई लिखाई खासतौर पर विज्ञान में रुचि होने की वजह से वह एक बड़े वैज्ञानिक के संपर्क में आए और आगे चलकर एक महान वैज्ञानिक बने। 

एक बार की बात है। एक ब्रिटिश अधिकारी उनसे मिलने रायल सोसायटी पहुंचा। उसने देखा कि रायल सोसायटी की इमारत में कोई नहीं है। दरबान से उसने कहा कि उसे माइकल फैराडे से मिलना है। वह कहां मिलेंगे? उस गार्ड ने इमारत के एक हिस्से की ओर संकेत कर दिया। वह अधिकारी उस ओर गया, लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं दिया। बस, एक बुजुर्ग सिंक में कुछ गंदी बोतलें धो रहा था। 

उस अधिकारी ने उनसे बेरुखी से पूछा कि तुम यहां के कर्मचारी हो। उस बुजुर्ग ने कहा कि जी हां, मैं चार दशक से यहां सेवा दे रहा हूं। अधिकारी ने कहा कि मुझे एक महान वैज्ञानिक से मिलना है, लेकिन वह दिखाई नहीं दे रहे हैं। बुजुर्ग ने कहा कि आपको जिससे मिलना है, उसका नाम क्या है? अधिकारी ने कहा कि  मुझे माइकल फैराडे से मिलना है। बुजुर्ग ने कहा कि वह मैं ही हूं। अधिकारी उनकी सादगी को देखकर दंग रह गया।

हरियाणा के गांवों में पानी के नाम पर धीमा जहर पी रहे हैं लोग



अशोक मिश्र

एक ओर जहां हरियाणा जल की कमी से जूझ रहा है, वहीं राज्य में पेयजल की गुणवत्ता काफी खराब हो चुकी है। पानी में रसायन घुल जाने की वजह से कई तरह की घातक बीमारियां फैल रही हैं। हालात कितने खराब हो चुके हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के 3489 गांवों में पानी पीने लायक नहीं रहा है। यदि पानी ही प्रदूषित और विषैला होगा, तो स्वास्थ्य समस्याओं का जन्म लेना निश्चित है। 

जल में घातक रसायन घुले होने की वजह से लोगों में कैंसर, त्वचा, हृदय रोग और मधुमेह सहित कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। प्रदेश के 20 जिलों के 136 गांव भूजल में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा पाई गई है जिसकी वजह से हड्डियां कमजोर हो रही हैं। जनस्वास्थ्य एवं आपूर्ति विभाग या अन्य स्रोतों द्वारा सप्लाई किया जा रहा पेयजल हो या फिर भूमिगत जल, निर्धारित मानकों से अधिक मात्रा में मौजूद रसायनिक पदार्थ इसे जहरीला बना रहे हैं। जल संसाधन, कृषि एवं भूजल विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक संगठन केंद्रीय भूजल बोर्ड की नवंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक न हो। 

विभिन्न स्थानों पर फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और यूरेनियम के साथ ही ईसी (विद्युत चालकता) की अत्यधिक मात्रा चिंताजनक है। भूजल में अपशिष्ट पदार्थों का मिश्रण बढ़ने से ब्लड प्रेशर, पथरी, दिमागी कमजोरी, शरीर में दर्द, पेट के रोग, पीलिया की शिकायतें बढ़ी हैं। यह स्थिति काफी बड़े संकट की ओर इशारा कर रही है। यदि हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो पूरा प्रदेश गंभीर बीमारियों की चपेट में होगा। इसके लिए सबसे पहले कृषि क्षेत्र में उपयोग किए जा रहे रासायनिक उर्वरकों पर रोक लगानी होगी। किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा ताकि मिट्टी में कम से कम रसायन घुले। 

अधिक उपज लेने के लिए किसान बिना सोचे समझे हर साल रासायनिक उर्वरकों की मात्रा बढ़ाते जा रहे हैं। इससे न केवल पैदा किए गए अनाज में रसायन घुल रहा है, बल्कि मिट्टी के जरिये भारी मात्रा में रसायन पानी में घुल रहा है। इसी पानी का उपयोग लोग अपने दैनिक जीवन में कर रहे हैं और किसान फसलों की सिंचाई में कर रहा है।  किसानों के साथ-साथ प्रदेश में चलने वाले छोटे-बड़े उद्योग भी राज्य के पानी को दूषित करने के लिए जिम्मेदार हैं। उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक कचरा बिना संशोधित किए सीधे नदियों और नालों में डाला जा रहा है। इससे नदियां प्रदूषित हो रही हैं। 

बहुत सारे उद्योग अपने यहां पैदा होने वाले अपशिष्टों को गड्ढा खोदकर जमीन में दबा देते हैं। धीरे-धीरे अपशिष्टों में मौजूद रसायन और कचरा जमीन के नीचे मौजूद जल में मिल जाता है। बाद जब इसका उपयोग किया जाता है, तो यह इंसानों और पशुओं के लिए काफी खतरनाक  साबित होता है। यदि राज्य के लोगों को साफ पानी उपलब्ध नहीं कराया गया,तो निकट भविष्य में प्रदेश में तमाम घातक रोग महामारी की तरह फैलेंगे।

Tuesday, January 6, 2026

यतींद्रनाथ दास ने कहा, चलो मां! घर चलते हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ब्रिटिश हुकूमत की जेल में क्रांतिकारियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को लेकर 63 दिन तक भूख हड़ताल करके मौत को गले लगाने वाले क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कोलकाता में हुआ था। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण सोलह साल की अवस्था में वह दो बार जेल गए। अपने जीवन में तो वह कई बार गिरफ्तार किए गए और जेल भेजे गए। 

एक बार की बात है। वह गर्मी की तपती दोपहरी में कलकत्ता की सड़कों पर कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे लोगों की भीड़ लगी हुई है। उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला गर्मी में चक्कर खाकर गिर पड़ी थी। वहां खड़े लोग उस महिला से सहानुभूति जता तो रहे थे, लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। यह देखकर यतींद्रनाथ आगे आए और उन्होंने बुजुर्ग महिला को उठाते हुए कहा, चलो! मां घर चलते हैं। 

उन्होंने उस महिला की गठरी अपने सिर पर रख लिया। घर पहुंंचने पर उन्होंने उस महिला से पूछा कि आपका कोई नहीं है क्या? उस महिला ने रोते हुए बताया कि मेरा एक बेटा था जिसकी महामारी के दौरान मौत हो गई है। तब यतींद्रनाथ ने कहा कि आपका बेटा मरा नहीं है। मैं हूं न आपका बेटा। इसके बाद उन्होंने कुछ रुपये उस महिला के हाथ पर रख दिया। 

वह महिला जब तक जीवित रही, वह आर्थिक सहायता करते रहे। लाहौर षड्यंत्र केस में छठी बार गिरफ्तार होने के बाद जब भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने क्रांतिकारियों के साथ जेल में होने वाले दुर्व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की, तो लोगों ने उनसे भी भूख हड़ताल के लिए कहा। उन्होंने कभी न तोड़ने के वायदे के साथ भूख हड़ताल शुरू की और 63 दिन तक भूख हड़ताल करने के बाद 13 सितंबर 1929 को वह शहीद हो गए।

संभलकर करें पानी का उपयोग हरियाणा में गहरा रहा जल संकट


अशोक मिश्र

जल ही जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन जगहों पर पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां लोगों में पानी की कोई कद्र ही नहीं है। पानी का दुरुपयोग इन जगहों पर आम बात है, लेकिन जिन जगहों पर पानी की उपलब्धता कम है, वहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। हरियाणा में भी पानी की उपलब्धता कफी कम है। राज्य में वर्तमान समय में 35 लाख करोड़ लीटर पानी की मांग बनी हुई है। लेकिन सारे प्रयास करने के बावजूद सिर्फ  21 लाख करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति हो पा रही है। बाकी बचे 14 लाख करोड़ पानी की आपूर्ति के लिए राज्य सरकार कई तरह के प्रयास कर चुकी है और आज भी कर रही है। 

ऐसी स्थिति में लोगों को पानी खर्च करने के मामले में मितव्ययता से काम लेना चाहिए। हरियाणा में करीब 86 प्रतिशत पानी की खपत खेती के काम में होती है। 14 प्रतिशत पानी पीने के काम में आता है। सरकार का फोकस ऐसी फसलों का उत्पादन घटाने की तरफ बन रहा है, जिनमें पानी की अधिक खपत होती है। प्रदेश सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है कि वह एक तो प्राकृतिक खेती की ओर लौटें और दूसरे वह उन्हीं फसलों की खेती करें जिसमें पानी की खपत कम से कम होती है। खेती में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग होने की वजह से प्रदेश के कई जिले डार्क जोन में आ गए हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए सीएम सैनी ने राज्य में जल शक्ति अभियान को गति देने का निर्णय लिया है। 

केंद्र सरकार के सहयोग से कैच द रेन 2025 जैसे अभियानों के माध्यम से जल संरक्षण और वन संरक्षण पर जोर दिया जा चुका है। पानी बचाने के लिए इन योजनाओं को पहले ही जल जीवन मिशन के साथ जोड़ा जा चुका है। सैनी सरकार ने वाटर सिक्योर हरियाणा कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व बैंक की मदद से 5700 करोड़ रुपये की योजना पर काम चालू कर दिया है। इस योजना के तहत राज्य को 2032 तक देश का पहला जल सुरक्षित राज्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 14 रणनीतिक सिंचाई क्लस्टर शामिल हैं। हरियाणा में पानी की बर्बादी रोकना केवल सरकार का ही काम नहीं है। 

इस जनभागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। प्रदेश के हर व्यक्ति को इस बात का एहसास होना चाहिए कि पानी की बूंद-बूंद बचाना उनका भी दायित्व है। जल संरक्षण के लिए सरकार ने कानून और नीतियां बनाई हैं। इनमें हरियाणा जल संसाधन (संरक्षण, विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम 2020 प्रमुख है, जो जल संरक्षण को अनिवार्य बनाता है। अधिनियम में पानी की चोरी और बर्बादी पर जुर्माना लगाने और कनेक्शन काटने का प्रविधान किया गया है। सरकारी तंत्र के बार-बार समझाने के बाद भी जो लोग पानी की आवश्यकता को नहीं समझ पा रहे हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।