अशोक मिश्रकोई यह सोच भी नहीं सकता है कि बच्चे! सिगरेट पीना तुम्हारे लिए हानिकारक है। इसे मत पियो कहने पर कोई नाबालिग थोड़ी देर बाद युवक पर चाकू से हमला कर दे। युवक की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। आरोपी नाबालिग केवल नौवीं कक्षा पास है और तीन-चार महीने पहले उसने अपने मोहल्ले में लोगों पर धाक जमाने के लिए दिल्ली से चाकू खरीदा था। हरियाणा में पिछले कुछ सालों में युवाओं से जुड़ी हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। कभी रील के लिए झगड़ा, कभी पुरानी रंजिश, कभी सिर्फ ‘तूने मुझे घूरा क्यों’ जैसी मामूली बात पर हत्या ऐसी घटनाएं अब अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं।
सिगरेट पीने से मना करने पर एक नाबालिग के हाथ में चाकू आ जाना और एक हंसते-खेलते युवक की जान चले जाना हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर हमारे हाथों में पल रहे बच्चों के मन में इतना गुस्सा, इतनी हिंसा कहां से आ रही है। यह सवाल सिर्फ उस एक नाबालिग का नहीं, बल्कि पूरे हरियाणा के बदलते युवा मानस का है। इस उग्रता के पीछे परिवार का बिखराव भी एक बड़ा कारण है। जब से परिवार बिखरने लगे हैं, तब से बच्चों और युवाओं के स्वभाव में तब्दीली आ रही है।
पहले संयुक्त परिवार में दादा-ताऊ की एक नजर ही बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए काफी थी। वह उन्हें संस्कारित करते रहते थे। अब एकल परिवारों में माता-पिता अपनी नौकरी और संघर्ष में व्यस्त हैं। घर पर बच्चों के पास पूरा दिन मोबाइल और इंटरनेट है। लोगों का आपसी संवाद भी धीरे-धीरे कम या खत्म होता जा रहा है। घर में बच्चा क्या देख रहा है, क्या सोच रहा है, किससे मिल रहा है, यह जानने का समय ही अभिभावकों के पास नहीं है। जब घर में उसकी बात नहीं सुनी जाती, तो वह बाहर अपनी धाक जमाकर, डराकर अपनी बात मनवाना सीख जाता हैं।
इस उग्रता को बढ़ावा देता है उन्हें सहजता से मिल जाने वाला नशा। बीड़ी-सिगरेट जैसी छोटी लत से शुरू होकर यह सिलसिला नशे की गोलियों और दूसरे सिंथेटिक नशे तक पहुंच रहा है। एनसीआर की बेल्ट में इन चीजों की उपलब्धता चिंताजनक रूप से आसान हो गई है। नशे की हालत में सही और गलत की समझ खत्म हो जाती है और छोटा सा गुस्सा भी जानलेवा बन जाता है।
समाज में एक अजीब सा डर बैठ गया है। अब लोग पार्क में, गली में गलत होते देखकर भी टोकने से कतराते हैं, सोचते हैं कि कौन झगड़ा मोल ले, पता नहीं सामने वाले के पास क्या है। यह चुप्पी धीरे-धीरे पूरे समाज को कायर और असुरक्षित बना रही है। इससे बचने का यही तरीका है कि हम रोज आधा घंटा बिना मोबाइल के अपने बच्चों से बात करें, उनके दोस्तों को जानें, उन्हें खेल के मैदान तक फिर से ले जाएं। जहाँ पसीना बहेगा तो सड़क पर खून नहीं बहेगा, यही इसका इलाज है। यही तरीका उनकी उग्रता को कम कर सकता है।