Thursday, January 15, 2026

अपाचे योद्धा लोजेन ने हार नहीं मानी

 

बोधिव़ृक्ष

अशोक मिश्र

अपाचे जनजाति ज्यादातर मैक्सिको में पाई जाती है। यह जनजाति लड़ाकू जनजातियों में मानी जाती हैं। इन्हें स्वतंत्र रहना काफी पसंद है। अपाचे जनजाति में कई ऐसी महिलाएं हुई हैं जिन्होंने अपनी सभ्यता, संस्कृति और जमीनों की सुरक्षा के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है। उनमें से एक लोजेन भी हैं। 

लोजेन का जन्म 1840 में न्यूमैक्सिको में हुआ था। मैक्सिकों में लोजेन को बहुत जुझारू और अपनी जनजाति की सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाला योद्धा माना जाता है। अपाचे  कबीले के पुरुष आमतौर पर युद्ध करते थे और महिलाएं घर का काम देखती थीं। अपाचे योद्धा लोजेन ने बचपन से ही युद्ध कला सीख रखी थी। 

आम लड़कियों की तरह वह घर का काम करने की जगह बचपन से ही हथियार चलाना, घुड़सवारी करना सीखा था। उनका भाई और अपाचे कबीले का नेता विक्टोरिया भी बहुत बहादुर था। जब अमेरिका के साथ मिलकर मैक्सिकों की सेनाओं ने अपाचे की जमीन पर कब्जा करना शुरू किया, तो यह अपाचे कबीले को बर्दाश्त नहीं हुआ। 

भाई-बहन ने विद्रोह कर दिया और अमेरिकी और मैक्सिको की सेना से भिड़ने के लिए तैयार हो गए। इन लोगों को अपनी स्वतंत्रता अत्यधिक प्यारी थी। भाई-बहन के नेतृत्व में अपाचे योद्धाओं ने दोनों सेनाओं से लोहा लिया। संघर्ष लंबा चला। इसी बीच लोजेन का भाई विक्टोरिया युद्ध में मारा गया। इसके बावजूद लोजेन का साहस कम नहीं हुआ। उन्होंने अपने सैन्य रणनीति से दोनों सेनाओं को खूब छकाया। लेकिन अंत में उन्हें बंदी बना लिया गया। मैक्सिको की इस वीर महिला को जेल में डाल दिया गया। 1889 में लोजेन की जेल में ही मौत हो गई।

खुले में कूड़ा फेंकने से पर्यावरण और इंसान को भारी नुकसान


अशोक मिश्र

कूड़ा आज वैश्विक समस्या बनता जा रहा है। पूरी दुनिया कूड़े-कचरे की वजह से परेशान है। कूड़ा-कचरा पर्यावरण के लिए तो हानिकारक है ही, इंसानों में कई तरह की घातक बीमारियों का कारण भी है। एक अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में दो अरब टन से अधिक ठोस कचरा हर साल पैदा होता है। कहा जा रहा है कि सन 2050 तक ठोस कचरे में 75 प्रतिशत की वृद्धि होगी। 

सालाना 3.8 अरब टन से अधिक ठोस कचरा पैदा होने का अनुमान है। इतनी भारी मात्रा में कचरे का निस्तारण एक बड़ी समस्या है। भारत में भी कचरा बहुत बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पर्यावरण को होने वाले नुकसान का एक बड़ा कारण कचरा ही है। हरियाणा में जितना भी कचरा उत्पन्न होता है, उसका एक तिहाई हिस्सा प्रबंधन की अकुशलता की वजह से सड़कों, नदियों, नालों, अरावली पहाड़ की घाटियों, खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर कूड़ा पड़ा रह जाता है। 

कई बार तो कूड़ा उठाने वाली कंपनियों से कांट्रैक्ट खत्म होने के बाद शहरों में कूड़ा उठाना बंद कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में लोग रात के अंधेरे में इधर उधर फेंक दिया जाता है। हरियाणा में सबसे ज्यादा कूड़ा-कचरा बंधवारी लैंडफिल में पहुंचता है। बंधवारी लैंडफिल अरावली की पहाड़ियों के बीच तीस एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। गुरुग्राम और फरीदाबाद से सबसे ज्यादा कूड़ा बंधवारी लैंडफिल में पहुंचता है। अनुमान है कि रोज यहां पर 16 सौ से दो हजार टन मिश्रित कूड़ा पहुंचता है जिसकी छंटाई नहीं हुई होती है। इस लैंडफिल से अरावली रेंज को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। 

राज्य सरकार ने सड़कों या किसी भी खाली जगहों पर कूड़ा फेंकने वालों पर जुर्माना लगाने की चेतावनी कई बार दी है। समय-समय पर कूड़ा फेंकने वालों के खिलाफ अभियान भी चलाया गया है, लेकिन खुले में कूड़ा फेंकने की घटनाएं कम नहीं हुई हैं। कूड़ा करकट फेंकने वालों पर स्थानीय निकायों की चेतावनियों का कोई खास असर पड़ता हुआ दिखाई नहीं दिया। ऐसी स्थिति में अब सरकार ने फैसला किया है कि यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थलों और सड़कों पर कूड़ा फेंकता हुआ पाया गया, तो उससे तत्काल जुर्माना वसूला जाएगा। 

सार्वजनिक स्थानों, पार्कों,सड़क या जोहड़ आदि में पहली बार कूड़ा-करकट फेंकते हुए पकड़े जाने पर पांच हजार रुपये जुर्माना वसूला जाएगा। यदि दूसरी बार कोई व्यक्ति कूड़ा फेंकते पाया गया, तो उससे दस हजार रुपये वसूला जाएगा। अगर कोई बहुत ज्यादा कूड़ा यानी बल्क में फेंकता हुआ पाया गया, तो उससे पच्चीस हजार और दोबारा बल्क में कूड़ा फेंकते पाए जाने पर पचास हजार रुपये वसूला जाएगा। इसके लिए जिले में टीमें नियुक्त की जाएंगी।

Wednesday, January 14, 2026

ओह डायमंड, यह तुमने क्या किया?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सत्रहवीं सदी के महान भौतिक विज्ञानी आइजैक न्यूटन का जन्म 4 जनवरी 1643 को इंग्लैंड में हुआ था। आइजैक न्यूटनके पैदा होने से तीन महीने पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। उनके पिता का नाम भी आइजैक था। न्यूटन समय से पूर्व पैदा हुए थे। उनकी मां कहा करती थीं कि जब आईजैक न्यूटन पैदा हुआ था, तो वह एक छोटे से मग में समा सकता था। 

पिता की मृत्यु के कुछ साल बाद उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली थी और न्यूटन का पालन पोषण उनकी नानी ने किया था। दूसरी शादी कर लेने की वजह से वह अपनी मां और सौतेले पिता से नफरत करते थे। जीवन भर उनका अपने सौतेले पिता और मां के साथ संबंध सामान्य नहीं हो पाए थे। न्यूटन की सबसे बड़ी खोज गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत और गति के तीन नियम थे जिसकी वजह से भौतिकी के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रगति हुई। 

एक बार की बात है। वह किसी विषय पर बीस साल से रिसर्च कर रहे थे। उनका पालतू कुत्ता था डायमंड। उसे वह बहुत प्यार करते थे। एक दिन वह किसी काम से घर के बाहर गए हुए थे। मेज पर रिसर्च पेपर रखा हुआ था और उस पर लैंप जल रहा था। डायमंड मेज पर कूदा तो लैंप पलट गया। लैंप में भरा हुआ मिट्टी का तेल चारों ओर बिखर गया। इससे मेज पर आग लग गई। 

इस आग में मेज पर ही रखा हुआ रिसर्च पेपर भी जल गया। जब न्यूटन वापस लौटे तो उन्हें रिसर्च पेपर जलने का बहुत दुख हुआ। क्रोध भी आया, लेकिन कुछ समय बात उन्होंने डायमंड को अपने पास बुलाकर थपथपाते हुए कहा, ओह डायमंड, यह तुमने क्या किया? इसके बाद उन्होंने अपनी स्मृति के आधार पर कई साल में रिसर्च पेपर फिर तैयार कर लिया।

भय और लालच की वजह से बढ़ रहीं साइबर ठगी की घटनाएं


अशोक मिश्र

साइबर ठगी के मामले हरियाणा में बढ़ते जा रहे हैं। लोगों की जीवन भर की कमाई को साइबर ठग तकनीक का दुरुपयोग करके पल भर में उड़ा देते हैं। इस तरह की घटनाएं जिसके साथ होती हैं, वह टूट जाता है। किसी ने जीवन भर पैसे-पैसे जोड़कर रखा था कि बेटी का विवाह करें, लेकिन साइबर ठग पल भर में उनके सपनों को चकनाचूर कर देते हैं। घर में किसी परिजन की गंभीर बीमारी के इलाज के लिए जुटाए गए पैसे को जब साइबर ठग चुरा लेते हैं, तो जिसके बैंकखाते से रकम चुराई गई होती है, वह असहाय हो जाता है। 

बुढ़ापे के लिए बचाकर रखी गई रकम जब बैंकखाते से चोरी हो जाती है, तो लगता है कि जैसे आंखों के सामने अंधेरा छा गया हो। पीड़ित व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि अब उसका बुढ़ापा कैसे कटेगा। वह कहां जाएगा और उसकी इस अवस्था में मदद कौन करेगा। साइबर ठगों को इससे कुछ लेना देना नहीं होता है। एक दिन पहले ही साइबर ठगों ने दो लोगों के फोन हैक करके 1.54 लाख रुपये उड़ा लिए। पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत तो दर्ज कराई है, लेकिन अभी तक पुलिस साइबर ठगों को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। बल्लभगढ़ की चावला कालोनी में एक व्यक्ति अपनी चतुराई से साइबर ठगों का शिकार होते होते रह गया, नहीं तो उसे कितने रुपये की चपत लगती, अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। 

दरअसल, चावला कालोनी में रहने वाले एक दुकानदार के पास फोन आया कि वह एटीएस हेडक्वार्टर से बात कर रहा है। उसे उनके मोबाइल नंबर के खिलाफ जांच का आदेश मिला है। इसके बाद दुकानदार से तमाम जानकारियां मांगी गईं। दुकानदार को आभास हो गया कि यह फ्राड काल है। उसने पुलिस कमिश्नर के पास जाने की धमकी दी, तब जाकर उसका पिंड छूटा। 

हालांकि दुकानदार ने पुलिस से इस मामले में शिकायत दर्ज करा दी है। सच बात तो यह है कि साइबर ठगों के चंगुल में ज्यादातर वही लोग फंसते हैं जो कम पैसे लगाकर ज्यादा कमाने के चक्कर में लगे रहते हैं। साइबर ठग इसी लालच का फायदा उठाते हैं। कुछ साइबर ठग तो पुलिस, सीबीआई, एनआईए जैसी एजेंसियों का सदस्य या अधिकारी बनकर लोगों को पहले डराते हैं। फिर समझौता करने के नाम पर मोटी रकम वसूल लेते हैं। उन्हें डिजिटल अरेस्ट कर लेते हैं। 

पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल अरेस्ट की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इनका शिकार ज्यादातर वह लोग होते हैं, जो अमीर होते हैं और बुढ़ापे की ओर अग्रसर होते हैं। ऐसे लोगों को सरकारी संस्थाओं का नाम लेकर डराना आसान होता है। जब साइबर ठग या डिजिटल अरेस्ट करने वाले किसी को अपना टारगेट चुनते हैं, तो पहले वह अपने टारगेट के बारे में पूरी जानकारी जुटाते हैं। वह ऐसे लोगों को ज्यादा चुनते हैं जो एकाकी जीवन जी रहे हैं या उनके बच्चे बाहर रहते हैं।

Tuesday, January 13, 2026

सिकंदर महान नहीं, इच्छाओं का सबसे अभागा दास था


अशोक मिश्र

हमारे यहां अक्सर बातचीत के दौरान कहा जाता है कि हरि अनंत, हरि कथा अनंता। हरि यानी भगवान विष्णु के अनंत रूप हैं और उनकी कथाएं भी अनंत हैं। ठीक इसी तरह इच्छाएं अनंत हैं। इन इच्छाओं की कहीं कोई सीमा नहीं है। हमने बचपन में मध्य प्रदेश की एक लोककथा पढ़ी थी। 

एक बड़े साहित्यकार ने भी इसी संदर्भ में एक निबंध भी लिखा है। ठीक ऐसी ही कहानी रूसी साहित्य में भी पढ़ने को मिलती है। कहानी कुछ यों है कि एक मछुआरा नदीं में मछलियां पकड़ने गया। उसके जाल में एक सुनहरी मछली फंसी। मछली ने उससे छोड़ने की विनती की, तो मछुआरे को भी दया आ गई। अगले दिन मछुआरा मछली के लिए आटे की गोलियां बनाकर ले आया। धीरे-धीरे मछली और मछुआरे के बीच दोस्ती हो गई। यह बात मछुआरे की पत्नी को पता चली तो उसने मछली से कुछ मांगने को कहा। मछुआरे ने जो मांगा, वह पूरा हो गया। 

धीरे-धीरे मछुआरे की पत्नी ने महल, धन-दौलत, नौकर-चाकर सब मांग लिया, तो एक दिन इच्छा प्रकट की कि चांद और सूरज उसके इशारे पर काम करें। मछुआरे ने अपनी पत्नी की इच्छा जब मछली के सामने जताई, तो उसने मछुआरे को पहले जैसा कर दिया और फिर दोबारा मछुआरे के बुलाने पर नहीं आई। यह लोककथा कई समाज में थोड़े-बहुत अंतर के साथ प्रचलित है। इसका यही निहितार्थ है कि प्रत्येक समाज मनुष्य की अनंत इच्छाओं के बारे में जानता था और उसके दुष्परिणाम भी जानता था। 

दरअसल, मानव स्वभाव यही है। जब उसकी एक इच्छा पूरी हो जाती है, तो तत्काल दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छाएं तभी पीछा छोड़ती हैं,जब इंसान के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। इच्छाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इंसान कई बार इनका गुलाम बनकर रह जाता है। उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता या पहचान नहीं रह जाती है। इतिहास में सिकंदर को ही देख लीजिए। लोग उसे सिकंदर महान कहते हैं, लेकिन अगर देखा जाए, तो उससे ज्यादा अभागा कौन होगा, जो इतनी सुख-सुविधाएं और धन-दौलत होने के बावजूद उसका सुख नहीं उठा पाया। वह और..थोड़ा और की रट लगाता हुआ, तत्कालीन ज्ञात दुनिया का पंद्रह प्रतिशत हिस्सा ही जीत पाया। 

कहां उसने मकदूनिया से निकलते समय पूरी दुनिया को जीतने की इच्छा मन में पाली थी। उसके पास जितनी दौलत थी, उस पूरी दौलत का उपयोग करके भी अपनी मौत को चौबीस घंटे भी टाल नहीं पाया। दरअसल, सच यही है कि जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, सच्चे अर्थों में स्वतंत्र वही है। बाकी सब इच्छाओं के दास हैं। 

मजे की बात यह है कि इंसान को यह दासत्व बहुत पसंद भी आता है। जीवन भर इसी दासत्व की मृगतृष्णा में भटकता रहता है और सिकंदर की तरह खाली हाथ इस दुनिया से विदा हो जाता है। यह स्थिति लगभग सबकी होती है। एक घर बन गया, तो दो घर बनाने की जुगत में इंसान लग जाता है। करोड़ रुपये हैं, तो सौ करोड़ कैसे बने, इसकी फिराक में वह जीवन खपा देता है, लेकिन इन रुपयों का सुख नहीं उठा पाता है।

आप महाराज होकर क्यों भटकते हैं?

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आज पूरा देश स्वामी विवेकानंद की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मना रहा है। राजनीतिक पार्टियां भी स्वामी विवेकानंद की जयंती को अपने-अपने स्तर पर मना रही हैं। स्वामी विवेकानंद सनातन धर्म के  सबसे बड़े प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। गुलाम भारत में पैदा हुए स्वामी विवेकानंद ने साफ तौर पर कहा था कि जब तक देश के युवाओं में आत्मबल नहीं होगा, वह गुलाम ही रहेंगे। 

शरीर भी बलशाली, निरोगी होना चाहिए ताकि दुश्मनों से लड़ सकें। उठो, जागो और तब तक न रुको, जब तक तुम्हें लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। यह अमर संदेश आज भी पूरे भारत में गूंज रहा है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद विभिन्न राज्यों में घूमते हुए अलवर पहुंचे। अलवर में एक दिन स्वामी विवेकानंद प्रवचन दे रहे थे, तो अलवर के दीवान रामचंद्र ने उनका प्रवचन सुना और बड़े प्रभावित हुए। 

उन्होंने सोचा कि स्वामी जी को महाराज मंगल सिंह से मिलवाया जाए। स्वामी जी से मिलने के बाद महाराज मंगल सिंह भी काफी प्रभावित हुए। उन्होंने स्वामी जी का बड़ा आदर सत्कार किया। एक दिन महाराज बोले, स्वामी जी! आप इतने ज्ञानी हैं, आपकी प्रतिभा भी काफी प्रखर है। आप एक ही जगह रहकर क्यों नहीं प्रवचन देते हैं? यह सुनकर विवेकानंद बोले, आप यह बताइए कि आप अपना काम धाम छोड़कर अंग्रेजों के साथ शिकार पर क्यों निकल जाते हैं? 

आपका काम तो प्रजा का कल्याण करना है। दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज ने कहा कि शिकार खेलना मुझे अच्छा लगता है। तब स्वामी जी ने कहा कि मेरे और आपके भटकने में अंतर है। आप निजी खुशी के लिए भटकते हैं, मैं लोगों के कल्याण के लिए भटकता हूं। मैं भारत में प्रेम और समानता फैलाना चाहता हूं। यह सुनकर महाराज की आंखें खुल गईं।

समाज की सामूहिकता और श्रम की महत्ता का पर्व है लोहड़ी

अशोक मिश्र

लोहड़ी आ गई। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम से लोहड़ी मनाई जाती है। लोहड़ी प्रकृति की पूजा का पर्व है। प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है। हड्डियों को भी कंपा देने वाली ठंड की विदाई का अवसर जानकर लोग प्रसन्न हैं। सूर्य मकर रेखा पर आने वाला है। ऐसी स्थिति में कौन ऐसा प्राणी होगा जो प्रसन्न नहीं होगा। मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाने वाली लोहड़ी वस्तुत: किसानों का पर्व है। 

यह श्रम की महत्ता और सामूहिकता का पर्व है। लोहड़ी बताती है कि मानव समाज का विकास भी सामूहिकता की वजह से ही हुआ है और भविष्य में भी सामूहिकता ही देश और समाज को आगे ले जाएगी। यही वजह है कि लोहड़ी भी सामूहिक रूप से मनाई जाती है। कोई भी घर में लोहड़ी नहीं मनाता है। गांव हो या शहर का कोई मोहल्ला सभी जगहों पर किसी एक खुले स्थान पर लकड़ियां और उपले इकट्ठे किए जाते हैं। उसमें आग लगाने के बाद लोग आग सेंकते हैं, उसके इर्दगिर्द बच्चे से लेकर बूढ़े तक नाचते गाते हैं, हंसी ठिठोली करते हैं। मूंगफली, रेवड़ी और मक्के का लावा लोहड़ी को समर्पित किया जाता है। 

दरअसल, जलती हुई लोहड़ी इस बात का प्रतीक है कि अब ठंड विदा होने वाली है। कल तक जो ठंड लोगों को घरों में ही रहने को बाध्य कर रही थी, दैनिक कार्यों में एक बाधा के रूप में थी, वह अब विदा होने वाली है। मकर राशि में प्रवेश करने के बाद सूर्य की ऊष्मा प्रखर होने लगेगी। ऐसी स्थिति में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना, लाजिमी है। हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है। ज्यादातर तीज-त्यौहार खेती-किसानी से ही जुड़े रहे हैं। लोहड़ी भी किसानों का ही पर्व है। यह वैदिक काल से ही मनाया जा रहा है। रबी की फसल तैयार हो रही है। किसान अपनी मेहनत को फलीभूत होते हुए देखकर प्रसन्न है। 

धरती ने उसे उम्मीद से ज्यादा दिया है। जल्दी ही पड़ने वाली गर्मी में फसल पकने लगेगी, ऐसी स्थिति में अग्नि और धरती के प्रति श्रद्धा प्रकट करना, उसका कर्तव्य है। वह मूंगफली, रेवड़ी, तिल, मक्के का लावा (पॉपकॉर्न) आदि अग्नि और धरती को समर्पित करके उसे प्रति श्रद्धा और आदर प्रकट करता है। प्रकृति की ही अनुकंपा की वजह से उसका और उसके परिवार का पालन पोषण होता है। 

अपनी मेहनत का परिणाम देखकर किसान प्रसन्न है, तो नाचना-गाना स्वाभाविक है। लोहड़ी लोकपरंपरा का पर्व है। इस अवसर पर लोकगीतों से गली, मोहल्ला और गांव गुलजार हो जाते हैं। लोकगीत हमारे देश की प्राचीन परंपरा के वाहक होते हैं। इन गीतों के माध्यम से ही हमें पता चलता है कि हमारे पूर्वज कैसे थे और उनकी परंपराएं कैसी थीं। लोहड़ी के अवसर पर दूल्ला भट्टी की कथा न गाई जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता है।

Monday, January 12, 2026

प्रमाण पत्र तो थे, लेकिन योग्यता नहीं थी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लियो टॉलस्टाय न केवल दुनिया के महानतम उपन्यासकारों में गिने जाते हैं, बल्कि उन्हें गहन नैतिक विचारों और सामाजिक विचारों के लिए याद किया जाता है। टॉलस्टाय की रचनाओं में समाज का नग्न स्वरूप दिखाई देता है। उनका सबसे ज्यादा प्रसिद्ध उपन्यास वार एंड पीस (युद्ध और शांति) और करेनिन्ना माना गया है। इन उपन्यासों की कभी दुनिया भर में धूम थी। 

वह सामाजिक सरोकारों को सबसे उच्च मानते थे। एक बार की बात है। उन्हें एक सहायक की जरूरत महसूस हुई। जो उनकी लेखन में सहायता कर सके। वैसे टॉलस्टाय गरीब घर में पैदा नहीं हुए थे। उनकी आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी। उन्होंने अपने कई मित्रों से सहायक के लिए चर्चा की थी। 

एक दिन उनके एक मित्र ने अपने किसी परिचिति को उनके पास सहायक के लिए भेजा। उस आदमी से मिलने के बाद टॉलस्टाय ने उस व्यक्ति को काम पर नहीं रखा। उन्होंने एक ऐसे आदमी को अपना सहायक बना लिया जिसको इस क्षेत्र में कोई जानकारी नहीं थी। कुछ दिनों बाद वह मित्र टॉलस्टाय से मिला तो उन्होंने पूछा कि आपने मेरे परिचित को काम पर नहीं रखा, लेकिन जिसे रखा है, उसके पास तो उतने प्रमाण पत्र भी नहीं थे। 

टॉलस्टाय कहा कि जब वह व्यक्ति मेरे पास आया, तो उसने बड़े शालीनता से अंदर आने की इजाजत मांगी। डोरमैट पर अपने पांव पोछे। जो सवाल किया गया था, उसका उसने संक्षिप्त जवाब दिया।उसके पास प्रमाण पत्र भी कम ही थे, लेकिन उसके पास आत्म विश्वास बहुत था। जबकि आपके मित्र ने आते ही आपका नाम लेकर सिफारिश की। आपके मित्र के पास प्रमाणपत्र तो थे, लेकिन योग्यता नहीं थी। अब आप बताइए मैं क्या करता। यह सुनकर उस मित्र चुप रह गया।

किसानों का दर्द: फसल खरीद विवाद और किसान अधिकार


अशोक मिश्र

हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है, जहां किसानों की आजीविका का बड़ा आधार धान और गेहूं जैसी फसलों की सरकारी खरीद प्रणाली पर टिका है। ऐसे में धान खरीद से जुड़े कथित घोटालों और अनियमितताओं के आरोप न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि किसानों के भरोसे को गहरा आघात पहुंचाते हैं। किसान संगठनों ने धान खरीद में गड़बड़ी को लेकर सीबीआई जांच की मांग की थी। गड़बड़ी के आरोप ने मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। 

किसानों का आरोप है कि मंडियों में फसल खरीद के दौरान नियमों की अनदेखी की जाती है। कहीं नमी का बहाना बनाकर फसल लौटाई जा रही है, तो कहीं भुगतान में देरी हो रही है। कई मामलों में किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति उस न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत है, जिसे किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए लागू किया गया था। फसल खरीद में पारदर्शिता का अभाव किसानों की सबसे बड़ी चिंता बन गया है। 

यदि सरकारी एजेंसियां समय पर और ईमानदारी से खरीद सुनिश्चित नहीं कर पातीं, तो फिर एमएसपी की घोषणा केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है। किसान संगठनों की जांच की मांग इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर भरोसे की कमी लगातार बढ़ रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खेती पहले से ही बढ़ती लागत, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में यदि खरीद प्रक्रिया में भी बाधाएं खड़ी हों, तो किसान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है। 

कर्ज का बोझ बढ़ता है। आत्मनिर्भरता की जगह असुरक्षा का भाव हावी हो जाता है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह किसानों के हितों की रक्षा करे और खरीद प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाए। यदि फसल खरीद में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या लापरवाही हो, तो निष्पक्ष जांच जरूरी है। दोषियों पर सख्त कार्रवाई न केवल न्याय सुनिश्चित करेगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर भी अंकुश लगाएगी। साथ ही, मंडी व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत करना, आॅनलाइन निगरानी, त्वरित भुगतान और शिकायत निवारण तंत्र को प्रभावी बनाना समय की मांग है। 

किसान केवल समर्थन मूल्य नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसे की भी अपेक्षा करता है। अंतत: यह मुद्दा केवल फसल खरीद का नहीं, बल्कि किसान अधिकारों और सरकारी नीतियों की विश्वसनीयता का है। यदि किसानों का विश्वास टूटता है, तो इसका असर केवल खेती पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ता है। सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसान की मेहनत का उचित मूल्य उसे समय पर और बिना किसी बाधा के मिले। यही सच्चे अर्थों में किसान-हितैषी शासन की पहचान होगी।

Sunday, January 11, 2026

जापानी कवि इगुचि की दयालुता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जापान में एक कवि हुए हैं इगुचि। यह सचमुच पैदा हुए थे या जापान की लोककथाओं में किसी लेखक द्वारा पैदा किए गए एक पात्र हैं, यह नहीं मालूम है। जापानी साहित्य में वह एक पात्र के रूप में जाने जाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि वह एक दार्शनिक,कवि और गरीबों की मदद करने वाले थे। वह अपने पास से पैसे खर्च करके लोगों की मदद किया करते थे। 

कहा जाता है कि वह बहुत ही मनमौजी स्वभाव के थे। लोगों को हंसाने और किसी भी बात की चिंता करने के लिए वह बहुत प्रसिद्ध थे। एक बार की बात है। एक आदमी अपनी गरीबी से बहुत परेशान था। तीन-चार दिन से उसके परिवार ने खाना नहीं खाया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करे। जब उसे कुछ नहीं सूझा, तो उसने तय किया कि वह आत्महत्या कर लेगा। 

आत्महत्या करने के लिए वह एक जगह गया। वह आत्महत्या करने ही वाला था कि उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा। उसने घूमकर देखा कि एक व्यक्ति पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा है। वह कवि इगुचि थे। इगुचि ने कहा कि आत्महत्या करने के लिए यह अनमोल जीवन नहीं मिला है। उस व्यक्ति ने इगुचि को अपनी सारी पीड़ा बताई। यह भी बताया कि उसके परिवार को तीन दिन से खाना नहीं मिला है। यह सुनकर इगुचि बहुत द्रवित हुए। उन्होंने उस व्यक्ति मदद की और उसे मरने से बचा लिया। 

इसके बाद उन्होंने नगर में एक गुप्तदान की पेटी रख दिया। पेटी पर लिख दिया कि जो सचमुच जरूरत मंद हो वह इसमें से नि:संकोच पैसे निकाल कर अपना काम चला सकता है। जो कोई जरूरतमंद ऐसा करेगा, मुझे बहुत खुशी होगी। इसके बाद पूरे जापान में कवि इगुचि प्रसिद्ध हो गए।