Thursday, January 29, 2026

आलसी का कभी भला नहीं हो सकता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करना नहीं जानता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता है। समय मुट्ठी से फिसलती रेत के समान होता है। धीरे-धीरे कब वह हाथ से फिसल जाता है, इसका आभास तक नहीं होता है। जब मुट्ठी खाली हो जाती है, तब जाकर एहसास होता है कि अरे, अब तो कुछ नहीं बचा है। एक आलसी की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। 

एक बार किसी गांव में एक साधु आया। उसकी काफी दिनों तक एक ऐसे युवक ने सेवा की, जो खुद बहुत आलसी था। लेकिन उसने साधु की सेवा बड़े मन से की थी, इसलिए साधु उसकी सेवा से प्रसन्न हो गया। उसने उसे पारस पत्थर देते हुए कहा कि इस पत्थर से सात दिनों तक लोहे को सोने में बदल सकते हो। सातवें दिन मैं आऊगा तब तुम्हें यह पारस पत्थर वापस करना होगा। 

यह सुनकर वह युवक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने घर में लोहे को खोजना शुरू किया। उसके यहां बहुत थोड़ा सा लोहा मिला जिसे उसने सोने में बदल दिया। अगले दिन वह बाजार लोहा खरीदने गया। लोहा बहुत महंगा था। उसने सोचा कि इतना महंगा लोहा खरीदने से बेहतर है कि वह थोड़े दिन रुक जाए, जब लोहा सस्ता हो जाएगा, तब वह लोहा खरीदेगा। तीन दिन बाद वह फिर बाजार पहुंचा। 

लोहे का दाम पहले की अपेक्षा कई गुना ज्यादा हो गया था। उसने सोचा कि कुछ दिन और इंतजार कर लेता है। यही सोचते-सोचते सातवां दिन आ पहुंचा। साधु उस पत्थर को लेने आ पहुंचा। युवक ने विनती की कि वह कुछ दिन और पत्थर उसके पास रहने दे, लेकिन साधु नहीं माना और पत्थर ले लिया। साधु ने कहा कि तुम आलसी आदमी हो। तुम्हारा भला नहीं हो सकता है। कोई दूसरा होता तो अब तक अपने घर में सोने का पहाड़ खड़ा कर लेता। तुम निरे आलसी हो।

बच्चे को पढ़ाइए, पहले मानसिक रूप से उसे तैयार तो होने दीजिए


अशोक मिश्र

पहली कक्षा में छह साल की आयु में ही प्रवेश देने के मामले में काफी सख्त हो गई है। जिन बच्चों की आयु छह साल से कम है, उन बच्चों को प्री-प्राइमरी में समायोजित करने का निर्देश सरकार जारी कर चुकी है। पिछले कुछ दशक से निजी स्कूलों ने डेढ़ या दो साल में ही बच्चों को प्रवेश देना शुरू कर दिया था। डेढ़ साल या दो साल के बच्चों को वह प्री नर्सरी या नर्सरी में एडमिशन दे देते थे। इससे इन स्कूलों को फायदा यह होता था कि उन्हें एडमिशन फीस के नाम पर एक मोटी रकम मिल जाती थी। 

हर महीने की फीस मिलती थी, वह अलग से। इतनी कम उम्र में बच्चे सीखने के नाम पर कुछ अक्षर या गिनतियां ही सीख पाते थे। माता-पिता भी निश्चिंत हो जाते थे कि उनका बच्चा स्कूल में कुछ न कुछ सीख रहा है। लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में वह कुछ सोचते ही नहीं थे। कुछ निजी स्कूलों में तो यह सब कुछ आज भी जारी है, लेकिन केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति ने सरकारी स्कूलों के लिए तय कर दिया है कि पहली कक्षा में प्रवेश के समय बच्चा छह साल की उम्र से कम नहीं होना चाहिए। 

कम उम्र में ही बच्चों को स्कूल भेजने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों के मस्तिष्क का विकास बाधित हो जाता है। वह मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। यही नहीं, वह शारीरिक रूप से कमजोर भी हो जाते हैं। सच कहा जाए, तो पांच-छह साल तक की उम्र बस खेलने कूदने और खाने-पीने की होती है। इतनी उम्र तक आते-आते बच्चों का मस्तिष्क आयु के हिसाब से परिपक्व हो चुुका होता है। वह सीखने के लायक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में जब कोई बच्चा सीखना शुरू करता है, तो वह कम उम्र में ही पढ़ाई शुरू कर देने वाले बच्चों की अपेक्षा जल्दी सीखता है। उसके सीखने की क्षमता काफी तेज होती है।

उसका मानसिक विकास भी जरूरत के मुताबिक हो चुका होता है। कुछ ही दिन पहले फरीदाबाद में ही एक पिता ने अपनी चार साल की बेटी को पचास तक गिनती न लिख पाने की वजह से पीट-पीटकर मार डाला था। चार साल की बच्ची को मानसिक दबाव देने ही गलत था। अगर वह बच्ची पचास तक गिनती नहीं लिख पाई थी, तो भी यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। इस उम्र के बच्चों में सीखने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन उसके पिता की अधीरता ने उसकी जान ले ली। 

दरअसल, शिक्षा का मतलब यही है कि भीतर की निहित शक्तियों को विकसित करना। अब कोई जरूरी तो नहीं है कि हर बच्चे की शक्तियां दो-तीन साल की उम्र से ही विकसित हो जाएं। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों को अपने शरीर और मस्तिष्क को विकसित होने का अवसर प्रदान किया जाए। राज्य सरकार ने तय किया है कियदि किसी निजी स्कूल ने भी इस मामले में नियमों का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

Wednesday, January 28, 2026

मूर्ख किसान! तू दिशाशूल की ओर जा रहा है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो व्यक्ति अपने कर्म पर विश्वास करता है, वह भाग्य के भरोसे नहीं रहता है। कर्मशील व्यक्ति के लिए हर दिन एक समान होते हैं। वह किसी भी दिन को बेहतर या खराब नहीं समझता था। महाराज वसुसेना को ज्योतिष पर बहुत ज्यादा भरोसा था। उनके राज ज्योतिषी ने उन्हें ज्योतिष के मामले में इतना ज्यादा उलझा दिया था कि वह हर काम में मुहूर्त और शुभ समय का ध्यान रखने लगे। 

जब उनका राज ज्योतिषी बताता कि महाराज, यह समझ अनुकूल नहीं है, तो वह उस समय में वह काम कतई नहीं करते थे। जब उनकी इस कमजोरी का पता पड़ोसी राज्य के राजाओं को चला तो वह ऐसे अवसर की फिराक में रहने लगे कि जब राजा राज्य में न हो या ज्योतिष के हिसाब से राजा के लिए अनुकूल न हो। एक दिन की बात है। राजा वसुसेना अपने राज ज्योतिषी के साथ नगर के बाहर निकले। 

राज ज्योतिषी ने देखा कि एक किसान अपने हल बैल के साथ खेत जोतने जा रहा था। राज ज्योतिषी ने अपना पांडित्य प्रदर्शन करने के लिए उस किसान से कहा, अरे मूर्ख! तू जिस दिशा में जा रहा है, उस  ओर आज दिशाशूल है। तेरा सर्वनाश हो जाएगा। उस किसान ने अपने बैलों को रोकने के बाद पसीना पोछते हुए कहा, पंडित जी, मैं रोज इसी दिशा में आता-जाता हूं। हो सकता है कि किसी दिन दिशाशूल हो। अगर ऐसा हो, तो मेरा अब तक सर्वनाश हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ। 

ज्योतिषी ने कहा कि अपने हाथ दिखा। किसान ने उल्टा हाथ उसके सामने कर दिया। ज्योतिषी ने कहा कि हाथ सीधे करो। किसान ने कहा कि मैंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। हाथ वह फैलाते हैं जो किसी से कुछ मांगते हैं। मेरे लिए तो साल का हर दिन पवित्र है। यह सुनकर राजा वसुसेना की आंख खुल गई। इसके बाद उनका समय लोगों की भलाई में बीतने लगा।

विकास के पथ पर उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा हरियाणा


अशोक मिश्र

हरियाणा धीरे-धीरे प्रगति के पथ पर अग्रसर है। हरियाणा उत्तरोत्तर विकास कर रहा है। यह विकास अब दिखाई भी देने लगा है। किसानों से लेकर निम्न आय वर्ग के लोगों की आय में बढ़ोतरी होने लगी है। विभिन्न सरकारी योजनाओं ने प्रदेश के कायाकल्प में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का कहना है कि  हरियाणा समृद्धि की नई परिभाषा लिख रहा है। 

वैसे यह बात सही है कि जब कोई राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, तो वह अपने राज्य की ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है। राज्यों की मजबूत अर्थव्यवस्थाएं ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती हैं। हरियाणा कहने को देश के कुल क्षेत्रफल का 1.34 प्रतिशत हिस्सा है और जनसंख्या के मामले में 2.09 प्रतिशत भागीदार है। लेकिन जहां बात आर्थिक भागीदारी की आती है, देश की जीडीपी में 3.7 प्रतिशत हिस्सेदारी हरियाणा की है। यह भागीदारी बताती है कि प्रदेश धीरे-धीरे समृद्धि की ओर बढ़ता जा रहा है। 

यही नहीं, हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 3.53 लाख रुपये है। हरियाणा जितनी प्रति व्यक्ति आय कई बड़े राज्यों की भी नहीं है। कई छोटे और बड़े राज्य इस मामले में कहीं ज्यादा पीछे हैं। हरियाणा प्रति व्यक्ति जीएसटी कलेक्शन के मामले में भी देश में पहले स्थान पर है। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। स्टेट ईज आफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में हरियाणा टाप अचीवर्स की श्रेणी में शामिल है। इन सारी उपलब्धियों के पीछे मातृशक्ति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। 

मातृशक्ति के सहयोग के बिना कोई भी देश या राज्य उन्नति नहीं कर सकता है। यह बात समझते हुए राज्य सरकार ने महिलाओं को स्वस्थ, सुरक्षित और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रखी हैं। प्रदेश की साढ़े छह लाख से अधिक महिलाओं को प्रतिमाह इक्कीस सौ रुपये मासिक प्रदान किया जा रहा है। गरीब महिलाओं को राहत प्रदान करने के लिए 15 लाख से अघिक परिवारों को पांच सौ रुपये में गैस सिलेंडर उपलब्ध कराया जा रहा है। पंचायती राज में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देकर उनकी आर्थिक और सामाजिक दशा को संवारा जा रहा है। 

इसके अतिरिक्त सुरक्षित हरियाणा की दिशा में कई तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। जिस राज्य की कानून व्यवस्था सुदृढ़ होती है, उस राज्य में पूंजी निवेश करने के लिए देशी-विदेशी पूंजीपति उत्सुक रहते हैं। इसके लिए हरियाणा पुलिस ने कई तरह के अभियान चलाकर अपराधियों, गैंगस्टरों और नशीले पदार्थ बेचने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। कई भगोड़े अपराधियों को भी सलाखों के पीछे डाला गया है। विदेश भाग गए अपराधियों को भी डिपोर्ट कराकर गिरफ्तार किया गया है।

Tuesday, January 27, 2026

कर्म के अनुसार तय होता है भाग्य


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध हमेशा अपने शिष्यों को कर्म की शिक्षा दिया करते थे। वह कहा करते थे कि कर्म ही सब कुछ है। जिसका कर्म मानव समाज के लिए लाभदायक होगा, उसी का जीवन सुखी रहेगा। वह शिक्षा देने के लिए सामान्य जीवन से ही प्रसंग लिया करते थे। एक बार की बात है। 

किसी गांव के बुजुर्ग की मौत हो गई। उसका पुत्र अपने पिता को अत्यंत प्यार करता था। उसने होश संभालने के बाद से ही अपने पिता का हर तरह से ख्याल रखा था। पिता की मौत से पुत्र अत्यंत व्यथित था। वह सोचा करता था कि उसके पिता की आत्मा स्वर्ग गई होगी या नरक। एक दिन उसने सुना कि उसके नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। वह महात्मा बुद्ध के पास जाकर बोला, भंते! क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि मेरे पिता की आत्मा स्वर्ग जाए। यदि कोई उपाय हो तो बताएं। 

महात्मा बुद्ध ने कुछ देर उस युवक की बात पर विचार किया। फिर बोले, ऐसा करो, कल तुम एक घड़े में पत्थर और दूसरे घड़े में घी लेकर नदी में जाना और दोनों घड़ों को फोड़ देना। जो परिमाण निकले, उसका आकर मुझे बताना। यह सुनकर वह व्यक्ति चला गया और उसने महात्मा बुद्ध ने जो कहा था, वैसा ही किया। यह सब कुछ करने के बाद वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा। 

महात्मा बुद्ध को उसने बताया कि जब मैंने पत्थर वाला घड़ा फोड़ा, तो सारे पत्थर नदी में बैठ गए। लेकिन घी का घड़ा फोड़ने पर सारा घी बह गया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि पत्थर बहने लगे और घी नदी के नीचे बैठ जाए। उस आदमी ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है। तब महात्मा बुद्ध ने कहा कि जिसने जैसा कर्म किया है, उसको उसी के हिसाब से स्वर्ग या नरक में भेजा जाएगा। इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर होने वाली बैठक से फिर जगी आस


अशोक मिश्र

पिछले लगभग पांच दशकों से सतलुज यमुना लिंक नहर का मुद्दा पंजाब और हरियाणा के बीच घड़ी के पेंडुलम की तरह लटका हुआ है। दोनों राज्य अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इस मामले में हरियाणा का पक्ष मजबूत और न्यायोचित दिखाई देता है। पंजाब से उसे उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए। पिछले 46 वर्षों से पंजाब हरियाणा के हिस्से का पानी दबाए हुए बैठा है और हरियाणा के हक जताने पर वह ऊलजुलूल तर्क देकर मामले को लटका देता है। 

सतलुज यमुना लिंक नहर नहीं बनने से अब तक लगभग बीस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। इतना ही नहीं, नहर नहीं बनने का सबसे ज्यादा असर दक्षिण हरियाणा की कृषि जमीनों का बंजर होने के रूप में दिखाई दे रहा है। यदि समय पर सतलुज यमुना लिंक नहर बन गई होती, तो प्रदेश की दस लाख एकड़ कृषि भूमि बंजर होने से बच जाती और इस इलाके में अनाज का उत्पादन भी बढ़ जाता। एक अनुमान के मुताबिक, हर साल सिंचाई पानी नहीं मिलने से 42  लाख टन खाद्यान्न का नुकसान हरियाणा को उठाना पड़ रहा है। इन सबके बावजूद एक नई आशा फिर जगी है सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर। 

आगामी 27 जनवरी को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में दोनों राज्यों के अधिकारियों की एक बैठक होने जा रही है। मुख्यमंत्री सैनी ने बैठक की तैयारियों को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक भी की है और सबको अपने तथ्यों को दुरुस्त रखने को कहा है। मंगलवार की सुबह चंडीगढ़ के हरियाणा हाउस में होने वाली बैठक में तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ जल की उपलब्धता, कानूनी स्थिति और संभावित आपसी सहमति को लेकर बातचीत हो सकती है। वैसे यह मामला सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है। 

पहले भी एसवाईएल के मामले में सुप्रीमकोर्ट पंजाब को कड़ी फटकार लगा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से कहा कि वह मनमानी कर रहा है। नहर बनाने का आदेश पारित होने के बाद अधिगृहीत जमीन को गैर-अधिसूचित कर देना, कहां तक जायज है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पंजाब हरियाणा को किसी भी हालत में पानी देने को तैयार नहीं है, जो कि हरियाणा का अधिकार है। मंगलवार को होने वाली बैठक में केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि मौजूद रहेगा या नहीं, इस बारे में कोई सूचना नहीं है। वर्ष 1981 में दोनों राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। 

इसके लिए सतलुज यमुना लिंक नहर बनाने का फैसला लिया गया था। हरियाणा ने अपने हिस्से की 92 किमी लंबी नहर भी बना ली थी, लेकिन पंजाब ने 122 किमी नहर निर्माण के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तब से यह मुद्दा दोनों राज्यों के बीच झूल रहा है।


Sunday, January 25, 2026

अत्याचार का हमेशा विरोध करें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अत्याचार करने से बड़ा गुनाह अत्याचार को सहन करना है। सच तो यह है कि जब हम अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहन करते हैं, तो इससे अत्याचार करने वाले का साहस बढ़ जाता है। वह और अत्याचार करने लगता है। यदि अत्याचार का विरोध किया जाए, तो अत्याचार करने वाला अपना साहस खो देता है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद रेल से कहीं जा रहे थे। 

वैसे भी स्वामी विवेकानंद बहुत ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रहते थे। पैदल, रेल या बस से वह यात्रा किया करते थे। वह पूरे भारत का भ्रमण करके देश की दशा को समझना चाहते थे। एक स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रुकी, तो दो अंग्रेज अफसर उस डिब्बे में चढ़े जिसमें स्वामी विवेकानंद बैठे हुए थे। वह दोनों अंग्रेज एक महिला के बगल में बैठ गए। उस महिला की गोद में बच्चा था। 

एक अंग्रेज कभी बच्चे का कान पकड़कर उमेठ देता,तो कभी उसके गाल पर चुटकी काट लेता। बच्चा रोने लगता। यह सब कुछ स्वामी विवेकानंद काफी देर से देख रहे थे। उन्हें गुस्सा आ रहा था। ट्रेन जब अगले स्टेशन पर रुकी, तो वह महिला चुपचाप उठकर दूसरे डिब्बे में बैठ गई। उन दिनों अंग्रेज भारतीय को बहुत परेशान किया करते थे। वह इस तरह की हरकतें किया करते थे। 

अब अंग्रेज अफसरों ने दूसरे लोगों को परेशान करना शुरू किया। तब स्वामी विवेकानंद उठे और उन अंग्रेज अफसरों के सामने खड़े हो गए। पहले तो उन्हें घूरा, फिर अपने कुर्ते की बांह ऊपर किया। फिर उन्हें अपनी सुगठित भुजाएं दिखाईं। यह देखकर अंग्रेज डर गए। वह चुपचाप बैठ गए और अगले स्टेशन पर वह दूसरे डिब्बे में बैठ गए। तब विवेकानंद ने कहा कि कभी अत्याचार को सहन नहीं करना चाहिए।

पचास तक गिनती न लिख पाने पर पिता ने बेटी को दी मौत की सजा

एआई तस्वीर

 अशोक मिश्र

पिता इतना क्रूर हो सकता है, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक पिता जो अपनी संतान का पालन-पोषण करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। पिता अपनी संतान के लिए कई बार चोरी करने पर भी मजूबर हो जाता है। कई बार वह खुद भूखा रहता है, उसके कपड़े फटे रहते हैं, लेकिन वह अपनी संतान को अच्छे से अच्छा खिलाने और अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनाने की कोशिश करता है। 

एक पिता अपने बेटे-बेटी को देश और समाज का सभ्य नागरिक बनाने का हरसंभव प्रयास करता है। लेकिन अफसोस है कि इस समाज में कुछ पिता ऐसे भी पाए जाते हैं, जो अपनी संतान को मौत के मुंह में ढकेल देते हैं। वह उनकी हत्या तक कर देते हैं और उन्हें कोई पश्चाताप नहीं होता है। फरीदाबाद के झाड़सेंतली गांव में किराये के मकान में रहने वाले एक पिता ने पीट-पीटकर केवल इसलिए मार डाला क्योंकि वह पचास तक गिनती नहीं लिख पाई थी। 

पिता ने अपनी चार साल की बेटी को पचास तक गिनती लिखने को कहा था। कई बार कहने के बाद भी वह सही गिनती नहीं लिख पाई। इससे क्रोधित पिता ने अपनी बेटी को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। बेटी को लेकर अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। पत्नी और डॉक्टर से उसने यही बताया कि बेटी सीढ़ियों से गिर गई थी, लेकिन जब पत्नी ने अपनी बेटी की पीठ पर चोट के निशान देखे, तो उसने पुलिस से शिकायत कर दी। तब जाकर मामले का खुलासा हुआ। 

दरअसल, लोग जब अपने बच्चे की उम्र और क्षमता का ध्यान न रखते हुए जरूरत के ज्यादा अपेक्षा कर लेते हैं, तब ऐसी घटनाएं घटित होती हैं। जिस बेटी को पिता ने पीट-पीटकर मार डाला, उस की आयु चार साल थी। चार साल की बच्ची अगर पचास तक गिनती नहीं लिख पाई,तो इसमें गलत क्या था? हर बच्चे की क्षमता अलग अलग होती है। बहुत सारे बच्चे तो ढाई-तीन साल में ही सौ तक गिनती लिख लेते हैं। यह उन बच्चों की क्षमता है, कोई बच्चा सात साल की उम्र में भी सौ तक गिनती नहीं लिख पाता, यह उस बच्चे की क्षमता है। 

जब हम अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने लगते हैं, तो वहीं गलत हो जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सभी बच्चों की क्षमता एक समान नहीं होती है। यही वजह है कि आज बच्चों में कुंठा और उग्रता बढ़ती जा रही है। जब उनके मां-बाप अपने बच्चे की तुलना दूसरों से करते हैं, उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं, ऐसी स्थिति में बच्चा मन ही मन घुटता रहता है, उसमें कुंठा पैदा हो जाती है। वह उग्र होने लगता है। कई बार बच्चे तो वह काम कर बैठते हैं जिसे देश और समाज अपराध मानता है। बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए बहुत संयम और शांति दिमाग की जरूरत होती है।

Saturday, January 24, 2026

जो जैसा होता है, उसको हर आदमी वैसा दिखता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोई भी व्यक्ति जैसा जीवन जीता है, उसके विचार भी वैसे ही होते हैं। यदि कोई व्यक्ति सादगी से रहता है, तो उसके विचार भी सादगीपूर्ण होंगे। विलासिता में जीवन बिताने वाले को सादगी भरा व्यवहार पसंद ही नहीं आएगा। इस बात को साबित करता है महाभारत का एक प्रसंग। कौरव और पांडवों के गुरु थे द्रोण। गुरु द्रोण अपने समय के सबसे बड़े अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता और धर्म प्रवीण थे। 

यही वजह है कि उन्होंने राजकुमारों को शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया गया था। गुरु द्रोण के सभी शिष्य मन लगाकर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शिक्षा देते हुए कई वर्ष बीत गए थे। एक बार गुरु द्रोण के मन में आया कि राजकुमारों की परीक्षा ली जाए कि उन्होंने मेरी शिक्षाओं को कितना ग्रहण किया है। उन्होंने सभी राजकुमारों को बुलाया और दुर्योधन से कहा कि तुम पूरी पृथ्वी में एक अच्छे आदमी को खोजकर लाओ। दुर्योधन चला गया। उसने अपने राज्य में सब जगह तलाशा लेकिन उसे कोई भी अच्छा आदमी नहीं मिला। 

कुछ दिनों बाद दुर्योधन ने लौटकर बताया कि उसने सब जगह खोज लिया, उसे कोई अच्छा आदमी नहीं मिला। तब द्रोण ने युधिष्ठिर को बुलाया और कहा कि तुम किसी एक बुरे आदमी को खोज लाओ। यह सुनकर युधिष्ठिर भी चले गए। काफी दिनों बाद वह भी खाली हाथ लौटकर आए। गुरु द्रोण के सामने सिर झुकाकर बोले, गुरुजी! मुझे कोई बुरा आदमी नहीं मिला। 

तब सभी शिष्यों ने पूछा कि गुरुजी! ऐसा कैसे हो सकता है कि दोनों को एक आदमी नहीं मिला। तब द्रोण ने कहा कि जो आदमी जैसा होता है, उसको पूरी दुनिया में हर आदमी वैसा ही दिखाई देता है। यही वजह है कि दोनों को एक आदमी नहीं मिला।

बजट में मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योगों पर ध्यान देन की जरूरत


अशोक मिश्र

हरियाणा में बजट सत्र की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर प्री बजट तैयारियां कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न जिलों में बैठकें करके आम जनता से बजट के लिए सुझाव मांगे हैं। इन बैठक में शामिल न होने वाले लोग भी 31 जनवरी तक अपने सुझाव सरकार को भेज सकते हैं। अगर सरकार को लोगों के सुझाव पसंद आए या जनहित में लगे, तो उन्हें बजट में शामिल किया जा सकता है। पिछले काफी दिनों से वह प्रदेश के उद्यमियों से कारोबार से जुड़ी समस्याओं को जानने का प्रयास कर रहे हैं। वह यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि किन प्रावधानों से उनको कारोबार में दिक्कत हो रही है? 

ऐसी कौन से व्यवस्था बनाई जाए जिससे उन्हें कारोबार करने में आसानी हो। उद्योगपति भी अपनी समस्याओं और सहूलियतों के बारे में बता रहे हैं। मुख्यमंत्री का विचार विमर्श केवल उद्योगपतियों तक ही सीमित नहीं है। वह किसानों, मजदूरों, महिलाओं और बच्चों तक से बजट के संबंध में राय लेने की कोशिश कर रहे हैं। वह जानना चाहते हैं कि पिछली बार जो बजट पेश किया गया था, उसमें कौन सी कमियां रह गई थीं। पिछले बजट में किए गए कौन-कौन से वायदे पूरे हुए और कौन से वायदे पूरे होने से रह गए। 

अगर रह गए, तो उनकी पीछे कारण क्या थे? यह सब कुछ जानने के बाद नया बजट बनाने में काफी सहूलियत होगी। अभी तक जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक सीएम सैनी इस बार का बजट हरियाणा विजन@2047 को समर्पित हो सकता है। बजट में किसान, उद्योगपति, छोटे कारोबारी, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, महिलाओं, विद्यार्थियों जैसे आमजन को समर्पित किया जा सकता है। प्री बजट के दौरान सीएम सैनी कई बार कह चुके हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी ने 2047 में भारत को विकसित बनाने का संकल्प लिया है। हम सभी इस दिशा में सामूहिक प्रयास करे और देश व हरियाणा को विकसित बनाने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि सरकार और उद्योग दो रास्ते नहीं बल्कि दो पहिए हैं, जो विकसित भारत और विकसित हरियाणा बनाने का सपना पूरा करेंगे। 

यह बात सही है कि हरियाणा में बड़े-बड़े उद्योगों की आवश्यकता है। यह उद्योग ही प्रदेश के लोगों की अर्थव्यवस्था को सुधार सकते हैं। प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। बड़े उद्योग लगने से जहां बेरोजगारी कम होगी, वहीं लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे उद्योग की भी बहुत आवश्यकता है। छोटे और मध्यम उद्योग जहां अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, वहीं रोजगार के अवसर सृजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बजट में अगर छोटे, लघु और मध्यम उद्योगों पर ध्यान दिया जाए, तो हरियाणा की वर्तमान तस्वीर बदल सकती है।