Monday, January 12, 2026

प्रमाण पत्र तो थे, लेकिन योग्यता नहीं थी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लियो टॉलस्टाय न केवल दुनिया के महानतम उपन्यासकारों में गिने जाते हैं, बल्कि उन्हें गहन नैतिक विचारों और सामाजिक विचारों के लिए याद किया जाता है। टॉलस्टाय की रचनाओं में समाज का नग्न स्वरूप दिखाई देता है। उनका सबसे ज्यादा प्रसिद्ध उपन्यास वार एंड पीस (युद्ध और शांति) और करेनिन्ना माना गया है। इन उपन्यासों की कभी दुनिया भर में धूम थी। 

वह सामाजिक सरोकारों को सबसे उच्च मानते थे। एक बार की बात है। उन्हें एक सहायक की जरूरत महसूस हुई। जो उनकी लेखन में सहायता कर सके। वैसे टॉलस्टाय गरीब घर में पैदा नहीं हुए थे। उनकी आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी। उन्होंने अपने कई मित्रों से सहायक के लिए चर्चा की थी। 

एक दिन उनके एक मित्र ने अपने किसी परिचिति को उनके पास सहायक के लिए भेजा। उस आदमी से मिलने के बाद टॉलस्टाय ने उस व्यक्ति को काम पर नहीं रखा। उन्होंने एक ऐसे आदमी को अपना सहायक बना लिया जिसको इस क्षेत्र में कोई जानकारी नहीं थी। कुछ दिनों बाद वह मित्र टॉलस्टाय से मिला तो उन्होंने पूछा कि आपने मेरे परिचित को काम पर नहीं रखा, लेकिन जिसे रखा है, उसके पास तो उतने प्रमाण पत्र भी नहीं थे। 

टॉलस्टाय कहा कि जब वह व्यक्ति मेरे पास आया, तो उसने बड़े शालीनता से अंदर आने की इजाजत मांगी। डोरमैट पर अपने पांव पोछे। जो सवाल किया गया था, उसका उसने संक्षिप्त जवाब दिया।उसके पास प्रमाण पत्र भी कम ही थे, लेकिन उसके पास आत्म विश्वास बहुत था। जबकि आपके मित्र ने आते ही आपका नाम लेकर सिफारिश की। आपके मित्र के पास प्रमाणपत्र तो थे, लेकिन योग्यता नहीं थी। अब आप बताइए मैं क्या करता। यह सुनकर उस मित्र चुप रह गया।

किसानों का दर्द: फसल खरीद विवाद और किसान अधिकार


अशोक मिश्र

हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है, जहां किसानों की आजीविका का बड़ा आधार धान और गेहूं जैसी फसलों की सरकारी खरीद प्रणाली पर टिका है। ऐसे में धान खरीद से जुड़े कथित घोटालों और अनियमितताओं के आरोप न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि किसानों के भरोसे को गहरा आघात पहुंचाते हैं। किसान संगठनों ने धान खरीद में गड़बड़ी को लेकर सीबीआई जांच की मांग की थी। गड़बड़ी के आरोप ने मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। 

किसानों का आरोप है कि मंडियों में फसल खरीद के दौरान नियमों की अनदेखी की जाती है। कहीं नमी का बहाना बनाकर फसल लौटाई जा रही है, तो कहीं भुगतान में देरी हो रही है। कई मामलों में किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति उस न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत है, जिसे किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए लागू किया गया था। फसल खरीद में पारदर्शिता का अभाव किसानों की सबसे बड़ी चिंता बन गया है। 

यदि सरकारी एजेंसियां समय पर और ईमानदारी से खरीद सुनिश्चित नहीं कर पातीं, तो फिर एमएसपी की घोषणा केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है। किसान संगठनों की जांच की मांग इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर भरोसे की कमी लगातार बढ़ रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खेती पहले से ही बढ़ती लागत, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में यदि खरीद प्रक्रिया में भी बाधाएं खड़ी हों, तो किसान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है। 

कर्ज का बोझ बढ़ता है। आत्मनिर्भरता की जगह असुरक्षा का भाव हावी हो जाता है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह किसानों के हितों की रक्षा करे और खरीद प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाए। यदि फसल खरीद में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या लापरवाही हो, तो निष्पक्ष जांच जरूरी है। दोषियों पर सख्त कार्रवाई न केवल न्याय सुनिश्चित करेगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर भी अंकुश लगाएगी। साथ ही, मंडी व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत करना, आॅनलाइन निगरानी, त्वरित भुगतान और शिकायत निवारण तंत्र को प्रभावी बनाना समय की मांग है। 

किसान केवल समर्थन मूल्य नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसे की भी अपेक्षा करता है। अंतत: यह मुद्दा केवल फसल खरीद का नहीं, बल्कि किसान अधिकारों और सरकारी नीतियों की विश्वसनीयता का है। यदि किसानों का विश्वास टूटता है, तो इसका असर केवल खेती पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ता है। सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसान की मेहनत का उचित मूल्य उसे समय पर और बिना किसी बाधा के मिले। यही सच्चे अर्थों में किसान-हितैषी शासन की पहचान होगी।

Sunday, January 11, 2026

जापानी कवि इगुचि की दयालुता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जापान में एक कवि हुए हैं इगुचि। यह सचमुच पैदा हुए थे या जापान की लोककथाओं में किसी लेखक द्वारा पैदा किए गए एक पात्र हैं, यह नहीं मालूम है। जापानी साहित्य में वह एक पात्र के रूप में जाने जाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि वह एक दार्शनिक,कवि और गरीबों की मदद करने वाले थे। वह अपने पास से पैसे खर्च करके लोगों की मदद किया करते थे। 

कहा जाता है कि वह बहुत ही मनमौजी स्वभाव के थे। लोगों को हंसाने और किसी भी बात की चिंता करने के लिए वह बहुत प्रसिद्ध थे। एक बार की बात है। एक आदमी अपनी गरीबी से बहुत परेशान था। तीन-चार दिन से उसके परिवार ने खाना नहीं खाया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करे। जब उसे कुछ नहीं सूझा, तो उसने तय किया कि वह आत्महत्या कर लेगा। 

आत्महत्या करने के लिए वह एक जगह गया। वह आत्महत्या करने ही वाला था कि उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा। उसने घूमकर देखा कि एक व्यक्ति पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा है। वह कवि इगुचि थे। इगुचि ने कहा कि आत्महत्या करने के लिए यह अनमोल जीवन नहीं मिला है। उस व्यक्ति ने इगुचि को अपनी सारी पीड़ा बताई। यह भी बताया कि उसके परिवार को तीन दिन से खाना नहीं मिला है। यह सुनकर इगुचि बहुत द्रवित हुए। उन्होंने उस व्यक्ति मदद की और उसे मरने से बचा लिया। 

इसके बाद उन्होंने नगर में एक गुप्तदान की पेटी रख दिया। पेटी पर लिख दिया कि जो सचमुच जरूरत मंद हो वह इसमें से नि:संकोच पैसे निकाल कर अपना काम चला सकता है। जो कोई जरूरतमंद ऐसा करेगा, मुझे बहुत खुशी होगी। इसके बाद पूरे जापान में कवि इगुचि प्रसिद्ध हो गए।

अपने साथ होने वाले अपराध के मामले में चुप न रहें महिलाएं

 

अशोक मिश्र

पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में कमी आ रही है। इसमें सरकार का सख्त रवैया, पुलिस प्रशासन की सक्रियता और लोगों में अपराध होने पर शिकायत दर्ज कराने को लेकर जागरूकता जिम्मेदार है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आंकड़े संतोषजनक हैं। महिलाओं के साथ होने वाले अपराध में और भी कमी आनी चाहिए। सबसे ज्यादा सख्ती तो महिलाओं और बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामले बरतनी होगी क्योंकि दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के मामले किसी भी महिला और बच्ची को जीवन भर दुख देते हैं। 

शरीर पर लगा घाव तो कुछ दिनों या महीनों में भर जाता है, लेकिन मन पर लगे घाव की पीड़ा उम्र भर सालती रहती है। किसी महिला या बच्ची के साथ किया गया दुष्कर्म दुनिया का सबसे जघन्यतम अपराध माना जाना चाहिए। आरोप सिद्ध होने पर दोषी को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए। अक्टूबर महीने में कालेज से लौट रही एक छात्रा से आटो चालक ने दुष्कर्म किया था। उसका आरोपी अब जाकर गिरफ्तार किया गया है। दो दिन पहले ही फरीदाबाद में ही एक नाबालिग सहित दो खिलाड़ियों के साथ उनके कोच ने यौन उत्पीड़न किया। कोच ने यौन उत्पीड़न के दौरान खिलाड़ी को धमकी देते हुए कहा था कि यदि किसी को बताया तो जान से मार दूंगा। 

नाबालिग खिलाड़ी काफी दिनों तक सदमे में रही। उसके बाद उसने अपनी मां को जानकारी दी, तब मामले का खुलासा हुआ। दरअसल सबसे बड़ी दिक्कत पुलिस के सामने यही है। अपने खिलाफ होने वाले अपराध की जानकारी पुलिस को देने में महिलाएं लापरवाही करती हैं। कई बार समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए महिलाएं चुप रह जाना बेहतर समझती हैं। इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। देर से पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने का नुकसान यह होता है कि कई बार तो मौके का फायदा उठाकर अपराधी सारे सबूत मिटा चुका होता है। महिलाओं के शरीर पर लगने वाली चोट भी ठीक हो चुकी होती है। 

यदि मामला तुरंत पुलिस के पास पहुंच जाए, तो पुलिस तुरंत डॉक्टरी कराएगी जो एक पुख्ता सबूत होगा। हरियाणा में दुष्कर्म की घटनाएं कम हो रही हैं, यह बात सही है, लेकिन बहुत सारे मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं। या तो समाज में बदनामी के डर से पीड़िता चुप रहती है या फिर अपराधी इतना डरा-धमका देते हैं कि वह अपनी जान बचाने के लिए चुप ही रह जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2023 में हरियाणा में दुष्कर्म की कुल 1772 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इनमें 18 से 30 की उम्र की 1105 पीड़िताएं शामिल थीं। 30 से 45 साल की 606 महिलाओं ने शिकायत दर्ज कराई थी और 60 साल से ऊपर की छह महिलाओं का यौन शोषण किया गया।

Saturday, January 10, 2026

कबीरदास की सादगी और मखमल का कुर्ता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कबीरदास अनपढ़ जरूर थे, लेकिन वैचारिक स्तर पर वह काफी ऊंचे स्तर पर थे। वह काम भले ही जुलाहे का करते थे, लेकिन वह अपने युग के तमाम उच्च पदस्थ लोगों से कहीं ज्यादा उदार और सोच में बहुत आगे थे। वह किसी भी प्रकार के पाखंड के प्रबल विरोधी थे। 

दिखावा तो उन्हें पसंद ही नहीं था। कबीर दास का जीवन जितना सादगी भरा था, उनका समझाने का ढंग भी उतना ही निराला था। वह जीवन के तमाम प्रसंगों के माध्यम से ही शिक्षा दे दिया करते थे। वह जैसा जीवन जीते थे, उसी प्रकार के उनके विचार भी थे। यही वजह है कि आज भी कबीरदास की बातें समाज में ग्राह्य हैं। एक बार की बात है। कबीर दास अपना काम-धाम निपटाने के बाद लोगों के बीच बैठे ज्ञान चर्चा कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए एक धनी व्यक्ति रोज आता था। 

वह जानना चाहता था कि कबीरदास की बातों में ऐसा क्या है जिसको सुनने के लिए इतनी ज्यादा मात्रा में लोग आते हैं। तभी उसका ध्यान कबीरदास के कुर्ते पर गया। कुर्ता बहुत ही साधारण था। उसने सोचा कि कबीरदास को एक अच्छा कुर्ता भेंट किया जाए। दो-तीन दिन बाद वह एक अच्छा सा कुर्ता बनवाकर लाया। कबीर ने ग्रहण कर लिया। दूसरे दिन कबीरदास वही कुर्ता पहनकर प्रवचन देने लगे। धनी व्यक्ति ने जब उन्हें देखा तो अपना माथा पीट लिया। कबीरदास ने कुर्ता उल्टा पहन लिया था।

कुर्ते का बाहरी कपड़ा तो मखमल का था, लेकिन अंदर का कपड़ा साधारण था। उस व्यक्ति ने कहा कि आपने कुर्ता उल्टा पहना है। कबीर ने लोगों से कहा कि यह कुर्ता इन्हीं महोदय ने दिया है। नरम हिस्सा शरीर को छू रहा है। साधारण हिस्सा दिखाने के लिए काफी है। यह सुनकर वह व्यक्ति शरमा गया।

पैदल चलने वालों के लिए खतरा बनते जा रहे आवारा कुत्ते


अशोक मिश्र

इन दिनों कुत्तों के मामले को लेकर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सड़कों पर लगातार बढ़ते कुत्ते और उनके काटने की बढ़ती घटनाएं सचमुच चिंताजनक है। दो-तीन महीने पहले जब सुप्रीमकोर्ट ने सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम भेजने और उनका बधियाकरण करने के निर्देश दिए थे, तो देश भर के लोगों ने इसकी आलोचना की थी। पशु प्रेमियों ने जगह-जगह प्रदर्शन भी किया था। सच कहा जाए, तो यह समस्या केवल दिल्ली एनसीआर की ही नहीं है। यह पूरे देश की समस्या है। हरियाणा भी इस समस्या से अछूता नहीं है। सरकारी आंकड़ा बताता है कि वर्ष 2024 में हरियाणा में ही 37 लाख लोग डॉग बाइट यानी कुत्तों के काटने के शिकार बने थे। इनमें से 54 लोगों की मौत भी हो गई थी। 

पिछले साल दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में ताबड़ू में 72 घंटे में आवारा और पागल कुत्तों ने 58 लोगों को अपना शिकार बनाया था। वैसे सैनी सरकार कई बार सड़कों को आवारा कुत्तों और लावारिस पशुओं से मुक्त कराने की घोषणा कर चुकी है। लेकिन अभी तक सरकारी घोषणाओं पर पूरी तरह अमल नहीं किया जा सका है। सड़कों के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि लोगों का चलना मुश्किल हो रहा है। चार-पांच साल के बच्चों का अकेले सड़कों पर निकलना खतरे से खाली नहीं है। देश में कुछ ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं जिसमें चार-पांच साल के बच्चे को कुत्तों का एक झुंड घेर लेता है। 

चारों तरफ से हुए हमले को देखकर बच्चा भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह नाकाम रहता है। कुत्ते उसे नोचते-घसीटते रहते हैं। जब तक लोग उसे बचाने के लिए पहुंचते, बच्चा दम तोड़ चुका होता है। हरियाणा में ही कई जिलों में कुत्ते झुंड बनाकर रहते हैं और आने जाने वालों पर हमला कर देते हैं। रात में तो लोगों का पैदल चलना काफी जोखिम भरा होता है। कब और कहां से आकर कुत्ता या कुत्तों का झुंड आक्रमण कर दे, कोई पता नहीं होता है। 

पिछले कुछ वर्षों से कुत्तों में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। वह अकारण लोगों पर हमला कर रहे हैं। इसका एक कारण तो यह भी है कि कुत्तों की बढ़ती संख्या के चलते उन्हें भोजन मिलने में काफी दिक्कत हो रही है। लोगों ने भी कुत्तों को बचा खुचा खाना देना बंद कर दिया है। इसकी वजह से भूखे रहने पर कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं। कुत्तों के काटने पर लोग जब सरकारी अस्पतालों में रैबीज का टीका लगवाने पहुंचते हैं, तो उन्हें दूसरे किस्म की परेशानी झेलनी पड़ती है। 

पता लगता है कि अस्पताल में रैबीज का टीका ही अनुपलब्ध है। ऐसी स्थिति में उसके पास निजी अस्पतालों में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं रहता है। निजी अस्पताल भी उन्हें महंगे दामों पर टीका उपलब्ध कराते हैं। सरकार को चाहिए कि वह कुत्तों को पकड़ने और उनका बन्ध्याकरण की ओर विशेष ध्यान दे।

Friday, January 9, 2026

हम अपने गुलाम के गुलाम के आगे क्यों झुकें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लोग कहते हैं कि सिकंदर महान था। गंभीरता से सोचें, विश्व इतिहास का सबसे अभागा इंसान था सिकंदर। वह एक प्यास के पीछे आजीवन भटकता रहा। प्यास थी धन-दौलत की, प्यास थी विश्व विजेता कहलाने की। प्यास थी बहते हुए रक्त देखने की, प्यास थी पूरी पृथ्वी को अपने पैरों तले रौंदने की। कहते हैं कि इतना वैभवशाली, विश्व विजेता और दुनिया के कई देशों को लूटकर धन संपत्ति जोड़ने वाला सिकंदर अपनी मौत को चौबीस घंटे भी टाल नहीं सका। 

जब वह मर रहा था, तो उसके वैद्य ने उसके सेवकों से कहा था कि केवल चौबीस घंटे उसे किसी तरह जिंदा रखो, मैं 24 घंटे में उसके पास पहुंच जाऊंगा और उसे हर हालत में बचा लूंगा। लेकिन वह सारे प्रयास करने के बाद भी वैद्य के पहुंचने से पहले ही मर गया। एक बार की बात है। जब वह विश्व विजय के बाद अपने राज्य में प्रवेश कर रहा था, तो राज्य की जनता सड़क के दोनों ओर कतारबद्ध होकर उसे देखने के लिए खड़े हो गए। 

वह जिसकी ओर देख लेता, वह अपने को धन्य मानने लगता था। संयोग से उसी समय संतों का एक दल उधर से गुजरा जिसने सिकंदर की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सिकंदर क्रोधित हो उठा। उसने सैनिकों को संतों को पकड़कर दरबार में पेश करने का हुक्म दिया। दरबार में पेश हुए संतों के चेहरे पर निडरता थी। सिकंदर गरजा -तुम नहीं जानते थे कि विश्व विजेता सिंकदर तुम्हारे सामने से गुजर रहा है। 

एक संत ने कहा कि तुम एक अमिट प्यास के गुलाम हो। इस गुलामी में तुमने पूरी दुनिया रक्तरंजित कर दी। उस प्यास को हमने गुलाम बना रखा है। फिर हम गुलाम के गुलाम के आगे क्यों झुकें। यह सुनकर सिकंदर का सिर झुक गया। उसने संतों को रिहा कर दिया।

बाल विवाह रोकने के लिए लोगों का जागरूक होना बहुत जरूरी

अशोक मिश्र

भारत सरकार ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान चला रखा है। देश के सभी राज्यों में लोगों को बाल विवाह के संबंध में जागरूक करने के लिए अभियान चलाया है। कई राज्यों में इसके बेहद सकारात्मक परिणाम आए हैं। हरियाणा में भी यह अभियान बड़े जोर-शोर से चलाया जा रहा है। बुधवार को फरीदाबाद में कई जगहों पर जिला प्रशासन की पहल पर विभिन्न कालोनियों, मंदिरों और मस्जिदों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

इन कार्यक्रमों में काफी संख्या में स्त्री, पुरुषों ने भाग लिया जिसमें स्त्रियों की संख्या ज्यादा बताई गई है। ऐसे कार्यक्रम राज्य के सभी जिलों में विभिन्न अवसरों पर चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद बाल विवाह मुक्त हरियाणा नहीं बन पाया है। हर साल कुछ घटनाएं जरूरत प्रकाश में आ जाती हैं। बाल विवाह रोकने के लिए कार्य करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकार को ऐसे विवाह होने की सूचना मिलती है, तो ऐसे विवाह को तुरंत रोकने का प्रयास किया जाता है। 

कई मामलों में तो दोनों पक्षों को समझा बुझाकर इस बात के लिए राजी किया जाता है कि जब लड़का और लड़की बालिग हो जाएंगे, तब इनका विवाह कराया जाएगा। कई मामले ऐसे भी सामने आ चुके हैं, जब लड़की या लड़के वाले बाल विवाह रोकने को राजी नहीं होते हैं, तब उन्हें कानून का भय दिखाया जाता है, उनके खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। कुछ लोग मान जाते हैं, कुछ मामलों में मजबूरीवश दोनों पक्षों या एक पक्ष के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी है। कई बार तो लड़की ने खुद पुलिस या स्वयंसेवी संस्थाओं से संपर्ककर बाल विवाह रोकने की गुहार लगाई है। 

ऐसी लड़कियां शाबाशी और पुरस्कार की हकदार हैं। दरअसल, हमारे देश में बाल विवाह की परंपरा सदियों पुरानी है। किसी न किसी रूप में दुनिया के हर देश में बाल विवाह की परंपरा लागू रही है। तब समाज में बाल विवाह से होने वाले नुकसान के बारे में लोग जागरूक नहीं हुआ करते थे। बाल विवाह के कारण लड़कियों को आजीवन जो परेशानियां होती हैं, उसके बारे में परिचित नहीं थे। कुछ देशों में बाल विवाह को धार्मिक चोला पहनाकर जायज बना दिया गया था। कुछ देशों ने ऐसे मामलों में सफलता हासिल कर ली है और उनके यहां बाल विवाह पूरी तरह से प्रतिबंधित हो गया है। 

हमारे देश में भी धीरे-धीरे यह परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है। इसके बावजूद कुछ राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जारी है। हरियाणा और उत्तर भारत के कई राज्यों में अक्षय तृतीया को विवाह करने की प्रथा रही है। इस दिन विवाह करने के लिए किसी शुभ घड़ी का इंतजार करने की जरूरत नहीं होती है। हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में बहुत कम संख्या में लोग अपनी नाबालिग बेटी या बेटे का विवाह कर देना, शुभ मानते हैं। ऐसे अवसर पर राज्य की संस्थाएं सतर्करहती हैं और बाल विवाह रोकने का भरसक प्रयाकस करती है।

Thursday, January 8, 2026

मैंने बदले की भावना से काम नहीं किया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रंगभेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला
ने आजीवन संघर्ष किया। वह दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे। मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। मंडेला के पिता हेनरी म्वेजो कस्बे के जनजातीय सरदार थे। 

स्थानीय भाषा में सरदार के बेटे को मंडेला कहते हैं। नेल्सन मंडेला सदियों से चल रहे रंगभेद का विरोध करने वाले अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और इसके सशस्त्र गुट उमखोंतो वे सिजवे के अध्यक्ष रहे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण उन्होंने 27 वर्ष रॉबेन द्वीप के कारागार में बिताये जहां उन्हें कोयला खनिक का काम करना पड़ा था। घटना मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद की है। 

एक बार वह अपने मित्रों के साथ एक रेस्तरां में वह भोजन करने गए। रेस्तरां में पहुंचने के बाद वह अपनी सीट पर मित्रों के साथ बैठ गए। उन्होंने इधर-उधर नजर दौड़ाई, तो थोड़ी दूरी पर लगी सीट पर एक व्यक्ति बैठा नजर आया। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मियों को बुलाया और उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि जाकर उस व्यक्ति से कह दो कि वह आज हमारे साथ भोजन करे। 

वह व्यक्ति मंडेला वाली टेबल पर आ गया। खाना परोसे जाने पर उसने कांपते हाथों से खाना खाया। उसके माथे पर बार-बार पसीना आ रहा था। वह चुपचाप खाता रहा और खाना खत्म होने पर चला गया। जब वह व्यक्ति चला गया, तो मंडेला के एक मित्र ने कहा कि शायद वह आदमी बीमार था। मंडेला ने कहा कि वह आदमी रॉबेन द्वीप के जेल का जेलर था। इस व्यक्ति ने 27 साल तक मुझ पर बहुत जुल्म ढाए थे। तब मित्रों ने कहा कि उसे सबक सिखाना चाहिए था। मंडेला ने कहा कि मेरा वैसा चरित्र नहीं है। मैंने उसे माफ कर दिया है। बदले की भावना से मैंने कभी कोई काम नहीं किया है।

कड़ाके की ठंडक और प्रदूषित हवा लोगों को बना रही बीमार

अशोक मिश्र

पूरा उत्तर भारत कड़ाके की ठंड पड़ रही है। पाला गिरने की वजह से जहां फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है, वहीं लोगों की भी परेशानियां बढ़ रही हैं। पशुओं को भी कड़ाके की ठंड का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते जाड़े के दिनों में कमी तो आई ही है, लेकिन ठंड की भयावहता बढ़ गई है। तीन-चार दशक पहले दशहरा पर्व से ही हलका जाड़ा पड़ना शुरू हो जाता था। तब ऐसे जाड़े को गुलाबी जाड़ा कहा जाता था। 

दीपावली तक आते-आते लोगों को फुल स्वेटर तक पहनना पड़ जाता था। हलका फुलका जाड़ा दिसंबर के पहले पखवाड़े तक पड़ता था और दिसंबर और जनवरी में तापमान नौ दस तक आ जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे जाड़ा विदा होने लगता था। कुल मिलाकर तीन-साढ़े तीन महीने तक जाड़ा पड़ता था। ग्लोबल वार्मिंग के चलते अब नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर जनवरी तक जाड़ा पड़ता है। जाड़े के दिन कम जरूर हुए, लेकिन जाड़े की प्रचंडता काफी बढ़ गई है। 

आज  कल जब जाड़ा पड़ता है, तो हड्डी तक कंपा जाता है। इन दिनों हरियाणा में भी हड्डियों को कंपा देने वाला जाड़ा पड़ रहा है। कई इलाकों में धूप तो निकल रही है, लेकिन रात में हवा चलने और पाला गिरने से लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। ऐसी ठंडक में सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और बूढ़े हो रहे हैं। थोड़ी सी भी लापरवाही बच्चों और बूढ़ों के लिए भारी पड़ रही है। इन दिनों सर्दी बढ़ जाने की वजह से रूखी त्वचा, एक्जिमा, खुजली, जलन और लाल चकत्तों की शिकायत लेकर लोग सिविल अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। निजी अस्पतालों में भी ऐसे मरीज बहुतायत में पाए जा रहे हैं। 

इसका कारण ठंडक के साथ-साथ हवा में घुला प्रदूषण है। ठंड और प्रदूषित हवा के चलते लोगों को फेफड़े से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। हार्ट अटैक की वजह से होने वाली मौतों का आंकड़ा ठंडक के दिनों में बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा सर्दी का पड़ना, कई बार जानलेवा साबित हो रहा है। ऐसी स्थिति में इन रोगों के मरीजों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। थोड़ी सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है। रूखी त्वचा ज्यादा सर्दी पड़ने और हवा के प्रदूषित होने से एक्जिमा का रूप ले लेती है। 

यह समस्या महिलाओं, बच्चों के साथ-साथ बुजुर्गों में अधिक दिखाई देती है। कुछ लोग सर्दी ज्यादा पड़ने पर हाथ-पैर की अंगुलियों में सूजन की समस्या को लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। महिलाओं में यह दिक्कत ज्यादा देखने को मिल रही है क्योंकि उन्हें आमतौर पर पुरुषों की अपेक्षा ठंडे पानी के संपर्क में ज्यादा रहना पड़ता है। कपड़े धोने, बर्तन आदि मांजने जैसे तमाम काम ज्यादातर महिलाएं करती हैं, इस वजह से उनको ज्यादा परेशानी हो रही है।