Thursday, March 26, 2026

हमेशा लोगों के साथ प्रेमभाव से रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंजाब के गुजरांवाला जिले में पैदा हुए स्वामी रामतीर्थ ने अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बिताया था। इनका बचपन का नाम तीर्थराम था, लेकिन संन्यास ग्रहण करने के बाद रामतीर्थ कर दिया गया था। हालांकि इनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था, लेकिन जब संन्यास ग्रहण किया, तो परिवार का त्याग कर दिया। संन्यासी बनने से पहले वह एक स्नातक कालेज में शिक्षक थे। 

1891 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में सर्वोच्च अंक हासिल किया था। एक दिन जब वह अपने क्लास में बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि कुछ छात्र आपस में लड़ रहे हैं। उन छात्रों का आपस में लड़ना, उन्हें पसंद नहीं आया। वह सोचने लगे कि उनके छात्र आपस में वैरभाव रखते हैं। जबकि वह चाहते थे कि लोग आपस में प्रेमभाव से रहें, एक दूसरे की मदद करें। 

पहले तो उन्होंने सोचा कि इन छात्रों को समझाया जाए, लेकिन उस दिन उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन जब वह क्लास में पहुंचे, तो उन्होंने ब्लैक बोर्ड पर एक लाइन खींच दी। उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि इसे छोटा करके दिखाओ। एक छात्र ने डस्टर लिया और उस लाइन को थोड़ा मिटाने लगा। इस पर रामतीर्थ ने रोकते हुए कहा कि इसे छोटा नहीं करना है। 

तब कई छात्रों ने कहा कि यदि इसे मिटाया नहीं गया, तो इसे छोटा करना संभव नहीं है। तब स्वामी रामतीर्थ ने उस लाइन के नीचे एक लंबी रेखा खींच दी और बोले, हो गई न छोटी। तब उन्होंने समझाया कि किसी की उपलब्धि पर ईर्ष्या करने से बेहतर है, उससे भी बढ़कर काम किया जाए। अपने काम से किसी उपलब्धि की रेखा को छोटी कर दो। बिना लड़े आगे बढ़ने का यही तरीका है। छात्रों की समझ में अब बात आ गई थी।  उन्होंने भविष्य में आपस में न लड़ने का संकल्प लिया।

जब तक लालच या भय रहेगा साइबर क्राइम नहीं रुकेगा


अशोक मिश्र

साइबर ठगी के मामले हरियाणा में बढ़ते जा रहे हैं। साइबर ठगों की कार्यप्रणाली को देखते हुए लोग अब अनजान नंबर से आने वाले फोन को उठाना बंद करने लगे हैं। इसके चलते कई बार वाजिब नंबर से आने वाले फोन भी अटेंड नहीं हो पाते हैं। लोग यही सोचकर फोन कॉल को टाल देते हैं, क्या पता ठगों का ही फोन हो और ऐसे में जरूरी कॉल भी अटेंड होने से रह जाती है। इन तमाम सावधानियों के बाद भी बहुत सारे लोग हैं जो इन साइबर ठगों के चंगुल में फंस ही जाते हैं। 

हरियाणा का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां से रोज एकाध खबर साइबर ठगी की न आती हो। फरीदाबाद में ही साइबर ठगों ने क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने के नाम पर साठ हजार रुपये से अधिक ठग लिए। साइबर ठगों ने अपने शिकार को क्रेडिट कार्ड बढ़ाने का आश्वासन दिया और लिंक भेजकर उसमें डिटेल भरने को कहा। जैसे ही पीड़ित व्यक्ति ने उस लिंक को खोला, उसके खाते से पैसे कट गए। 

बल्लभगढ़ में ही एक फर्नीचर व्यापारी से दुबई टूर की व्यवस्था के नाम पर करीब साढ़े छह लाख रुपये ठग लिए गए। व्यापारी को अपने परिवार के साथ दुबई टूर पर जाना था। दुबई जाने के लिए व्यापारी वेबसाइट पर टूर पैकेज तलाश रहा था, उसी पर उसे एक नंबर मिला। उस पर बातचीत करने पर उस व्यक्ति ने एक टूर पैकेज भेजा। व्यापारी ने छह लाख चौबीस हजार रुपये भी अलग-अलग किस्तों में जमा कर दिया। 

नियत समय पर जब व्यापारी अपने परिवार के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचा तो पता चला कि साथ जा रही एक लड़की का वीजा फर्जी है। टूर पैकेज के नाम पर बेबसाइट से बात करने वाले व्यक्ति ने दो दिन बाद वीजा बनवाकर देने और दो दिन बाद की फ्लाइट से सीटें बुक करने का आश्वासन दिया। इसके बाद आरोपियों के फोन बंद आ रहे है। फर्नीचर व्यापारी ने इसकी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी है। 

स्वाभाविक है कि पुलिस अब अपना काम करेगी। हरियाणा पुलिस ही नहीं, देश भर की सरकारें, वहां के पुलिस अधिकारी, सुप्रीमकोर्ट और यहां तक कि पीएम नरेंद्र मोदी लोगों को साइबर अरेस्ट, डिजिटल ठगी और अन्य साइबर क्राइम के बार में देशवासियों को सचेत कर चुके हैं। आज भी कर रहे हैं और शायद भविष्य में भी लोगों को सचेत करते रहेंगे, इसके बावजूद ऐसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। ऐसी स्थिति में एक ही बात समझ में आती है कि इन घटनाओं के पीछे भय या लालच काम करता है। 

जब पुलिस बार-बार यह दोहरा रही है कि वह किसी भी मामले में न तो टेलीफोन, मोबाइल फोन या वीडियो कॉल करके किसी बारे में चर्चा नहीं करती है, तो फिर पता नहीं क्यों लोग साइबर अरेस्ट हो जाते हैं। अपने पैसे को दो गुना करने या जिस व्यक्ति से कभी मिले नहीं हैं, उस पर कैसे विश्वास करके लाखों रुपये ट्रांसफर कर देते हैं।

Wednesday, March 25, 2026

गुरु का स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में माता-पिता के बाद गुरु को ऊंचा स्थान दिया गया है। गुरु कैसा भी हो, वह हमेशा सम्मानीय होता है। इस संदर्भ में एक पुरानी कथा प्रचलित है। एक राजा था। उसे ज्ञान प्राप्त करने की बड़ी लालसा थी। उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वह किसी योग्य गुरु की तलाश करें। काफी खोज के बाद मंत्री एक योग्य व्यक्ति को खोजने में सफल हो गया। राजा ने उस गुरु से शिक्षा हासिल करनी शुरू की। गुरु जी बहुत योग्य थे। इस तरह काफी समय बीत गया, लेकिन गुरु के योग्य होने के बावजूद राजा को कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 

वह इस वजह से चिंतित रहने लगे। एक दिन उन्होंने इस बात की चर्चा अपनी महारानी से की। राजा ने कहा कि तुम बताओ, मैं इसका कारण किससे पूछूं। महारानी ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि आप इस समस्या का हल अपने गुरु जी से ही पूछिए। वह एक योग्य गुरु हैं। 

उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने कई लोगों को योग्य बनाया है। कुछ दिन विचार करने के बाद एक दिन राजा ने अपने गुरु के सामने समस्या रख दी। उन्होंने कहा कि गुरु जी, मुझे इतने महीने हो गए, आप मुझे रोज अच्छी अच्छी बातें सिखाते हैं, लेकिन मैं सीख नहीं पाता हूं। इसका कारण क्या है? गुरु जी ने राजा को गौर से देखा और बोले, इसका कारण आपका राजा होना है। 

आप मेरे शिष्य हैं और मैं आपका गुरु हूं। इस नाते मुझे आपको ज्ञान देते समय ऊंचे स्थान पर बैठना चाहिए और आपको नीचे। लेकिन राजा होने की वजह से आप ऊंचे स्थान पर बैठते हैं और मैं नीचे बैठता हूं। गुरु हर हालत में सम्मानीय होता है। उसका स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए। 

यह बात सुनकर राजा सारी बातें समझ गया और उसने गुरु को आगे से ऊंचा स्थान देना शुरू किया। कुछ साल के बाद वह विद्वान हो गया।

सामूहिक प्रयास से ही हरियाणा हो सकता है तपेदिक मुक्त राज्य


अशोक मिश्र

आज विश्व तपेदिक दिवस पर पूरे देश में टीबी उन्मूलन को लेकर अभियान चलाए गए। लोगों को जागरूक किया गया। उन्हें यह समझाने का प्रयास किया गया कि तपेदिक एक गंभीर रोग है, इससे पीड़ित होने पर इलाज ही इसका बचाव है। यदि समय पर रोग का पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है और मरीज का जीवन बचाया जा सकता है। हरियाणा में भी आज लगभग सभी जिलों में लोगों को जागरूक करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएं और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

इसके बावजूद अभी तक हरियाणा को तपेदिक मुक्त नहीं किया जा सका है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। राज्य के सभी जिलों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। औद्योगिक नगरी के नाम से जाने जाने वाले जिलों में दूसरे राज्यों से कामगारों का आना और उनका अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहना, तपेदिक रोग का सबसे बड़ा कारण कारण है। 

राज्य के लगभग हर जिले में शहरी क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है, इसके साथ झुग्गी-झोपड़ियों का भी विस्तार होता जा रहा है। दूसरे राज्यों से आए ज्यादातर मजदूर इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों में शरण लेते हैं। स्वास्थ्य एजेंसियां जब तपेदिक रोगियों का पता लगाने के लिए अभियान चलाती हैं, तो पता लगता है कि इनमें से कई मजदूर टीबी के मरीज निकल आते हैं। 

ज्यादातर मामलों में होता यह है कि यह मजदूर एक जगह टिकते नहीं हैं। टीबी का कोर्स भी पूरा नहीं करते हैं। जबकि टीबी का इलाज लंबा चलता है और एक दिन भी दवा लेने में नागा नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं जिससे बाद में जब परेशानी बढ़ जाती है, तो यह लोग फिर अस्पताल की ओर रुख करते हैं, तब दवा लेने की मियाद काफी बढ़ जाती है। इन सब परेशानियों के बावजूद राज्य सरकार अपने पूरे दमखम के साथ तपेदिक उन्मूलन के अभियान में लगी हुई है। 

मार्च महीने में ही राज्य सरकार ने एक आंकड़ा जारी किया था जिसके मुताबिक हरियाणा की 2157 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित कर दिया गया है। इनमें से 211 पंचायतों को स्वर्ण, 646 पंचायतों को रजत तथा 1300 पंचायतों को कांस्य श्रेणी में प्रमाणपत्र मिला है। राज्य में कुल 6237 पंचायतें हैं। इस तरह लगभग 35 प्रतिशत पंचायतें टीबी मुक्त हो गई हैं। अंबाला टीबी मुक्त 191 पंचायतों के साथ अभियान में सबसे आगे है। 

पिछले तीन वर्षों में टीबी-मुक्त पंचायतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस कार्यक्रम के जमीनी स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन को दर्शाती  है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 88,689 टीबी के मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 74,483 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया गया। ऐसी स्थिति में लोगों को भी चाहिए कि वह लगातार खांसी आने पर अपनी जांच कराएं और हरियाणा को तपेदिक मुक्त बनाने में सहयोग करें।


Tuesday, March 24, 2026

भगत सिंह बोले, तुम्हारा स्थान मेरी मां से ऊंचा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में छुआछूत जैसी कुरीति सदियों से चली आ रही थी। इसके खिलाफ हमारे देश के महापुरुषों ने बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी, तब जाकर समाज में धीरे-धीरे बदलाव आया और आज हम कह सकते हैं कि देश से अस्पृश्यता जैसी भावना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया है। बात उस समय की है, जब एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह जेल में बंद थे। 

ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी थी। लाहौर जेल में बंद किए गए भगत सिंह का सभी कैदी बड़ा सम्मान करते थे। उनमें एक बोधा नाम का सफाई कर्मी भी था। भगत सिंह बोधा को बेबे कहकर पुकारा करते थे। पंजाब में मां को बड़े सम्मान और प्यार के साथ बेबे कहकर संबोधित किया जाता है। 

इस पर बोधा विनीत स्वर में प्रतिरोध करते हुए भगत सिंह से कहा करता था कि वह निम्न कुल में पैदा हुआ है। आप उच्च कुल में पैदा हुए हैं। आपका इस तरह मुझे बेबे कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। इस पर हंसते हुए भगत सिंह कहा करते थे कि बचपन में मां ने मेरा मल-मूत्र साफ किया था। 

आप हमारे बड़े होने के बाद भी वही काम करते हो। इस नाते तो आपका सम्मान मां से भी बढ़कर होना चाहिए था। भगत सिंह वैसे भी उस विचारधारा को मानते थे जिसमें इंसान का इंसान के प्रति कोई भेदभाव न हो। अपनी फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह ने जेल प्रशासन से कहा कि उन्हें बोधा के हाथ की बनी रोटी खानी है। यह सुनकर बोधा फूट-फूटकर रो पड़ा। भगत सिंह ने अपनी शहादत देते हुए भी अपने आदर्श का जीवंत उदाहरण पेश करते हुए बड़े प्रेम से बोधा के हाथ की बनी रोटी खाई  और शहीद हो गए।

हरियाणा में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुईं पंचायतें


अशोक मिश्र

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अब लोग जागरूक होने लगे हैं। धार्मिक, सामाजिक क्षेत्र में जितनी भी कुरीतियां हैं, लोग अब उसके खिलाफ स्वर बुलंद करने लगे हैं। शादी-विवाह सहित सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों में लोगों ने देश और समाज को नुकसान पहुंचाने वाली रीतियों, परपंराओं से निजात पानी शुरू कर दी है। इसके लिए अब पंचायतें भी सामने आने लगी हैं। 

प्रदेश में सामाजिक बदलाव की बहने वाली बयार के पीछे जागरूक स्त्री और पुरुष दोनों हैं। फतेहाबाद जिले की बड़ोपल पंचायत ने प्रस्ताव पास किया है कि अब वह बाल विवाह नहीं होने देंगे। जो भी बाल विवाह कराता हुआ पाया जाएगा, उसके यहां होने वाले विवाह में बान पर नहीं बैठेंगे और हल्दी की रस्म नहीं निभाई जाएगी। पंचायत ने भी यह तय किया कि यदि किसी ने पंचायत के फैसले के खिलाफ जाकर बाल विवाह कराने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, पंचायत में बारात नहीं आने दिया जाएगा और यदि किसी ने गुपचुप बाल विवाह करने की सोची, तो उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की जाएगी। 

जरूरत पड़ने पर दूसरे गांवों की पंचायतों का भी सहयोग लिया जाएगा। कभी हमारे देश और प्रदेश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा थी। इसे सामाजिक मान्यता भी हासिल की थी, लेकिन जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ, जागरूर हुआ, लोगों को बाल विवाह से होने वाली परेशानियां और नुकसान की बात समझ में आने लगी। प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी ने बाल विवाह से अपना मुंह मोड़ लिया, लेकिन कुछ लोग अभी बाल विवाह को उचित मानकर अपने बेटा-बेटी का बाल विवाह कराते हैं। 

प्रदेश के मामले में अच्छी बात यह है कि पंचायतों ने अब शादी-विवाह में होने वाले बेतुके खर्चों पर भी रोक लगानी शुरू कर दी है। फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में पिछले दिनों आयोजित पंचायत में फैसला लिया गया है कि शादी-विवाह या अन्य दूसरे मांगलिक कार्यों के समय बजाए जाने वाली डीजे का बहिष्कार किया जाएगा। पूरे जिले के गांवों, कालोनियों और सेक्टरों से आए प्रतिनिधियों ने पूरे दस सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प लिया। लोगों को मानना था कि शादी-विवाह के समय कई परंपराएं पुराने समय के हिसाब से शुरू हुई थीं। अब इन परंपराओं का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

कुछ परंपराएं ऐसी हैं जिनकी वजह से वर और वधू पक्ष के खर्चे अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं और जिनका कोई औचित्य भी नहीं है। शादी-विवाह में बहुत तेज आवाज में बजने वाले डीजे की वजह से कई बार पड़ोसियों से मारपीट जैसी घटनाएं हो जाती हैं। बहुत ज्यादा शोर मचाने वाले डीजे जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं खर्चा भी बहुत ज्यादा आता है। यही नहीं, फैसला यह भी किया गया कि शादी, लगन-सगाई और अन्य रस्मों में खर्च लेने की प्रथा को बंद किया जाएगा।

Monday, March 23, 2026

प्रशंसा प्रगति का मार्ग रोक देती है, पुत्र!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान और प्रशंसा दो ऐसे शब्द हैं जो व्यक्ति की प्रगति को बाधित कर देते हैं। बहुत अधिक प्रशंसा होने से व्यक्ति में अभिमान आ जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि महापुरुषों ने हर व्यक्ति को प्रशंसा से दूर रहने की बात कही है। इस संदर्भ में एक मूर्तिकार की बड़ी रोचक कथा है। 

किसी नगर में एक मूर्तिकार रहता था। वह अपने समय में बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था। लोग जब उसकी प्रशंसा करते तो वह विनम्रता से सिर झुकाकर रह जाता था। कुछ दिनों बाद उसके बेटे ने भी मूर्तियं बनाना सीखना शुरू कर दिया। पिता अपने पुत्र की मूर्तियों में हमेशा कोई न कोई कमी निकाल देता और उसे दूसरी मूर्ति बनाने को कहता था। इस तरह कई साल बीत गए। 

अब उसका पुत्र भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगा था। लेकिन मूर्तिकार पिता अपने पुत्र के कार्यों से संतुष्ट नहीं होता था। वह अपने हिसाब से कुछ न कुछ कमियां निकाल ही देता था। धीरे-धीरे पुत्र के मन में क्रोध की भावना पैदा होने लगी। उसे लगने लगा कि पिता में ही कोई खोट है, जो उनकी इतनी अच्छी मूर्तियों से भी संतुष्ट नहीं हैं। एक दिन उसने अपनी एक मूर्ति को अपने मित्र के हाथ से पिता के पास भिजवाया। वह अपने घर में एक जगह पर छिप गया। 

पिता ने उस मूर्ति को देखा, तो बरबस मुंह से निकल गया कि जिसने यह मूर्ति बनाई है, वह महान मूर्तिकार है। तभी बेटा बाहर आया और बोला, यह मूर्ति मैंने बनाई है, लेकिन कभी आपने मेरी प्रशंसा नहीं की। थोड़ी देर पहले इस मूर्ति को बनाने वाले को महान मूर्तिकार कह रहे थे। तब पिता ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी प्रशंसा कर देता, तो तुममें और अच्छा करने की ललक नहीं पैदा होती। तुम्हें अपनी कला पर अभिमान हो जाता और तुम्हारी प्रगति रुक जाती। यह सुनकर पुत्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पिता से क्षमा मांगी।

आगामी ओलिंपिक खेल में 36 पदक जीतने का सरकार ने तय किया लक्ष्य

अशोक मिश्र

पूरे देश में हरियाणा को खिलाड़ियों वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता है। यहां की प्रदेश सरकारों ने समय-समय पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाईं, उन्हें प्रोत्साहित किया और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में पदक जीतने पर उन्हें सम्मानित भी किया, नकद ईनाम भी दिए। सरकारी नौकरियां प्रदान कीं। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 709 करोड़ रुपये करीब 17 हजार खिलाड़ियों को पुरस्कार देने पर खर्च किए हैं। पिछले साल से अब तक 662 खिलाड़ियों को 109 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जा चुकी है। इसका नतीजा यह रहा कि यहां के युवाओं ने भी सरकार को निराश नहीं किया। 

हरियाणा के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने प्रदेश और देश का नाम विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में रोशन किया है जिनमें भाला फेंक में पानीपत के नीरज चोपड़ा, कुश्ती में सोनीपत के योगेश्वर दत्त और रवि कुमार दहिया, झज्जर के बजरंग पुनिया, रोहतक की साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, संग्राम सिंह आदि प्रमुख हैं। प्रदेश में ऐसे खिलाड़ियों की भरमार है जिन्होंने समय-समय पर देश और प्रदेश का नाम गर्व से ऊंचा किया है। 

अब सैनी सरकार ने गुजरात के अहमदाबाद में वर्ष 2036 में ओलंपिक खेलों में हरियाणा के खिलाड़ियों के कुल मिलाकर 36 पदक जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार ने इसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है। मिशन ओलिंपिक 2036 में 36 पदक लाने के लक्ष्य लेकर सरकार ने प्रदेश में 21 नए स्टेडियम बनाने का फैसला किया है। इसके लिए हरियाणा में खेलों का बुनियादी ढांचा बेहतर किया जाएगा। प्रतिभावान खिलाड़ी तैयार करने के लिए जल्द ही वैज्ञानिक तरीके से प्रतिभा खोज अभियान शुरू की जाएगी। 

स्कूल-कालेजों और खेल नर्सरियों में जुझारू खिलाड़ी तलाशे जाएंगे और उन्हें पदक जीतने लायक बनाया जाएगा। 10 से 12 साल के प्रतिभाशाली बच्चों को ओलिंपिक स्तर की प्रतियोगिता के लायक बनाने के लिए राज्य खेल विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण दिया जाएगा। सैनी सरकार का 11 जिलों में नए खेल स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव है। कैथल, झज्जर, चरखी दादरी, गुरुग्राम, कुरुक्षेत्र, जींद, रोहतक, फरीदाबाद, यमुनानगर, सोनीपत, फतेहाबाद और पलवल जिले में कुल 21 नए खेल स्टेडियम बनाने जाएंगे। 

इनमें खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। दिव्यांग खिलाड़ियों को समर्पित पैरा खेल स्टेडियम बनाने की दिशा में सरकार ने काम शुरू कर दिया है। राजीव गांधी खेल परिसर दौलताबाद को भी सरकार अपग्रेड करेगी। सरकार ने तो पूरे राज्य में डेढ़ हजार खेल नर्सरियां खोल रखी हैं। इन नर्सरियों में 37 हजार से अधिक खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। इतनी तैयारी के बाद पूरी तरह विश्वास है कि हमारे प्रदेश के खिलाड़ी 36 से कहीं ज्यादा पदक जीतकर लाएंगे और प्रदेश का नाम रोशन करेंगे।

Sunday, March 22, 2026

प्रायश्चित रूपी पानी पापों को बहा देता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुरा कर्म करने वाले को यदि अपराध बोध से मुक्ति पानी है, तो उसे अपने बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना होता है। प्रायश्चित ही उसके मन निर्मल बना सकती है। जिस व्यक्ति के लिए उसका कर्म नुकसानदायक साबित हुआ है, उससे क्षमा मांगने से पाप का प्रायश्चित हो जाता है। 

बुरे कामों के लिए किसी से क्षमा मांगना और अपने पापों का प्रायश्चित करना वही व्यक्ति कर सकता है जिसे अपने पापों का ज्ञान हो गया हो। एक बार की बात है। एक संत किसी जगह प्रवचन कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी हुई थी। 

संत की मधुर वाणी में ज्ञान का अजस्र प्रवाह हो रहा था। वह कह रहे थे कि यदि किसी व्यक्ति से अनजाने में कोई गलती हो जाए, पाप हो जाए, तो उसे आभास नहीं होता है। ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति को जाने-अनजाने हुए पाप या बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। इतना ही नहीं, भविष्य में कोई बुरा कर्म या पाप न हो जाए, इसके लिए संकल्प लेना चाहिए। 

वहां मौजूद लोग मौन होकर संत का प्रवचन सुन रहे थे।  प्रवचन खत्म हुआ तो सारे लोग चले गए, लेकिन एक व्यक्ति वहां मौजूद रहा। जब सब चले गए तो उसने संत से कहा कि महाराज! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। प्रायश्चित करने से पापों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। 

संत ने कहा कि आप कल आइएगा, मैं समझाऊंगा। दूसरे दिन उस व्यक्ति को लेकर संत नदी किनारे पहुंचे। वहां एक गड्ढे में पानी सड़ गया था, कीड़े पड़ गए थे। संत ने पूछा कि यह पानी क्यों सड़ गया? उस व्यक्ति ने कहा कि प्रवाह न होने से पानी सड़ गया। संत ने कहा कि ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप होते हैं जिन्हें प्रायश्चित का पानी सड़े हुए पानी को बहा देता है।

देसी प्रजाति के पेड़ पौधों के लिए खतरा है विलायती कीकर

अशोक मिश्र

अरावली का प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन खतरे में है। इसका कारण अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में उगने वाली विलायती कीकर को माना जा रहा है। विलायती कीकर ने पूरे अरावली क्षेत्र में देसी प्रजाति के पौधों खेजड़ी, करीर और ढाक जैसे पौधों को पनपने और विकसित होने से रोक दिया है। देसी प्रजाति के पौधे धीरे-धीरे अरावली क्षेत्र से गायब होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव वन्यजीवों पर भी दिखाई देने लगा है।

जो वन्यजीव देसी प्रजाति के पेड़-पौधों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से कई बार वह भोजन की खोज में अपने निवास क्षेत्र से निकलकर मानव बस्तियों में पहुंच जा रहे हैं। अरावली क्षेत्र में विलायती कीकर के लगातार फैलने का कारण पूर्व सरकारों का गलत फैसला था। हरियाणा में सन 1990 से लेकर 1999 तक इन दस वर्षों में अरावली पहाड़ियों और उसके आसपास के क्षेत्र में हेलिकाप्टर से जगह-जगह विलायती कीकर यानी बबूल के बीज गिराए गए थे। 

नतीजा यह हुआ कि अरावली क्षेत्र की अधिकतर जमीनों पर विलायती कीकर उग आए। इन विलायती बबूलों ने अपना कुनबा बढ़ाना जब शुरू किया, तो स्थानीय वनस्पतियां सिकुड़ने लगीं। यह विलायती कीकर राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकने में नाकामयाब रहे। पहले से रोपे गए या अपने आप उगी स्थानीय वनस्पतियां पहले एक सीमा के बाद धूल को आगे बढ़ने से रोक देती थीं। इससेहरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ क्षेत्र रेगिस्तान बनने से बचे रहे। अब राजस्थान से उठने वाले धूल के बवंडर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने लगे हैं। यदि राजस्थान से आने वाली धूल को रोका नहीं गया, तो दिल्ली और हरियाणा की हरी-भरी जमीनें रेगिस्तान में बदल जाएंगी। 

ऐसी आशंका पर्यावरणविद व्यक्त करने लगे हैं। लेकिन विलायती बबूल ने सारे इकोसिस्टम को बिगाड़कर रख दिया। पर्यावरण को शुद्ध रखने में सक्षम स्थानीय वनस्पतियां अब तो नब्बे फीसदी कम हो गई हैं। सन 2000 से 2004 के बीच अरावली क्षेत्र में अवैध खनन भी बहुत हुए। खनन और वन माफियाओं ने पूरे अरावली क्षेत्र को बरबाद करके रख दिया। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र का दायरा बढ़ा है। 

वन विभाग का सर्वे बताता है कि वर्ष 2025 में वन क्षेत्र 6948.44 हेक्टेयर से बढ़कर 7530.23 हेक्टेयर हो गया है। इस विस्तार का श्रेय बड़े पैमाने पर अरावली क्षेत्र में किए गए पौधरोपण को जाता है। लेकिन इस पौधरोपण का फायदा तब मिलेगा, जब पूरे अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर की बढ़त को रोक दिया जाए। विलायती कीकर की बढ़त को लेकर जिला वन अधिकारी भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर को नियंत्रित करना हमारी प्राथमिकता है।