बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
इंसान को हमेशा आगे की सोचना चाहिए। उसे यह सोचना चाहिए कि आज जिस पेड़ के फल का उपयोग वह कर रहा है, उसे उसने नहीं रोपा है। उसे रोपने वाला तो न जाने कब का इस दुनिया से विदा हो चुका है। यदि उस व्यक्ति ने फलदार पेड़ नहीं लगाए होते, तो आज वह इन फलों का स्वाद कैसे ले रहा होता।इस संबंध में एक बड़ी रोचक कथा है। किसी गांव में एक सत्तर-बहत्तर वर्ष की आयु का एक बुजुर्ग रहता था। वह शाम को एक निश्चित समय पर रोज टहलने निकलता था। काफी दूर तक टहलने के बाद लौट आता था। उस बुजुर्ग के घर से थोड़ी ही दूर पर एक नया परिवार रहने आया था। उस परिवार में दस-बारह साल का एक किशोर भी रहता था। वह उस बुजुर्ग को रोज टहलने निकलते देखकर सोचता था कि बुजुर्ग आखिर नियत समय पर ही क्यों टहलने निकलता है।
एक दिन वह उस बुजुर्ग के पीछे-पीछे चल पड़ा। उसने देखा कि कुछ दूर जाने के बाद उस बुजुर्ग ने एक बड़े पत्थर के पीछे रखी एक छोटी सी बाल्टी निकाली और थोड़ी दूर पर स्थित तालाब से पानी भरा। पानी भरने के बाद वह छोटे-छोटे फलदार पौधों की सिंचाई करने लगा। सारे पौधों की सिंचाई करने के बाद जब वह बुजुर्ग लौटने लगा, तो उस किशोर ने उससे पूछा, बाबा! जब तक यह पौधे बड़े होंगे और फल देने लायक होंगे, तब तक तो शायद आप इस दुनिया में नहीं रहेंगे। तो फिर इन पौधों को पानी क्यों दे रहे हैं?
उसकी बात सुनकर बुजुर्ग मुस्कुराया। बोला, मैंने जीवन भर जिन फलों का स्वाद लिया, उन पौधों को तो मैंने नहीं लगाया था। मैं इन पौधों को इसलिए सींच रहा हूं ताकि आने वाली पीढ़ी को फल खाने को मिल सके। यह सुनकर किशोर बहुत प्रभावित हुआ और उसने भी पौधरोपण की प्रतिज्ञा की।