Friday, January 2, 2026

क्लास में हमेशा अव्वल रहे सत्येंद्र नाथ बोस

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गॉड पार्टिकल बोसान का नाम इधर कुछ वर्षों से काफी चर्चा में है। बोसान नाम जिस वैज्ञानिक के नाम पर दिया गया था, वह भारतीय थे। उनका नाम सत्येंद्र नाथ बोस था। यह प्रतिभाशाली वैज्ञानिक एक जनवरी 1894 को कोलकाता में पैदा हुआ था। इन्हें दुनिया के महान वैज्ञानिकों में गिना जाता है। बोस की प्रारंभिक शिक्षा घर के पास ही चल रहे एक साधारण स्कूल में हुई थी। 

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सत्येंद्र नाथ कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ने गए। बोस स्कूली शिक्षा से लेकर उच्चतर कक्षाओं में सर्वाधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों में रहे। कहा जाता है कि जब वह स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तो उन्होंने गणित के हर प्रश्न के कई तरीके से हल किया था। 

उनकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर उनके गणित के अध्यापक ने सौ में से एक सौ दस अंक प्रदान किए। जब स्कूल के प्रिंसिपल ने अध्यापक से इसका स्पष्टीकरण पूछा, तो अध्यापक ने सारी बात बताते हुए कहा कि एक दिन यह लड़का बहुत बड़ा वैज्ञानिक बनेगा। उस अध्यापक की बात सच निकली। उन्होंने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी शोध किए। उनकी खोज से मानवता की काफी सेवा हुई। 

गणितज्ञ और भौतिकशास्त्री बोस को तार्किक भौतिकी में काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। बोस को दुनिया के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ काम करने का भी मौका मिला। अपने वैज्ञानिक कार्यों की वजह से वह रायल सोसाइटी के सदस्य बनाए गए। भारत सरकार ने भी 1954 में उन्हें पद्म विभूषण अलंकरण से सम्मानित किया। शांति निकेतन में विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए उन्होंने 4 फरवरी 1974 को देह छोड़ दिया था। यह विज्ञान की बहुत बड़ी क्षति थी।

बाढ़ से निपटने की सैनी सरकार ने अभी से शुरू की तैयारियां

अशोक मिश्र

इन दिनों पूरे उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। पिछले कई दिनों से उत्तर भारत कोहरे की सफेद चादर से ढका हुआ है। ऐसे मौसम में अगर सूखा और बाढ़ राहत के संदर्भ में बात की जाए, तो जरूर अटपटा लगेगा। बाढ़ या सूखा लाने वाला मौसम आने में अभी लगभग छह महीने बाकी है। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अभी से सूखा और बाढ़ राहत के मामले से निपटने की अभी से तैयारियां शुरू कर दी है। पिछले साल पंजाब और हरियाणा में आई बाढ़ की वजह से एक बहुत बड़ी आबादी प्रभावित हुई थी। 

हरियाणा के कई जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। फसलों को काफी नुकसान हुआ था। ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो, इससे निपटने के लिए सैनी सरकार ने बंदोबस्त करने शुरू कर दिए हैं। मुख्यमंत्री ने बुधवार को हरियाणा राज्य सूखा राहत एवं बाढ़ नियंत्रण बोर्ड की बैठक में साफ तौर पर कहा कि बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी सभी परियोजनाओं की नियमित मानीटरिंग की जाए और जो कार्य पिछले साल के अधूरे रह गए हैं, उन्हें जल्दी से जल्दी पूरा किया जाए। 

इसके साथ-साथ मुख्यमंत्री ने प्रदेश की 388 बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए 637 करोड़ की मंजूरी भी प्रदान कर दी है। इसमें जिला उपायुक्तों द्वारा प्रस्तावित की गई 102 करोड़ रुपये की 59 परियोजनाएं भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री ने बैठक में मौजूद अधिकारियों से कहा भी कि वर्ष 2023 और 2025 में राज्य के विभिन्न इलाकों में जलभराव और बाढ़ ने लोगों का जीवन अस्तव्यस्त कर दिया था। लोगों और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसी स्थिति भविष्य में न आए, इसके लिए जरूरी है कि बाढ़ से निपटने की तैयारियां अभी से शुरू कर दी जाएं। ड्रेनों की सफाई की व्यवस्था तत्काल की जाए। 

जहां भी जरूरत हो, ड्रेनों की सफाई अभी से शुरू कराई जाए, ताकि समय आने पर किसी किस्म की अफरातफरी का सामना न करना पड़े। इतना ही नहीं, नदियों के तटबंधों को भी मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। नदियों के तटबंधों को मजबूत करने के लिए स्टोन स्टड नई तकनीक से लगाए जाएं ताकि बाढ़ की स्थिति में तटबंधों में कटाव न हो। इसके लिए जरूरत हो तो उत्तर प्रदेश की तर्ज पर ही स्टोन स्टड लगाए जाएं। सैनी सरकार इस बार समय से पहले सूखा राहत और बाढ़ नियंत्रण को लेकर सतर्क हो गई है। 

बजरी से भरे बोरों की भी व्यवस्था करने के निर्देश अभी से ही दिए गए हैं। इस दौरान उन परियोजनाओं पर भी निगाह डाली गई जो पिछले साल पूरी नहीं हो पाई थीं। इन परियोजनाओं को जल्दी से जल्दी पूरा करने को कहा गया है। भविष्य में जिन परियोजनाओं पर काम होना है, वह उसके टेंडर जनवरी माह में ही निकालने के भी दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं। बाढ़ से निपटने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं।

Thursday, January 1, 2026

मौत के बाद प्रसिद्ध हुए फ्रांज काफ्का


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बीसवीं सदी में कहानियों, लघु कथाओं और उपन्यास के मामले में जर्मनी के लेखक फ्रांज काफ्का महान माने जाते हैं। 3 जुलाई 1883 को  काफ्का का जन्म एक जर्मन यहूदी परिवार में हुआ था। काफ्का के पिता हरमन्न काफ्का जर्मनी में एक दुकान चलाते थे। वह बहुत क्रूर किस्म के दुकानदार थे। उनकी मां जूली दुकान में अपने पति का हाथ बंटाती थीं। 

काफ्का ने भी बड़े होने पर बीमा कंपनी में नौकरी की थी। जिस दौर में काफ्का का जन्म हुआ था, प्रगतिशीलता धीरे-धीरे जन्म ले रही थी। उनके लेखन में भी आधुनिकता काफी देखने को मिलती है। उनके समकालीन समीक्षकों ने काफ्का को बीसवीं सदी के महान साहित्यकारों में से एक माना है। दुनिया के साहित्यकारों में काफ्का शायद पहले व्यक्ति हैं जिनको मरने के बाद प्रसिद्धि मिली। 

अपने जीवनकाल में वह बहुत कम चर्चित रहे। वह जीवन भर अपने लेखन को छापने और पढ़ने के अयोग्य मानते रहे। उनका मानना था कि उनके लेखन में कोई नई और विशेष बात नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने अपने घनिष्ठ दोस्त इस्राइली लेखक, संगीतकार और पत्रकार मैक्स ब्राड से जीवन के अंतिम दिनों में अपनी पांडुलिपियां सौंपते हुए कहा था कि इसे जला देना, यह पाठकों के पढ़ने योग्य नहीं है। 

असल में काफ्का को जीवन के अंतिम दिनों में तपेदिक रोग हो गया था। उनकी मौत के बाद ब्राड ने मित्र के अनुरोध को अस्वीकार करते हुए साहित्य को प्रमुखता दी। उन्होंने उनकी पांडुलिपियों को संशोधित करके प्रकाशित किया। द ट्रायल, अमेरिका और द कैसल जैसे उपन्यासों ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। लोगों ने उनकी मौत के बाद उनके लेखन को पहचाना। वह मरने के बाद प्रसिद्ध हो गए।

नए साल पर वही संकल्प लें जिसको पूरा कर सकें

अशोक मिश्र

नया साल 2026 आपके दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। नई आशा, नए उमंग और उल्लास के साथ पूरी दुनिया नए वर्ष का स्वागत कर रही है। पहली जनवरी केवल तारीख बदलने का अवसर नहीं है। यह बीते वर्ष की समीक्षा का भी मौका होता है। पीछे मुड़कर पिछले साल की गई गलतियों को जानने और समझने का भी अवसर होता है। ऐसा नहीं है कि पिछले साल केवल गलतियां ही गलतियां हुई थीं। 

कुछ ऐसा भी हुआ होगा जिसने हमें प्रसन्नता दी होगी, खुश होने का मौका दिया होगा। कुछ ऐसी भी घटनाएं हुई होंगी, जो सुखद होने के साथ-साथ हमें जीवन भर याद रहेंगी। उपलब्धियों को यों ही बिसार पाना, इतना आसान नहीं है। ऐसे अवसरों को दिलोदिमाग में सहेज कर रखने की जरूरत है। ऐसे क्षण जीवन की थाती बनकर रह जाते हैं। नया साल हमें इस बात का भी अवसर उपलब्ध कराता है कि हम यह पता करें कि पिछले साल हमने जो संकल्प लिए थे, वे कितने पूरे हुए। 

अगर पूरे नहीं हुए, तो उसके कारण क्या थे? हमने कहां गलती की। किस वजह से हमारे संकल्प पूरे नहीं हुए। बीता हुआ वर्ष हमें यही सिखाता है कि इस साल हमें वो गलतियां नहीं करनी है जो पिछले साल कर चुके हैं। बीता साल भी हमें उतना ही प्यारा होना चाहिए जितना नया वर्ष है। बीते हुए साल ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। विपरीत परिस्थितियों से लड़ना, हार न मानना और अपनी जिजीविषा को हर हालत में कायम रखना। एक शिक्षक की भूमिका निभाकर बीता साल चला गया। 

बीते साल ने जो कुछ दिया, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। बीते साल में जो कुछ दुख मिले, तकलीफें झेलीं, उसको भूलकर अब आगे बढ़ने का अवसर आ गया है। यही नए साल का संदेश भी है। बीती बातों को मन में बोझ की तरह ढोने से कोई फायदा नहीं है। उन्हें भुलाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। आत्ममंथन करके ही सपनों की नींव को रखा जा सकता है। अब बारी आती है नए साल पर संकल्प लेने की। कोई जरूरी नहीं है कि बड़े संकल्प लिए जाएं। संकल्प वही लिए जाएं, जिन्हें पूरा कर सकते हैं। 

लोगों को दिखाने या जोश में आकर बड़े-बड़े संकल्प ले लिए और बाद में पता चला कि इसे पूरा नहीं किया जा सकता है। ऐसे संकल्प लेने का कोई फायदा नहीं है। पहले लक्ष्य तय कीजिए। नए साल में हमें करना क्या है? जो हमें करना है, उसको कैसे किया जा सकता है। नया वर्ष केवल व्यक्तिगत बदलाव का समय नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का भी समय है। हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी समस्याओं से हम अछूते नहीं रह सकते। छोटे-छोटे प्रयास—जैसे ईमानदारी, संवेदनशीलता, पर्यावरण के प्रति जागरूकता—समाज को बेहतर बना सकते हैं। अगर हर व्यक्ति नए साल में केवल एक अच्छी आदत अपना ले तो बदलाव अपने आप दिखने लगेगा।

Wednesday, December 31, 2025

राजेंद्र बाबू ने कर्ज लेकर किया भतीजी का विवाह

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दहेज आज भी गरीब और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। आजादी से पहले और आज भी दहेज की वजह से बहुत सारी लड़कियां अविवाहित रह जाती हैं। इस समस्या से मुक्ति के लिए अब कुछ संस्थाओं ने सामूहिक विवाह का आयोजन करना शुरू कर दिया है, ताकि गरीब परिवार की लड़कियों का भी विवाह कराया जा सके।

ऐसे वैवाहिक आयोजनों में कुछ अमीर लोग और संस्थाएं आर्थिक मदद करती हैं ताकि आयोजन संपन्न हो सके। कुछ लोग तो भारी भरकम रकम कर्ज लेकर भी अपनी कन्या क विवाह करते हैं। ऐसी ही पीड़ा देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी झेलना पड़ा था। 

बात तब की है, जब उनके पिता का निधन हो गया था। कुछ समय बाद उनकी मां भी चल बसीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिन्हें लोग बड़े प्यार से राजेंद्र बाबू भी कहते थे, दो भाई थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद की बेटी विवाह योग्य हो चुकी थी। उन दिनों आमतौर पर लोग अपनी बेटियों का विवाह 14-15 साल की आयु में कर दिया करते थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद को तीन महीने पहले ही अध्यापक की नौकरी मिली थी। 

जमींदारी थी, लेकिन उससे केवल इतनी आय होती थी कि रहने खाने की व्यवस्था हो जाए। नतीजा यह हुआ कि दोनों भाइयों को कर्ज लेकर बेटी की शादी करनी पड़ी। कर्ज लेकर भतीजी की शादी करने की पीड़ा राजेंद्र बाबू को आजीवन सालती रही। उन्होंने आगे चलकर दहेज प्रथा के खिलाफ सक्रिय अभियान चलाया।  उन्होंने युवकों से यह शपथ पत्र भरवाया कि वह दहेज लेकर विवाह नहीं करेंगे। यदि लेना भी पड़ा, तो 51 रुपये से अधिक दहेज नहीं लेंगे। दहेज का दानव आज भी न जाने कितनी महिलाओं की बलि ले रहा है।

पूरी दुनिया की संपदा से भी नहीं चुकाया जा सकता मां की ममता का मोल


अशोक मिश्र

दुनिया की सभी भाषाओं में मां के लिए जो भी शब्द प्रचलित हों, वह उस भाषा के सबसे पवित्र शब्द है। मां अपनी संतान को नौ महीने पेट में रखने के बाद जब जन्म देती है, तो वह जिस पीड़ा से गुजरती है, उसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता है। मां कैसी भी हो, अपने बच्चे को अटूट प्यार देती है। अगर कहीं बच्चे को चोट लग जाए, तो सबसे पहले मां को ही दर्द महसूस होता है। 

मां अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती है। समाज में कई ऐसी घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं कि मां अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए अपना तन तक बेच देती है। इसके बड़ा बलिदान कोई दूसरा नहीं हो सकता है। मां की ममता का एक उदाहरण फरीदाबाद में देखने को मिला। 

फरीदाबाद की संजय कालोनी निवासी रीना की बेटी को रविवार की दोपहर में पेट दर्द हुआ। वह अपनी बच्ची को बीके अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लेकर पहुंची। अस्पताल में मौजूद डॉक्टर ने उसकी जांच के बाद बताया कि बच्ची की यहां आने से पहले ही मौत हो चुकी है। डॉक्टर ने कागजी कार्रवाई करते हुए बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया। इसके बाद भी रीना को यही लग रहा था कि उसकी बच्ची जिंदा है। डॉक्टर से जांचने में कोई गलती हुई है। मां की ममता यह मानने को तैयार ही नहीं थी कि उसकी बेटी की मौत हो चुकी है। वह छटपटा रही थी कि क्या किया जाए? 

उसने अंत में फैसला लिया और मॉर्च्युरी से अपनी बेटी का शव उठाया और उसे लेकर निजी अस्पताल की ओर भाग खड़ी हुई। मॉर्च्युरी में मौजूद लोगों ने इसका विरोध भी किया। लेकिन रीना नहीं मानी। निजी अस्पताल में पहुंचने पर वहां के डॉक्टरों ने भी वही बात बताई जो बीके अस्पताल के डॉक्टर बता चुके थे। इधर बीके अस्पताल के कर्मचारियों ने पुलिस को सूचित कर दिया। पुलिस ने आकर सब कुछ संभाला। बच्चे के प्रति मां की इस ममता ने कई लोगों को द्रवित कर दिया। 

अफसोस की बात यह है कि यही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी मां और पिता के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके मां-बाप ने उनके लिए किया ही क्या है? देश में दिनोंदिन बढ़ रहे वृद्धाश्रम इस बात की गवाही देते हैं। बच्चे बड़े होकर नौकरी या रोजगार करने के लिए जब मां-बाप से दूर चले जाते हैं, तो वह धीरे-धीरे अपने माता-पिता के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। ऐसा सभी बच्चे नहीं करते हैं। ऐसा करने वाले मुश्किल से कुछ ही प्रतिशत होंगे। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि बूढ़े माता-पिता अपने घर से दूर जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन बच्चों की मजबूरी यह होती है कि उनको नौकरी ही दूसरे जिले या राज्य में मिलती है। ऐसी दशा में उनके लिए अपने माता-पिता को अकेला छोड़ना मजबूरी हो जाती है।

सचमुच, लालच बहुत बुरी बला है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि लोभ सबसे बुरी बला है। लोभ के वशीभूत होकर लोग अपना नुकसान करा बैठते हैं। कई बार लोभ इतना भारी पड़ता है कि लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। कुछ मामलों में तो यह भी देखा गया है कि लालच के चक्कर में लोग अपना कमाया हुआ धन भी गंवा बैठते हैं। इसके बावजूद लोग सबक नहीं लेते हैं। 

इस संदर्भ में एक रोचक कथा कही जाती है। यह घटना सत्य घटना नहीं, बल्कि केवल एक कथा ही है। किसी राज्य के राजा के दरबार में एक कर्मचारी था। वह किसी काम से एक जंगल की ओर से गुजर रहा था। जंगल के बीचो बीच पहुंचने पर उसे एक आवाज सुनाई दी। 

उसने ध्यान लगाकर बात सुनने की कोशिश की। उसे लगा कि कोई कह रहा है कि सात घड़ा धन लोगे? उसने इधर उधर देखा, लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं दिया। एक बार उसने साहस किया और बोला, हां, लूंगा सात घड़ा धन। तब उसे दोबारा आवाज सुनाई दी। उस आवाज ने कहा कि सात घड़ा धन तुम्हारे घर पहुंच चुका है। घर जाकर देख लेना। उसे संभालकर रखना।

 जिस काम के लिए वह आदमी जा रहा था, उसे जल्दी-जल्दी निपटाया और घर पहुंच गया। घर जाकर उसने देखा कि छह घड़ा तो भरा हुआ है। लेकिन सातवां घड़ा खाली है। उसने सोचा कि मैं इस घड़े को भर दूंगा। उसने अपने घर के सारे जेवर उस घड़े में डाल दिया। घड़ा नहीं भरा। उसने राजा से वेतन बढ़ाने को कहा। राजा ने वेतन दो गुना कर दिया। फिर भी वह गरीब ही बना रहा। एक दिन राजा ने उससे पूछ लिया कि क्या तुम्हें सात घड़ा धन तो नहीं मिल गया है? उसने कहा, हां महराज। राजा ने कहा कि उससे छुटकारा पा लेने में ही भलाई है। उस आदमी ने धन से छुटकारा पाया, लेकिन उसका अपना धन भी चला गया।

सबसे बड़ी जरूरत अरावली क्षेत्र को संरक्षित करने की है


अशोक मिश्र

संतोष की बात यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने 20 नवंबर के अपने ही फैसले पर रोक लगा दी है। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से गुजरात, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान में आंदोलन कर रहे पर्यावरण प्रेमी और जागरूक नागरिकों ने चैन की सांस ली है। अब उनकी निगाहें 21 जनवरी 2026 को होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई है। सुप्रीमकोर्ट भविष्य में अरावली को लेकर क्या फैसला देता है, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीमकोर्ट करोड़ों लोगों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने पुराने फैसले को पलट देगा और लोगों को स्थायी रूप से राहत प्रदान करेगा। 

इस मामले में पर्यावरणविदों का मानना है कि सवाल यह नहीं है कि कितनी ऊंचाई वाली पहाड़ियां अरावली क्षेत्र में मानी जाएंगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि संपूर्ण अरावली क्षेत्र को ही संरक्षित किया जाए। उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए। सौ मीटर वाली परिभाषा में यह आशंका थी कि सौ मीटर से नीचे की पहाड़ियों पर खनन के लिए सरकारें इजाजत दे देंगी। रियल एस्टेट, खनन और वन माफियाओं को अरावली को तहस नहस करने का लाइसेंस मिल जाएगा। 

लोगों का यह भी मानना था कि अरावली क्षेत्र में जिन राजनेताओं, उद्योगपतियों और रियल एस्टेट से जुड़े लोगों ने अपने रिसार्ट, मैरिज हाल और भव्य मकान बना रखे हैं, उनको वैधता मिल जाएगा। इसी साल कोर्ट के आदेश पर अरावली क्षेत्र में अवैध रूप से बनाए गए पक्के निर्माणों को ढहा दिया गया था। तब यह भी बात उठी थी कि कुछ रसूखदार लोगों के पक्के निर्माण को नहीं गिराया गया है।  इससे लोगों में काफी आक्रोश था। यही वजह है कि जब सुप्रीमकोर्ट ने सौ मीटर वाली परिभाषा दी, तो लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। अरावली पर्वत शृंखलाओं से जुड़े चारों राज्यों में लोगों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।

इन चारों राज्यों में रहने वाले करोड़ों लोगों का मानना है कि यदि अरावली पर्वतमाला सुरक्षित रहेगी, तभी लोगों को स्वच्छ वायु सांस लेने के लिए मिलेगी। अरावली है, तो हम हैं। लोगों का यह सोचना सही भी है। करोड़ों साल से अरावली पर्वत शृंखलाएं यहां के लोगों को प्राणवायु प्रदान करती रही हैं। राजस्थान से उठने वाले रेत के बवंडर को अपनी सीमा के बाहर ही रोककर अरावली ने चारों राज्यों को रेगिस्तान होने से बचा लिया है। अरावली क्षेत्र में उगने वाले पेड़-पौधों ने जलवायु परिवर्तन की गति को भी काफी हद तक धीमा कर रखा है। 

अरावली बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे लोगों की मांग है कि सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक एक्सपर्ट कमेटी गठित करे जो पूरे अरावली क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट पेश करे। इस रिपोर्ट के आधार पर ही अरावली के बारे में भविष्य में फैसले लिए जाएं।

Monday, December 29, 2025

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती का वास्तविक नाम मुंशीराम विज था। श्रद्धानन्द को प्रखर शिक्षाविद, स्वाधीनता संग्राम सेनानी और आर्य समाज के संन्यासी के रूप में माना जाता है। उनमें धार्मिक कट्टरता तो रंच मात्र भी नहीं थी। स्वामी जी का जन्म 22 फरवरी 1856 को जालंधर जिले में एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में यूनाइटेड प्रॉविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। 

युवावस्था में वह ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे, लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रवचन सुनने के बाद वह आर्य समाजी हो गए। एक बार की बात है। हकीम अजमल खां अपने साथियों के साथ स्वामी श्रद्धानन्द से मिलने गुरुकुल पहुंचे। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना ही स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती ने की थी। 

जब अजमल खा गुरुकुल पहुंचे, तो उस समय वहां हवन चल रहा था। आश्रम के लोगों ने अजमल खा और उनके साथियों से कहा कि आप लोग थोड़ा इंतजार करें। इस समय हवन चल रहा है। फुरसत पाते ही स्वामी जी आपसे मुलाकात करेंगे। अजमल खां एक जाने-माने यूनानी चिकित्सक थे और बाद में वह कांग्रेस के पांचवें मुस्लिम अध्यक्ष चुने गए थे। जब हवन खत्म हुआ, तो स्वामी जी ने लोगों से कहा कि खाने का समय है, चलिए पहले भोजन कर लीजिए, फिर बातें करते हैं। 

इस पर कुछ लोगों ने कहा कि हमारे नमाज का वक्त हो गया है। हम नमाज के बाद ही भोजन करेंगे। कोई जगह बता दीजिए, जहां नमाज पढ़ सकें। स्वामी जी उन्हें यज्ञशाला में ले गए और बोले, यहीं नमाज पढ़ लीजिए। लोगों ने कहा कि अरे, यह आपकी यज्ञशाला है। हिंदुओं को बुरा लगेगा। स्वामी ने कहा कि यह पूजा स्थल है। तो पूजा ही होगी। चाहे हिंदू यज्ञ करे या मुसलमान नमाज पढ़े।

नए साल में फिरौती, कांट्रैक्ट किलिंग पर रोक लगाएगी हरियाणा पुलिस

अशोक मिश्र

किसी भी देश या राज्य को अपराधविहीन बना पाना लगभग असंभव है। हां, संगठित अपराधों को पुलिस, खुफिया विभाग और जागरूक नागरिकों के सहयोग से रोका जा सकता है। कम किया जा सकता है। पिछले काफी दिनों से हरियाणा पुलिस अपराधियों, फरार अपराधियों और नशा तस्करों के खिलाफ बाकायदा मुहिम चला रही है। काफी हद तक पुलिस को सफलता भी मिली है। कई वर्षों से फरार चल रहे अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। 

राज्य में छोटे से लेकर बड़े अपराधियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने का भी प्रयास किया जा चुका है। अपनी सफलता से उत्साहित हरियाणा पुलिस नए साल में अपराधियों पर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है। इस संदर्भ में मधुबन पुलिस अकादमी में राज्य स्तरीय बैठक आयोजित की गई है। इस बैठक में प्रदेश  के सभी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भाग लेंगे और अपराध पर लगाम लगाने की योजनाओं पर विचार विमर्श करेंगे। इस बैठक में वर्ष 2025 में पुलिस की ओर से चलाई गई मुहिम की समीक्षा की जाएगी। 

पता लगाया जाएगा कि पुलिस के प्रयास में कहां कमी रह गई। उनके प्रयास कितने सफल रहे। कहां अभी और प्रयास करने की गुंजाइश है। इसके बाद नए साल में नए जोश और उमंग के साथ प्रदेश के अपराधियों को उनके किए की सजा दिलाने की योजना बनाई जाएगी। प्रदेश अपराध मुक्त हो सके, इसकी युक्ति खोजी जाएगी। संगठित अपराध को रोकने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। यह भी सच है कि असंगठित अपराध पर अंकुश लगा पाना लगभग असंभव होता है। 

यदि कोई व्यक्ति राह चलते किसी व्यक्ति से टकरा जाए और क्रोध में आकर वह टकराने वाले व्यक्ति की हत्या कर दे, ऐसे अपराध को रोक पाना असंभव सा है। हर गली, हर नुक्कड़, हर चौराहे और हर मकान या व्यक्ति के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती है। क्षणिक उत्तेजना में होने वाले अपराध को किसी भी देश या प्रदेश में होने से नहीं रोका जा सकता है। हां, ऐसे अपराध होने के बाद के बाद दोषी को जल्दी से जल्दी सजा दिलाने का प्रयास जरूर पुलिस को करना चाहिए। 

नए साल में पुलिस का प्रयास रहेगा कि फिरौती काल, कांट्रैक्ट किलिंग और आनर किलिंग जैसे अपराध पर लगाम लगाई जाए। जेलों या विदेश में बैठे अपराधी सोशल मीडिया के माध्यम से अपराध को अंजाम देते हैं। ऐसे अपराधियों और अपराधों पर अंकुश लगाना पुलिस की पहली प्राथमिकता हो सकती है। इसके लिए सबसे पहले पुलिस को अपना नेटवर्क चुस्त दुरुस्त करना होगा। खुफिया विभाग को भी अपना जनसंपर्कबढ़ाना होगा, ताकि समय पर होने वाले अपराध के बारे में पता लग जाए और अपराध को रोका जा सके। बैठक में संगठित अपराध, नशा तस्करी, साइबर क्राइम आदि रोकने पर भी चर्चा हो सकती है।