अशोक मिश्रकल सावन का पहला सोमवार था। शिवालय में भक्तों की भारी भीड़ जुटी हुई थी। अपने आराध्यदेव की भक्त पूजा-अर्चना करके देश, प्रदेश और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे। इसी के साथ-साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में सावनी लोकगीतों की भी धुन सुनाई देने लगी है। सभी प्रदेशों के सावन से जुड़े लोकगीतों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, माधुर्य है और लालित्य है। हरियाणवी लोकगीतों का तो कहना ही क्या है! आषाढ़ की तपिश के बाद जब पहली फुहार पड़ती है तो खेत, बाग और आंगन सब एक साथ भीगते हैं, मिट्टी की सोंधी खुशबू से सारा परिवेश महक उठता है।
उसी भीगेपन और सोंधी खुशबू से फूटते हैं सावन के लोकगीत। लोकगीत हरियाणा की औरतों की अपनी डायरी रहे हैं। इनमें उनकी खुशी है, तो दुख भी दर्ज है। नवविवाहिताओं के अपने प्रिय से मिलन है, तो सावन में पीहर लौटने की वजह से विरह की पीड़ा भी समाहित है। इन लोकगीतों में बाग में डले झूले की पींग है, तो नई बहू की तीज की कोथली की आस है। बहू की सास से बाग में झूला डलवाने का मीठा उलाहना है। जहां बहू अपनी सास से मनुहार करती है कि ‘आया री सासड़ सावन मास’। वहीं पीहर की गलियों की याद है जहां उसने अपनी सहेलियों, भाभियों और भाइयों-बहनों के साथ जीवन के सुखद दिन बिताए हैं।
अब हरियाणा की युवा गायिकाएं पुरानी बंदिशों को नए संगीत के साथ गा रही हैं। उन पर बेहतरीन नृत्य कर रही हैं। अपने नृत्य कौशल और पहनावे में हरी-हरी चूड़ियों, धानी चुनरिया और अमुआ की डाली वाले बिंबों को फिर से फैशन बना रही हैं। यह सही है कि सावनी गीतों की आत्मीयता घटी है, पर उनकी दृश्यता और पहुंच बढ़ी है। एक रील हजारों लोगों तक पहुंचकर उन्हें हरियाणा की पारंपरिकता से परिचय करवा रही है। पुराने गीतों की भाषा ठेठ हरियाणवी थी। उसमें अलंकार नहीं, सीधे-सीधे मन के भावों को व्यक्त करने की भावना थी। उनमें कोथली, पीहर, सासरा, बाग, मोर, पींग जैसे शब्द बार-बार आते थे।
प्राचीन लोकगीतों का उद्देश्य किस्से के माध्यम से अपनी पीड़ा और खुशी को व्यक्त करके मन को हल्का करना था। आज के सावनी गीतों में भाषा हिंदी-मिश्रित हरियाणवी हो गई है। इसका कारण यह है कि इन गीतों का बड़े पैमाने पर प्रसार हो सके, ज्यादा से ज्यादा दर्शक इसे देख-समझ सकें। वाद्ययंत्रों में भी काफी बदलाव आया है। संगीत में ढोलक के साथ कीबोर्ड, गिटार और डीजे बीट्स जुड़ गए हैं। अब गीत छोटे हो गए हैं दो-ढाई मिनट के, ताकि रील में फिट हो जाएं।
इसके बावजूद अच्छी बात यह है कि धुन वही पुरानी है। सावन का महीना आज भी हरियाणा की बेटी को पीहर की तरफ खींचता है। जब तक ‘सावन आया हे मां मेरी मैं सुण्या जी’ जैसी पंक्तियां किसी महिला के होंठों पर हैं, सावनी लोकगीतों की परंपरा हमेशा कायम रहेगी।
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