Tuesday, August 4, 2026

अब मैं राजकुल का सदस्य नहीं रहा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक पूरे देश में मानव धर्म का प्रचार किया। राज्य का त्याग किए हुए उन्हें बारह वर्ष हो चुके थे। एक दिन बुद्ध कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन के सामने भिक्षु के रूप में खड़े हो गए। शुद्धोधन उन्हें देखकर आश्चर्यचकित थे। जिसे चक्रवर्ती सम्राट बनना था, वह आज अपने पिता के सामने भिक्षु के रूप में खड़ा है। 

वह विचलित हो उठे और बोले, क्या यही हमारे कुल की परिपाटी है? अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम भिक्षु का रूप त्यागकर वापस लौट सकते हो। यह सारा राजपाट तुम्हारा ही है। अपने पिता की विह्वल वाणी को सुनकर भी बुद्ध धीर गंभीर बने रहे। उन्होंने कहा कि राजन! यह आपके कुल की परिपाटी नहीं है। यह बुद्ध के कुल की परिपाटी है। बुद्ध कुल में हर भिक्षु को अपनी क्षुधा पूर्ति के लिए भिक्षा मांगनी ही पड़ती है। मैं अब राजकुल का सदस्य नहीं रह गया हूं। मैं आत्म कल्याण और लोक मंगल की कामना से साधना में लगे भिक्षु समुदाय का परिजन हूं। 

महात्मा बुद्ध की बात सुनकर राजा शुद्धोधन की आंखों से आंसू बहने लगे। लेकिन उन्हें इस बात का संतोष था कि कम से कम उनका पुत्र जीवित सामने खड़ा है। उन्हें लगा कि अब अपने पुत्र को समझा-बुझाकर वापस राजकुल में नहीं ला सकते हैं। इससे अच्छा है कि उसे मुक्त कर दिया जाए। लेकिन उन्होंने कहा कि क्या तुम एक दिन मेरा आतिथ्य स्वीकार करोगे। 

बुद्ध ने कहा कि कल मैं अपने संघ के साथ आतिथ्य स्वीकार करने आऊंगा। अगले दिन नियत समय पर महात्मा बुद्ध राजभवन में पहुंचे और सभी परिजनों का उसी प्रकार अभिवादन स्वीकार किया जैसे वह संघ में रहकर करते थे। इसके बाद वह चले गए।

No comments:

Post a Comment