Friday, September 4, 2026

वक्कलि! यह सब कुछ क्षणभंगुर है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रावस्ती में वक्कलि नाम का ब्राह्मण रहता था। कहने को तो वह ब्राह्मण था, लेकिन गुण, कर्म और स्वभाव में ऐसी कोई बात नहीं थी जिससे उसका ब्राह्मणत्व झलकता हो। उसके मन मस्तिष्क में हमें रूप, यौवन और धन संबंधी बातें ही आती रहती थीं। उन्हीं दिनों श्रावस्ती के वेलुवन में महात्मा बुद्ध पधारे। वेलुवन में एक विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया। जिसने भी सुना कि श्रावस्ती में तथागत आए हुए हैं, वह उनके दर्शन को दौड़ा चला गया। 

धर्म सभा में अपार भीड़ उमड़ती थी। लेकिन तथागत की वाणी को सुनने के लिए वक्कलि नहीं गया। एक दिन उसके गांव के एक व्यक्ति ने उससे धर्म सभा में महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुनने के लिए चलने को कहा, तो वह बेमन से धर्म सभा में चला गया। महात्मा बुद्ध को देखते ही वह अचंभित रह गया। उसने अपने मन में कहा कि यही तो है जिसे वह खोज रहा था। 

वक्कलि ने उसी दिन महात्मा बुद्ध से बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की। महात्मा बुद्ध ने उसे दीक्षा तो दे दी, लेकिन वह समझ गए कि इसकी मनस्थिति धर्म की दीक्षा लेने लायक नही है। एक दिन वक्कलि ने तथागत से कहा कि भगवन! आप मुझे योगसाधना सिखाएं जिससे मैं भी आपकी तरह रूपवान हो जाऊं। आप जैसी ओजस्विता मुझ में भी आ जाए। आप जैसा नवयौवन मुझ में भी फूट पड़े। 

बुद्ध ने कहा कि रूपवान होने के लिए उपाय किए जा सकते हैं, शरीर को मजबूत करने के लिए योगासान सिखाया जा सकता है। लेकिन वक्कलि यह सब कुछ क्षणभंगुर है। एक दिन मिट जाएगा। आत्मोत्सर्ग का स्थायी साधन तो धर्म धारण है। वक्कलि को अपनी भूल का पता चल गया। उसने उसी दिन से आत्म सुधार और आत्म निरीक्षण की ओर ध्यान देना शुरू किया और एक दिन महान भिक्षु बन गया।

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