अशोक मिश्र
हरियाणा के विभिन्न जिलों में पार्कों की गिनती कम नहीं है। बच्चों के खेलने के लिए बहुत अधिक जगह है। कागजों पर हर जगह पर्याप्त पार्क हैं, पार्कों में खेलने के उपकरण हैं। हर कॉलोनी, हर सेक्टर, हर गाँव में पार्क दर्ज हैं, पर जमीन पर उतर कर देखो, तो सच्चाई आँखों में चुभती है। कहीं पार्क की चारदीवारी के भीतर किसी ने अपना सामान रख लिया है, कहीं किसी दबंग ने पक्का कमरा बना लिया है। कहीं दुकान सज गई है। जो थोड़ी बहुत हरियाली बची थी, वहाँ अब टाइल-पत्थर की पूजा-वेदी बन गई है, अगरबत्ती की खुशबू तो है पर बच्चों की किलकारी गायब है।सोच कर देखिए, जिस जगह पर कभी बच्चे दौड़ते थे, आज वहाँ अतिक्रमण का ताला लगा है। जहाँ अतिक्रमण नहीं हुआ, वहाँ के हालात तो और निराशा जनक हैं। पार्क में झूले तो खड़े हैं, पर उनकी चेन जंग खा चुकी है। फिसलपट्टी टूटी हुई है, झूला हिलाओ तो पूरा ढांचा कांपता है। किसी पार्क में एक ही झूला बचा है, जिस पर बारी के लिए बच्चों में झगड़ा होता है। कई पार्क तो ऐसे हैं जहाँ झूला लगा ही नहीं, सिर्फ नाम का घास का टुकड़ा है, जिसमें कचरा और काँटे ज्यादा हैं। खेल की जगह कम। बच्चा वहाँ जाए भी तो खेले क्या? एक उम्मीद स्कूलों से बंधती है, लेकिन उनकी भी दशा पार्कों से कम बदतर नहीं है।
स्कूलों में भी वही सूना मंजर है। नए-नए भवन बन गए, कमरे बन गए, पर खेल का मैदान कहीं खो गया। जहाँ थोड़ा बहुत मैदान बचा भी है, वहां घंटी तो बजती है पर खेलने की नहीं। अध्यापक कहते हैं सिलेबस पूरा करना है। अभिभावक कहते हैं सबसे ज्यादा नंबर लाने हैं। बच्चा बेचारा बस्ते के बोझ में दबा, कक्षा की चारदीवारों में कैद है। वह भीतर ही भीतर घुटता है। खिड़की से बाहर मैदान को देखता रहता है। उसका मन भागना चाहता है, पर उसे बैठना पड़ता है। अध्यापक का अनुशासन उसके मन की छटपटाहट पर भारी पड़ता है। गाँवों और मोहल्लों में तो हालत और कठिन है।
पहले जहां जोहड़ के पास, बाखल में, खाली पड़ी जमीन पर बच्चे गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कबड्डी खेल लेते थे, वहाँ अब प्लॉट कट गए हैं, मकान खड़े हो गए हैं। खेलने लायक एक इंच जमीन नहीं बची। नतीजा, हमारे बच्चे सड़क पर खेलने को मजबूर हैं। गली में दो ईंटों से विकेट बनता है, सड़क पर आती गाड़ी के हॉर्न से खेल रुकता है। माँ का दिल हर पल डरता है कि कहीं कुछ हो न जाए।
क्या यही बचपन है जो हमें उनको देना था? शायद नहीं। हमें उन्हें स्वस्थ जीवन देना था। जब बच्चा दौड़ेगा नहीं, कूदेगा नहीं, गिरेगा-उठेगा नहीं, तो उसका शरीर कैसे बनेगा। उसकी सांस कैसे गहरी होगी, उसकी आँखों में वह चमक कहाँ से आएगी? आज छोटे-छोटे बच्चों की आँखों पर चश्मा है, पीठ झुकी हुई है, थकान जल्दी आती है, क्योंकि उनके जीवन से खेल ही छीन लिया गया है। बच्चों को खेलने की जगह देना कोई एहसान नहीं है, यह उनका हक है, उनकी सांस है, उनका बचपन है।
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