बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध हमेशा तर्कशील रहे। उन्हें अनीश्वरवादी भी माना जाता है। जो बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरती थी, उसी बात को वह प्रश्रय देते थे। पाखंड और वितंडावाद से वह बहुत दूर रहते थे। यही वजह है कि उनके समर्थकों और शिष्यों की संख्या दिन रात बढ़ती जाती थी।एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ राजगृह के पथ पर जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गृहस्थ नहाने के बाद भीगे कपड़ों में ही सभी दिशाओं को प्रणाम करता जा रहा है। यह बात महात्मा बुद्ध की समझ में नहीं आई। उन्होंने सोचा कि इन दिशाओं को प्रणाम करने का आखिर औचित्य क्या है? उन्होंने आखिरकार उस गृहस्थ से पूछ ही लिया। बुद्ध ने पूछा, महाशय! इन छह दिशाओं की पूजा करने का निहितार्थ क्या है? इनकी पूजा क्यों करनी चाहिए?
गृहस्थ उनकी बात सुनकर भौंचक्का रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे। उसने कहा, मुझे इस बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। बुद्ध ने कहा कि बिना औचित्य जाने पूजा करने से क्या लाभ है? उस व्यक्ति ने कहा कि भंते! आप ही समझा दीजिए कि इन दिशाओं की पूजा क्यों करनी चाहिए। तब बुद्ध मुस्कुराए और बोले, पूजा करने की दिशाएं भिन्न हैं। माता-पिता और गृहपति के लिए पूर्व दिशा मानी गई है। आचार्य की दिशा दक्षिण, पत्नी और पुत्र की दिशा पश्चिम मानी गई है। मित्रादि के लिए उत्तर दिशा मानी जाती है। सेवक के लिए नीचे वाली दिशा और ब्राह्मण, श्रमण के लिए ऊंचाई वाली दिशा मानी गई है।
गृहस्थ ने कहा कि सेवक की पूजा क्यों? वह तो हम लोगों की पूजा करते हैं। बुद्ध ने कहा कि सेवकों की पूजा का मतलब उनके साथ सद्व्यवहार, वात्सल्यपूर्ण आचरण करना है। उनकी सेवा के बदले हाथ जोड़ना पूजा नहीं है। उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना ही पूजा है। गृहस्थ ने बुद्ध को नमन करते हुए कहा कि आज मुझे सच्चा ज्ञान प्रदान किया।
No comments:
Post a Comment