Tuesday, February 25, 2025

हमें सुख-दुख दोनों का परित्याग करना चाहिए

अशोक मिश्र

सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं। यह प्रकृति की द्वंद्वात्मकता है। प्रकृति में अगर प्रकाश है, तो यह निश्चित है कि कहीं न कहीं अंधकार मौजूद है। अगर प्रकृति में प्रकाश का महत्व है, तो उसका कारण अंधकार ही है। यदि अंधकार न हो, तो प्रकाश का कोई महत्व नहीं है। यही हालत मनुष्य के जीवन में आने वाले सुख-दुख का है। यदि जीवन में दुख है, तो वह स्थायी नहीं है। ठीक उसी तरह सुख भी स्थायी नहीं है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद के पास एक महिला आई और उसने स्वामी जी से कहा कि मैं जीवन से तंग आ गई हूं। मैंने जीवन भर दुख ही देखे हैं। जीवन भर संघर्ष किया है। कभी सुख का एहसास नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में मैं इस जीवन से ऊब गई हूं। मैं अब भगवान को पाना चाहती हूं। स्वामी जी कोई उपाय बताइए। 

यह सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अगर दुख है, तो कभी न कभी सुख जरूर आएगा। लेकिन जो व्यक्ति अपने जीवन में दुख ही दुख मानता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती है। 

उस महिला ने कहा कि मैं सचमुच दुखी हूं। तभी आपकी शरण में आई हूं। दुख मुझे घृणित और परेशान करने वाला लगता है। 

तब स्वामी विवेकानंद ने कहा कि जीवन में सुख और दुख लगे रहते हैं। कभी सुख आता है, तो कभी दुख। दुख और सुख दोनों घृणित हैं। दोनों मन में आसुरी प्रवृत्ति पैदा करते हैं क्योंकि दोनों जुड़वा भाई हैं। जो सुख और दुख की परवाह किए बिना संतुष्ट रहता है, उसे ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं। इनसे घबराना नहीं चाहिए। 

यह सुनकर महिला ने कहा कि मैं आपकी बात समझ गई। 

तब स्वामी जी ने कहा कि हमें सुख और दुख दोनों का परित्याग करना चाहिए।




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