अशोक मिश्र
क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब इंसान के ऊपर क्रोध हावी होता है, तो वह आगा-पीछा नहीं सोच पाता है। वह यह नहीं सोच पाता है कि उसके क्रोध करने से उसे और दूसरे लोगों को क्या नुकसान हो सकता है, परेशानी हो सकती है। जहां क्रोध होता है, वहां विवेक नहीं रह सकता है। विवेकहीन व्यक्ति को जीवन में सफलता भी नहीं मिलती है। क्रोधी व्यक्ति सफलता के लिए तरस जाता है। इस संदर्भ में एक कथा कही जाती है।
किसी गांव में एक संत रहते थे। संत लोगों की समस्याओं को अपनी शक्ति भर दूर करने का प्रयास करते थे। जो लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आते थे, वह उन कारणों की खोज करते और सामने वाले को उसका उपाय बता देते थे। एक दिन एक व्यक्ति संत के पास आया। उसने बाहर खड़े लोगों को पहले तो धकियाया। फिर उसने अपना जूता उतारना चाहा, लेकिन जूते के तस्मे (फीता) कसा हुआ था,तो जल्दी से नहीं निकला। उसे गुस्सा आ गया। उसने किसी तरह जूता निकाला और पैर पटकते हुए जूते को दूर फेंक दिया।
इसके बाद वह आगे बढ़ा और उसने दरवाजे को जोर से धक्का दिया। उसने संत को प्रणाम किया और कहा कि मैं आपको अपनी समस्या बताने आया हूं।
संत ने उसे देखते ही कहा कि तुम्हारी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। उस व्यक्ति ने पूछा-क्यों? संत ने कहा कि क्रोधी व्यक्ति की समस्या कोई नहीं सुलझा सकता। अभी तुमने बाहर अपने जूते पर अपने क्रोध प्रकट किया। उसके बाद दरवाजे पर। जाओ पहले उनसे माफी मांगो।
यह सुनकर उस व्यक्ति ने कहा कि वह तो वस्तु हैं। संत ने कहा कि यदि तुम जूते और दरवाजे को वस्तु मानते तो गुस्सा क्यों करते? जो अपने गुस्से पर काबू नहीं पा सकता है,उसकी कोई भी समसया हल नहीं सकती है। यह सुनकर वह चुप रह गया।
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